Thursday, March 26, 2020

नोटबन्दी के बाद कोरोना से देशबन्दी, मजदूर बेहाल

कोरोना का प्रकोप दिनों-दिन महामारी का रूप लेता जा रहा है. सरकार ने २१ दिन भारत बंद का घोषणा करते हुए शायद इस बात का ध्यान सम्भवतः नहीं दिया था. वरना सरकार को ये जरूर समझ में आ गया होता कि इस फैसले से कौन-कौन से लोग कितने प्रभावित होंगे ? भारत बंदी नोट बंदी का दूसरा रूप है. मीडिया रिपोर्टों से कुछ खबरें निकलकर सामने आ रहीं हैं. जो अत्यंत हृदय विदारक है. दिल्ली में दिहाड़ीं मजदूरी करने वाले देश के अन्य भागों की तरह परेशान हैं. जो असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं उनके सामने खुद को ज़िंदा रखने की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है. एक न्यूज़ चैनल की खबर को आधार मानकर अगर मैं बात करूँ तो आज की स्थिति नोटबंदी से भी भयावह हो गयी है. लोग दिल्ली से अपने घर के लिए पैदल हीं ठेले पर सामान लेकर निकल पड़े हैं. उनकी चिंता सरकार को  नहीं हैं या ये कहें कि सरकार अंधी हो चुकी है. वो कुछ न तो देखना चाहती है और न हीं सुनना चाहती है.
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक गाँव कोइरीपुर आता है. जिसमें गाँव के मुसहर जाति के बच्चे अपने पेट को भरने के लिए घास खा रहें हैं. ऐसे निरीह लोगों तक सरकार की निति अगर नहीं पहुंची तो इसके लिए हम किसे जिम्मेदार माने ? क्या इसके लिए हम सरकार को के लोगों  दोष नहीं दे सकते ? मैं खुद गाँव में हूँ और गाँव के लोगों के मन में ब्याप्त भय आसानी से पढ़ पा रहा हूं. सरकार के इस फैसले से लोगों के मन में उहा-पोह की स्थिति में जी रहें हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को खाद्यान की चिंता सताने लगी है. गाँव में लोगों के पास साग-सब्जी की कमी होने लगी है. अगर उदाहरण स्वूपरूप मैं अपनी बात हीं रखू तो ३१ मार्च को मेरे दादा जी की तेहरवीं है. उनके तेरहवीं के लिए जरूरी सामान भी मेरे बाजार में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. मेरा बाजार त्रिलोचन महादेव क्षेत्र में एक जाना-माना बाजार है. ऐसी हीं ब्यथा मेरे जैसे सैकड़ों लोगों की है. कुछ तो पुलिस प्रशासन के रवैये से परेशान हो रहे हैं. जैसे कल त्रिलोचन महादेव मंदिर पर भैयालाल राजभर को पुलिस ने गाली-गुप्तार दिया और बाजार में बस स्टैंड के पास पीपल के पेड़ के निचे चार डंडा मार भी दिया। इस तरह से लोगों के मन में बहुत भी ब्याप्त है.
मुझे कहीं भी देखने या पढ़ने को नहीं मिला है कि आजादी के बाद पूरे भारत को कभी बंद किया गया हो. अगर ऐसा हुआ तो इसी मजबूत सरकार के दौर में देखने को मिला। मैं सरकार के इस बंद का समर्थन करता हूँ पर विलम्ब करने को लेकर मेरी नाराजगी भी है. राहुल गांधी ने 12 फरवरी को हीं सरकार को चेता दिया था. पर ये घमंडी सरकार उनकी बात को इग्नोर करती गयी. जिसका परिणाम आज पूरे देश में तालाबंदी के रूप में देखने को मिल रहा है. यदि एहतियातन सरकार ने एक महीने पहले हीं विदेश से आने-जाने वाली उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया होता। तो आज भारत बंद करनी की आवश्यकता नहीं होती। इस बंद देश का कितना नुक्सान होगा ? उसका अंदाजा चाटुकार, दरबारी मीडिया वालों को तो है. पर वो जनता के सामने असलियत बताने से बच रही हैं. और सरकार की तरफदारी करते-करते देश के साथ गद्दारी कर रही है. देश की अर्थब्यवस्था वैसे हीं गर्त में डूबी पड़ी थी और इस आर्थिक मंदी के बाद अब रसातल में भी पहुंचने की संभावना निश्चित है. अकेले कोरोना के झटके से उबरने में सरकार को कम से कम १ साल का समय लग सकता है.

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना पर मोदी जी फिर हुए अवतरित

हर देशवासी जानता है की कोरोना आज समाज के हर तबके के बीच घुस चुका है. गांव से लेकर शहर तक यह महामारी का रूप धारण कर चुका है. इसे रोकने के लिए कुछ कड़े फैसले की जरूरत थी. जिस पर अमल भी हुआ. २१ तारीख की मध्य रात्रि २२ मार्च की मध्य रात्रि तक प्रधानमंत्री महोदय जी ने जनता १४ घंटों के लिए जनता कर्फ्यू का ऐलान कर दिया. जिसमें ये होना था कि २२ की सुबह को सड़क पर कोई भी सरकारी या प्राइवेट वाहन नहीं चलेंगे. आदेश तो यहां तक था कि लोगों को घर से निकलने के लिए रोका जाय. इसी बीच मेरे दादा जी का देहावसान हो चुका था. मैं दिल्ली से मंडुआडीह चलने वाली रेल में टिकट भी ले चका था. जिसमें मेरे साथ परिवार के अन्य सदस्य भी यात्रा में जुड़ने वाले थे. गाजियाबाद से हम सबने अपनी यात्रा शुरू की और हम बनारस के लिए निकल गए. जहां से हमें अपने गांव जाना था. जो जौनपुर-वाराणसी राजमार्ग पर स्थापित था. इस बीच जब हम मंडुआडीह स्टेशन पहुंचे तो वहां परिवहन का कोई भी साधन मौजूद नहीं था. लोग घंटों वाहनों के इन्तजार में थे. कुछ लोग तो पैदल हीं लहरतारा होते हुए कैंट रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे. जिसमें बूढ़े लोग भी शामिल थे. उन्हें पैदल चलने में काफी तलकीफ का सामना करना पड़ रहा था. क्योंकि एक तो मंडुआडीह से कैंट की दूरी तकरीबन चार किमी थी ऊपर सर दोपहर के १२.३० बज चुके थे. सूरज सर पर चढ़ कर नांच रहा था. उन लोगों की आँखों में देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा थी कि सरकार का ये फैसला सही था पर उसका क्रियान्यवन सही नहीं था.
जैसे हीं जनता ने एक दिन का 'जनता कर्फ्यू' झेला. उसके बाद थोड़ी राहत की सांस लेनी चाही तो २४ मार्च की शाम को भक्तों के देव पुरूष श्री मोदी जी अपने पसंदीदा समय रात्रि के ८ बजे फिर से उपस्थित होंगे। ऐसा समाचार भक्तगड़ों समेत देशवासियों को पता चला. हर कोई आशंकित हो गया कि मोदी जी अपनी आदतों के अनुरूप कुछ तो घोषणा करेंगे. और हुआ भी वही. साहेब तय समय पर उपस्थित हुए और ऐलान कर दिया कि ये कर्फ्यू आगे २१ और दिनों के लिए के लिए बढ़ाया जा रहा है. फिर क्या था ? भक्त प्रसन्न हो गए और मोदी जी को देव् अवतार बताने में जुट गए. पर जब उनसे ये सवाल किया गया कि जब १२ फरवरी को कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी जी ने कोरोना को लेकर चेता दिया था. तो सरकार ने क्या किया ? ऐसे सवाल का जबाब न दे पाने की स्थिति में भक्त तिलमिलाने लगे और अपने संस्कारों के अनुरूप गाली-गलौज करने लगे.

  

Friday, March 20, 2020

बाबा आपका जाना एक सदी का जाना है

19 मार्च 2020 को मेरे दादा जी का देहावसान हो गया। यह दुखद खबर मुझे मेरे आफिस से शाम को घर आने के बाद मिली। घर से पिता जी और छोटे भाई मोनू का फोन मेरे पास आया था। बाबा अक्सर कुछ महीनों से बीमार रहने लगे थे तो होली के दिन सोनू ने बाबा के कष्ट को देखा और मुझे फोन किया। जब मैं उसे बोला कि बाबा की जांच-पड़ताल बीएचयू में करवाईए। उसके बाद सोनू-मोनू गाड़ी करके घर से बाबा जी को बीएचयू ले गये और दो दिन बाद बदहाल ब्यवस्था से जंग लड़कर हम हार गये पर इलाज तो दूर कोई खाट भी नहीं मिली। अन्त में हार मानकर उनका बनारस के हीं किसी प्राइवेट अस्पताल में जांच पड़ताल करवाया गया। जांच की तीन दिन बाद उनकी रिपोर्ट आई। जिसमें दादा जी के अस्त होने की कहानी लिखी गई थी। जांच में पता चला कि दादा जी को कर्क रोग की शिकायत है। इसी के बाद हम सब समझ चुके थे कि अब वो ज्यादा दिन नहीं जीने वाले हैं।
अन्ततः कल के दिन हमारे परिवार का सूरज अस्त हो गया। नि:संकोच आप किसी के लिए अच्छे तो किसी के लिए बुरे रहे होंगे। लेकिन हमारे लिए आप सच्चे नायक रहे हैं। मैं बहुत से लोगों को जानता हूं जो आपको नापसंद करते थे। उसका कारण उनका निजी स्वार्थ हुआ करता था।
आपके हीं संस्कार की वजह से हमने एक भाई का दूसरे भाई के प्रेम को देखा, समझा और जाना। आपका और छोटे बाबा (सिपाही) का प्रेम तो गांव के लोगों और हमारे सगे-संबंधियों के बीच में एक उदाहरण हुआ करता था। लेकिन एक बात सत्य है कि आपका मोह आपके अन्तिम समय में भंग होने लगा था। जो आपके देहावसान के महज कुछ घंटे पहले आपके शब्दों से प्रतीत हुआ। बाबा आप जहां भी रहोगे ईश्वर वहां आपको खुशहाल रखेंगे।

Wednesday, March 18, 2020

लोकतंत्र के क्या मायने जब विधायक जनता के प्रति निष्ठावान न हो

अगर इसी तरह चुनाव के बाद 5-10 सीट कम रह जाय और कुछ असंतुष्टों को तोड़कर एक नई सरकार का गठन विपक्ष के द्वारा किया जाय तो लोकतंत्र कहाँ बचा ? उदाहरण स्वरूप 2013 के छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए. जिसमें 90 विधान सभा सीट आती हैं. ऐसे में बीजेपी ने 49 सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस ने 41 पर. फिर भी पांच सालों एक बीजेपी की सरकार बिना किसी कठिनाई के चली. ऐसा इसलिए संभव हो सका कि कांग्रेस के नेतृत्व ने कोई कुटिल खेल नहीं खेला. वरना मध्य प्रदेश की तरह मात्र 5 असंतुष्टों को प्रलोभन देकर बीजेपी की सरकार को बड़ी हीं आसानी सी अस्थिर कर सकती थी. पर की नहीं क्योंकि ऐसा करने पर जनता के मत का अपमान होता. खैर इस मामले में कांग्रेस का नया नेतृत्व काफी उदार है. 
आज जैसे सुबह-सुबह खबर मिली की कांग्रेस के कई नेता और मंत्री बागी विधायकों से मिलने कर्नाटक पहुंचे. जिनमे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह, श्री कांति लाल भूरिया, कैबिनेट मंत्री जीतू पटवारी, घनघोरिया, सज्जन सिंह वर्मा, कुणाल चौधरी समेत 13 विधायक और मंत्री कर्नाटक पहुंचे. जिनकी आगवानी कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष डी. के. शिवकुमार ने किया. जिस होटल में बागी रुके हैं उसके कुछ किमी दूर कांग्रेसी नेताओं को कर्नाटक पुलिस रोक लेती है और दिग्विजय समेत सभी नेताओं को पुलिस हिरासत में ले लेती है. अगर ऐसा लोकतंत्र में चलता रहा तो हमें अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव करना बंद कर देना चाहिए. लोकतंत्र के क्या मायने जब विधायक जनता,पार्टी और विचार के प्रति निष्ठावान न हो ? आज मध्य प्रदेश कर्नाटक के बाद दूसरा लोकतंत्र की हत्या करने वाला राज्य बना है. इन दोनों जगहों पर बीजेपी हीं विपक्ष में थी. इसे संयोग नहीं कह सकते. ये एक कुटिल प्रयोग है. दिग्विजय सिंह कोई छोटे कार्यकर्ता नहीं हैं. वो पूरे देश में एक जाना-पहचाना चेहरा है. 1993 से 2003 तक कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में मध्य प्रदेश की सेवा की है. वर्तमान में वो मध्य प्रदेश कोटे से हीं राज्य सभा सांसद हैं. उन जैसे नेता के साथ भाजपा शासित सरकार का ये रवैया निंदनीय है.
मध्य प्रदेश को लेकर अदालत से सड़क तक दोनों तरफ से संघर्ष किया जा रहा है. सरकार बनाने के लिए भाजपा वाले क्यों इतने आतुर है ? जो अपने भविष्य को भी नहीं देख पा रहें हैं. मान लें कि आज कांग्रेस की सरकार गिर जाती है और 22 सीटों पर फिर से चुनाव होंगे. कुछ सीटें कांग्रेस जरूर जीतेगी. यदि कांग्रेस का आँकड़ा सैकड़ें में फिर से पहुंच जाता है तो क्या गारंटी कि कांग्रेस भाजपा के असंतुष्टों को नहीं तोड़ पाएगी ? क्योंकि बीजेपी में भी तो महात्वाकांक्षी लोग है ? उनको भी तो मंत्री बनना है. जब पार्टी प्रेम का पैमाना एक तरफ नहीं है तो दूसरी तरह होगा. क्या इसका कोई पैमाना है ? ऐसे कृत्य करके आप अपने भी पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहें हैं. अगर ये प्रयोग चल निकला तो आने वाले भविष्य में भाजपा समेत क्षेत्रीय दलों के लिए शुभ संकेत नहीं है. ऐसे कारकों को अमलीजामा पहनाने से सत्ताधारी दल को बचना चाहिए. अन्यथा लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं बचेगा. लोकतंत्र एक मजाक बन जाएगा.
     
   

Monday, March 16, 2020

एम पी में कमलनाथ सरकार का बचना मुश्किल बीजेपी हुई एक्टिव

मध्य प्रदेश में जब से महाराज के नाम से विख्यात ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पलटी मारते हुए कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए हैं. तब से मध्य प्रदेश में राजनैतिक रूप से उथल-पुथल मचा हुआ है. राज्यपाल ने कल मुख्यमंत्री कमलनाथ को आज यानी 16 मार्च को 'फ्लोर टेस्ट' कराने को कहा था, जिस पर कमलनाथ ने 'कोरोना' और बेंगलुरू में बैठे सिंधिया खेमें के विधायकों को अपना मुद्दा बनाया. आज विधान सभा में राज्यपाल महोदय का अभिभाषण हुआ. फिर हंगामें के बाद 'कोरोना' के नाम पर 26 मार्च तक सदन को स्पीकर ने स्थगित कर दिया. फिर दोनों पार्टी के लोग जोर आजमाइश करने लगे. बीजेपी ने अपने विधायकों की परेड राज्य पाल आफिस तक परेड करा दिया. बीजेपी के एक्टिव होने का असर ये हुआ कि शाम होते-होते 5 बजे तक महामहिम ने कल तक बहुमत साबित करने के लिए दुबारा कमलनाथ जी को पत्र लिखा. जबकि बीजेपी सुबह हीं इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जा चुकी है. और अब सुनने में आ रहा है कि कांग्रेस भी इसी मामले में सरकार के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है.   
देखिये बीजेपी आज जो कह रही है वो 1947 से अब तक किये गए कांग्रेस के कार्यों के पीछे छुप रही है. पर याद रखना होगा कि जो बीजेपी आज कर रही है वो निश्चित तौर पर आने वाले भविष्य में बीजेपी को भी भोगना पड़ेगा. मतलब कांग्रेस की केंद्र में जब सरकार होगी. तब बीजेपी आज की हीं तरह चिल्लायेगी और कुछ नहीं कर पायेगी. आज कांग्रेस की सरकार को जिस तोड़-फोड़ के माध्यम से गोवा, मणिपुर, अरुणांचल के बाद कर्नाटक और अब मध्य प्रदेश सरकार को जिस तरह से गिराया जा रहा है. वो देश के राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं हैं. कांग्रेस जब भी केंद्र की सत्ता में आएगी बीजेपी को भी इसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा.
अब निश्चित तौर पर लग रहा है कि कमलनाथ की सरकार मध्य प्रदेश की सत्ता को नहीं बचा पाएगी. परन्तु इसका जो असर होगा वो दशकों तक भारतीय राजनीति में देखने को मिलेगा. इसका असर ये होगा कि एक तरह जिसकी केंद्र में सत्ता होगी वो निर्लज्जता के साथ अपने विरोधी की राज्य सत्ता को महज कुछ राजयसभा सीटों के लिए हथिया लेगा. और विपक्षी पार्टियां बस संविधान की दुहाई देती रह जाएंगी. निश्चित तौर पर कांग्रेस ने जो किया उसी रास्ते पर बीजेपी दौड़ रही है. तो बीजेपी का भी हस्र आज नहीं तो 5 साल बाद कांग्रेस की तरह होगा. अगर कांग्रेस एक बार दिल्ली की सत्ता में आ गयी तो न जाने कितने ऐसे सिंधिया पानी भरते मिलेंगे. बीजेपी को भी ये समझ जाना चाहिए कि दल-बदलू नेता किसी के ख़ास नहीं होते। वो सावन के अंधे की तरह होते हैं. उन्हें हर जगह हरियाली नजर आती है. 
कांग्रेस के समर्थकों को निराश होने की जरूरत नहीं हैं. उन्हें मेहनत करने की जरूरत है. अब जनता खुद समझने लगी है और कांग्रेस के साथ जुड़ने लगी है. हाल में हुए चुनाव को देखें तो हरियाणा से लेकर झारखण्ड, मुम्बई तक जनता कांग्रेस के साथ जुड़ रही है. कार्यकर्ताओं को ये समझने की आवश्यकता है कि आपकी मेहनत रंग ला रही है. आप निराश मत होइए एक सिंधिया गया है. आप हर कार्यकर्ता में एक सिंधिया बसता है. जो भी कांग्रेस के विधायक इस समय कांग्रेस के साथ वो सच्चे कांग्रेसी है. बाकी तो सिंधिया निकले. कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह बड़ी हीं खामोशी के साथ अपना काम कर रहें हैं. कुछ न कुछ खेल तो कांग्रेस भी अंदरखाने खेल रही है. कांग्रेस के जितने भी बड़े नेता हैं. जैसे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, जीतू पटवारी, पी सी शर्मा सब बड़ी खामोशी से अपना काम कर रहें हैं. उनकी मेहनत 'फ्लोर-टेस्ट' के वक्त दिख जाएगा.


Wednesday, March 11, 2020

एमपी में सिंधिया की गद्दारी से कमल खिलने की संभावना

सिंधिया घराने के वारिस और कांग्रेस के पूर्व नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया पाला बदलते हुए बीजेपी में के पाले में जा चुके हैं. वैसे ये भी बहुगुणा परिवार की तरह नमक हराम निकले और अपने इतिहास को दोबारा फिर से दोहरा रहे हैं. साल 1967 में इनकी दादी श्रीमती राजमाता जी ने भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को गिराते हुए जनसंघ की टोली में शामिल हो गयी थी. उसके बाद इनके पिता स्व. माधवराव सिंधिया 1971 में जनसंघ पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ा और हार गए थे. फिर उसके बाद कांग्रेस में शामिल हुए और 1996-1997 में कांग्रेस पार्टी को छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई. जिसमें वो सफल नहीं हुए. फिर वापस कांग्रेस में लौट आये. इस दौरान वो 9 बार सांसद, मंत्री भी रहे. आखिरकार वो एक कांग्रेसी के रूप में इस दुनिया से विदा हुए. उनकी विरासत के दम पर हीं 18 वर्षों में 15 साल सांसद, मंत्री के तौर पर जिया. अब मात्र 2 साल बिना पावर के महाराजा से रहा नहीं गया. तो इनके परिवार का इतिहास पुराना और दागदार है. आज औपचारिक रूप से ज्योतियादित्य सिंधिया भाजपा से जुड़ गए हैं. तो आगे के लिए उन्हें बधाई. परन्तु ये परिवार बहुत दलबदलू है. इसे एक बार फिर से साबित कर दिया.
आज जब महाराजा बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता स्वीकार करेंगे. तो वो किस मुंह से नैतिकता की बात करेंगे. उन्होंने तो अपनी सारी नैतिकता, विश्सनीयता महज एक राजयसभा सीट के लिए समाज में नफरत फैलाने वालों के कदमों में रख दिया. ग्वालियर और चंबल संभाग के जो बीजेपी नेता उन्हें गाली देते थे. अब वो क्या कहेंगे ? क्या महाराज की पूजा करेंगे ? जो प्रभात झा सीधे-सीधे सिंधिया के राज-पाठ को लेकर सार्वजिन तौर पर गंभीर आरोप लगाते रहते थे क्या अब वो बदल जाएगा ? जिस सिंधिया को शिवराज, मोदी, शाह एवं बीजेपी के सभी छोटे-बड़े नेता सोने की चम्मच लेकर पैदा होने का आरोप लगाते थे. क्या वो अब महाराज को भिखारी मानने को तैयार हो गए हैं या सिंधिया जी अपना महाराजा वाला ठाठ छोड़ चुके हैं. राजनीति में अब दोगलेपन का बोलबाला है. इसीलिए संविधान में 'राइट टू रिकाल' का प्रावधान जोड़े जाने की आवश्यकता है.  
मुझे अब भी दिग्विजय सिंह जी के कौशल पर पूरा विश्वास है. मुझे विश्वास है कि कमलनाथ जी के अगुवाई वाली मध्य प्रदेश सरकार बनी रहेगी. क्योंकि दिग्विजय जी कहीं भी बयानों में नजर नहीं आ रहें है. वो चुप चाप अपना काम बिना किसी शोर-गुल के कर रहें हैं. ये मेरा दृढ विश्वास है कि दिग्विजय सिंह जी अब तक शांत नहीं बैठे होंगे. क्योंकि ऐसी परिस्थिति को उन्होंने पहली बार नहीं देखा है, तो ऐसी स्तिथि से निपटना उन्हें अच्छी तरह से आता है. कुछ मीडिया रिपोर्ट में खबरे आ रही हैं कि सिंधिया समर्थक बागी विधायक भी सिंधिया के बीजेपी में जाने से खुश नहीं है. बागी विधायक अलग पार्टी बनाने की मांग कर हैं. तो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह उन्हीं को वापस अपने खेमें में लाने की योजना पर काम कर रहें हैं. जिसके लिए उन्होंने दो मंत्रियों को बेंगलुरू भेज भी दिया है. उसमें थोड़ी हीं सही लेकिन सफलता निश्चित मिलेगी. अब तक मैं जिन भी चैनलों को देखा सब पर एकतरफा बीजेपी की बात चलाई जा रही है. कांग्रेस के संदर्भ में बस नकारात्मक बातें हीं प्रसारित की रही हैं. किसी चैनल ने ये खबर नहीं चलाया कि कुछ टूट बीजेपी में भी हो सकती है. आखिर जब सत्ता के लिए हीं ह्रदय परिवर्तन करना है तो ये तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेताओं पर लागू होती है. बीजेपी में भी कुछ विधायक होंगे जिनको लगता होगा कि उन्हें भी मंत्री बनना चाहिए. उनकी भी कुछ आकांक्षा होगी.
वैसे एक बात मैं बड़े गौर से देख रहा हूँ राहुल गांधी ने जितने भी दोस्त बनाये उनमें ज्यादातर नमक हराम निकले. आप ताजा उदाहरण महाराजा सिंधिया को हीं ले लें. लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि राहुल गांधी के किसी भी निर्णय पर उनको टोकने का हिम्मत केवल सिंधिया के पास था. जो महज सत्ता के लिए उस संबंध को भी तोड़ दिया. पूर्व में हरियाणा में अशोक तंवर ऐसे निकले थे. हुड्डा भी धमकी देते रहे कि अगर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा तो वो पार्टी तोड़ देंगे. त्रिपुरा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बर्मन भी पार्टी छोड़ देते हैं. ऐसे लोगों को राहुल जी का ख़ास माना जाता रहा है. सुनने में तो ये भी आ रहा है कि कांग्रेस के लोग सिंधिया को मध्य प्रदेश में बहुत बड़ी जिम्मेदारी का मन बना लिया था. परन्तु कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं को ज्योतिरादित्य और भाजपा के नेताओं की मुलाक़ात की भनक लग गयी थी. जो कांग्रेस के लिए अच्छा हुआ. नहीं तो महाराज अरुणांचल की तरह पूरी कांग्रेस समेत भगवामय हो जाते.
कल महाराज कांग्रेस से इस्तीफा दिए और आज औपचारिक तौर पर भाजपाई बन गए. ये महाराज जैसा स्वाभिमानी हीं कर सकता था. अच्छा हुआ कि महाराज का स्वाभिमान राज्य सभा की सीट के लिए हीं जागा और मात्र 22 विधायकों का हीं इस्तीफा करवा पाए. इन्हीं विधायकों के बल पर महाराज मुख्यमंत्री का सपना देख रहे थे. ऐसे ब्लैकमेलर के आगे कांग्रेस नहीं झुकी. ये कांग्रेस के भविष्य के लिए ठीक है. अब गए हैं महाराज संघ की शाखा में हाजिरी भी लगाएंगे और कांग्रेसी बस उनके और शिव राज सिंह चौहान के भाषणों को हर जगह दोहराये. जनता खुद-ब-खुद इनके स्वाभिमान को समझ जायेगी और कांग्रेस को अगली बार भरपूर आशीर्वाद देगी. 15 माह में ही कांग्रेस की सरकार लगभग गिरने के मुकाम तक पहुंच गयी है. 'माफ़ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज' का नारा बुलंद करने वाले शिवराज उनके नेता और सांसद कहते थे. अब महाराज कमलनाथ सरकार गिराने के बाद शिवराज के साथ हीं होंगे. अब शिवराज और समस्त भाजपाई सिंधिया के संदर्भ में क्या पहले जैसा विचार रखते हैं? ये देखना दिलचस्प होगा.

Wednesday, March 4, 2020

अमन के लिए राहुल का दिल्ली दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा

हालात दिल्ली में अब बदल चुका है. संसद से सड़क तक अब तक 47 शहादतों के ऊपर राजनीति शुरू हो चुकी है. दिल्ली का चुनाव प्रचण्ड बहुमत से जितने के कारण केजरीवाल राजनैतिक रूप से सफलता तो प्राप्त की. परन्तु जब दंगों के वक्त उन्हें उस जनता के साथ खड़ा होने की जरूरत थी. उनके बीच सौहार्द बढ़ाने की जरूरत थी. उस मामले में शायद असफल जो गए. क्योंकि उन्हें अपने विधायकों के साथ क्षेत्र की जनता के बीच जाकर शान्ति स्थापित कर सकते थे. केजरीवाल जी ने बस फर्ज अदा करने की कोशिश की इसका अंदाजा आप इस बात से हीं लगा सकते हैं कि वो बस लेफ्टिनेंट गवर्नर और पुलिस के ऊपर ऊँगली उठाते रहे. रही बात बीजेपी की तो चुनाव के समय से हीं बिगड़े बोल बोलने वालों का समर्थन किया. तो उससे शांति की अपील करना बेमानी होगी. और कांग्रेस को तो दिल्ली की जनता ने सिरे से नकार दिया. फिर भी कांग्रेस दिल्ली के हिंसा प्रभावित लोगों की आवाज संसद से सड़क तक उठा रही है.
आज शाम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ब्रिजपुरी के दंगाग्रस्त इलाकों का जायजा लेने के लिए गए थे. जिस स्कूल को जला दिया गया उस जगह गए और क्षेत्र के मस्जिद में भी गए. राजनिति में भाजपाई राहुल की सांत्वना यात्रा को ढकोसला करार देंगे, हिन्दू-मुसलमान करेंगे. ऐसे विकृत मानसिकता वाले पागल संघ और भाजपा में हीं देखने को मिलते हैं. राहुल गांधी के इस निर्णय का मैं ब्यक्तिगत तौर पर समर्थन करता हूँ. क्योंकि इस वक्त लोगों में विश्वास बहाल करना सबसे जरूरी है. और इस तरह का कार्य चाहे इस तरफ के हों या उस तरफ के हों. दोनों तरफ के शीर्ष नेता हीं कर सकते हैं. जिसका राहुल गांधी बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं. इसे अगर कांग्रेस की राजनीति कहें तो भी बुरा नहीं लगना चाहिए. कांग्रेस भी और पार्टियों की भांति एक राजनितिक पार्टी है. उसे भी देश के अंदर घटने वाली हर घटना पर राजनिति करने का अधिकार है. ये भाजपाई नेता जो एल जी के माध्यम से दिल्ली की जनता पर राज करते हैं. वो उनके दुःख में जाने की भी नहीं सोचे. जब राहुल गांधी पहुंचे तो उनकी यात्रा का असर भाजपा के नेताओं के चेहरों पर साफ़ तौर पर देखा जा रहा है. उनके जबान से बौखलाहट में अनाप-शनाप बोल रहें हैं.
भाजपा का एक बेवकूफ प्रवक्ता जो आज से महज दो साल पहले समाजवादी था और अब भाजपाई है. उसकी जबान इतनी गंदी ही चुकी है कि उसकी बातों को सुनना भी नागवार लगता है. बेवकूफ सत्ता में खुद है दिल्ली समेत देश के अधिकतर राज्यों में और इस्तीफा सोनिया गांधी से माँगता है. अगर सोनिया गांधी, दिग्विजय सिंह, अय्यर जैसे नेता जिम्मेदार है तो आप नामर्दों की तरफ क्यों बैठे हो ? ये दोगले ऐसे हीं जो अपनी जिम्मेदारी को किसी और के नाम से डालने की कोशिश करते हैं. आप उस पागल, मूर्ख बच्चे की बात को yootube या अन्य न्यूज़ चैनलों पर देख और सुन सकते हैं. ये संघी और भाजपाई हमेशा अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं. वो चाहे दुर्दांत आतकवादियों की रिहाई हो, गुजरात दंगा, मुजफ्फरपुर दंगा या फरवरी महीने के अंतिम सप्ताह में घटित दिल्ली नरसंहार हो. देश की जनता को अमन चाहिए. जो सिर्फ शान्ति, प्रेम, सद्भाव से हीं हासिल हो सकती है.