बिहार चुनाव इस साल का और यूं कहें कि आने वाले अगले एक साल तक का सबसे बड़ा चुनाव साबित होने वाला है। इस बात के आसार प्रबल हैं कि इस बार बिहार में बदलाव की बयार चलेगी। उसके कुछ कारक भी है-
नितीश कुमार के खिलाफ 15 साल की सत्ता विरोधी लहर- नितिश जी की छवि अमूमन 'सेकुलर' और विकास वाले नेता की रही है। वो जबसे 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए। उसके बाद उन्होंने कभी पिछे मुड़कर के नहीं देखा। बीजेपी गठबंधन के साथ 5 साल का पहला सफल कार्यकाल पूरा करने के बाद नितिश जी फिर इसी गठबंधन का चेहरा बनकर 2010 में दुबारा जनता के सामने अपने काम को लेकर गये। और बिहार की जनता ने एक बार फिर से नितिश जी के काम और चेहरे को सिर आंखों पर बिठाया और पहले कार्यकाल से भी बड़ी जीत दर्ज कर वापस सत्ता में पुनः स्थापित हुए। और पूर्व की भांति एकाग्र होकर अपने काम पर ध्यान देने लगे।
2013 में मोदी के नाम पर नितीश-भाजपा का पुराना गठबंधन टूटा- नितीश कुमार की पार्टी और भाजपा में सबकुछ बढ़िया चल रहा था कि अचानक भाजपा ने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नाम को आधिकारिक तौर पर आगे करके 2014 का लोकसभा चुनाव की घोषणा कर आक्रामकता के साथ चुनाव में उतर चुकी थी। जिसको स्वीकार करने के लिए बीजेपी की तरफ से नितिश कुमार पर दबाव बन रहा था। परन्तु गौर करने वाली बात ये है कि गुजरात में हुए भीषण नरसंहार (दंगे) में मोदी जी पर किसी खास समुदाय को जानबूझकर लक्ष्य करने का आरोप लग चुका था। जिसकी वजह से अल्पसंख्यकों में डर का माहौल था। और नितिश कुमार की छवि एक गैर-सांप्रदायिक नेता की थी।
तो उस वक्त नितिश कुमार उस दोराहे पर खड़े थे। जिसकी एक तरफ दिल्ली की सत्ता में भागीदारी साफ-साफ देख सकते थे और दूसरी तरफ उनकी सेकुलर छवि थी। जिसने नितिश कुमार को बिहार का एक सर्वमान्य नेता बनाया। तो अन्तत: यह हुआ कि 2013 के मध्य में जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन टूट गया और दोनों पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ी। जिसमें भाजपा को अप्रत्याशित लाभ हुआ तो वहीं जेडीयू महज दो सीटों पर आकर सिमट गयी। और नितिश कुमार ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और महादलित समाज से आने वाले जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया।
गठबंधन टूटने के बाद लालू प्रसाद यादव बने नितिश कुमार का सहारा - जैसा कि ऊपर वाले पैराग्राफ में विवरण दिया गया है कि मोदी जी के नाम पर जब नितिश-भाजपा का गठबंधन टूटा तो लालू यादव बार-बार नितिश के खेवनहार बने। भाजपा के समर्थन वापसी के बाद कांग्रेस और लालू जी की पार्टी राजद ने बारी-बारी जीतनराम और नितिश कुमार जी का कुर्सी सुख भोगने के लिए समर्थन किया। भाजपा के सह पर जब जीतनराम मांझी ने जेडीयू में बगावत कर दिया और नितिश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने से रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। उस दौरान मत विभाजन के वक्त विधानसभा में भाजपा ने आधिकारिक तौर पर मांझी के पक्ष में वोट किया। तो वहीं दूसरी तरफ लालू और कांग्रेस पार्टी ने लालू के कहने पर नितिश के आमंत्रण पर नितिश कुमार के पक्ष में मतदान किया और विधानसभा में नितिश कुमार जी एक बार फिर अपना बहुमत सिद्ध करके मुख्यमंत्री पद को सुशोभित किया।
2015 का विधानसभा चुनाव लालू-नितीश और कांग्रेस ने मिलकर लड़ा और जीता- इतने बड़े घटनाक्रम के दौरान पार्टी के उदय के समय से एक दूसरे के खिलाफ राजनितिक लड़ाई और भाषण देने वाली पार्टी मोदी इफेक्ट की वजह से एक साथ आ खड़ी हुई। इस बात से कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि मोदी ने दो विपरित ध्रुव के लोगों को एक पाले में लाकर खड़ा कर दिया। एक तरह से 1990 के बाद का एक बहुत बड़ा प्रयोग था। पूरे देश के राजनीतिक पंडितों के मन में गठबंधन के मूर्त रूप लेने से लेकर वोट हस्तांतरण तक बहुत सवाल दौड़ रहा था। अन्तत: राजनीति का यह सबसे बड़ा प्रयोग सफल रहा। जिसमें राजद-जेडीयू-कांग्रेस गठबंधन बहुत विशाल जीत हासिल की। जहां चंद महिने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सबको मिट्टी में मिला दिया था और प्रचंड जीत हासिल की थी। वहीं विधानसभा चुनाव में भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। इस राजनैतिक प्रयोग का आखिरकार ढ़ाई साल में अन्त हो। गया। जिसपर लालू के बेटे और सरकार में उप-मुख्यमंत्री रहे तेजस्वी कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए महज चार घंटे में बीजेपी गठबंधन के साथ मिलकर सरकार बनाने तक संपन्न हुआ।
लालू परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप खुद नितिश के तर्कों से कमजोर - जैसा कि ऊपर दिए गए पैराग्राफ में विवरण अंकित है कि नितीश कुमार भाजपा के साथ सरकार बनाकर लालू प्रसाद यादव के परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सरकार छोड़ने का निर्णय लिया। वो तो जनता को पहले से पता था कि लालू के ऊपर "चारा घोटाले" का आरोप लगा है और आरोप सिद्ध होने पर जेल भी जा चुके थे। जब नितीश कुमार 2015 में लालू के साथ मंच साझा कर रहे थे। उस दौरान भी लालू यादव झारखंड की जेल से जमानत पर बाहर आते थे। तो ये तर्क अब जनता के सामने भाजपा और नितीश की नहीं चलने वाली है। जनता सब देखती है और समझती है।
तेजस्वी आत्मविश्वास से लबरेज- इस चुनाव में राजद लालू यादव की अनुपस्थिति में पहली बार चुनाव लड़ रही है। राजद के नेता और महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी कुमार आत्मविश्वास से लबरेज होकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। एक-एक दिन में 13 रैलियां और इस 28 साल के नौजवान के पीछे पीएम और दर्जन भर सीएम पड़े हुए हैं फिर भी यह नौजवान बांका एक निर्भीक योद्धा की भांति सबके सामने अकेले खड़ा है।
संभावनाओं के अनुसार राजद और कांग्रेस का गठबंधन चुनाव जीत रहा है। बाकी तो ईवीएम में कैद परिणाम 10 नवम्बर को अपना अंतिम निर्णय बता देगा।