अमित शाह या तो जनता को गुमराह कर रहे हैं या नेहरू जी और कश्मीर मसले को लेकर उनके पास कोई ठोस जानकारी नहीं है या जानबूझकर झूठ बोल रहा है. जैसा कि उनके राजनीतिक पूर्वजों ने आजादी के पहले से लेकर आज तक करते आए हैं। उसी सफेद झूठ की परंपरा को शाह भी बेशर्मी के साथ आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
1947 के बटवारे के समय अंग्रेजों की हुकूमत ने कहा था कि हिंदुस्तान की 565 रियासतों में से जो भी हिंदुस्तान के साथ रहना चाहें वे हिंदुस्तान के साथ रहें और जो पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं वो पाकिस्तान के साथ जा सकते हैं और जो अपनी स्वतंत्र पहचान को बनाए रखना चाहते हैं वो स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दें. भारत हमेशा से चाहता था कि जम्मू कश्मीर जो कि एक सीमावर्ती का प्रदेश था वो भारत में विलय कर दे लेकिन जम्मू कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह ने अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दिया. 15 अगस्त के बाद से 12 अक्टूबर के रात काबाइलियों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना ने बारामुला, श्री नगर तक जम्मू कश्मीर में कब्जा कर लिया. तब राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी, जिसके जवाब में भारत ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय की शर्त रखी और फारुख अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला की सहयोग से जम्मू कश्मीर का विलय 26 अक्टूबर को भारत में हुआ इसके तुरंत बाद भारतीय सेना एक्शन में आई और बारामुला, श्री नगर, कारगिल, ड्रास आदि जगहों से पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया.ये नेहरू की ही कूटनीति थी जिसने जम्मू कश्मीर को बचाने के लिए 1931 से कश्मीर में सक्रिय शेख अब्दुल्ला, जो कि जम्मू कश्मीर की 77% जनता के एक मात्र नेता थे, उन्हें राजा हरि सिंह के साथ हुए समझौते में शामिल करवाया.
आज जो लोग अपने आप को राष्ट्रवाद का घोर प्रवर्तक बताते हैं वो दरअसल अंग्रेजों के मातहत भारत के खिलाफ काम करते थे, महान भारत का राष्ट्रीय झंडा 14 अगस्त की अर्द्धरात्रि को जलाने वाले संगठन के लोग आज प्रखर राष्ट्रवादी और आजाद भारत के सबसे बड़े नेता पंडित नेहरू जी पर उंगली उठा रहें हैं। नेहरू जी जेसा योग्य,तपस्वी, त्यागी और राष्ट्र भक्त नेता हजारों साल में एक जन्म लेता है.