Sunday, June 30, 2019

संसद में नेहरू जी पर अमित शाह का झूठ

अमित शाह या तो जनता को गुमराह कर रहे हैं या नेहरू जी और कश्मीर मसले को लेकर उनके पास कोई ठोस जानकारी नहीं है या जानबूझकर झूठ बोल रहा है. जैसा कि उनके राजनीतिक पूर्वजों ने आजादी के पहले से लेकर आज तक करते आए हैं। उसी सफेद झूठ की परंपरा को शाह भी बेशर्मी के साथ आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
1947 के बटवारे के समय अंग्रेजों की हुकूमत ने कहा था कि हिंदुस्तान की 565 रियासतों में से जो भी हिंदुस्तान के साथ रहना चाहें वे हिंदुस्तान के साथ रहें और जो पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं वो पाकिस्तान के साथ जा सकते हैं और जो अपनी स्वतंत्र पहचान को बनाए रखना चाहते हैं वो स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दें. भारत हमेशा से चाहता था कि जम्मू कश्मीर जो कि एक सीमावर्ती का प्रदेश था वो भारत में विलय कर दे लेकिन जम्मू कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह ने अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दिया. 15 अगस्त के बाद से 12 अक्टूबर के रात काबाइलियों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना ने बारामुला, श्री नगर तक जम्मू कश्मीर में कब्जा कर लिया. तब राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी, जिसके जवाब में भारत ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय की शर्त रखी और फारुख अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला की सहयोग से जम्मू कश्मीर का विलय  26 अक्टूबर को भारत में हुआ इसके तुरंत बाद भारतीय सेना एक्शन में आई और बारामुला, श्री नगर, कारगिल, ड्रास आदि जगहों से पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया.ये नेहरू की ही कूटनीति थी जिसने जम्मू कश्मीर को बचाने के लिए 1931 से कश्मीर में सक्रिय शेख अब्दुल्ला, जो कि जम्मू कश्मीर की 77% जनता के एक मात्र नेता थे, उन्हें राजा हरि सिंह के साथ हुए समझौते में शामिल करवाया.
आज जो लोग अपने आप को राष्ट्रवाद का घोर प्रवर्तक बताते हैं वो दरअसल अंग्रेजों के मातहत भारत के खिलाफ काम करते थे, महान भारत का राष्ट्रीय झंडा 14 अगस्त की अर्द्धरात्रि को जलाने वाले संगठन के लोग आज प्रखर राष्ट्रवादी और आजाद भारत के सबसे बड़े नेता पंडित नेहरू जी पर उंगली उठा रहें हैं। नेहरू जी जेसा योग्य,तपस्वी, त्यागी और राष्ट्र भक्त नेता हजारों साल में एक जन्म लेता है. 

Tuesday, June 25, 2019

औरंगाबाद महाराष्ट्र में बच्चे 14 किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर

कितना दुखद है कि एक तरफ जहां प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक अपनी वाह वाही करने में ब्यस्त हैं वहीं दूसरी तरफ बीजेपी/संघ शासित महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित एक गांव के बच्चे घर से 14 किलोमीटर दूर पीने का पानी लाने के लिए जाते हैं और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री फड़नवीस जी 25 जून 1975 को आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों को पेंशन बांटने में ब्यस्त हैं परन्तु मिलों दूर से पानी लाने वाले बच्चों का दर्द उनकी आंखों ने नहीं देखा। एक राज्य के लोगों के लिए ये शर्म की बात है कि उसका मुखिया आंख होते हुए भी बिना आंख वालों के समान है। जब India Today ने आज उस जगह की रिपोर्ट की तो हमें उन गांव वालों की तकलीफों का पता चला कि पानी की समस्या उनकी जिंदगी में किस हद तक जहर घोल रही है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चे स्कूल से वापस लौट कर अपने घर आते हैं फिर वहां से वो ट्रेन के मार्फत बच्चे जातें हैं और वहां से रेलवे स्टेशन पर पानी भरते हैं और आते हैं रास्ते में सफर के बीच रेलवे पुलिस के लोग क्रूरतापूर्ण उनका पानी गिरा देते हैं जिसकी वजह से बच्चे ट्रेन के डिब्बे में बने ट्वायलेट वाटर टैंक से पानी भरने को मजबूर हो जाते हैं। तो मेरी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री फड़नवीस जी से कर बद्ध निवेदन है कि वो औरंगाबाद के प्यासे लोगों का प्रयास बुझाने पर जोर दें, पेंशन तो दो महीने बाद भी दें सकते हैं। 

Sunday, June 23, 2019

कश्मीर में धारा 370 मुखर्जी और बीजेपी का झूठ

आज जनसंघ के संस्थापक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का पुण्य तिथि है। मुखर्जी जी की तथाकथित सबसे बड़ी उपलब्धि कश्मीर में धारा 370 को लेकर लड़ाई लड़ते हुए 23 जून को अस्पताल में रहस्यमयी मृत्यु रही है। मुखर्जी जी ने कश्मीर में धारा 370 को देश में एक नई बहस छेड़ने का काम किया था, परन्तु दूर्भाग्य वश उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु में साजिश का आरोप संघ/भाजपा ने अनगिनत बार लगाया पर अटल जी के छः साल और मोदी जी के पांच वर्षों के दौरान एक बार भी सरकार ने जांच क्यों नहीं कराई ? संघ और भाजपा मुखर्जी जी के प्रति इतनी उदासीन कैसे हो गई ? अब तक एक अदद जांच तक नहीं करवा सकी या संघ और भाजपा इस मुद्दे को केवल जिन्दा रखने की कोशिश कर रहे हैं। बात चाहे जो हो संघ और भाजपा को कश्मीर के नाम पर उन्माद फैलाकर सत्ता चाहिए था जो उन्होंने हासिल कर लिया है। मुखर्जी जी बीजेपी के मेंटर हैं जो धारा 370 के घोर विरोधी थे और वहीं बीजेपी महज सत्यता भोग के लिए धारा 370 की घोर हितैषी पार्टी पीडीपी के मुफ्ती साहब और महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में कश्मीर में लगभग तीन सालों तक सत्ता भोग किया और 370 को मजबूत करने का काम किया परन्तु जैसे हीं आम चुनाव होने का समय आया तो सरकार छोड़ भगोड़ा हो लिए। इनके कृत्यों पर आज मुखर्जी जी की आत्मा कहीं बैठी रो रही होगी। मुखर्जी जी ने 13 भी को बिना परमिट कश्मीर जाने का प्रण किए और दिल्ली स्टेशन से लोकल ट्रेन में अनेक लोगों के साथ सवार होकर कश्मीर के लिए निकले थे। पठानकोट तक तो इनकी यात्रा बेरोकटोक चली परन्तु जैसे हीं इन्होंने रीवा नदी को पार कर आगे बढ़ने की कोशिश की वैसे ही उन्हें पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिया गया।

जैसा कि धारा 370 के संदर्भ में बात की जाए तो यह कश्मीर के भारत में विलय के दौरान किए गए कुछ मुख्य शर्तों में से एक है। धारा 370 की वजह से आजादी के कुछ वर्षों तक भारत संविधान के केवल कुछ कानून कश्मीर में लागू होते थे। उनमें वित्त, गृह, विदेश एवं रक्षा विभाग प्रमुख थे। परन्तु आज के समय में भारत सरकार द्वारा किसी राज्य को भारतीय संविधान के अनुसार कार्य करने के लिए 96 मानक तय किए थे जिसमें से आज कश्मीर में 94 मानकों पर कार्य किया जा रहा है। 

Wednesday, June 19, 2019

वन नेशन वन इलेक्शन आज अब्यवहारिक है

देश 1947 में आजाद हुआ था तो उस समय जाहिर सी बात है कि सभी राज्यों और केन्द्र के चुनाव एक साथ कराते जाते थे क्योंकि वो दौर राष्ट्र निर्माण का दौर था और दक्षिण के कुछेक राज्यों को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार होती थी। अलग-अलग चुनाव का सिलसिला आर्टिकल 356 के तहत कार्रवाई करने के बाद हुआ। जब किसी राज्य सरकार को बर्खास्त किया जाता है तो वहां आर्टिकल 356 का हीं प्रयोग किया जाता है। इसलिए जब कांग्रेस नित सरकार ने कुछ राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने की कोशिश की या लगाई जब से चुनाव के समय में परिवर्तन हुआ और आज ऐसा लगता है कि हर छ्ठे महीने चुनाव है। आर्टिकल 356 का उपयोग भाजपा/संघ की सरकार ने भी खूब किया है। उसका ताजा उदाहरण उत्तराखंड और अरूणांचल प्रदेश है जहां इन्होंने कांग्रेस की कार्यरत सरकार को 356 के माध्यम से बर्खास्त कर दिया था, खैर ये बात अलग है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की सिफारिश पर लगाए गए आर्टिकल 356 को निरस्त कर कांग्रेस की पुरानी सरकार को बहाल किया था।

एक देश एक चुनाव पर आगे बढ़ने का मतलब है कि आर्टिकल 356 को संविधान से हटा दिया जाय। ऐसा होने के बाद एक दूसरी स्थिति ये पैदा हो जायेगी की मानो किसी राज्य की सरकार विधानसभा के पटल पर अपना बहुमत को देती है और जो सरकार से निकले हुए विधायक हैं वो विपक्ष की तरफ भी नहीं जाते हैं तो ऐसी सूरत में केन्द्र सरकार क्या करेगी ? क्या बचे हुए वक्त तक वहां कोई चुनी हुई सरकार काम नहीं करेग ? करता केन्द्र अपनी कठपुतली उस राज्य की जनता पर ज़बरदस्ती थोप देगी और अपनी इच्छा अनुसार कार्य करेगी जैसा की कश्मीर में देखने को मिल रहा है। एक राष्ट्र एक चुनाव सुनने में तो अच्छा लग रहा है पर जब आप ब्यवहारिकता पर परखने की कोशिश करेंगे तो आपको इसमें तमाम खामियां नजर आयेंगी जो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन करने वाली होंगी। 

Tuesday, June 18, 2019

चमकी से 130 बच्चों की मौत नितिश जी दिल्ली में ब्यस्त

बिहार में 130 बच्चों की मौत के बाद हालात काबू से बाहर हो चला है. ये सरकारें कब तक अपने रवैये को बदलेंगी शायद इस सवाल का जबाब भगवान् के पास भी नहीं होगा। 2016-17 में गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में कुछ इसी तरह की भयावह घटना घटी थी तब उस समय जै पार्टी आज सत्ता में है वो उस समय विपक्ष में थी तब इसने बहुत हल्ला काटा था पर आज जब सत्ता में है तो मुंह को सिल लिया है। 2019 में फिर से बहुत से बच्चों के मरने की खबर आयी पर अबकी बार भी सरकार मौन साधे रखी। बहरहाल हम बिहार की स्थिति पर वापस आते हैं क्योंकि बिहार में चमकी नामक बुखार ने ताण्डव मचा रखा है और डबल इंजन की सरकार कहीं भी दिखाई नहीं दे रही है। अब प्रश्न उठता है कि ऐसी डबल इंजन सरकार का करता फायदा जो माताओं और बहनों की गोद सुनी होने से रोकने में बुरी तरह असफल रही हो। शर्म की बात ये है कि 109 बच्चों के मरने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री महोदय को आज घटना के 10 दिन बाद अस्पताल पहुंचने का मौका मिला और मृतकों के परिजनों से मिले। अस्पताल पहुंचने पर आत्मा कुमार का लोगों ने जोरदार विरोध किया और मुर्दाबाद के नारे को विरोध स्वरूप बुलंद किया। अब आपके मन में होगा कि नितिश जी 10 दिन तक कहां थे तो उसका जबाव में है कि नितिश जी दिल्ली में अपनी पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम में मशगूल थे। इसलिए नितिश जी ने इस दरम्यान मृतकों के परिजनों से मिलना मुनासिब नहीं समझा। हद तो तब हो गई जब एक तरफ बच्चों की मौत हो रही थी तो वहीं दूसरी तरफ बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंडल पाण्डेय जी विश्व कप के स्कोर जानने में ब्यस्त थे न कि बच्चों की जान बचाने को लेकर कोई योजना बनाने में। मुख्यमंत्री महोदय आते और मीडिया के सवालों का जबाव दिये बिना चुपचाप खिसक लिए फिर मुख्य सचिव वादों का पुलिंदा लेकर बाहर आते हैं और बहुत बड़ा वादा करते हुए कहते हैं कि हम इस अस्पताल को आने वाले समय में 1500 बिस्तर वाला बनायेंगे पर महोदय ये नहीं बताते कि इतना संसाधन लायेंगे कहां से। इतने डाक्टर कहां से लायेंगे ? वो भी तब जब हर मेडिकल कालेज में सीटों की संख्या लगातार सिमित किया जा रहा हो। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 2014 में जब इसी तरह की बीमारी से सैकड़ों बच्चे मरे थे तब भी नितिश जी और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जी ने लगभग यही वादा किया था और उसका क्रियान्वयन कितना हुआ आप सहज रूप से इस घटना के बाद समझ सकते हैं। 

Saturday, June 1, 2019

शपथ ग्रहण के बाद रोजगार और अर्थब्यवस्था की गंभीर चुनौती

दो दिन पहले रायसीना हिल्स की जगमगाती रोशनी में 17 वीं लोकसभा के मंत्री और प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह भब्यता के साथ सम्पन्न हुआ. इस समारोह में ऑफिशियल तौर पर 6500 अतिथियों को आमंत्रित किया गया था. जिनमें तमाम गणमान्य हस्तियां मौजूद थी. फिल्म और कला जगत के नामी-गिरामी हस्तियों के साथ-साथ सरकार के चहेते और देश के प्रमुख उद्योगपतियों में से एक अनिल अम्बानी जी भी अग्रिम पंक्ति में विराजमान थे. इन के अलावा सभी प्रमुख राजनितिक दलों के नेता भी शामिल रहे ममता बनर्जी और कुछ कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को छोड़ कर. खैर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी इस आलिशान समारोह का हिस्सा थे. 

अबकी बार कुछ मंत्रालयों में नए चेहरे भी देखने को मिल रहे हैं और उसमें सबसे बड़ा नाम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का है. जिन्होंने अपने कौशल के दम और मोदी के चेहरे के दम पर 2014 से भी विराट जीत हासिल की. इन सब के बीच एक चौकाने वाला फैसला लिया गया कि गृह मंत्रालय श्री राजनाथ सिंह जी का कद घटाकर अमित जी शाह को दे दिया गया. ऐसा किस परिस्थिति में सम्भव हुआ ? इसका कोई खुलासा नहीं हुआ. क्योंकि राजनाथ जी ने अपने पहले कार्यकाल में कश्मीर की कुछ दर्दनाक हादसों को छोड़ दें तो पाएंगे कि गृहमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल शानदार रहा है. बहरहाल अब उनके पास रक्षा मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय है. जिसमें भी काम करने के असीमित संभावनाएं हैं. निर्मला जी को रक्षा से उठाकर वित्त मंत्रालय दे दिया गया है जो कि पिछली सरकार में अरुण जेटली जी के पास था. जेटली जी स्वास्थ्य कारणों से इस कैबिनेट में नहीं है. वैसे जेटली जी बहुत अच्छे वक्ता है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। इस कैबिनेट विस्तार में बीजेपी की सहयोगी पार्टियों को भी आंशिक रूप से शामिल से किया गया है. एक मात्र सहयोगी पार्टी जदयू ने इस आंशिक भागीदारी को स्वीकार नहीं की है.

सरकार के शपथ लेने के अगले हीं दिन दो खबर देश के सामने आयी और वो दोनों सत्ता के लिए डराने वाली है. पहली खबर ये थी कि 45 सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर इन 5 सालों में रहा है. जिसमें शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 7 % को भी पार कर गयी है और दूसरी बुरी खबर ये रही कि वित्तीय वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही में देश की अर्थब्यवस्था 5.8 % तक आ गयी जो पिछले दस सालों में सबसे कम आंका गया है. इससे पहले 2012-2013 वित्तीय वर्ष में देश की अर्थब्यवस्था अपने न्यूनत स्तर 6.4 रही थी. अब आप समझ हीं गए होंगे कि आने वाला समय समय सरकार के लिए चुनौतियों से भरा रहने वाला है. खैर बेरोजगारी की बात तो विपक्ष 2019 के आम चुनाव में भी खूब प्रचारित किया था तब सरकार ने इसे मिथ्या करार दिया था और मानने से इंकार कर दिया था पर अब मान लिया है. क्योंकिअब उन्हें भी लगने लगा है कि आने वाले निकट भविष्य में तमाम चुनौतियों से से लड़ना होगा और उससे पार पाना होगा।