किसानों के आंदोलन का आज 89 वां दिन है। सत्ता और किसान दोनों अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। लेकिन इन सब के बीच में एक सिरा लगभग नदारद है। जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। संघ तो वैसे हमेशा हिन्दू और किसान की बात किया करती थी। चाहे पूर्व में कांग्रेस की सरकार रही हो या अटल जी की सरकार रही हो। अटल जी के निजीकरण के विरोध में उस वक्त संघ सरकारी विरोध खुले मन्चों से करने में नहीं हिचकता था। लेकिन मौजूदा सत्ता के दौर में ऐसा प्रतीत होता है कि संघ का तेवर नरम पड़ चुका है या यूं कहें कि संघ मौजूदा दौर में अपने आपको लाचार महसूस कर रहा है। जभी लगभग तीन महीने गुजर जाने के बाद भी संघ का कोई संगठन किसानों के समर्थन में नहीं आया। संघ के एक पूर्व प्रमुख ने हरियाणा में किसानों को हिन्दूत्व से जोड़ते हुए कहा था कि हकीकत में अन्नदाता हीं हिन्दू है जो धरती मां से जुड़ा हुआ है। तो आज सवाल से खड़ा होता है कि क्या संघ अब सत्ता के सामने नतमस्तक हो चुका है ? क्या अब सत्ता को संघ की आवश्यकता नहीं है ?
बहरहाल हम इन बातों से थोड़ा आगे निकलते हुए संघ द्वारा बनाए गए एक संगठन का जिक्र करते हैं। जो पिछली सरकारों के दौरान किसानों के समर्थन में रहने वाला संगठन था। जिसका नाम "भारतीय किसान संघ" था। जो नये सत्ता के दौर में शायद नेपथ्य में चला गया है। भारतीय किसान संघ को दन्तोपन्त हेंगणी ने 13 मार्च 1978 को राजस्थान में इस संगठन के बारे में सोचा और सभा में उपस्थित लोगों को अवगत कराया। फिर 4 मार्च 1979 में राजस्थान के कोटा शहर में भारतीय किसान संघ की पहली सभा हुई या यूं कहें कि 4 मार्च को भारतीय किसान संघ अस्तित्व में आया और किसानों के हक के लिए काम करना शुरू किया। हेंगणी ने हीं 1991 में एक और संगठन की नींव धरी थी। जिसका नाम "स्वदेशी जागरण मंच" था। दरअसल हम फिर किसानों पर आते हैं। किसान संघ ने किसानों के हक के लिए आन्दोलन करते हुए पहली बार 26 जनवरी 1981 में हैदराबाद विधानसभा को घेरा था। दोबारा फिर किसानों के मुद्दे पर 1985 में राजस्थान विधानसभा का भी सफल घेराव किया था और 1986-87 का जिक्र करना बहुत हीं महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एक बार फिर भाकिसं ने गुजरात विधानसभा का घेराव किया था। जिसको भारतीय जनता पार्टी ने अपना समर्थन दिया था। 1999 में एक बार फिर हरियाणा के किसानों के समर्थन में किसान संघ ने हस्तिनापुर में विरोध प्रदर्शन किया था और तो और 2003 में जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी थे और बिजली दरों में वृद्धि की गई थी। जब भी किसान संघ ने उसका जोरदार विरोध किया था। लेकिन आज किसान संघ की दशा इतनी दयनीय हो गई है कि वह मौजूदा सत्ता के खिलाफ कुछ भी बोलने में असमर्थ है।
जहां तक मैं देख पा रहा हूं कि संघ के हिन्दूत्व को किसान अब चुनौती दे रहें हैं। भले हीं सरकार और संघ यह मानकर चल रहा है कि यह आन्दोलन बस ढ़ाई प्रदेश का है, लेकिन इसका असर बहुत ब्यापक होने वाला है। क्योंकि जब खेती की बात आती है तो उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के लोग अपने आप को किसान मानते हैं। अभी पंजाब, राजस्थान और हरियाणा के लोकल इलेक्शन बताते हैं कि किसानों ने केन्द्र की सत्ता का बहुत नुकसान किया है। यदि यह आन्दोलन दक्षिण-पश्चिम और मध्य क्षेत्र में पहुंचने में कामयाब हो तो संघ और बीजेपी दोनों के लिए बुरी खबर होगी। इतने बड़े आन्दोलन में संघ का नदारद रहना बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है।
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