Friday, January 22, 2021

ग्यारहवें दौर की वार्ता के बाद किसान और सरकार के बीच बातचीत का सिलसिला टूटने के कगार पर

आज दोपहर बाद किसानों और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच ग्यारहवें दौर की वार्ता प्रस्तावित थी। तय समय पर किसान तो पहुंच गए मगर किसानों ने सरकार पर आरोप लगाया कि वो तीन घंटे इंतजार कराने के बाद आते और बस पन्द्रह मिनट में हीं मिटींग समाप्त हो गई। सरकार के अपने तर्क और सवाल हैं। मैं इस पर कोई और चर्चा नहीं करूंगा। क्योंकि आप सभी लोग उन खबरों से अवगत हो गये होंगे। आज मैं किसान आन्दोलन से होने वाले राजनैतिक नफा-नुकसान के बारे में बात करने की कोशिश करूंगा।

किसानों के लम्बे आन्दोलन का सरकार पर असर - किसानों का आंदोलन आज अनवरत 58 दिनों से चल रहा है। न किसान झूूूके न सरकार। नतीजा यह रहा कि आज की वाार्ताता के बाद सरकार भी मुखर हो गई और खुलकर कुछ किसान नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ नेता ऐसे हैं जो आन्दोलन की आत्मा को तोड़ रहे हैं। ऐसे लोग कभी भी सकारात्मक सोच के साथ नहीं आते। तो इसका सहज अर्थ यह निकलता है कि सरकार भी अब कड़ा रूख अख्तियार करने का मन बना लिया है। और यह विचार निश्चित तौर पर अमित शाह जी का होगा। इस आन्दोलन से निपटने का तरीका बिल्कुल नागरिकता कानून के जैैसा था। लेकिन यहां दांव उल्टा पड़ गया।

किसानों की ट्रैक्टर रैली - यदि ट्रैक्टर रैली किसान निकालने में सफल रहे तो मोदी सरकार के माथे पर आपातकाल की की तरह कभी न मिटने वाला धब्बा लगेगा। सरकार और संघ मिलकर समाज में किसान हितैषी सरकार ढिंढोरा पिटते है। जिस पर निश्चित तौर पर मोदी जी की साख पर बट्टा लगेगा। मैं टी वी पर देख रहा हूं भाजपा के बड़े विद्वान प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी जी आज तक चैनल पर आज जिस तरह से कृषि निजीकरण की पैरोकारी कर रहे हैं। वो किसानों को उकसाने वाला है। किसान के फसलों की तुलना विद्वान प्रवक्ता जी मोबाइल और कार से कर रहे थे। मैं तो उनके विवेक पर सवाल खड़े करता हूं कि आप इस समय ऐसी बकवास बात कैसे कर सकते हैं ? जब आपका किसान आपके खिलाफ सड़कों पर उतरा हो। निश्चित तौर पर ऐसे लोग भाजपा या सरकार का भला नहीं करने वाले।

किसानों का निश्चय - किसान भाइयों ने पहले दिन से हीं एक निश्चय के साथ आन्दोलन कर रहे हैं। MSP की कानूनी गारण्टी और तीनों ने कानून पूरी तरह से रद्द हो। पर सरकार भी कभी MSP का आश्वासन जुबानी ख़र्च में तो देती है पर लिखकर नहीं। फिर कभी अट्ठारह से चौबीस महीने कानून पर अमल को रोकने का आश्वासन देती है। जुबानी जमा ख़र्च के अनुसार सरकार किसानों को वो सब कुछ देना चाहती है पर जो किसान चाह रहा है सरकार वहीं उसे देना नहीं चाहती। कमाल का विचार है सरकार का। भेड़ से ऊनी कम्बल का वादा तो कर दिया मगर ये नहीं बताया कि बाल भेड़ के हीं काटे जायेंगे।


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