Friday, June 24, 2022

बुढ़ापे का इश्क पार्ट - 3

पार्ट - २ से आगे की कहानी -

कहानी धीरे - २ आगे बढ़ती है और इन दो दिलों में प्यार की तरंगों का प्रवाह तीव्र होता गया। जब उस महिला/पुरुष को उसके रिश्तेदारों ने समझाने की कोशिश की तो उनके ऊपर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। फिर भी चुपचाप सबके आंखों के सामने उनका फोन आता और बात होती। इसी दरम्यान उन दोनों का एक बार फिर सामना होना था। और वो दिन था मंगलवार। उपरोक्त पुरुष/महिला अपने घर से सुबह आठ बजे अपना कागज लेनें के लिए निकल गये थे। उसी दिन उनका पुरूष/महिला साथी अपने कार्यों से निवृत्त होकर दिल्ली जाने के लिए निकले। लेकिन वो दिल्ली नहीं गए। सबको चकमा देते हुए एक सच्चे आशिक की तरह वह रास्ते में एक-दूसरे से मिले और विश्रामगृह में जाकर एकांत में कुछ घंटे ब्यतीत किए। हालांकि विश्राम करने का कोई ठोस सूबूत तो नहीं है लेकिन उनका कूबूलनामा था विश्राम करने का।
बाकी कि सारी बातें उनके चेहरे और हाव-भाव को देखकर उनके कूबूलनामें पर मुहर लगा रही थी। उनका चेहरा थका सा प्रतीत हो रहा था, चेहरे की रंगत उड़ चुकी थी। जो समझने वालों के लिए काफी था। सब समझ चुके थे और जब आनंद बस उनसे और जानने की जिज्ञासा हुई तो वो फिर अपनी बात को थोड़ा घुमाने लगा/लगी। जब तक असलियत का पता और असर हो चुका था। आम तौर पर वो पुरुष/महिला काफी बन-ठन कर रहता/रहती थी। लेकिन उस दिन लौटने के बाद उनका चेहरा बहुत अलग दिखाई दे रहा था। 
उनसे बात करने वालों को बहुत आनंद भी आ रहा था और प्यार से छिंटाकशी भी कर रही थी। लेकिन उनका/उनकी प्यार और परवान चढ़ चुका था।‌‌ उन्हें अब किसी परवाह नहीं थी।‌‌‌ वो सबसे अलग होकर अपने प्यार की दुनिया में मशगूल रहना चाहती थी। जो प्यार करने वालों के लिए सही भी है। एक दिन और गुजरा तो अगले दिन दिल्ली भ्रमण की योजना बनाई गई और उसमें मोहरा बनाया गया एक 15 साल के बच्चे को। जिसे इन सब बातों की कोई खबर तक नहीं थी। वह बालक भी घूमने के नाम पर खुशी-खुशी तैयार हो गया। अन्ततः समय कम होने के कारण घूमने का प्लान रद्द करना पड़ा।


अगला और अंतिम भाग कल लिखूंगा।

Wednesday, June 22, 2022

बुढ़ापे का इश्क पार्ट -2

 पार्ट - 1 से आगे लिख रहा हूँ -

इंसान ये भूल जाता है कि वो जिस जगह जा रहा है. उस जगह भी उसे पहचानने वाला कोई हो सकता है. लेकिन अधेड़ उम्र के चक्कर में पड़कर वो सोचता है कि अब तो शादी भी हो चुकी है, बच्चे और पति भी हैं. लेकिन ये भूल जाता है/जाती है कि ये दुनिया है. यहां के लोग नजरों को देखकर हकीकत पहचान जाते हैं. वो भी तब जब आप अपने काम के लिए सुबह-सुबह किसी और के साथ निकलते हैं और घर से 60 किलोमीटर दूर आपका अधेड़ पुरूष/महिला मित्र पहुँच जाता है. उसके साथ 1 घंटे का सफर 5 घंटे में पूरा करते हैं.

ऐसे अधेड़ लोगों में मैंने मिलने की बहुत तड़प देखी है. दोनों अधेड़ उम्र के आशिक शुक्रवार को बहाने से 5 घंटों तक साथ रहते हैं और फिर शनिवार को इनके दिल में मिलने की इतनी तड़प होती है कि किसी रिश्तेदार के यहां (अपने घर वालों से दूर) बहाने बनाकर बुलाते हैं, फिर रविवार को पीवीआर मॉल में बहाने बनाकर बुलाते हैं और एक अपने रिश्तेदार और उसके छोटे से बच्चे के साथ जाते हैं. ये सब उनके कुछ जानकार लोगों के नजरों के सामने घटित होता है. जिन लोगों के सामने ये जाया करते थे/थी. उनमें से एक उनका जानने वाला भी उनके रिश्तेदारों के आस-पास रहता है. और जब वो पूछता है तो पूर्व की भांति आँखों में आँखें डालकर झूठ बोल देता/देती है कि मैं तो वहाँ गया/गयी हीं नहीं था/थी. आप झूठ बोल रहे हो. आप मुझ पर शक कर रहे हो. मुझे बदनाम कर रहे हो. आपने मुझे कहाँ देखा ? जब देखा तो मुझे बुलाया क्यों नहीं ? अब इन्हें कोई कैसे बताएं कि राह चलते किसी को कोई बुलाकर अपनी जान जोखिम में क्यों डाले ?  वहाँ पहचाने से इंकार कर देती/देते तो जनता उस बेचारे का क्या हश्र करती ? ये न तो आप को अंदाजा होता और न उस बेचारे को. ये शहर है कोई गांव नहीं, जहां आप किसी को रोककर न पहचानने पर भी थोड़े समय में अपना परिचय दे सकते हैं.

ऐसे घट रही घटनाओं को साक्षात देखकर मैं हतप्रभ हो जाता हूँ. क्योंकि, उस घटना का मैं भी उस दिन गवाह था. इन सब बातों को देखकर तो अब रिश्तों से भी विश्वास उठता जा रहा है. जब कोई 40 साल की महिला/पुरूष किसी दूसरे महिला/पुरूष से संबंध बनाने पर इतने उतारू हो जाएँ तो उनमें शर्म कहा बची ? और कोई कैसे विश्वास करें कि उनके बच्चों की उम्र 20 साल हो जाने के बाद भी वो अपने जीवनसाथी पर पूर्ण विश्वास कर सकें ?

उन्होंने ये सारे पैंतरे बड़ी चालाकी के साथ आजमाए थे. लेकिन जब आप किसी से बात करते हैं और घूम किसी और के साथ रहे/रही हैं. तो सामने वाला अपने भी पैंतरें बदलता रहता है. जिसने इस सत्य घटना को लिखने के लिए प्रेरित किया उसके मन को टटोला तो इनको लेकर उसके मन में कोई दुराभाव नहीं था. बल्कि उसका मात्र इतना कहना था कि आप जिस पुरूष/महिला के साथ अपना काम करवाने के लिए गए/गयी. उसके बारे में आप अपने घरवालों को बताकर जाती/जाते। क्योंकि वो जिस पुरूष/महिला के साथ गए/गयी थी. वो भी उनके परिवार वालों को बहुत करीब से जानता था/थी. अभी तो टेलीविजन और किताबों  पढ़ने/देखने को मिलता था कि प्यार की कोई उम्र नहीं  होती, लेकिन अब साक्षात देख भी रहा हूँ. इस स्टोरी में अभी बहुत से रूचिकर मोड़ आने बाकी हैं. जिन्हे आगे -आगे घट रही घटनाओं के आधार पर समेटने का प्रयास करूंगा.

मेरा लेख के माध्यम से  किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा बिलकुल नहीं हैं, अपितु समाज में घट रही सत्य घटनाओं से सबको परिचित कराने का इरादा है. 

Tuesday, June 21, 2022

बुढ़ापे का इश्क पार्ट - 1

जमाना बहुत बदल गया है. अब कभी किसी को अपने निजी रिश्तों पर विश्वास नहीं रह पायेगा. सोशल मीडिया के इस दौर में देख पा रहा हूँ और तमाम उदाहरण मेरे सामने घटित हुए हैं और वर्तमान में हो भी रहें हैं. पुरूष/महिला अपने साझीदार को छोड़कर दूसरे पुरूष/महिला की तरफ बहुत तेजी से आकर्षित हो रहें हैं. इस प्रकार की मनो: स्थिति में वो क्यों पहुंच रहें हैं ? ये शोध का विषय है. मैं यहां बात युवक/ युवतियों की नहीं बल्कि 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की कर रहा हूँ. जिनकी 18/20 साल की अपनी संतानें हैं. ऐसे लोगों में अपने पार्टनर से असंतुष्टि की भावना जागृति होना बहुत आश्चर्यचकित करने वाला हूँ. लेकिन यह घटित हो रहा है. ऐसे लोग अलप समय के लिए थोड़ा सुख तो उठा सकते हैं. लेकिन जब वो अपने चौथेपन में प्रवेश करेंगे तब उनको आज की गलती का अहसास करेंगे.

मैं कोई दूध का धुला नहीं हूँ. हो सकता है कि मैं भी किसी से बात करता हूँ, लेकिन वो बस बात तक हीं सिमित है. पार्टनर बदल-बदलकर मिलने-जुलने, घूमने-फिरने का कोई इरादा भी नहीं हैं और न कभी होगा. उनसे मैं एक अच्छे दोस्त के रिश्ते के दरम्यान बात करता हूँ. वो भी कोई एक होगी, एक से ज्यादा नहीं.

हाँ, मैं बात कर रहा था अधेङ उम्र के प्यार के बारे में. कई बार इस तरह के लोग आँखों देखी हकीकत को झूठ साबित करने के लिए अनेक तरह की बातों का जिक्र करते/करती हैं. और सच देखने वाला जब सबकुछ सोच-समझ कर कहता है कि मैं जो बोल रहा हूँ वो झूठ था. तब उस चरित्र को लोगों के सामने संतुष्टि तो जरूर मिलता/मिलती है, लेकिन मेरा दावा है कि उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारती होगी और कहती होगी कि तुमने तो चार लोगों के सामने उसे झूठा साबित कर दिया. लेकिन अपने जमीर को कैसे समझा पायेगा/पाएगी. हकीकत को तू, मैं और ऊपरवाला तो देख रहा था ना. उसके बाद चालाकी बस स्टेटस पर दो-चार ऐसे परिचित लोगों का चेहरा लगाकर वो फिर से दोहराई जाने वाली उस कहानी को छुपाने का असफल प्रयास करता/करती है. यार स्क्रिप्ट तो पहले से लिखी होती है, बस उसके अनुसार नाटक किया जाता है. आजकल के कैब वाले भी दिन में 11 बजे फ्री होते हैं और उसके बाद अपने ग्राहक को लाने के लिए गंतब्य को निकलते हैं और उचित किराया भी वसूलता है. लेकिन जो यात्री है, वह कहता है कि मैंने कोई किराया अदा नहीं किया है. इसे कैसे सच मान लिया जाय कि इस भागम-भाग की दुनिया में जहां हर किसी के पास समय का अभाव है, उस दौर में नि:स्वार्थ सेवा कौन करता है ? बहरहाल, मैं अपने मुद्दे पर फिर से लौट कर आता हूँ कि आजकल बुढ़ापे में इश्क का बुखार क्यों इतना बढ़ रहा है. मैंने कुछ लोगों को देखा है कि बहुत दूर से चलकर आते हैं और किसी वयस्क पुरूष/महिला से मिलते है और घंटे भर की दूरी को 5-6 घंटों में पूरा करते हैं. मिले हुए 24 घंटे भी नहीं बीतते है और फिर मिलने की बहुत बेचैनी रहती है, फिर कहीं बुलाते हैं और मिलते हैं. ऐसे लोगों को मेरे ख्याल से शायद अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा किसी एक इंसान के बारे में सोचने की उत्तेजना रहती है. और वह इंसान अब उनकी जिंदगी में वर्तमान भी नहीं बन सकता.

मेरे अनुमान के मुताबिक़ ऐसी घट रही घटनाओं के पीछे पैसा हीं एकमात्र कारण होता है. अब समझ में आता है कि अगर हमारे पास पैसा है तो दुनिया की हर ख़ुशी हमारे पास होगी वर्ना आप बेकार हैं. मेरी हर किसी से यही प्रार्थना रहती है कि आप इधर-उधर भागने से अच्छा है अपने परिवार के साथ रहें। वो हर हाल में, हर परिश्थिति में आपके साथ होंगे और आपका सहयोग करेंगे।

मेरे लिखें हुए शब्दों से यदि किसी भाई/बहन को तकलीफ पहुंचती है. तो मैं उनसे खेद प्रकट करता हूँ, माफी चाहता हूँ.