Saturday, December 18, 2021

अमेठी में राहुल

राहुल गांधी आज अमेठी में पदयात्रा करने के बाद एक अलग हीं अंदाज में नजर आये. जयपुर के बाद अमेठी में फिर से एक बार हिन्दू और हिंदूत्ववादी पर बात करके टीवीपुरम के लिए एक बार चर्चा का विषय फिर बना दिया। राहुल गांधी भी अब चर्चा में रहने का हुनर सिख हीं लिया है. उनके हालिया भाषणों से कुछ ऐसा ही मालूम पड़ता है. हिन्दू और हिंदुत्व के नरेटिव को जोड़ते हुए राहुल ने शानदार तुकबंदी का भी इस्तेमाल किया। उदाहरणस्वरूप महात्मा गांधी और गोडसे। जहां राहुल ने गांधी जी को हिन्दू के रूप में परिलक्षित किया तो वहीं दूसरी और गोडसे को हिन्दुत्वादी से जोड़ा। जहाँ मोदी जी के बनारस में अकेले गंगा स्नान को हिन्दुत्वादी से जोड़ा तो वहीं दूसरी तरफ कुम्भ और अर्धकुम्भ में करोणों लोगों को एक साथ स्नान करने की प्रक्रिया को हिन्दू से जोड़ा।
आज का राहुल गांधी का भाषण बहुत हीं रोचक और जोशीला था. अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि कांग्रेस भी बीजेपी के धर्म आधारित पिच पर खेलने का मन बना लिया है. ये तो अभी बानगी है. बीजेपी के अब राहुल का ये हमला या नया रूप निश्चित तौर पर अखरेगा। आम तौर पर कांग्रेस अब तक हिन्दू शब्द का प्रयोग करने से बचती नजर आ रही थी, लेकिन राहुल के हालिया बयानों ने बहुत कुछ साफ़ कर दिया है। राहुल गांधी वहां के लोगों के प्रति अपने भावों को कुछ इस तरह प्रकट करते हैं। अमेठी में राहुल गांधी ने कहा ,"कुछ दिन पहले प्रियंका ने कहा लखनऊ चलो,मैंने बहन से कहा लखनऊ जाने से पहले घर जाना चाहता हूँ और घर में पहले अपने परिवार से बात करना चाहता हूँ।"

राहुल गांधी के आज के कुछ मुख्य अंश -

गोड़से को जब फाँसी हुई थी तो उनके पैर काँप रहे थे क्योंकि वह हिन्दुत्ववादी थे। गांधी जी को तीन गोलियाँ लगी वह रोये नही , डरे नहीं सिर्फ़ हे राम कहा था क्योंकि वह हिन्दू थे। हिन्दू किसी से डरता नहीं है।
हिन्दुत्ववादी अकेला गंगा में स्नान करता है। 
हिन्दू करोड़ों लोगों के साथ गंगा में स्नान करता है। मोदी जी करते है मैं हिन्दू हूँ लेकिन सच्चाई की उन्होंने कहा रक्षा की ? जिसके दिल में लोगों के लिए प्यार नहीं वह हिन्दू नहीं हो सकता।
आप सबने देखा होगा जब मोदी जी छोटे तो मगरमच्छ से लड़ाई लड़ते थे लेकिन मुझे लगता है उन्हें तैरना ही नहीं आता।
मेरा भाषण TV पर 30 सेकेंड चलेगा, लेकिन ऐसा भाषण नरेंद्र मोदी ने दिया हो तो वो 6 महीने चलेगा. क्योंकि हम दो-हमारे दो। इनकी पार्टनरशिप है, धंधा है. नरेंद्र मोदी हिंदुस्तान का धन इन दोनों को देते हैं और ये दो नरेंद्र मोदी की मीडिया में 24 घण्टे मार्केटिंग करते हैं।


Wednesday, December 8, 2021

बिपिन रावत

दोपहर बाद जैसे हीं लोग टीवी या सोशल मीडिया को देखा होगा। एक खबर आँखों के सामने तैरने लगी होगी और वो खबर सीडीएस बिपिन रावत का हेलीकाप्टर तमिलनाडु के कुन्नूर जिले में दूर्घटनाग्रस्त होने की थी. जिसमें श्री रावत के अलावा उनकी पत्नी श्री समेत 14 लोग सवार थे. यह खबर हम देशवासियों के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी. हम सभी देशवासी उनकी सलामती की कामना कर रहें हैं. रावत जी किसी पहचान के मोहताज नहीं रहे हैं. उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें बहुत से वीरता पुरस्कार और अन्य प्रख्यात पुरस्कारों से भी समय-समय पर भारतीय सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है. फिर एक बार मैं भगवान से आशा करता हूँ कि वो सही सलामत फिर से हमारे बीच होंगे। हादसा काफी भयावह प्रतीत हो रहा है।
लेकिन शाम होते-होते एअर फोर्स ने उस बात को बताया जिसका किसी को कोई उम्मीद नहीं थी और वो थी बिपिन रावत उनकी धर्मपत्नी समेत हेलिकॉप्टर में सवार चौदह लोगों में से तेरह लोगों की शहादत हो गई है। यह खबर देशवासियों के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। रावत जी का सफर बहादुरी से भरा हुआ है। उनके न जाने कितने बहादुरी के किस्से हम देशवासियों के सामने है।

नमन आंखों से जनरल को नमन।

Friday, November 19, 2021

तीनों काले कृषि कानून वापस

जीता किसान, हारी घमण्डी सरकार।।
तीनों काले कृषि क़ानून केंद्र सरकार ने लिया वापस 

हमारे किसान भाईयों को प्रणाम. आज सुबह जैसे हीं अवतारी पुरुष श्री मोदी जी ने तीनों काले कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया. उनके इस ऐलान से करोङों किसान परिवारों के चेहरे ख़ुशी से खिल उठे. क्योंकि उन किसानों के सदस्य पिछले लगभग 355 दिनों से अपना घर बार छोड़कर दिल्ली की सीमाओं पर बैठे थे. तीन कृषि कानूनों पर चला किसान आंदोलन दुनिया के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक था. जिसमें लगभग 750 किसानों की मृत्यु हुई. इतने मृत्यु के बाद सरकार की नींद टूटी और काला कृषि क़ानून वापस लिया।
किसानों की जीत, सरकार की हार -
इन तीनों बिल का वापस होना किसानों के धैर्य, साहस, प्रतिज्ञा और अटल रहने की जीत है. लेकिन एक बात का दुःख है कि इसमें 750 किसानों की शहादत देश को देखना पड़ा. इस आंदोलन में करोड़ों लोगों की भागीदारी थी. लेकिन उनमें कुछ लोग प्रमुख थे. जिनके नाम क्रमशः राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, चढूनी, राजेवाला, दर्शन पाल सिंह, जोगिन्दर सिंह, माता सुरजीत कौर, नवदीप, दिशा रवि हैं. जो सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक किसान आंदोलन को मजबूत किया और उसको अंतिम अंजाम तक ले जानें में सफल हुए. मुझ जैसे युवा ने इतना विराट आंदोलन देखा जो सम्भवतः इस जिंदगी में अब दोबारा देखने को भी न मिलें। लेकिन धरती माँ के सपूतों ने दो ब्यक्तियों के घमंड को मिट्टी में मिला दिया.                 
राजनितिक मजबूरी या कुछ और -
यह कृषि क़ानून चार राज्यों में हुई उपचुनाव में बीजेपी की हार के बाद लिया गया. सरकार की एक हठ ने किसानों का बहुत नुकसान किया. सरकार को आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधान सभा के चुनाव में अपनी निश्चित हार दिखने लगी थी. जिससे हताश होकर सरकार को अपने हीं निर्णय पर पीछे मुड़ना पड़ा. जिस प्रधानमंत्री ने किसानों को "आन्दोलनजीवी" नाम की संज्ञा दी. वो इतनी आसानी से बिल वापस कैसे ले सकते थे ? बिल वापस लेने के पीछे किसानों के वोट का डर साफ़ देखा और समझा जा सकता है.
जो राजनितिक विशेषज्ञ किसानों को मवाली, गुंडा, खालिस्तानी, आतंकवादी बोलते थे. अब वापसी के बाद इस क़ानून के संदर्भ में किस मुंह से बात करेंगे ? अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार करे प्रवक्ता और गुल्लू एंकर मोदी के इस फैसले का कैसे बचाव करते हैं ? किसान इतनी जल्दी कुछ नहीं भूलता जो सरकार सोच रही है कि अब उसे बहला लिया जाएगा और ध्रुवीकरण की कोशिश को धार दिया जायेगा. तो सरकार को मैं बता दूँ कि किसान सालों पहले के डाई,यूरिया, पोटाश, जिंक, सल्फर की कीमत याद रखता है. उसे बरगलाया नहीं जा सकता है। इसलिए सरकार का ये फैसला विशुद्ध रूप से राजनैतिक कारणों से लिया गया है.

Wednesday, October 6, 2021

लखीमपुर खीरी में राहुल गांधी

दो दिन पहले लखीमपुर खीरी में किसानों के साथ हुए बर्बरता के संदर्भ में कांग्रेस प्रियंका गांधी के नेतृत्व में विपक्षी आवाज को बुलंद किया हुआ है। प्रियंका गांधी की मेहनत को धार देने के लिए राहुल गांधी भी आज लखीमपुर खीरी जा रहें हैं। राहुल दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि वह लखीमपुर खीरी जा रहे हैं। जैसे हीं उन्होंने लखनऊ एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरे। ये खबर योगी आदित्यनाथ के प्रशासन को लगी। उन्होंने तुरंत आनन-फानन में लखनऊ में निषेधाज्ञा लागू कर दिया। इसके बाद जब राहुल गांधी को लखीमपुर खीरी जानें से रोकने का प्रयास हुआ तो वह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेष बघेल के साथ एअरपोर्ट परिसर में हीं धरने पर बैठ गए।
राहुल गांधी केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री "टेनी' के काफिले से कुचल कर मारे गए किसानों को अपनी श्रद्धांजलि भेंट करने जाने वाले थे। इस घटना का विवरण मेरे इसके पहले वाले ब्लॉग में पढ़ने को मिल जाएगा। परमिशन मिलने के बाद राहुल गांधी प्रशासन के साथ लखीमपुर खीरी के लिए निकले। लेकिन वह पहले सीतापुर के अस्थाई जेल में कैद अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा से मिले फिर साथ में उनको लेकर किसानों के घर पहुंचे और उनका दर्द साझा किया। हिन्दुस्तान की राजनीति में राहुल गांधी एक विलक्षण प्रतिभा के नेता हैं। उनके ब्यक्तित्व को खराब करने में संघ/भाजपा ने बहुत बार कोशिश की, लेकिन राहुल गांधी के आभामंडल को वो धूमिल नहीं कर पाए। किसानों के हक में आवाज राहुल गांधी ने अपनी केन्द्रीय सरकार के दौरान भी उठाया था और वो जगह उत्तर प्रदेश का भट्टा परसौल गांव था। इसलिए लखीमपुर खीरी के मामले में राहुल की राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्हें एक जन हितैषी लड़ाके के रूप में जानने की कोशिश की जानी चाहिए।

Tuesday, October 5, 2021

प्रियंका गांधी

लखीमपुर खीरी में हुए किसानों के साथ बर्बरता के संबंध में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, उत्तर प्रदेश अध्यक्ष श्री अजय कुमार लल्लू और संदीप सिंह फिलहाल चालीस घण्टों से पुलिस की गिरफ्त में हैं। इन नेताओं की गिरफ्तारी का कोई वाजिब ज़बाब पुलिस की तरफ से नहीं आया है और न हीं इतने घण्टों की गिरफ्तारी के बाद इन नेताओं को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया है। इस तरह का आरोप खुद प्रियंका गांधी जी ने चिट्ठी लिखकर लगाया है। किसानों के साथ जितना क्रूर मजाक इस पापी भाजपा सरकार ने किया है, शायद इतिहास में उतना बड़ा पाप अंग्रेजी हुकूमत ने भी नहीं किया होगा।

आज उत्तर प्रदेश में किसानों की हक की लड़ाई में केवल कांग्रेस और प्रियंका गांधी वाड्रा हीं विपक्ष का सबसे बड़ा और विश्वसनीय ब्रांड बनकर उभरी हैं। कांग्रेस पार्टी किसानों की आवाज को आमजन तक बहुत आक्रामकता के साथ रख रही है। बीजेपी बेशक इसे विपक्ष की राजनीति कहे उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि अगर ऐसी राजनीति होती है तो वो देश और समाज के लिए शुभ हैं। यहां पर सरकार की तमाम शिथिलता जनता के सामने आ रही है।

इस किसान हत्याकांड में चार किसानों समेत आठ लोगों की हत्या की गई है। ऐसी खबर तमाम चैनलों और अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। लेकिन इन सब के बीच अखिलेश यादव और मायावती के नदारद रहने की भरपाई कांग्रेस और प्रियंका गांधी ने पूरा किया। किसानों की हत्या आने वाले चार महीने बाद होने वाले चुनाव में बीजेपी को बहुत नुकसान पहुंचाने वाला है। कांग्रेस और विपक्षी दल इस समय पूरी तरह से किसानों के साथ खड़ा है और संघ/बीजेपी मुखौटे के पिछे छिपने की कोशिश में हैं।

गिरफ्तारी के दौरान सीतापुर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लिखा गया कांग्रेस महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी का पत्र-





Monday, October 4, 2021

लखीमपुर खीरी

कल शाम मोदी कैबिनेट विस्तार में मंत्री बने टेनी जी ने अपने गृह क्षेत्र में सरकारी किसान सम्मेलन का आयोजन किया था। जिसमें प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य जी आने वाले थे। जिसकी भनक उस क्षेत्र के सच्चे किसानों को लगी। तो उन्होंने हेलीपैड को घेर लिया और यह सुनिश्चित किया कि मौर्य जी का विमान वहां उतर न सके। इतना सब होता रहा और किसानों और बीजेपी समर्थकों के बीच विवाद बढ़ता गया। दोपहर बाद एकाएक खबर आती है कि लखीमपुर खीरी में तीन किसानों की गाड़ी से कुचलने से मौत हो गई और अब उसकी संख्या बढ़कर दस तक हो गई है। जिसमें किसान और बीजेपी समर्थक भी शामिल हैं। जिस गाड़ी से रौंदने की खबर मिल रही है वो गाड़ी मंत्री जी के बेटे की थी। अतः कथित आरोपी मिश्रा जी के बेटे पर आरोप यह लगा कि वही गाड़ी चला रहे थे। गाड़ी से कुचलने के बाद उन्होंने बन्दूक और गोली भी चलाया और भागते बने। 
किसानों की हत्या की खबर देश भर में आग की तरह फ़ैल गई। तमाम राजनीतिक दलों और किसान संगठनों के लोग लखीमपुर खीरी जानें का ऐलान कर दिया। जिस वजह से शासन-प्रशासन के हाथ- पांव फूल गए। सभी नेताओं को सरकार पुलिस का उपयोग करते हुए नजरबंद या हाउस अरेस्ट करने लगी। लेकिन इनमें प्रियंका गांधी लड़ते-झगड़ते लखनऊ कौल निवास से निकल कर सीतापुर तक पहुंचने के बाद तड़के सुबह हिरासत में ले ली गई। अब तक वो हिरासत में हीं हैं, जबकि अखिलेश यादव समेत दूसरे राजनैतिक लोगों को रिहा कर दिया गया।
भाजपा की शासन में हीं क्यों किसानों के उपर इतने अत्याचार होते हैं ? ये कोई पहला अवसर नहीं है जब बीजेपी सरकार ने किसानों के उपर अत्याचार किया हो। इससे पहले 2018 मे शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने 'मन्दसौर' में किसानों के उपर गोलियां चलवाई थी। जिसमें आधा दर्जन से ज्यादा किसान शहीद हुए थे और किसानों पर गोली किसी नेता-मन्त्री का बेटा या समर्थक नहीं बल्कि मध्य प्रदेश की पुलिस ने चलाई थी। वो जख्म अभी भरा नहीं था कि उत्तर प्रदेश को फिर वही देखना पड़ा। जो हमारे लिए शर्म की बात है।

Wednesday, September 29, 2021

कपिल सिब्बल

पंजाब में सिद्धू ने क्या इस्तीफा दिया कांग्रेस का नमकहराम G-23 समूह एक बार फिर से सक्रिय हो गया है। सिब्बल ने आज शाम पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए नेतृत्व परिवर्तन की अपनी और अपने साथियों की पुरानी बातों को फिर से दोहराया और कांग्रेस आलाकमान को एक बार फिर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। सिब्बल ने सीधा आरोप लगाया कि कांग्रेस के पास कोई अध्यक्ष नहीं है। ये बात सत्य है लेकिन अधूरा। कांग्रेस के पास अन्तरिम अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी जी हैं। जिन्हें सी डब्लू सी की मीटिंग में इन्हीं महानुभावों ने चुना था। लेकिन अब अपनी बात से पलटने की कोशिश कर रहे हैं। निश्चित तौर पर कांग्रेस इस समय बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। इस संकट के वक्त में ये महान नेता बस कांग्रेस नेतृत्व की टांग खिंचने में लगे हुए हैं।
हमें याद करने की जरूरत है कि ये तथाकथित शूरवीर नेता जो 2004-2014 तक मंत्री बनकर सत्ता की मलाई खा रहे थे। उस वक्त इन्होंने पार्टी और संगठन में अपना कितना योगदान दिया ? बल्कि इन्हीं नाकाम लोगों की वजह से कांग्रेस सत्ता से दूर हुई और दहाई के आंकड़ों में आकर सिमट कर रह गई। इन्हें किसी भी कांग्रेसी निति से कोई मतलब नहीं था और न विचारधारा का प्रवाह इनके हृदय में था।
मैं भी कांग्रेस का समर्थक रहा हूं और 2004 से इन महान गैंग के नेताओं को अखबार और टीवी के माध्यम से देखता आया हूं और गांव में इनके विभागों में हुई अनियमितता तथा समर्थकों से संवादहीनता को भी महसूस किया हूं। कांग्रेस के लिए 2014 के चुनाव में भी जमीन पर सहानूभूति थी, लेकिन इन बेगैरत लोगों के लिए जबरदस्त नाराजगी थी। जिसका परिणाम कांग्रेस को बुरी तरह चुनाव हारकर चुकाना पड़ा। खुद सिब्बल साहब 2014 का चुनाव बुरी तरह से हार गए थे और किसी तरह उसी आलाकमान से सिफारिश लगवाकर राज्य सभा के सदस्य बने। उस वक्त इनका आत्मसम्मान शायद घास चरने गया था। सिब्बल गैंग के लोग कायल और डरपोक हैं जो संघ/बीजेपी से डरते हैं और अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए पार्टी पर दोष मढ़ते हैं। सिब्बल जी यदि इतने महारथी थे तो उन्हें चांदनी चौक लोकसभा सीट छोड़कर भागना नहीं चाहिए था अपितु डटकर मुकाबला करना चाहिए था। 

Tuesday, September 28, 2021

कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी

आज देश ने दो खबर कांग्रेस की तरफ से देखी। पहली खबर प्रमुखता से जो प्रकाशित हो रही थी वो ये थी कि वामपंथी और आंदोलन से जन्में नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे थे। जिनका नाम क्रमश: कन्हैया कुमार (बेगूसराय) और गुजरात से निर्दलीय विधायक और दलित चिंतक जिग्नेश मेवानी थे। लेकिन सारी महफ़िल लूट ले गए पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष श्री नवजोत सिंह सिद्धू ने। कैप्टन अमरिंदर सिंह जी को कुर्सी हटाने के बाद चन्नी जी को मुख्यमंत्री बनाया और जब चन्नी पर सिद्धू का दबाव नहीं चला तो पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इस दौरान कन्हैया कुमार और जिग्नेश की कांग्रेस से जुड़ने वाली खबर दब गई।

कांग्रेस के लिए हाल के दिनों में देखा गया था कि ज्योतिरादित्य, जितिन प्रसाद, प्रियंका चतुर्वेदी, ललितेशपति त्रिपाठी और सुष्मिता देव जैसे युवा नेता कांग्रेस का हाथ छोड़कर या तो बीजेपी/संघ में चले गए या तो क्षेत्रीय पार्टियों में शामिल हो गए। इस सन्दर्भ में देखा जाए तो इन दोनों युवाओं का कांग्रेस के साथ जुड़ना एक बहुत बड़े राजनीतिक संकेत प्रदान करने वाला है। वो इसलिए कि जब कांग्रेस को युवा छोड़ रहे थे जब युवा पार्टी के साथ जुड़ भी रहे थे। आज कांग्रेस से जुड़ने वाले दोनों नेता आन्दोलन से जन्में हैं। जिसमें कन्हैया कुमार पर 2018 में जेएनयू में विवादित नारे लगाने का आरोप लगा था। जिसे दिल्ली पुलिस और भाजपा की सरकार आज तक अदालत में सिद्ध करने में असमर्थ रही है और दूसरे नेता जिग्नेश नए और ऊर्जावान हैं जो गुजरात में दलितों के हितों की रक्षा के लिए आन्दोलन चलाया और उन्हें जागरूक किया। इस तरह से दोनों नेता बिना किसी गाडफादर के खुद आगे बढ़े।

Monday, September 20, 2021

चरणजीत सिंह चन्नी

आज पंजाब के लिए एक राजनैतिक दृष्टि से ऐतिहासिक दिन रहा. जहाँ कांग्रेस पार्टी ने पहली बार पंजाब के इतिहास में पंजाब को 'चरणजीत सिंह चन्नी' के रूप में एक दलित मुख्यमंत्री दिया. पंजाब कांग्रेस में पिछले लगभग एक साल से आंतरिक कलह चल रही थी. जिसके दो गुट बन गए थे. एक गुट भाजपा से चार साल पहले आकर कांग्रेस में शामिल होने वाले निवर्तमान पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष श्री नवजोत सिंह सिद्धू और दूसरा वर्तमान मुख्यमंत्री और अनुभवी नेता श्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का था. इनके बीच भयानक कलह हो रही थी. जिसका विपरीत असर पंजाब की सरकार और कांग्रेस की छवि पर पद रहा था. अंततः कांग्रेस ने येन-केन प्रकारेण अमरिंदर सिंह का इस्तीफा शनिवार को करवा लिया था.
अमरिंदर के बाद कौन ?
अमरिंदर जी के बाद पंजाब का मुखिया कौन ? इसका जबाब कांग्रेसी नेता ढूंढ रहे थे. जिसमें सुनील जाखड़ से लेकर रंधावा तक कई नाम गोदी मीडिया में चलें, लेकिन अंत में कांग्रेस ने भी बीजेपी की तर्ज पर चलते हुए अनुमानों के उलट चन्नी का नाम सामने किया. जिसकी उम्मीद शायद खुद चन्नी को भी नहीं रही होगी। खैर ये नाम निकलते हीं राजनैतिक तौर पर कांग्रेस ने एक साथ कई सवालों का जबाब दे दिया. चन्नी जमीन से जुड़े हुए नेता की छवि रखते हैं और दो बार के लगातार विधायक भी रहें है. चन्नी को आगे कर कांग्रेस ने दलितों को एक बड़ा संदश अपनी तरफ से दिया है. पंजाब देश का एक ऐसा राज्य है जहां दलितों की संख्या सर्वाधिक 32 प्रितशत है. पांच महीने बाद होने वाले चुनाव में ये पता चल जाएगा कि कांग्रेस की ये चाल कितनी कामयाब हुई ? आप तौर पर पंजाब ने अब तक 15 मुख्यमंत्री देखें हैं जिनमें सिख और जाट का बोलबाला रहा है. इस प्रकार का पहला प्रयोग करने का साहस कांग्रेस ने हीं किया है बेशक अल्पसमय के लिए हो. 
पंजाब के नए मुखिया की तलाश की जरूरत क्यों ?
चुनाव से महज पांच महीने पहले कांग्रेस को मुख्यमंत्री बदलने की जरूरत इसलिए आई कि अमरिंदर जी पर नौकरशाही हावी है , ऐसा पंजाब नेताओं का मानना था. पंजाब के मंत्री और विधायकों को मुख्यमंत्री जी से मिलने के लिए काफी लम्बा इन्तजार करना पड़ता था और अमरिंदर जी पर ये भी आरोप लगता रहा है कि वो खुद को कांग्रेस आलाकमान से ऊपर समझने लगे थे. उसका उदाहरण ये है कि 2017 में अकाली/बीजेपी की सरकार अपनी लगातार 10 साल की सरकार की एंटीइंकम्बेंसी झेल रही थी. उस दौरान अमरिंदर जी ने कमजोर हो चुकी कांग्रेस और आलाकमान से सौदेबाजी कर रहे थे और अपना नाम चुनाव पूर्व घोषित करवाने पर अड़ गए थे. तब राहुल गांधी ने ऐसा करने से मना किया था तो राहुल से अमरिंदर जी नाराज हो गए थे और सोनिया जी को पार्टी छोड़ने की धमकी दे दी थी. तब कांग्रेस आलाकमान उनके दबाव के आगे झुकते हुए चुनाव से पूर्व जनता के बीच अमरिंदर जी के नाम का ऐलान कर दिया था. कांग्रेस चुनाव बाद प्रचण्ड जीत हासिल करते हुए 80 सीटें जीती और अमरिंदर जी मुख्यमंत्री बने. उसके बाद कांग्रेस नेतृत्व इन पर नजर बनाये रखा और इनके कमजोर होने का इन्तजार किया. जिसका बीड़ा सिद्धू ने उठाया. पहले अमरिंदर जी की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धू को पंजाब प्रदेश अध्यक्ष बनाया फिर सिद्धू ने नाराज कांग्रेस विधायकों को साधकर अमरिंदर जी पर दबाव बनाना शुरू किया और इनकी नाकामियों को आलाकमान तक पहुंचाया और अमरिंदर जी को अंत में मुख्यमंत्री पद से विदा करवा दिया. अब पंजाब में  पास ऐसा कोई बड़ा क्षत्रप नहीं है जो कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती दे सके. कुछ इस पंजाब कांग्रेस के कलह का पटाक्षेप हुआ और चन्नी के रूप में पंजाब को पहला दलित मुख्यमंत्री आज 11 बजे मिला. 

Thursday, September 9, 2021

राहुल गांधी की वैष्णो देवी यात्रा

आज कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री राहुल गांधी कटरा, कश्मीर से मां वैष्णो देवी की यात्रा पैदल हीं शुरू की। उनके इस जज्बे को देखकर माता के एक भक्त के रूप में बहुत सुखद लगा। खबरों के माध्यम से पता चल रहा है कि राहुल धाम तक की पूरी यात्रा भीड़ के साथ पैदल पूरी की, कीसी भी स्पेशल ब्यवस्था के अन्तर्गत राहुल एक आम भक्त की तरह यात्रा पूरी की। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी पहली बार ‌‌‌‌‌कोईदेवस्थान की यात्रा पैदल कर रहे हैं। आज से पहले भी राहुल गांधी ने कैलाश मानसरोवर, केदारनाथ की यात्रा पैदल हीं पूरी की थी। 
इस समय कोई चुनाव नहीं है फिर भी राहुल ने आस्थावश माता रानी के दर्शन करने के लिए गए हैं। लेकिन उनके विरोधी संघ/भाजपा के लोग इसे फिर से अपनी गंदी मानसिकता के अनुसार राजनीति से प्रेरित यात्रा बताने की कोशिश करेंगे। मुझे अच्छे से याद है कि जब 2019 में गांधी ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा की थी। उस समय भी इन पातकियों ने उस यात्रा को राजनीति से प्रेरित कहकर प्रचारित किया था। राहुल गांधी अपने किसी भी धार्मिक आयोजन का कभी भी कोई ढिंढोरा नहीं पिटते हैं और न हीं उसे अपने राजनैतिक फायदे के लिए कभी उपयोग करते हैं।

Tuesday, September 7, 2021

किसान महापंचायत

5 सितंबर को किसानों ने मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत का आयोजन किया। जिसमें अनुमान के मुताबिक पांच लाख से ज्यादा किसानों ने भाग लिया और एक सफल आयोजन पूरा किया इसके साथ हीं हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूत बनाया ‌‌। जो 2013 के दंगों के बाद पूरी तरह टूट चुका था। उसे इस किसान महापंचायत ने फिर से जोड़ दिया। किसान अपनी मांग पर अड़े हुए हैं और सरकार अपनी घमंड में मशगूल है। मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत में भाईचारे को मजबूत करने वाला एक अद्भुत नजारा देखने को मिला जहां मंच पर किसानों के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे नरेश, राकेश टिकैत बंधु ने मंच से "अल्लाह हू अकबर और हर हर महादेव" का नारा एक साथ लगाया ‌‌। यह दृश्य मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से लगभग गायब हीं हो चुका था। जिसका भरपूर राजनैतिक फायदा संघ/भाजपा ने उठाया था और केन्द्र समेत उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई।
वैसे इस मोदी सरकार को अपने दोनों सरकारों के दौरान बहुत हीं कम बार परेशानी का सामना करना पड़ा है। उनमें कृषि कानून और किसान दोनों टर्म की सरकारों को नाकों चने चबवा दिए। पहली बार सत्ता में आने के बाद एक बार और संघ/भाजपा की सरकार ने कृषि कानून बदलने का निर्णय लिया था जिसे "धरती पुत्रों" ने अपने पराक्रम के बल पर सरकार को नया कृषि कानून रद्द करने तथा घुटनों पर आने को मजबूर कर दिया था। ठीक उसी प्रकार दूसरे कार्यकाल में भी मोदी सरकार ने कृषि कानून को बदल दिया है और आज भी विगत नौ महीनों से किसान नव ऊर्जा के साथ आन्दोलन के मोर्चे पर डटे हुए हैं।

Monday, August 16, 2021

अफगानिस्तान

पिछले दो दिनों से अफगानिस्तान से जो खबर निकलकर आ रही है वह निश्चित तौर पर विश्व समुदाय के लिए एक चिंताजनक सबक है. कल जब भारत 15 अगस्त को देश का 75 वां आजादी दिवस मना रहा था. ठीक उसी समय हमारे पड़ोस के देश से चरमपंथियों के कब्जे की खबर आयी. देखते हीं देखते अफगानी लड़ाके अफगानिस्तान के सबसे बड़े शहर काबुल पर कब्जा जमा लिया था और वहाँ के राष्ट्रपति अशरफ गनी अपनी जान बचाकर भाग चुके थे. अफगानी चरमपंथियों का उन्माद पूरे अफगानिस्तान में फ़ैल चूका था. अफगानिस्तान की जनता हताश हो चुकी थी.
इन सबके बीच विश्व के बड़े झंडाबरदार देशों की फजीहत हो चुकी थी. जो अपने आपको विश्व में सर्वशक्तिमान होने का दम भरते थे वो असहाय हो चुके थे. इन सबमें सबसे ज्यादा बेइज्जती अमेरिका की हुई है. बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने अपने संघमित्रों की सेना 'नाटो' को वापस बुला लिया था. उसके लगभग दो महीनों के अंदर हीं अफगानिस्तान का बंटाधार हो गया. आज वहां चरमपंथी सरकार का शासन हो चुका है. काबुल हवाई अड्डे पर दृश्य भयावह नजर आ रहा है. चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ है. अमेरिका समेत विश्व के सारे देश अफगानिस्तान में अपने दूतावास और नागरिकों को युद्धस्तर पर बाहर निकालने के प्रयास में जुटे हुए हैं. इन सबके बावजूद एक मात्र सवाल हर किसी की दिमाग में घूम रहा है कि विश्व की सबसे मजबूत खुफिया एजेंसी मानी जाने वाली अमेरिका यहां असफल कैसे हो गयी ? अफगानिस्तान के नागरिकों के लिए विश्व समुदाय को आज एक साथ खड़े होने की जरूरत है और उनके जान-माल की रक्षा करने की जरूरत है.

Monday, July 19, 2021

पेगासस

2019 के बाद पेगसस नाम का जीव देशद्रोही की संज्ञा के साथ फिर से अवतरित हो गया है। बहरहाल इस बार यह संज्ञा विपक्षी पार्टियों द्वारा दी जा रही है। "द वायर" इस रिपोर्ट को विश्लेषण के साथ हिंदी और अंग्रेजी में निरंतर छाप रहा है। वायर की रिपोर्ट को पढ़ने पर जो बात सामने निकलकर आ रही है, वो भारतीय लोकतंत्र को और संविधान को शर्मशार करने वाली है।
पेगासस साफ्टवेयर है क्या - यह साफ्टवेयर मूलतः एक एंटीवायरस है। जो इजरायल में निर्मित किया गया है। जो सरकारें निगरानी के लिए खरीदती हैं और यह कंपनी अपना साफ्टवेयर सिर्फ वहां की केन्द्र सरकारों को बेचती है। तो यह सवाल उठता है कि सरकार को विपक्षी नेताओं की जासूसी की क्या जरूरत आ गई थी?
पेगासस से किसकी-किसकी जासूसी हुई- जो खबरें निकलकर सामने आ रही हैं ‌‌उसके अनुसार विपक्ष के बड़े नेताओं, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए माननीयों, पत्रकारिता से जुड़े हुए लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम मुख्यत: शामिल है। विपक्षी नेताओं में अब तक सबसे बड़ा नाम कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी और उनके पांच सहयोगियों के सामने आए हैं। संवैधानिक पदों पर आसीन ब्यक्तियों में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री अशोक लवासा, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई और पत्रकारिता जगत से न्यूज नेटवर्क 18, India Today Network, Poineer, Weekly Economic Times, Rojnama, द वायर, प्रसांत किशोर, अभिषेक बनर्जी, मोदी सरकार में शामिल कुछ मंत्रियों प्रहलाद पटेल, वैष्णव इत्यादि के नाम शामिल है। लिस्ट जारी होने का सिलसिला अभी भी जारी है। "द वायर" के तो M K Venu, Vardrajan पर सरकार की नजर शुरुआत से टेढ़ी है‌। क्योंकि यह न्यूज पोर्टल सरकार से सवाल पूछती है, जो जाहिर सी बात है कि सरकार को चुभती है और सरकार की छवि पर असर भी डालती है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत जिस महिला ने मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई पर जी पर sexual harassment के सनसनीखेज संगीन आरोप लगाये थे। उस महिला और उसके पति के अलावा उसके परिजनों को भी जासूसी का शिकार बनाया गया। जो इस महिला के साथ घटित हुआ, वह अत्यंत शर्मनाक और बेहूदा था। बाद में उस महिला के साथ क्या न्याय हुआ और राफेल पर जो फैसला आया, जगजाहिर है।
लेकिन जासूसी को लेकर एक सवाल देश के हर समझदार लोगों के मन में है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों, राजनेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं से सरकार को क्या डर था ? क्या ये लोग आतंकवादी, अलगाववादी या नक्सली हैं? यह कृत्य सीधा-सीधा भारत के महान संविधान को चुनौती देता है। अगर मोदी सरकार इतनी पाक-साफ है तो इनको आगे आकर सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज से जांच करवाकर दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहिए। नहीं तो सरकार के उपर जनता का शक और बढ़ता जाएगा।

Wednesday, July 7, 2021

मंत्रियों के इस्तीफे से नहीं बदलेगी मोदी सरकार की छवि

ये खबर नहीं तो क्या है ? जिस देश के स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफा ले लिया जाए तो कैसे कहा जा सकता है कि यह एक सफल सरकार की पहचान है ? आज दर्जन भर से ज्यादा मंत्रियों को केन्द्रीय कैबिनेट से बाहर कर दिया गया। इनमें से ज्यादातर वो मंत्री हैं जो देश की जनता के काम के लिए नहीं अपितु कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री राहुल गांधी जी को ट्रोल करने के लिए मंत्री थे। जिस सरकार ने सिर्फ हेडलाइंस मैनेजर के रूप में खुद को स्थापित चुकी थी। वो अब अपनी कमियों को छुपाने के लिए अपने बरदहस्त काम करने वाले छोटे कर्मचारियों पर नाकामी का ठीकरा फोड़ा जा रहा है। 

 ्मो्मं्मो्मंत्रिमंडल से छुट्टी वाले मंत्रियों की लिस्ट कुछ इस प्रकार है -

1. रमेश पोखरियाल निशंक

2. संतोष गंगवार

3. देबोश्री चौधरी

4. संजय धोत्रे

5. बाबुल सुप्रियो

6. राव साहेब दानवे पाटिल

7. सदानंद गौड़ा

8. रतन लाल कटारिया

9. प्रताप सारंगी

10. स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन

11. थावरचंद गहलोत

12. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद 

13, प्रकाश जावड़ेकर

कांग्रेस से बगावत करके बीजेपी में आने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को पन्द्रह महीने बाद उनके गद्दारी का फल मिला। जिससे अब वो खुद और और उनके समर्थक खुश हो रहे हैं। होना भी चाहिए ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌।

Tuesday, June 8, 2021

महंगाई अब हमारी नियत बन चुकी है

बदलते भक्तिमय दौर के साथ-2 हमारी इच्छाएं भी बदलती जा रहीं है. हमने एक वो दौर भी देखा था जब पेट्रोल और डीजल पर 1 रूपये की कीमत बढ़ोत्तरी पर तत्कालीन विपक्ष धरने पर बैठ जाता था और आज प्रीतिदिन की बढ़ोत्तरी के बाद भी हमारी नींदें नहीं टूट पा रही है. जब विपक्ष कहता था कि उस वक्त की तत्कालीन सरकार ने देश के सारे पैसे विदेश भेज दिए हैं, कांग्रेस के मंत्रियों द्वारा अथाह भ्रष्टाचार किया जा रहा है. तब भी डीजल और पेट्रोल की कीमतें मात्र 76 रूपये तक पहुँच पाई थी. जबकि आज अथाह श्रद्धा भाव से 18-18 घंटे काम करने के बाद भी पेट्रोल 100 तक पहुंच गया है. फिर भी हम भारतीय इसे अब अपने ब्यवहार में ढाल चुके हैं और चुप रहना बेहतर बोलने की अपेक्षा बेहतर समझने लगे हैं.
इसी अपेक्षा को देखते-देखते सरसो के तेल की कीमत सत्तर सालों में पहली बार 220 रूपये प्रति लीटर से ऊपर पहुंच कर रिकार्ड कायम कर चुका है. हम देशवासियों की चुप्पी का हीं नतीजा है कि इतनी कमरतोड़ महंगाई के बावजूद हम शांत हैं. अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं. मैंने भी अपने अल्प बोध के दौरान महंगाई के ऊपर सत्ता को जाते देखा है. अटल जी की सरकार को कौन भूल सकता है ? जहां प्याज की बढ़ी हुई कीमतों ने सत्ता परिवर्तन कर दिया था. लेकिन यहां एक बात गौर करने वाली है कि उस दौर की जनता अपने मुद्दों को लेकर जीवंत थी और ऐसा प्रतीत होता है कि आज की जनता मरणासन्न स्थिति में पहुँच चुकी है. जिसे महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक असुरक्षा से कोई वास्ता नहीं है. 
समाज में बहुत सी समस्याएं मुंह बाये खड़ी है, जिन्हें हम जानते भी हैं पहचानते भी हैं. लेकिन ये सोच कर मुंह मोड़ लेते हैं कि इससे हमारा क्या ? यही प्रवृत्ति सरकार को घमण्डी बनने पर मजबूर हुई. तेल, डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की कीमतें भी आसमान की तरफ मुंह उठाये अग्रसर है. सरकार से कोई एकाक आदमी सवाल करती है तो सरकार उसका जबाब बड़े घमंड से देती है कि महंगाई रोकना हमारे हाथ में नहीं हैं. शायद महंगाई अब हमारी नियत बन चुकी है. क्योंकि उन्हें पता है कि अब सत्ता बरकरार रखने के लिए मंहंगाई को थामने की जरूरत नहीं है, बल्कि हिन्दू-मुसलमान वाली राजनीति को साधने की जरूरत है. खैर जो भी हो चुप रहकर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं.

Sunday, May 9, 2021

चिताओं और आंसुओं के बीच में चुनाव का जश्न मनाती भाजपा

बंगाल में बीजेपी/संघ चुनाव हार चुकी है. लेकिन उसे मानने को अब भी तैयार नहीं हैं. इस महामारी के दौर में ये चुनाव याद किया जाएगा. जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा था उस समय देश के प्रधानमंत्री, डेढ़ दर्जन से ज्यादा केंद्रीय मंत्री और पांच-पांच मख्यमंत्री प्रचार में लगे हुए थे. क्यों, बस ममता बनर्जी को हराकर बंगाल जितने के लिए ? इन सबके बीच सरकार ने ये तक नहीं सोचा कि इस चुनाव को कुछ दिनों तक टाल कर कोरोना नियंत्रण के ऊपर ध्यान देना था.  जब प्रधानमंत्री लाखों की भीड़ को ये कहते हैं कि "ऐसा भीड़ तो मैंने अपने पूरे जीवन में नहीं देखा". तो इस सन्देश का असर बहुत दूर तक जाता है. जनता भी लापरवाह हो गयी और चुनाव परिणाम के बाद देखा गया कि कलकत्ता के हालात बहुत खराब हो चुका था. जिसे नियंत्रित करने के लिए नवगठित ममता बनर्जी की सरकार को एक बार में हीं दो हफ्ते का लाकडाउन लगाने का निर्णय लेना पड़ा.

अगर कठोर शब्दों में मैं सरकार के इस कृत्य का आंकलन करूँ तो यही कहूंगा कि चिताओं और आंसुओं के बीच भाजपा/संघ चुनाव का जश्न मना रही थी. भाजपा को ऐसा करने से पहले ठहर कर कुछ वक्त तक सोचना चाहिए था. या जिस तरह लेफ्ट के लोगों ने 22 अप्रैल से अपना चुनाव प्रचार रोक कर वर्चुअल रैली करने शुरू कर दी. उसकी यह चिंता उसके राज्य के लोगों के प्रति जबाबदेह बनाती है. बेशक लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन को एक भी सीट बंगाल विधान सभा में नहीं दी फिर भी इनके चुनाव रद्द करने की योजना को भुलाया नहीं जा सकता. लेफ्ट के बाद कांग्रेस के राहुल गाँधी ने भी बंगाल में होने वाली अपनी सारी रैलियों को ना कह दिया था. इन सबके बाद भी बीजेपी/संघ भीड़ जुटाने में मशगूल रही. 

Thursday, May 6, 2021

ममता ने शेरनी बनकर बंगाल जीता संघ और मोदी-शाह तथा उनका मन्त्रीमंडल बुरी तरह हारा

बंगाल की जनता ने दो महीने उबाऊ और नफरती प्रचार का जबाब ममता को प्रचण्ड बहुमत देकर दिखाया। प्रधानमंत्री से लेकर उनके बेवकूफ मंत्रियों ने जिस नफरत की फसल को काटना चाहा। उसे बंगाल के सभी कौम के लोगों ने नकार दिया और पिछली साल के 209 सीटों की तुलना में इस 212 सीटों के साथ ममता को लगातार तीसरी बार सत्ता पर बिठाया। इस चुनाव में देश ने बहुत कुछ देखा। जिसमें गिरती भाषा की मर्यादा को भी देखा। ममता बनर्जी पर हुए हमले को भी देखा। बिके हुए मीडिया को भी जनता ने इसी चुनाव में देखा। इन सब के बीच भारतीय जनता ने चुनाव आयोग की विवशता को भी देखा। जो कोई भी फैसला संविधान सम्मत नहीं कर सका।

Sunday, May 2, 2021

भाजपा को वोट दिलवाने के लिए संघ वाले घर-घर जाते हैं और आज कोरोना कहर में कहां छुप गए हैं

कोरोना महामारी भयंकर रूप धारण कर चुकी है। देश के चारों कोनों से त्राहि-त्राहि की चीख-पुकार सुनकर मन-मष्तिस्क अब अधीर होने लगा है। केन्द्र एवं राज्य सरकारें अपना कर्तव्य निभाने में असफल हो चुकी है। बात राज्य सरकारों की आती है तो देश में आधे से ज्यादा राज्यों में संघ/भाजपा की सरकार है। लेकिन इस दुःख के घड़ी में संघ और सरकार के लोग नदारद है। गौर करने वाली बात ये है कि यह वही संघ है जो भाजपा को जिताने के लिए घर-घर जाकर वोट मांगती है, प्रचार करती है। लेकिन आज जब जनता परेशान है तो ये सब मांद में जाकर छूप गये हैं। हमें इनके चेहरे को बेनकाब करने की आवश्यकता है। ताकि जब ये अगली बार भाजपा के लिए वोट करने को कहें तो इन्हें आज का आईना दिखाने की जरूरत होगी।

Monday, April 19, 2021

कोरोना योद्धा श्रीनिवास बी वी

कोविड के इस महामारी के दौर में आप सुरक्षित रहिये. आपसे हमारी यही अपेक्षा है. हर जिम्मेदार नागरिक बस यही प्रार्थना कर रहा है. लेकिन जिन निति नियंताओं के हाथों में हमने जीवन की बागडोर थमाई थी. वो लाशों के ढेर पर खड़े होकर चुनावी रैलियां कर रहें हैं. हमने जिनको अपने सपनों को सजाने का जिम्मा दिया था. वो दूर कहीं प्रचार में नजर आते हैं और रात में आठ बजे हमारी सुरक्षा को लेकर मीटींग करने का ढोंग करते है और सुबह होते हीं लाशों की ढेर पर खड़े होकर चुनावी सभाओं के शोर में विभोर हो जाते है.

इन सबके बीच सोशल मीडिया पर मदद करने वालों की सूची में दो-तीन नाम बहुत तेजी से निकल कर आ रहैं हैं. जिनका नाम क्रमशः श्रीनिवास बी वी, दिलीप पांडेय और शलभमणि त्रिपाठी है. ये तीनों ब्यक्ति राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले है. जहां श्रीनिवास भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) के  राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, दिलीप पांडेय दिल्ली से आप पार्टी के विधायक हैं और सशलभमणि त्रिपाठी जी पत्रकार से बीजेपी के कार्यकर्ता बनें हुए हैं. आज इस महामारी के दौर में ये तीनों ब्यक्ति किसी भी पीङित की सहायता करने में सबसे आगे हैं. सोशल मीडिया पर मात्र एक संदेश से ये सेवा के लिए दौड़ पड़ते हैं.

इन सबमें श्रीनिवास बहुत आगे हैं. लिहाजा वो एक संगठन के प्रमुख है. तो उनकी टीम पूरे देश में है. पिछले लाकडाउन से लेकर अब तक अनवरत रूप से श्रीनिवास की टीम कोरोना मरीजों और मजबूर मजदूरों की मदद कर रहें हैं. ट्विटर तमाम ऐसे संदेशों से भरा पड़ा है. जिनके लिए भारतीय युवा कांग्रेस की टीम ने आपातकालीन स्थिति में उपयोग होने वाली जीवनरक्षक दवाइयों से लेकर आक्सीजन, प्लाज्मा डोनर और खाने-पीने का बेहतर प्रबंध किया. श्रीनिवास जी के इस भाव को देकर आज हर परेशान आदमी की पहली आशा बी वी की टीम होती है. इन्हीं सब कामों के बदौलत आज श्रीनिवास जी दक्षिण के राज्य कर्नाटक से होते हुए भी पूरे देश में अपनी पहचान बना चुके हैं और देश की राजनीति का एक जाना पहचाना नाम बन चुके है. आज का समाज उनके किये गए कार्यों का ऋणी रहेगा.

जो काम सरकार में बैठे लोगों को करना था. वो काम मात्र कुछ लोग विपक्ष एवं एकाध सत्ता पक्ष के लोग कर रहें हैं. इस संकट की घड़ी मन प्रधानमंत्री प्रचारमंत्री बने हुए हैं और गृहमंत्री उनके रणनीतिकार बनकर बंगाल में कोरोना को दावत दे रहें हैं. जब पार्टी के नेता बन प्रधानमंत्री प्रचार करने में ब्यस्त हैं तो ऐसे में मंत्रालय उनके कनिष्ठ सहयोगी भला  कैसे पीछे रहने वाले थे ? वे लोग भी कोरोना पर विजय हासिल के करने के बजाय ममता बनर्जी पर विजय हासिल करने के लिए चुनाव में दिन-रात एक किये हुए हैं. लेकिन श्रीनिवास बी वी आपको आपकी मदद के लिए हमेशा याद किया जाएगा और आपको इतिहास हमेशा एक योद्धा के रूप में याद करेगा. 

Monday, April 5, 2021

सरकार बताये क्या चुनावी राज्यों से कोरोना ने छुट्टी ले रखी है

एक साल बीत जाने के बाद मार्च महीने के अंतिम सप्ताह से कोरोना का कहर विगत वर्ष से भी तेजी से बढ़ रहा है. उसके रोकथाम के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के पास कोई ठोस रणनीति अब बची नहीं है. दिसंबर महीने के बाद जिस तरिके से कोरोना के मामलों में कमी देखी गयी और दो देश में विकसित दवाइयां बाजार में आई. उससे जनता में सन्देश में गया कि कोरोना अब ख़त्म होने के कगार पर पहुँच चुका है. जिसके बाद कोरोना संबंधी नियमों को लेकर केंद्र तथा राज्य स्तर पर ढिलाई देखी गयी. पब, माल, रेस्त्रा, सिनेमाघर, पार्क को खोल दिया गया. इन्हें खोलने से अर्थब्यवस्था सुधरी जरूर लेकिन कोरोना ने एक बार फिर बहुत प्रभावी तरिके से वापस लौट आया है. 

जनवरी के बाद जब कोरोना लगभग निष्प्रभावी रूप में जी रहा था. उस वक्त बड़बोले नेताओं ने और स्वयं मोदी जी, शाह जी, नड्डा जी सार्वजनिक रैलियों में मोदी जी की सफल निर्णय से जोड़ते नहीं थकते थे. लेकिन जब कोरोना आज फिर से भयंकर रूप धारण कर लिया है तो ये सब नेता दृश्य से गायब हो चुके हैं. अब भी तो इनको आगे आकर जिम्मेदारी लेनी चाहिए। जब हम मानेंगे कि वाकई इन्हीं लोगों के नेतृत्व का करिश्मा था. जबकि मैं शुरू से कहता आया हूँ कि वो सफलता देश के समस्त नागरिकों, राज्य सरकारों समेत केंद्र सरकार की थी और आज की विफलता भी इन्हीं सबकी है. क्योंकि हम सब शिथिल पड़ गए और अपनी जिम्मेदारियों से भागने लगे.

एक बात मेरे समझ में आज तक नहीं आई कि बंगाल, केरल, पुड्डुचेरी, असम और तमिलनाडू जैसे राज्यों में कोरोना क्यों नहीं बढ़ रहा है ? क्या चुनावी राज्यों से कोरोना ने छुट्टी ले रखी है ? सभी पार्टियां बहुत बड़ी-बड़ी जनसभाएं कर रहीं हैं. न वहां सामाजिक दूरी का पालन हो रहा है. न वहाँ मास्क का ख्याल रखा जा रहा है. मतलब समझ नहीं आता कि देश में चल क्या रहा है ? इसके लिए देश की सभी पार्टिया दोषी हैं. जिस कोरोना की वजह से 542 सांसदों के बैठने वाला संसद भवन अल्पावधि में समाप्त कर दिया जाता हो. कई राज्य की विधान सभाओं की बैठक को स्थगित कर दिया जाता है. वहाँ चुनाव में हजारों, लाखों लोगों की भीड़ के साथ रोड शोज और जनता रैली की जा रही हैं. यह हास्यास्पद है. यही लापरवाही की सबसे बड़ी मिसाल है. क्या ये नेता हम नागरिकों को बेवकूफ समझते हैं या हम नागरिक इन नेताओं को अपना सबसे बड़ा रहनुमा ? कोरोना को निष्प्रभावी करने का एक मात्र उपाय ज्यादा से ज्यादा लोगों तक मेडिकल सेवाएं जा सके.

Friday, March 26, 2021

आजादी के बाद पहली बार बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा

जैसा कि देश का हर जागरूक नागरिक जानता है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री जी को 70 साल की गिनती बहुत याद आती है। हर बात में वो कहते हैं कि कांग्रेस सरकार ने पिछले 70 सालों में कुछ नहीं किया। कभी मनरेगा को लेकर कहते हैं कि कांग्रेस सरकार ने देश के लोगों को सिर्फ गड्ढा खोदने में लगा दिया। कभी कहते हैं कि कांग्रेस की सरकार देश का विकास नहीं कर सकी। तो उसी 70 साल के सन्दर्भ में आज मैं कुछ लिखने की चेष्टा कर रहा हूं।

प्रचार मंत्री महोदय इसी 70 सालों में पहली बार बेरोजगारी की सर्वाधिक ऊंची दर देखने को मिली है। आप कहते हैं कि हमारी सरकार नित नए रिकॉर्ड कायम कर रही है। तो आपके उस बात से मैं सहमत हूं। इन्हीं 70 सालों में पहली बार नौजवान भारी मात्रा में रोजगार के लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं। इन्हीं 70 सालों में पहली बार उत्तर प्रदेश की आपकी सरकार ढ़ाई साल पहले ग्राम विकास अधिकारी पद पर चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करने के बजाय पूरी भर्ती रद्द कर देती है। इन्हीं 70 सालों में पहली बार आपकी सरकार के नितिगत कुप्रबंधन के कारण कोरोना के बाद करोड़ों नौकरियां चली गई। इन्हीं 70 सालों में रोजगार के लिए आन्दोलन करने वाले युवाओं पर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। 

आंकड़ों पर गौर करें तो 70 सालों में पहली बार (एबीपी न्यूज के अनुसार) देश में बेरोजगारी दर 6.5 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 7.1 तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर पहली बार 6.2 प्रतिशत पर पहुंचकर एक नया रिकॉर्ड कायम कर चुकी है। ये सभी आंकड़े 70 सालों में पहली बार परिलक्षित हो रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, बिहार, त्रिपुरा, दिल्ली और पंजाब सर्वाधिक ऊंची बेरोजगारी दर वाले राज्य हैं। इसमें परोक्ष या अपरोक्ष रूप से 6 बीजेपी शासित राज्य हैं। जिनमें कुछ राज्यों में 15 साल तो कुछ राज्यों में 6 साल से अधिक समय से। सत्ता में है। बाकी राज्यों राजस्थान में डेढ़ साल और झारखंड में एक साल पहले तक बीजेपी की डबल इंजन वाली सरकार सत्ता में थी।

तो ये तो साहेब की पार्टी की 70 सालों की उपलब्धियां रही है। इनके 70 सालों के सन्दर्भ में हम बहुत बात कर सकते हैं। लेकिन इस लेख को मैं बेरोजगारी दर को इंगित करना चाह रहा था। मुंह चलाने और समुचित संतुलन के साथ सत्ता चलाने में बहुत अंतर होता है। आज का मेरा यह लेख बेरोजगार मित्रों को समर्पित है।

जय हिन्द।।

Wednesday, March 24, 2021

कल का दिन बिहार में दमन दिवस के रूप में याद किया जाएगा

कल बिहार विधान सभा में जब पुलिस ने घुसकर विधायकों को मारा-पीटा. उसे बिहार हीं नहीं बल्कि पूरे देश के लिए "दमन दिवस" के रूप में याद किया जाना चाहिए. हमें समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से जो पढ़ने और  मिला। वह वाकई हैरान करने  वाला रहा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सत्ता  मौजूदगी में विपक्ष के राजद और कांग्रेस के चुनें हुए विधायकों के ऊपर हुए बर्बरता को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता. अब मुख्यमंत्री महोदय इस सन्दर्भ में चाहे जितनी भी दलीलें दें, वो जायज नहीं होगा. निश्चित तौर पर विधान सभा के अंदर की इस घटना ने नीतीश जी के सौम्य एवं धैर्यशील छवि को बहुत बड़ा आघात पहुंचाया है. 

निश्चित तौर पर आपकी विपक्षी विधायकों और उनकी पार्टियों की नीतियों को मतभेद हो सकता है. लेकिन इस तरह का घृणित कृत्य निंदनीय है. क्योंकि हो सकता है कि कल आप भी सत्ता से हटकर विपक्ष में आएंगे. उस समय भी यदि यही कृत्य दोहराया जाएगा तो आपकी मनोस्थिति क्या होगी ? इस बात का भी आंकलन आपको कर लेना चाहिए था. मार्शलों के अलावा विधान सभा में अतिरिक्त पुलिस बल बुलाना माननीय विधान सभा अध्यक्ष का विशेषाधिकार था. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता. लेकिन सरकार का चेहरा मुख्यमंत्री होते कि विस अध्यक्ष. आज से आप जहां भी जनता के बीच जाएंगे तो जनता आपसे जबाब मांगेगी न कि अध्यक्ष जी से. 

विपक्ष के विधायक बस पुलिस विशेषाधिकार क़ानून जो आपने विपक्ष की अनुपस्थिति में विधान सभा में पास करवाया. उसी का तो विरोध कर रहे थे. उनकी बात सुनकर भी आप उस बिल को पास करवा सकते थे. महिला विधायकों को भी महिला पुलिस ने बर्बरता पूर्वक पीटा और घसीटा. शायद नितीश जी जब आप भी अपने घर पर ये दृश्य देखे होंगे.तो आपको भी उतना हीं वीभत्स लगा होगा. जितना की मुझे और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले मुझ जैसे करोड़ों लोगों को लगा है. आप उन विधायकों से सदन की तरफ से माफी मांग सकते हैं. 

Tuesday, March 16, 2021

कांग्रेस उत्तर प्रदेश के लिए जरूरी क्यों

आज मैं बात करना चाहता हूँ कि कांग्रेस यू पी की जरूरत क्यों महशूस होने लगी है ? पिछले तीन दशक से कांग्रेस यू पी की सत्ता नदारद है. उत्तर प्रदेश की लगभग तीस फीसदी आबादी कांग्रेस के शासन को देख हीं नहीं पाई. आखिरी बार कांग्रेस की सत्ता 1989-1990 तक उत्तर प्रदेश में एन डी तिवारी के नेतृत्व में बनी थी. जब से एक अरसा गुजर गया और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस धीरे-2 अप्रासंगिक होती चली गयी. कुछ मौके आये जिसे कांग्रेस अपनी तरफ मोड़ने में असफल रही. 

देश की अधिकाँश आबादी ने पिछले तीन दशकों में सपा, बसपा, बसपा-भाजपा गठबंधन और वर्तमान में भाजपा के प्रचंड बहुमत की सरकार के काम को देख लिया है. लेकिन राज्य का नौजवान जो तीस साल की उम्र का है. उसने कांग्रेस की सत्ता के अलावा सबको देख लिया है. तो ऐसे नौजवानों से मेरा आग्रह यही है कि आपने छोटे से जीवन काल में जीन सरकारों का काम देखा वो सबने निराश किय. किसी सरकार ने जात-पात की तो किसी ने धर्म की राजनीति की. इन सब ने विकास के अलावा सबकुछ किया लेकिन आम इंसान की तकलीफों को दूर करने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया।सरकारी नौकरियों में सिंडिकेट किस तरह काम करता है और कितनी बार उजागर हुआ ? ये हममे में से लगभग हर किसी ने देखा। मुलायम सरकार की एक पुलिस भर्ती को 2007 में तो मायावती जी अनियमितता को आधार मानकर रद्द हीं कर दिया था. वो तो भला हो इलाहबाद हाईकोर्ट को जिन्होंने हजारों परिवारों को रोटी देते हुए उस पुलिस भर्ती को बहाल कर दिया।

कांग्रेस को नौजवानों, किसानों, दलितों, वंचितों की लड़ाई लड़नी चाहिए। आज देश में कृषि और कृषक दोनों की हालत दयनीय है. भाजपा की सरकार को छोड़कर पूरी दुनिया देख रही  हमारे किसानों को कितना प्रताड़ित किया जा रहा है ? जो धूप-छांव की परवाह किये बिना आज 110 दिनों से तीन काले कृषि क़ानूनों के खिलाफ सड़कों पर बैठा है. ऐसे सभी पीड़ित लोग एक नया विकल्प खोज रहें है और वो विकल्प कांग्रेस को बनना होगा। कांग्रेस हीं उत्तर प्रदेश में एक मात्र ऐसा विकल्प बचा है, इसका विस्वास कांग्रेस को जनता को दिलाना है. तीन दशक की सरकारों के काम-काज को भी आज की कसौटी पर कसने की जरूरत है. जाहिर तौर पर अब की सोच 90 के सोच से कहीं ज्यादा विकसित और परिपक्व हो गई है. उस समय किये हुए कार्यों को कांग्रेस आज प्रचारित नहीं कर सकती। 

यदि आज के युवाओं के साथ कांग्रेस को जुड़ना है, तो उनके हित में एक रोडमैप उनके सम्मुख रखने की आवश्यकता है. जाहिर तौर पर जब से प्रियंका गांधी सार्वजनिक जीवन में खुलकर आयी हैं. वो उस खालीपन को भरने की कोशिश कर रहीं हैं और उसमें कुछ हद तक सफलता भी प्राप्त हुई है. चाहे सोनभद्र का काण्ड हो, उन्नाव बलात्कार काण्ड, हाथरस बलात्कार कांड हो. इन सभी जगह पर प्रियंका गांधी ने कांग्रेस की उपस्थिति प्रभावी ढंग से दर्ज कराई। अर्से बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस को एक जमीनी नेता अध्यक्ष के रूप में मिला है. जिनका नाम अजय कुमार लल्लू है. जो स्वयं भी विधायक है और संगठन को मजबूत करते हुए जमीन पर गाँव-2 घूमकर जनता के सरोकारों की लड़ाई लड़ रहें हैं. इसमें कितनी सफलता कांग्रेस को मिलती है. ये 2022 का विधान सभा परिणाम बताएगा।                   

                

Sunday, March 7, 2021

कोलकाता के ब्रिगेड मैदान से मोदी की आसोल परिवर्तन रैली में किसानों की जगह नहीं

आज मोदी जी कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान से "आसोल परिवर्तन" रैली किया। जहां से तमाम तरिके के राजनीतिक बाण छोड़े। बंगाल के हित की बात की। रामराज्य की बात की। कोलकाता हमेशा से ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। चाहे आजादी के पहले की बात हो या आजादी के बाद की। आजादी के बाद जब सारा देश चकाचौंध में डूबा हुआ था और नेहरू जी के भाषण को सुनने को बेताब था। उस वक्त भी कलकत्ता अंधेरे में डूबा हुआ था। ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान जहां से आज मोदी जी रैली को संबोधित कर रहे थे। उससे महज़ 11 किलोमीटर दूर "बेलिया घाट" नामक स्थान है। जहां पर हैदरी नामक एक एक मस्जिद हुआ करती थी। जब देश खुशियां मना रहा था। उस वक्त भी कलकत्ता शहर अन्धेरे से पटा था और उसी रात हैदरी मस्जिद में बापू जी दिल्ली की चकाचौंध से दूर अमन-चैन की बात कर रहे थे। अब उस मस्जिद का नाम "गांधी भवन" है। बात ये है कि कलकत्ता ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है, मुफलिसी से लेकर अमीरी तक।

कुछ विदेशी विद्वानों के कलकत्ता के सन्दर्भ में विचार निचे मैं कोट कर रहा हूं-

चर्चिल- चर्चिल जब भारत से अपने देश लंदन वापस आते तो अपनी से बोले "कलकत्ता एक अजीब शहर है। वहां की ठण्डी हवा और सुरमयी धुन्ध लंदन जैसा दिखाई देता है।"

ब्रिटिश रिपोर्टर सर ड्रेवलेन ने 1863 में कहा था कि "कोलकाता से ज्यादा उदासीन बस्ती दुनियां के चारों दिशाओं में नहीं है।"

रावर्ड क्लाइड ने कहा था कि "कोलकाता कायनात की सबसे बुरी बस्ती है। ऐसी बस्ती पुरी दुनिया में नहीं है।"

विलियम हंटर मोहब्बतनामा में लिखते हुए अपनी मंगेतर से कहते हैं कि "तसब्बुर करो उन तमाम चीजों का जो फितरत में सबसे शानदार है और उनके साथ-2 उन तमाम अनासीर जो तामिर के फन में सबसे ज्यादा हसीन होते हैं। जैसे हीं याद करोगी तुम्हें कलकत्ता शहर की रूह का अहसास हो जायेगा कि ये शहर क्या है। (हिन्दी अनुवाद)

चलिए ये बात हुई उन लोगों की जिन लोगों ने कलकत्ता को अपने-अपने तरिके से समझा था। बात इतिहास की करते हैं जब 1967 में 14 पार्टियों ने सामूहिक रूप से ब्रिगेड मैदान में रैली की थी। जिसमें किसान, मजदूर और मजलूमों की बात हुई थी। जो इस बार मोदी जी के भाषण से नदारद रही। और हो भी क्यों नहीं बीजेपी/संघ अपने साथ साल के कार्यकाल में शायद दो या तीन बार सरकार के सामने इतना बड़ा संकट आया हो। जो किसान आन्दोलन प्रधानमंत्री जी के आवास से महज कुछ मील दूरी पर बैठे हैं। अगर आसोल परिवर्तन रैली में किसानों की बात मंच से की जाती तो सरकार खुद फंसती। 

वैसे सारी सरकारें चयनित तौर पर अपनी उपलब्धियों का बखान तो करती हैं और उन मुद्दों को गौड़ करने की कोशिश करती हैं जिससे उन्हें फजीहत ना झेलनी पड़े। कांग्रेस ने पूर्व में एक दशक, वाम दल तीन दशक (जो यह चुनाव एक साथ मिलकर लड़ रही हैं) और ममता की पार्टी भी एक दशक से सत्ता पर काबिज है। लेकिन फिर भी कलकत्ता आज उन्हीं मूलभूत सुविधाओं के लिए लड़ाई लड़ रहा है। बंगाल चुनाव मोदी जी, संघ और भाजपा के लिए नाक की लड़ाई का सवाल बन चुका है। क्योंकि जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ/बीजेपी अपना पूज्य पुरुष मानती है वो बंगाल से आते थे। जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ-बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करती आई है उनके नाम के सहारे भी बीजेपी अब तक बंगाल की सत्ता में नहीं आ सकी है। अगर बीजेपी हारती है तो आने वाले दो दशकों तक बंगाल में कोई करिश्मा नहीं कर पायेगी।


 

Monday, March 1, 2021

राहुल गांधी की मेहनत पर पानी फेरते कांग्रेस के थके हुए नेता

आगामी पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव का ऐलान चुनाव आयोग की तरफ से कर दिया गया है। कांग्रेस समेत सभी पार्टियां जोर-शोर से चुनाव प्रचार में जुट गई हैं। एक तरफ राहुल गांधी अपने नये सिपहसालारों के साथ केरल, पुड्डूचेरी, तमिलनाडु, असम में जी तोड़ मेहनत कर रहें हैं। तो दूसरी तरफ बंगाल में प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में कांग्रेस के नेता सदन अधीर रंजन चौधरी बंगाल की सियासी लड़ाई में दो-दो हाथ कर रहे हैं तथा प्रियंका गांधी समूचे उत्तर प्रदेश का ताबड़तोड़ दौरा करते हुए पहली बार यू पी से बाहर असम में प्रचार करने के लिए निकली हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के बूढ़े शेर कांग्रेस के हीं नाव में छेद करने की कोशिश कर रहे हैं।

राहुल गांधी के असर को बेअसर करने के लिए कांग्रेस के कुछ बुजुर्ग नेताओं ने ठान लिया है। जिसकी अगुवाई कुछ हफ्तों पहले तक राज्य सभा में नेता विपक्ष रहे श्री गुलाम नबी आजाद जी कर रहे हैं। इस अभियान में दिग्गज वकील और कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल, राज्य सभा में कांग्रेस के उप-नेता आनन्द शर्मा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, मनीष तिवारी, पृथ्वीराज चौव्हाण, विवेक तन्खा, संदीप दीक्षित, मिलिन्द देवड़ा, जितिन प्रसाद, राज बब्बर समेत 23 नामचीन कांग्रेसी नेता कर रहें हैं। इनमें से कुछ लोग अभी बुक महासचिव हैं तो कुछ दिग्गज सांसद और विधायक भी हैं। जिनको G-23 गुट नाम दिया गया है। कांग्रेस में यह दृश्य लगभग 4 दशक बाद देखने को मिल रहा है। जहां एक खेमा बागी होने के कगार पर खड़ा है। बेशक ये गुट उतना ताकतवर नहीं है लेकिन छवि गढ़ने और बिगाड़ने के लिए काफी है।

कुछ अपवादों को छोड़कर ये सभी नेता ऐसे हैं जो बमुश्किल हीं अपने राजनैतिक जीवन में कोई चुनाव जीता हो। आज जब राहुल गांधी गंभीर और जन सरोकार की राजनीति कर रहे थे तब ये नेता कश्मीर में राहुल की धरती से राहुल विरोध की राजनीति कर रहे हैं। ये लोग अपने मंचो से खुद को कांग्रेस का कार्यकर्ता तो बताते हैं परन्तु कृत्य विरोधियों वाला करते हैं। ट्विटर पर देखा कि आनन्द शर्मा खुलेआम कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बंगाल गठबंधन के संबंध में उनका ट्वीट बागी के रूप में लिखा हुआ प्रतीत हो रहा है। मुझे तो लगता है कि ये तथाकथित बड़े नेता राहुल गांधी के खिलाफ साजिश कर रहे हैं तथा कांग्रेस को आगामी चुनाव में हारते हुए देखना चाहते हैं। जिससे राहुल गांधी की क्षमता पर मुखर होकर सवाल उठा सकें। यदि इन आगामी चुनावों में कांग्रेस को अपेक्षित सफलता मिल गई तो इन तथाकथित बड़े G-23 के बागी नेता नेपथ्य में चले जायेंगे और कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी का एक छत्र राज स्थापित हो जायेगा।

Sunday, February 21, 2021

किसान आन्दोलन के बीच संघ का किसान संघ नदारद

किसानों के आंदोलन का आज 89 वां दिन है। सत्ता और किसान दोनों अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। लेकिन इन सब के बीच में एक सिरा लगभग नदारद है। जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। संघ तो वैसे हमेशा हिन्दू और किसान की बात किया करती थी। चाहे पूर्व में कांग्रेस की सरकार रही हो या अटल जी की सरकार रही हो। अटल जी के निजीकरण के विरोध में उस वक्त संघ सरकारी विरोध खुले मन्चों से करने में नहीं हिचकता था। लेकिन मौजूदा सत्ता के दौर में ऐसा प्रतीत होता है कि संघ का तेवर नरम पड़ चुका है या यूं कहें कि संघ मौजूदा दौर में अपने आपको लाचार महसूस कर रहा है। जभी लगभग तीन महीने गुजर जाने के बाद भी संघ का कोई संगठन किसानों के समर्थन में नहीं आया। संघ के एक पूर्व प्रमुख ने हरियाणा में किसानों को हिन्दूत्व से जोड़ते हुए कहा था कि हकीकत में अन्नदाता हीं हिन्दू है जो धरती मां से जुड़ा हुआ है। तो आज सवाल से खड़ा होता है कि क्या संघ अब सत्ता के सामने नतमस्तक हो चुका है ? क्या अब सत्ता को संघ की आवश्यकता नहीं है ?

बहरहाल हम इन बातों से थोड़ा आगे निकलते हुए संघ द्वारा बनाए गए एक संगठन का जिक्र करते हैं। जो पिछली सरकारों के दौरान किसानों के समर्थन में रहने वाला संगठन था। जिसका नाम "भारतीय किसान संघ" था। जो नये सत्ता के दौर में शायद नेपथ्य में चला गया है। भारतीय किसान संघ को दन्तोपन्त हेंगणी ने 13 मार्च 1978 को  राजस्थान में इस संगठन के बारे में सोचा और सभा में उपस्थित लोगों को अवगत कराया। फिर 4 मार्च 1979 में राजस्थान के कोटा शहर में भारतीय किसान संघ की पहली सभा हुई या यूं कहें कि 4 मार्च को भारतीय किसान संघ अस्तित्व में आया और किसानों के हक के लिए काम करना शुरू किया। हेंगणी ने हीं 1991 में एक और संगठन की नींव धरी थी। जिसका नाम "स्वदेशी जागरण मंच" था। दरअसल हम फिर किसानों पर आते हैं। किसान संघ ने किसानों के हक के लिए आन्दोलन करते हुए पहली बार 26 जनवरी 1981 में हैदराबाद विधानसभा को घेरा था। दोबारा फिर किसानों के मुद्दे पर 1985 में राजस्थान विधानसभा का भी सफल घेराव किया था और 1986-87 का जिक्र करना बहुत हीं महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एक बार फिर भाकिसं ने गुजरात विधानसभा का घेराव किया था। जिसको भारतीय जनता पार्टी ने अपना समर्थन दिया था। 1999 में एक बार फिर हरियाणा के किसानों के समर्थन में किसान संघ ने हस्तिनापुर में विरोध प्रदर्शन किया था और तो और 2003 में जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी थे और बिजली दरों में वृद्धि की गई थी। जब भी किसान संघ ने उसका जोरदार विरोध किया था। लेकिन आज किसान संघ की दशा इतनी दयनीय हो गई है कि वह मौजूदा सत्ता के खिलाफ कुछ भी बोलने में असमर्थ है।

जहां तक मैं देख पा रहा हूं कि संघ के हिन्दूत्व को किसान अब चुनौती दे रहें हैं। भले हीं सरकार और संघ यह मानकर चल रहा है कि यह आन्दोलन बस ढ़ाई प्रदेश का है, लेकिन इसका असर बहुत ब्यापक होने वाला है। क्योंकि जब खेती की बात आती है तो उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के लोग अपने आप को किसान मानते हैं। अभी पंजाब, राजस्थान और हरियाणा के लोकल इलेक्शन बताते हैं कि किसानों ने केन्द्र की सत्ता का बहुत नुकसान किया है। यदि यह आन्दोलन दक्षिण-पश्चिम और मध्य क्षेत्र में पहुंचने में कामयाब हो तो संघ और बीजेपी दोनों के लिए बुरी खबर होगी। इतने बड़े आन्दोलन में संघ का नदारद रहना बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। 


Friday, February 19, 2021

देश में राष्ट्रवादी महंगाई चरम पर

 सादर आभार,

राष्ट्र वादी महंगाई के दौर में आपका स्वागत है। महंगाई के बढ़ने की गति बांस (करैल) से भी तेज है। क्या डीजल, क्या पेट्रोल, क्या गैस सिलेंडर ? सबमें महंगाई का जबरदस्त तड़का लगा हुआ है। कमरतोड़ मंहगाई से रसोईं और सड़क दोनों का बजट बुरी तरह बिगड़ चुका है। लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। जैसे लोगों को महंगाई की आदत सी हो गई है। लाकडाउन और कोरोना की वजह से करोड़ों लोग पहले से हीं बेरोजगार हो चुके थे और ऊपर से ये राष्ट्र वादी महंगाई तो जान निकालने का काम कर रही है। 

अगर मैं कुछ पिछले सात-आठ साल पहले की बात करूं। तब दिल्ली की सत्ता पर एक दूसरी पार्टी काबिज थी। उस दौर में जब पेट्रोल-डीजल के दामों में एक रूपए की वृद्धि होती थी तो विपक्ष के लिए महंगाई डायन हो जाती थी। जबकि उनके शासनकाल में सिलेंडर की सर्वाधिक कीमत 413 रूपए, पेट्रोल 76 रुपए था और वो भी तब जब कच्चे तेल की कीमत 124 डालर प्रति बैरल होती थी। तब की महंगाई डायन आज डार्लिंग बन गई है। विपक्ष में रहते हुए जिस पार्टी ने महंगाई पर तमाम ब्यंग बाण चलाते थे। तब के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी को चूड़ियां भेजते थे। अब वो मानो कोमा में चले गए हैं या उनका अब जनता से सरोकार नहीं रहा।

जभी तो मैं इसे राष्ट्र वादी महंगाई का नाम दे रहा हूं। आज अगर नये उभरे कट्टर राष्ट्रवादियों से महंगाई पर बात करो तो वो वहीं व्हाट्सएप विश्वविद्यालय का ज्ञान बांटने लगते हैं कि जब लाकडाउन में पांच रूपए वाला गुटखा चालीस रूपए में ले सकते थे तो देशहित में पेट्रोल सौ रुपए का क्यों नहीं ले सकते। आज का दिल्ली में पेट्रोल का रेट 90.18 पैसा है और सिलेंडर की कीमत 717 राष्ट्र वादी रूपया हो चुका है। वर्तमान राष्ट्र वादी सरकार पेट्रोल पर 33 और डीजल पर 32 रूपए टैक्स के रूप में लेती है। इसके उलट कांग्रेस की सरकार पेट्रोल पर 10 तथा डीजल पर 5 रूपए टैक्स के रूप में वसूलती थी। महंगाई के ऊपर 2014 के तमाम विडियो मोदी जी और उनकी पार्टी के नेताओं के वायरल हो रहे हैं और लोग अब सवाल पूछ रहे हैं। अब तो कट्टर समर्थक भी स्टेटस पर साहेब के पुराने पोस्ट चिपकाने लगे हैं।

Saturday, February 13, 2021

पेट्रोल डीजल की किमतों में लगी आग

आज देश किसान आंदोलन के साथ-साथ महंगाई से त्रस्त है। एक तरफ घरेलू गैस की सब्सिडी को खत्म करते हुए प्रति सिलेंडर की कीमत 717 रूपए कर दी गई है। पेट्रोल की तो बात करना देशद्रोह समान है। एक वक्त था जब मुझे याद है कि 2013 में डीजल की कीमत 52 रुपये लीटर डीजल तथा 73 रूपए पेट्रोल की कीमत थी और उस दरम्यान अमिताभ बच्चन ,अक्षय कुमार जैसे कईयों अभिनेताओं ने कीमत वृद्धि की आलोचना करते हुए गाड़ियों में ब्यंग स्वरूप आग लगाने की बात करते थे। परन्तु आज देखिए कि @abpnews के अनुसार भाजपा शासित मध्य प्रदेश में आज पेट्रोल की कीमत 70 सालों में पहली बार सैकड़े अर्थात 100 रुपये लीटर तथा डीजल 80 रूपए से ऊपर रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज की गई। फिर भी इन‌ अभिनेताओं की गाड़ी मक्खन की तरह चल रही है। अब इनकी एक ट्वीट करने तक की हिम्मत नहीं है।अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी गाड़ी में तेल भरपूर है मात्रा में है और साथ हीं मुंह में दही भी प्रचुर मात्रा में जमी हुई है।

मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तब की कांग्रेस सरकार के खिलाफ इन अभिनेताओं ने सुनियोजित तरीके से एक षणयन्त्र रचने का काम किया था। वास्तव में अगर ये तथाकथित महान अभिनेता राष्ट्र की जनता के प्रति उत्तरदाई होते तो आज इस सरकार के खिलाफ भी आवाज उठाते। पर इनका उद्देश्य देश की जनता नहीं एक राजनैतिक पार्टी को पुनर्स्थापित करने की थी। जिसमें वो भली-भांति सफल भी हुए। मैं किसी और का नहीं अपना हीं उदाहरण दे रहा हूं। कोरोना काल के बाद नौकरी चली गई, गैस की सब्सिडी चली गई, पेट्रोल-डीजल के भाव आसमान पर चढ़ गये। फिर भी इस घमण्डी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रहा है।

Thursday, February 4, 2021

किसानों को और कितना यातना देगी केन्द्र की घमंडी सरकार

आज 70 दिन हो गए किसान भाइयों को दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हुए हैं। लेकिन उनकी समस्या का हल अब तक नहीं निकल पाया। प्रधानमंत्री आवास बीस किलोमीटर की दूरी पर संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट भी लगभग समान दूरी पर स्थित है। लेकिन किसी को अन्नदाताओं की बेबसी नहीं दिखी। अब तो कोरोना के बाद का बजट भी आ गया। बजट के आंकड़ों पर भी नजर डाला जाय तो पिछले साल की तुलना में बहुत मामूली बढ़त की गयी है। लेकिन वो बढ़त इतनी नहीं है कि आन्दोलनकारी किसानों में सरकार के प्रति विश्वास बहाली का सिलसिला शुरू हो सके। मेरा तो लगभग रोज नोएडा सेक्टर 62 तक आना-जाना लगा रहता है। की बार तो नेहरू प्लेस से वापस घर लौटते हुए आन्दोलन स्थल पर रूकना भी हो जाता है। जहां पर किसानों के जज्बे और बुलंद हौसले को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो राधे प्रिय खुद कुरूक्षेत्र में जमें हों। और वही योगी बाबा आज सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री हैं। जो लोग टिकैत के रोने का मजाक उड़ा रहे हैं। उन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है। 

मिडिया और अन्य तबके के लोग कह रहें हैं कि राकेश टिकैत के आंख से निकले आंसू ने दोबारा से किसान आन्दोलन में जान डाल दिया। वैसे आंसूओं के गिरने की ताकत भारत और विश्व जगत ने कई बार देखा है। आंसू की बात करें तो अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, बराक ओबामा, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति पुतिन,  भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी तक की आंखों से कभी न कभी किन्हीं कारणों से आंसू टपके हैं। कर्नाटक के किसान परिवार से आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा को भी हमने रोते देखा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को भी लोकसभा में पूरे देश ने फूट-फूटकर रोते देखा है।

राकेश टिकैत के रोने का हीं असर हुआ कि गाजीपुर बार्डर पर सात स्तरीय अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था तालीम कर दी गई हैं। सड़कों पर लोहे की कीलें गाड़ दी गयी हैं, कंक्रीट की दिवारें चुनवा दी गई हैं और सिंघु बार्डर पर तो सड़क कै बीचोबीच गड्ढे सरकार द्वारा खुदवा दिए गए हैं। टिकैत के आंसुओं का हीं असर है कि सिंघु बार्डर के आस-पास के इलाकों में कई दिनों तक इन्टरनेट सेवा बाधित रही और यही समस्या गाजीपुर धरना स्थल पर है। मैं एक बात बेझिझक महसूस करता हूं कि टिकैत के निकले कीमती आंसुओं ने आन्दोलन को जीवन दे दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में जगह-जगह किसानों के समर्थन में महापंचायतों का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें बहुत भारी भीड़ इकट्ठी हो रही है और उनमें धरना स्थल से उठकर राकेश टिकैत भी उपस्थित हो रहें हैं।

Thursday, January 28, 2021

क्या टिकैत अन्नदाताओं की बुलन्द आवाज बन चुके हैं

क्या किसान आन्दोलन 26 जनवरी के बाद राकेश टिकैत के चेहरे के आस-पास आकर सिमट गई है ? मिडिया की आंखों से देखें तो यही सच दिखाई दे रहा है। आन्दोलन 26 जनवरी की लाल किले पर घटित घटना के बाद अपना रुप बदल चुका है। लेकिन जैसे हीं मंच पर रोते हुए राकेश टिकैत का विडियो आया। जब उन्होंने आरोप लगाया कि लोनी से भाजपा विधायक हमारे बुजुर्गों को डरा-धमका रहे हैं। अब मैं यहां से नहीं जाउंगा। यही अपील एक तरह से लोगों के अन्दर भावनात्मक रूप से घर कर गया। मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बड़ौत, नोएडा, गाजियाबाद और हरियाणा के कुछ जिले के लोगों में भावनात्मक अपील कर गया। रात में हीं राकेश टिकैत के मुजफ्फरनगर स्थित आवास पर समर्थक किसानों का रात में हीं जुटना शुरू हो गया और गाजीपुर चलो का नारा बुलंद करने लगे।

रात में हीं मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों से लोग ट्रैक्टर और अन्य साधनों से दिल्ली बार्डर की तरफ कूंच कर दिया। फिर भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत जी ने कल सुबह मुजफ्फरनगर के राजकीय इण्टर कालेज में किसान महापंचायत बुलाने का आह्वाहन किया है। निश्चित तौर पर कल कुछ रैली ऐतिहासिक होने वाली है। क्योंकि विपक्ष की सारी पार्टियां अब किसान आन्दोलन को अपना समर्थन दे चुकी है। एक बात तो तय है कि लोनी विधायक के एक तथाकथित बयान ने खत्म होने वाले किसान आन्दोलन को एक नई जिंदगी मुहैय्या करा दी। इन सब घटनाओं को अगर आपस में जोड़कर देखने की कोशिश करें तो पायेंगे कि इस आन्दोलन ने राकेश टिकैत को एक राष्ट्रीय किसान नेता के तौर पर स्थापित कर दिया है।


Tuesday, January 26, 2021

गणतंत्र आन्दोलन पर गर्व और ट्रैक्टर रैली में हिंसा होना शर्मनाक

26 जनवरी हिन्दुस्तान के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं? दिसंबर, 1929 में लाहौर में रावी नदी के किनारे पं. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का सम्मेलन आयोजित किया गया था और यहां पर हीं पहली बार कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया था।

उसी आयोजित सम्मेलन में कांग्रेस ने कहा था कि अगर 26 जनवरी, 1930 तक अंग्रेजी हुकूमत भारत को स्वाधीन घोषित नहीं किया। तो उसी दिन आन्दोलनकारीओं द्वारा स्वत: भारत को पूर्ण स्वाधीन घोषित कर दिया जाएगा। चूंकि अंग्रेज सरकार का  भारत को स्वाधीन करने का कोई इरादा नहीं था। इसीलिए 1930 से 1947 तक हर 26 जनवरी को कांग्रेस स्वाधीनता दिवस मनाती रही। यही वजह रहा कि 26 जनवरी, 1950 के दिन भारत को गणतंत्र घोषित किया गया तथा 26 जनवरी की तारीख हमारे इतिहास का गौरवशाली क्षण बन गया।

आज 26 जनवरी है और आज हम सभी देशवासी बड़े हीं नाज से 72 वें गणतंत्र दिवस के रूप में मना रहें हैं। जहां दल से उपर उठकर राष्ट्र के शूरवीरों को एकमत से याद किया जाता है और उनकी शौर्य गाथा से आज की पीढ़ी को अवगत कराया जाता रहा है। लेकिन आजादी के 72 सालों के इतिहास में कल देश को दो झांकियां देखने को मिलेगी। पहली झांकी सेना और उसके शौर्य की निकलती है जिसकी परम्परा आजादी के बाद से अनवरत चली आ रही है। लेकिन आज देश के सामने एक अनोखा दृश्य है। जब किसान भी सैकड़ों किलोमीटर लंबी ट्रैक्टर रैली सरकार के विरोध में निकाल रहे हैं। सुबह आठ बजे की बात करें तो गाजीपुर NH 24 पर खोड़ा से लेकर लाल कुआं तक ट्रैक्टरों से पटी पड़ी थी।

सरकार द्वारा निर्मित तीन नये कृषि कानून के खिलाफ किसान उद्वेलित है। सरकार के हठपूर्ण रवैय्ये के कारण किसानों का धरना आज 62 दिन बाद भी समाप्त नहीं हो पाया। 12 दौर की बात भी किसान और सरकार के बीच बने गतिरोध को खत्म नहीं कर पाई। ये सब बस सरकार के अकड़ के कारण हुआ। सरकार को लगता है कि हमने प्रचण्ड बहुमत प्राप्त किया है तो उसके बल पर कुछ भी करने का अधिकार हमें मिल गया है। लेकिन ये भूल गए हैं कि सड़क पर बैठे इसी गण ने इनको इतना विशाल बहुमत दिया है। और आज वही गण सत्तासीन तन्त्र को उसकी असली जगह दिखा रहा है। 

मेरे मन-मस्तिष्क में एक सवाल कौंध रहा है कि आज देशवासी किसानों की ट्रैक्टर रैली को देखें या जवानों की प्रदर्शनी को। वैसे जवानों की परेड के बाद हीं किसानों की ट्रैक्टर रैली निकलेगी। जो भी हो जब गाजीपुर सीमा से, टिकरी सीमा से किसान निकलें तो वो देखने लायक रहा। लेकिन सरकारी दबाव में न्यूज चैनल किसानों को नहीं दिखा रहे। जिसे हम सोशल मीडिया पर देख रहे हैं। किसानों से अपील है कि हमेशा की तरह आज भी आप संयम का परिचय देते हुए अपनी रैली शान्ति पूर्ण ढंग से पूरा करेंगे।

किसान देवता हैं ऐसा सत्ताधारी पार्टी हर चुनाव में बोलती रहती थी। परन्तु आज जब अन्नदेवताओं को सरकार की सख्त दरकार थी। तब सरकार उन्हें ठण्ड में सिकुड़ने के लिए छोड़ दिया है। सरकार अपनी हठधर्मिता को छोड़कर किसानों की मांगों को मान सकती थी। वो मौका गवां दिया। अगर इतिहास की बात करें तो एक बार और इसी तरह के टकराव की आहट 1965 में तमिलनाडु में हिन्दी विरोध को लेकर हुआ था। द्रविड़ आंदोलन के जनक सीएन अन्नादुरै ने हिंदी का विरोध शुरू किया था। जब तमिलनाडु के लोग 26 जनवरी के दिन काला झण्डा लेकर प्रदेश भर में आन्दोलन करने के लिए उद्वेलित थे। तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार में शामिल लोगों ने 26 जनवरी के बलिदान और इतिहास से अवगत करिते हुए ऐसा न करने की अपील की। जिसका यह असर हुआ कि सीएन अन्नादुरै ने अपना प्रतिकात्मक विरोध 26 जनवरी की बजाय 25 को किया। यहां सरकार और तमिल दोनों ने देश की गरिमा को धूमिल करने से बचा लिया।

आज ट्रैक्टर रैली के नाम पर जो हुआ वह शर्मनाक है। आन्दोलन के बीच कुछ उपद्रवी लाल किला और आईटीओ पर हिंसा की‌। जिसकी मैं भर्त्सना तो करता हूं उसके साथ इनके साथ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए ऐसी मेरी उम्मीद और आकांक्षा है। इस तरह से आप राष्ट्रीय पर्व पर कर नहीं कर सकते। आज इन आन्दोलनकारीओं को मैं इंसान नहीं मानता। मैं दिल्ली पुलिस के जवानों के धैर्य को नमन करता हूं। इस तस्वीर को विश्व समुदाय की मिडिया ने देखा। जिसका संदेश सही नहीं गया। लाल किला पर जिस जगह 1950 से तिरंगा फहराया जाता है और आज भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने ध्वजारोहण किया था। उसे उतारकर एक धार्मिक झण्डा लगा दिया गया। जो हमारे लिए और किसान आन्दोलन के लिए शर्म की बात है।


जय हिन्द

जय जवान जय किसान


Friday, January 22, 2021

ग्यारहवें दौर की वार्ता के बाद किसान और सरकार के बीच बातचीत का सिलसिला टूटने के कगार पर

आज दोपहर बाद किसानों और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच ग्यारहवें दौर की वार्ता प्रस्तावित थी। तय समय पर किसान तो पहुंच गए मगर किसानों ने सरकार पर आरोप लगाया कि वो तीन घंटे इंतजार कराने के बाद आते और बस पन्द्रह मिनट में हीं मिटींग समाप्त हो गई। सरकार के अपने तर्क और सवाल हैं। मैं इस पर कोई और चर्चा नहीं करूंगा। क्योंकि आप सभी लोग उन खबरों से अवगत हो गये होंगे। आज मैं किसान आन्दोलन से होने वाले राजनैतिक नफा-नुकसान के बारे में बात करने की कोशिश करूंगा।

किसानों के लम्बे आन्दोलन का सरकार पर असर - किसानों का आंदोलन आज अनवरत 58 दिनों से चल रहा है। न किसान झूूूके न सरकार। नतीजा यह रहा कि आज की वाार्ताता के बाद सरकार भी मुखर हो गई और खुलकर कुछ किसान नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ नेता ऐसे हैं जो आन्दोलन की आत्मा को तोड़ रहे हैं। ऐसे लोग कभी भी सकारात्मक सोच के साथ नहीं आते। तो इसका सहज अर्थ यह निकलता है कि सरकार भी अब कड़ा रूख अख्तियार करने का मन बना लिया है। और यह विचार निश्चित तौर पर अमित शाह जी का होगा। इस आन्दोलन से निपटने का तरीका बिल्कुल नागरिकता कानून के जैैसा था। लेकिन यहां दांव उल्टा पड़ गया।

किसानों की ट्रैक्टर रैली - यदि ट्रैक्टर रैली किसान निकालने में सफल रहे तो मोदी सरकार के माथे पर आपातकाल की की तरह कभी न मिटने वाला धब्बा लगेगा। सरकार और संघ मिलकर समाज में किसान हितैषी सरकार ढिंढोरा पिटते है। जिस पर निश्चित तौर पर मोदी जी की साख पर बट्टा लगेगा। मैं टी वी पर देख रहा हूं भाजपा के बड़े विद्वान प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी जी आज तक चैनल पर आज जिस तरह से कृषि निजीकरण की पैरोकारी कर रहे हैं। वो किसानों को उकसाने वाला है। किसान के फसलों की तुलना विद्वान प्रवक्ता जी मोबाइल और कार से कर रहे थे। मैं तो उनके विवेक पर सवाल खड़े करता हूं कि आप इस समय ऐसी बकवास बात कैसे कर सकते हैं ? जब आपका किसान आपके खिलाफ सड़कों पर उतरा हो। निश्चित तौर पर ऐसे लोग भाजपा या सरकार का भला नहीं करने वाले।

किसानों का निश्चय - किसान भाइयों ने पहले दिन से हीं एक निश्चय के साथ आन्दोलन कर रहे हैं। MSP की कानूनी गारण्टी और तीनों ने कानून पूरी तरह से रद्द हो। पर सरकार भी कभी MSP का आश्वासन जुबानी ख़र्च में तो देती है पर लिखकर नहीं। फिर कभी अट्ठारह से चौबीस महीने कानून पर अमल को रोकने का आश्वासन देती है। जुबानी जमा ख़र्च के अनुसार सरकार किसानों को वो सब कुछ देना चाहती है पर जो किसान चाह रहा है सरकार वहीं उसे देना नहीं चाहती। कमाल का विचार है सरकार का। भेड़ से ऊनी कम्बल का वादा तो कर दिया मगर ये नहीं बताया कि बाल भेड़ के हीं काटे जायेंगे।


Wednesday, January 20, 2021

लोकतंत्र के मायने अमेरिका हमसे बहुत बेहतर

अमेरिका से अनगिनत असहमतियों के बीच आज हमें उसके उदार लोकतंत्र को देखते हुए यह कहने में खुशी हो रही कि एक परिपक्व देश में हीं ऐसी विलक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था हो सकती है। जहां एक भारतीय अमेरिकी नागरिक भी अमेरिका में दूसरे स्थान का नागरिक बन सकता है। कल जब कमला हैरिस ने अमेरिका के उप-राष्ट्रपति के पद और गोपनीयता की शपथ ली। सीना गर्व से गुब्बारा बन गया। और अनायास हीं मुंह से निकल पड़ा अमेरिका का लोकतंत्र इसी तरह जीता-जागता रहे और वहां के लोग आगे भी जागरूक बनें रहें।

हमारे यहां तो लोगों की बातों में अथाह दोगलापन है। कल रात्रि में (भारतीय समयानुसार) जब कमला हैरिस शपथ ग्रहण करने के लिए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज के सामने हाथों में "बाइबिल" लिए खड़ी थी और शपथ ले रहीं थीं। जब सभी लोग उन्हें भारत का सम्मान बता रहे थे। ऐसे लोगों में भक्त और दक्षिण पंथी विचारक भी शामिल थे। जबकि वो नागरिक अमेरिका की थी और शपथ अमेरिकी संविधान की ले रहीं थीं। ऐसे में पता नहीं लोगों को गर्व कहां महशूस हुआ ? हां अगर गर्व महसूस करना हो तो वो अमेरिकी संविधान पर करो। जहां एक भारत से संबंध रखने वाली महिला को नहीं बल्कि एक अमेरिकी नागरिक को उन्होंने तवज्जो दी।

हमारे देश में 2014 में एक ऐसा हीं नजारा देखने को मिला था। जब सत्ता में अटल जी की अगुआई में बीजेपी थी और बिखरे हुए विपक्ष की अगुआई सोनिया गांधी जी कर रही थी। जो कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी जी की पत्नी थी। जिन्होंने ने इटली से आकर भारत में हिन्दू रिति-रिवाज से शादी के पवित्र बंधन में बधी थीं और भारत की नागरिक बनी थी। उस चुनाव में भाजपा और शरद पवार जैसे लोगों ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था। शादी से पहले सोनिया गांधी मूलतः इटली की नागरिक थीं। सुषमा स्वराज ने तो यहां तक कह दिया कि अगर सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी तो मैं सर मुड़ा लूंगी। तब सारे भक्त ये भूल गए थे कि सोनिया अब इटली की नागरिक नहीं बल्कि भारत के नागरिक थे। उस चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई ने जीत हासिल की और मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने। ऐसे दोगलों के लिए मेरा ये लेख था। अन्त में फिर अमेरिकी लोकतंत्र को सलाम।

हमारे देश में आज भी लोकतंत्र शैशवास्था में है। हमारे यहां कोई फिल्म बन जाती है। उसमें कोई संवाद किया जाता है। तो लोगों की संवेदनाएं घायल हो जाती है। यदि एक नारा कहीं लगा दिया जाता है तो हमारा लोकतंत्र टूटने लगता है। भाई हमारा लोकतंत्र और संविधान इतना महान है कि वो ऐसी बेवकूफी हरकतों से बिखरने वाला नहीं है। हां ऐसे लोगों के ऊपर तत्काल भारतीय संविधान के अनुसार त्वरित एवं कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। परन्तु अफसोस है कि कथित विवादित नारा देने वालों पर पुलिस अदालत में ठोस साक्ष्य नहीं दे पाई। इसलिए कहता हूं कि अमेरिका का लोकतंत्र महान है और हां कमला हैरिस भारतीय नहीं बल्कि अमेरिकी नागरिक की हैसियत से वहां की नम्बर दो लेडी बनी हैं।


Tuesday, January 19, 2021

किसानों के समर्थन में राहुल गांधी की पत्रकार वार्ता

नये साल में इटली की ब्यक्तिगत यात्रा से वापस आने के बाद कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी किसानों और तीनों विवादित कानूनों को लेकर लगातार मार्च और सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे थे। लेकिन एक कदम और चलकर आज दोपहर डेढ़ बजे ‌राहुल गांधी ने दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकार वार्ता किया। जहां पर उन्होंने किसानों के समर्थन में अपना बयान दोहराया तथा किसानों के लिए लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया। अपने पत्रकार वार्ता के दौरान आज राहुल गांधी की शारीरिक भाषा संतुलित थी।‌ राहुल गांधी एकाध मौकों को छोड़कर बस किसान और नव कृषि कानून पर हीं बात करते दिखे। और हर पत्रकार के सवालों का जबाव दिए। लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला। उन्हें अपने अन्दर निरंतरता लाए रखने की जरूरत है। 

इस नए कानून में कई खामियां है। जैसे कि कमोडिटी एक्ट में जो बदलाव किया गया है। उसके मुताबिक कोई भी ब्यवसायी किसी भी कृषि फसल का कम मूल्य पर कितनी भी जमाखोरी कर सकता है और महंगे मूल्य पर बाजार में बेच सकता है। इसका असर देश के आम लोगों पर पड़ेगा। राहुल गांधी ने चीन और अर्नब गोस्वामी पर भी अपने विचार देश के सामने संक्षिप्त रूप से साझा किया। इसी दौरान कांग्रेस ने 'खेती का खून' "तीन काले कानून" नामक एक बुकलेट भी जारी किया।


राहुल गांधी के प्रेस वार्ता की कुछ महत्वपूर्ण झलकियां -

4, 5 लोगों को देश की खेती का ढाँचा दिया जा रहा है.

‘मैं साफ़ सुथरा आदमी हूँ, मुझे ये लोग छू नहीं सकते, हाँ गोली ज़रूर मार सकते हैं, मैं इनसे डरता नहीं हूँ 

चाहे केई मेरे साथ न हो मैं अकेला खड़ा रहूँगा और लड़ता रहूँगा, ये मेरा धर्म है 

आज मेरी बात मत मानना, जब गुलाम बन जाओगे तब मानोगे’- राहुल गांधी 

एक पत्रकार को बालाकोट की जानकारी दी गई थी। पत्रकार ने कहा , यह हमारे लिए बहुत अच्छा हुए हैं कि हमारे 40 जवान मर गए अब हम चुनाव जीत जाएँगे। जिसने जानकारी दी और जिसे मिली दोनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए.

विपक्ष को मीडिया की ज़रूरत होती है। विपक्ष को कोर्ट की ज़रूरत होती है। विपक्ष को संसद की ज़रूरत होती है।विपक्ष को संस्थानों की ज़रूरत है लेकिन इन सब पर सरकार का क़ब्ज़ा है.

किसान जानता है राहुल गांधी क्या करता है। भट्टा परसोल में जेपी नड्डा कहाँ थे ? भूमि अधिग्रहण के वक्त जेपी कहाँ थे.

राहुल गांधी कौन है? क्या करता है? यह बात हिंदुस्तान का हर किसान जानता है। किसान जानता है कि भट्टा परसोल में कौन किसान के साथ खड़ा था ? भूमि अधिग्रहण के समय नड्डा जी या मोदी जी नहीं बल्कि 'राहुल गांधी' किसानों के साथ खड़ा था.


Tuesday, January 12, 2021

विवादित कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने बनाई चार सदस्यी कमेटी

आन्दोलन कर रहे किसानों और उनकी मांगों पर माननीय उच्चतम अदालत ने चार सदस्यी कमेटी बनाई है। कमेटी का काम किसानों की समस्या और सरकार के पक्ष को सुनकर माननीय अदालत को अवगत कराना है। कमेटी के ऐलान के बाद मामला और उलझता हुआ प्रतीत हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने चार नाम इस प्रकार दिए हैं, हरसिमरत मान, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, डाक्टर प्रमोद जोशी और चौथा नाम महाराष्ट्र शेतकारी संगठन से संबंध रखने वाले अनिल धनवत का है।

इनमें से तीन प्रमुख लोग तो पहले से हीं सरकार समर्थित कानून को सार्वजनिक तौर पर देश के प्रतिष्ठित अखबारों में लेख लिखकर किसान हितैषी बताया था। तो इनसे अब निष्पक्षता की क्या कोई उम्मीद की जा सकती है ? जैसा कि उम्मीद था। किसान संगठनों ने भी इनके नाम पर आपत्ति जताई है और यहां तक कह दिया कि यदि कमेटी के लोग बदल भी दिए जाए। तब भी हम कमेटी के सामने नहीं जाने वाले। 

किसानों को भी चाहिए कि वे लोग अदालत का सम्मान करते हुए कमेटी के सामने जाएं। बेशक वो अपनी मांगों पर अड़े रहे। अगर किसान संगठन बात-चीत से दूरी बनाते हुए दिखते हैं तो आम जनता में उनके प्रति नकारात्मक बातें बहुत ज्यादा फैलाई जायेंगी। जो किसान आन्दोलन के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होगा। सरकार को भी अपनी जिद छोड़कर किसानों से खुले मन से बात करनी चाहिए।


Monday, January 11, 2021

कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट की मोदी सरकार को तमाचा

नये कृषि कानून को लेकर मचे घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई चल रही है। इस सुनवाई में कोर्ट ने मोदी सरकार पर सख्त रूख अख्तियार करते हुए बहुत हीं बड़ी टिप्पणी की‌। SC ने केन्द्र सरकार को किसान कानून पर लगाई कड़ी फटकार - माननीय अदालत ने कहा कि यदि सरकार कृषि कानून पर रोक नहीं लगाती है तो अदालत रोक लगायेगी। किसानों के आंदोलन के संबंध में माननीय अदालत ने कहा कि हम किसानों को प्रदर्शन से नहीं रोकेंगे. किसान आंदोलन जारी रखना चाहें तो जारी रख सकते हैं।

इससे पहले कोर्ट ने सरकार पर कभी भी इतना तल्ख टिप्पणी नहीं की थी। कोर्ट ने बुजुर्ग किसान और उनकी मौतों के उपर भी सरकार से सवाल कर रही है। जिस पर सरकार को कोई ज़बाब नहीं सूझ रहा है। सरकार बैकफुट पर है। कोर्ट ने सरकार के बारे में बोला कि हम आपके ब्यवहार से बहुत निराश है, आप असंवेदनशील कैसे हो सकते हैं ? माननीय अदालत की तल्ख टिप्पणी के बाद भी सरकार अपनी दलील को बेशर्मी से रखें जा रही है।

केन्द्र सरकार को ये मान लेना चाहिए कि किसानों की ये लड़ाई अदालत में सुनवाई और पेशी की नहीं है। यह लड़ाई उनके भविष्य और उनके सम्मान की लड़ाई है। आज सर्वोच्च अदालत में केन्द्र सरकार के वकील जी दलील दे रहे थे कि उत्तर भारत के तीन प्रदेशों के किसान हीं क्यों आन्दोलन कर रहे हैं ? दक्षिण भारत के किसान क्यों आन्दोलन नहीं कर रहे हैं ? तो उनकी नासमझी के लिए मैं बता दूं कि इस आंदोलन में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के भी किसान भाई भी शामिल है। और दक्षिण के किसानों का रेल सेवा बाधित होने के बाद यहां तक पहुंचना आसान नहीं रह गया है। दूर-दराज के किसान भी अपने स्तर पर विरोध कर रहे हैं। लेकिन उसे देखने के लिए अहम का चश्मा उतार फेंकना पड़ेगा। कल हरियाणा के मुख्यमंत्री अपने गृह जिले में 'किसान पंचायत' नहीं कर पाए। इससे बड़ी जलालत और क्या होगी संघ की सरकार के लिए। किसान भाइयों का शोषण नहीं होना चाहिए और तत्काल किसान भाइयों को विश्वास में लेकर केन्द्र सरकार को उनकी बात मान लेनी चाहिए। वर्ना कुर्सी वहीं देते हैं और उतार कर फेंक भी देते हैं। जैसा कि पिछली सरकारों ने देखा भी है।

फिर भी इन बेशर्मों को शर्म कहां ?

#कृषि_निजीकरण_बंद_करो

Friday, January 1, 2021

नये साल की पहली खुशखबरी सीरम संस्थान द्वारा विकसित कोरोना की आपातकालीन दवा को मिली सरकार की मंजूरी

नये साल के आगाज के साथ कोरोना वैक्सीन के इस्तेमाल की आपातकालीन स्थिति में करने के लिए सरकार ने आदेश जारी कर दिया। जो नये साल के लिए कोरोना की लड़ाई में एक रोल अदा करेगी। और जनता अत्यधिक आत्म विश्वास के साथ कोरोना से लड़कर जंग जीत हासिल कर सकती है। लगभग अब पूरी दुनिया में मानव जीवन पर लगा ग्रहण छंटने की संभावना प्रबल हो गई है। दवाई के अभाव में दुनिया भर में ‌हजारों-लाखों इंसानों की जान चली गई। लाखों लोगों का परिवार उजड़ने से अब बच जायेगा।