Wednesday, January 30, 2019

गाँधी जी विचारों में आज भी जिन्दा है


बिपिन नंदलाल गिरि 

आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की ७१ वीं पुण्यतिथि है. आज के हीं दिन ३० जनवरी सन १९४८ को प्रार्थना सभा में जाते समय दिल्ली के बिड़ला हाउस में एक सनकी (पागल) ने सेमी ऑटोमेटिक रिवाल्बर से तीन गोलियां बापू जी के सीने में उतार दी और वही बापू "हे राम" बोलते हुए इस मृत्यु लोक को छोड़कर स्वर्ग सिधार गए. उस पागल ब्यक्ति का नाम "नाथू राम गोडसे" था. जिस सिरफिरे ने बापू को गोली मारी थी उसका रिश्ता हिन्दू महासभा नामक एक हिंदूवादी संगठन से था. जो आरएसएस की सहयोग में रहती थी या यूं कहें आरएसएस की ही एक अलग इकाई थी. बापू की हत्या के 10 दिन पहले यानी २० जनवरी को एक बार और बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी जी के ऊपर हमला हुआ था. उस वक्त बापू को लगा था कि सैनिक गोले और हथियार चलाने का प्रशिक्षण ले रहें हैं. बापू के मौत की खबर सुनते हीं पूरे देश में सन्नाटा छा गया था. देश के हर हिस्से में रोने-बिलखने की खबरें आ रही थीं. वो इसलिए हो रहा था कि १९२० से १९४७ तक आजादी की सम्पूर्ण लड़ाई राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में ही लड़ी गयी थी. इस लड़ाई में आरएसएस और हिन्दू महासभा का कोई योगदान नहीं था इसलिए ये लोग बापू की मृत्यु के पश्चात खुशिया मना रहे थे और मिठाइयां बाट रहे थे. खैर बाद में नाथूराम को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से शिमला की अदालत ने फांसी की सजा दे दी थी.

बापू की हत्या पर आरएसएस और हिन्दू महासभा की दिवाली - 

बापू की हत्या के बाद दक्षिण पंथी हिन्दू संगठन आरएसएस और हिन्दू महासभा ने मिलकर नागपुर, पुणे इत्यादि शहरों में मिठाइयां बाटकर बापू के हत्या का जश्न मनाया था. इस बात को आरएसएस वाले गलत बताते हैं पर उस समय के अखबार इस घटना की सत्यता की पुष्टि करते हैं. बापू जी की हत्या की साजिश के आरोप में तब के सर संघचालक एम. एस. गोलवलकर भी जेल गए थे. हालांकि तफ्शीश के दौरान तकनिकी आधार पर छूट गए थे. उस समय गृह मंत्री सरदार पटेल ने गोलवलकर से अंडरटेकिंग लिखवाकर और उनसे कुछ शर्तें मनवा कर जेल से रिहा किया था.   

ऐसा करने के पीछे संघ की ये सोच थी के अब हमें हिन्दू समाज स्वीकार कर लेगा लेकिन हुआ उलटा. देश के बहुसंख्यकों ने सिरे से इन दोनों संगठनों को नकार दिया। क्योकि चाहे १९३२ का समय हो या १९४२ का भारत छोडो आंदोलन दोनों में आरएसएस ने अपने आपको आजादी आंदोलन से अलग किया और अंग्रेजों की मदद की. उनके इस कृत्य को कोई भी देशवासी आज भी नहीं भूला है. संघ ने तो युवाओं से खुली अपील की आजादी की लड़ाई लड़ने से अच्छा है कि वो अंग्रेजी फ़ौज में शामिल हो जाये और स्वतंत्रता सेनाओं के खिलाफ करें। क्यों संघ के एक पूर्व प्रमुख ने अंग्रेजों से आधा दर्जन बार माफी मांगी थी.

संघ और गोडसे की दूरी दिखावा क्यों - 

बापू जी की हत्या के बाद बहुत से संघ नेताओं को हिरासत में लिया गया था. जिसकी वजह से संघ को अपने छवि की चिंता सताने लगी थी तो एक संदेश गोडसे के पास भिजवाया गया होगा कि वो अपने आप को संघ से अलग कर तो आरएसएस की थोड़ी नाक बच जायेगी, और गोडसे ने ठीक वही किया अपनी गवाही में बोला था कि जिस समय गाँधी जी की हत्या किया उससे पहले मैं संघ को छोड़ चुका था और अब मैं हिन्दू महासभा का कार्यकर्ता हूँ. गाँधी जी की हत्या का जब-जब जकर हुआ तो १९८० के दौर के बाद आडवाणी, वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी आरएसएस के बचाव में आने लगे क्योंकि संघ बीजेपी को पर्दे के राजनितिक ताकत दे रही थी. उसी समय नाथू राम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने सबकुछ गड़बड़ कर दी. "जेल से निकलने के बाद उन्होंने अंग्रेज़ी पत्रिका ‘फ्रंटलाइन’ को दिए गए एक इंटरव्यू में बताया कि आडवानी और बीजेपी के अन्य नेता उनसे दूरी नहीं बना सकते। उन्होंने कहा, ‘हम सभी भाई आरएसएस में थे। नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविन्द सभी आरएसएस में थे। आप कह सकते हैं कि हमारा पालन-पोषण अपने घर में न होकर आरएसएस में हुआ. वह हमारे लिए एक परिवार जैसा था."

गाँधी जी आज भी जिन्दा है 

आज भी हम महात्मा गाँधी जी को याद कर रहें हैं. यहीं महात्मा गांधी जी के आज भी ज़िंदा होने का सबसे बड़ा सुबूत है. जो संघ, भाजपा आज गाँधी-गाँधी कहते नहीं थक रहे हैं वो आजादी के आंदोलन के वक्त में हमेशा गांधी जी के खिलाफ रही है. जब गोडसे भक्त अगर आज २० वीं सदी में गांधी से मुहब्बत करने लगे हैं तो यही तो गांधी जी की और उनके विचारों की जीत हैं. मैं आज भी गांधी जी को दुनिया का सबसे बड़ा फोटोग्राफर मानता हूँ.

बापू अमर रहे        

Tuesday, January 29, 2019

राहुल का न्यूनतम आय गारंटी की घोषणा, बीजेपी चुकी


बिपिन नंदलाल गिरि 

चुनावी बिसात बिछ चुकी है तो जाहिर तौर पर घोषणाओं और वादों का अम्बार लगना स्वाभाविक है. इसी कड़ी में कांग्रेस राहुल गाँधी ने कल छत्तीसगढ़ में किसान आभार रैली की. ये सिलसिला तीन राज्यों की कांग्रेस विजय के बाद हुआ. किसान आभार रैली की शुरुआत राजस्थान से होते हुए छत्तीसगढ़ तक पहुंची है और अगले महीने में ऐसी ही एक और किसान रैली   मध्य प्रदेश में प्रस्तावित है. कल छत्तीसगढ़ के दौरे पर किसान रैली में राहुल गाँधी ने एक एक बहुत बड़ा ऐलान किया जो सम्भवतः कांग्रेस का अब तक बेस्ट शॉट कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

राहुल का छत्तीसग़ढ की किसान आभार रैली में बड़ा ऐलान -

राहुल गाँधी का ऐलान उन्हीं के शब्दों में, "हम एक ऐतिहासिक फैसला लेने जा रहे हैं, जो दुनिया की किसी भी सरकार ने नहीं लिया है. 2019 का चुनाव जीतने के बाद देश के हर गरीब को कांग्रेस पार्टी की सरकार न्यूनतम आमदनी गारंटी देगी. हर गरीब व्यक्ति के बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी रहेगी." राहुल गाँधी के मुंह से ये बस निकले हुए शब्द हीं नहीं हैं ये कांग्रेस के चुनावी गणित की भावी तस्वीर है जो उन्होंने छत्तीसगढ़ की धरती से खेल दिया है. इसका कितना असर होता है ये तो वक्त हीं बताएगा पर मिस्टर गांधी ने अपनी तरफ से गूगली दाल दी है अब सामने वाले पर निर्भर करता है कि वो इस गूगली से किस तरह निपटता है. राहुल ने इस रैली इस रैली के माध्यम से छत्तीसगढ़ की जनता को साधने का काम खूब किया और एक निश्चित "न्यूनतम आय की गारंटी" का बहुत लोक-लुभावन वादा भी किया और इस वादे पर यकीन दिलाने के लिए उन्होंने कांग्रेस की पिछली सरकार में लागू की गयी और अत्यंत सफल योजनाओं जैसे मनरेगा, सूचना का अधिकार (आरटीआई), भोजन का अधिकार, पढ़ाई का अधिकार का जिक्र किया. इसके साथ हीं राहुल ने "न्यूनतम आय की गारंटी" के माध्यम से एक निश्चित रकम बैंक खाते में डालने की बात कही. इसके पीछे उनकी सोच यही रही होगी की मतदाताओं को यकीन हो जाएगा कि जब इतना सब किये हैं तो ये भी करेंगे.

छत्तीसगढ़ से राहुल के ऐलान का असर -

छत्तीसगढ़ की धरती से इस अति महत्वाकांक्षी फैसले का ऐलान करने पीछे राहुल गांधी और उनकी पार्टी की ये सोच जरूर रही होगी यहां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, आदिवासी और किसानों की सर्वाधिक संख्या है और इनके बीच इस ऐलान को करने से हिंदी भाषी क्षेत्रों के गरीब वोटरों में एक सकारात्मक संदेश पहुंचेगा। एक बात और ध्यान देने वाली है कि कर्जमाफी की बात पहली बार राहुल गांधी ने यहीं छत्तीसगढ़ की भूमि से हीं किया था जिसका उनकी पार्टी को मन वांछित लाभ मिला। तो इसी बात को ध्यान में रखकर राहुल इस योजना की घोषणा करने का मौक़ा नहीं चूके और अब भाजपा बहाना बना रही है. वैसे ये सोच भाजपा की थी पर वो चूक गयी. राहुल गाँधी ने इस ऐलान के अलावा एक रूचिकर बात और कही. राहुल गांधी ने पूरे दमखम से कहा कि "कांग्रेस ने कर्जमाफी, जमीन वापसी का वादा पूरा किया. पैसे की कोई कमी नहीं है. हम दो हिंदुस्तान नहीं चाहते. बीजेपी दो हिंदुस्तान बनाना चाहती है. एक हिंदुस्तान उद्योगपतियों का, जहां सब कुछ मिल सकता है और दूसरा गरीब किसानों का हिंदुस्तान, जहां कुछ नहीं मिलेगा, सिर्फ 'मन की बात' सुनने को मिलेगी." वो समझ गए थे कि किसान कर्जमाफी से हीं किसानों और गरीबों का दिल जीतकर रमन सिंह सरकार की विदाई की है. 

राहुल के ऐलान के मायने -  

राहुल के ऐलान का सीधा मतलब ये है कि कांग्रेस अब सरकार बनाने के लिए लड़ने जा रही है जिसकी झलक अब तक नदारद थी वो राहुल के दो आश्चर्यचकित कर देने वाले फैसले से प्रतीत होने लगा है. वो चाहे प्रियंका गाँधी को सक्रिय राजनीति में लाना हो या पूर्वांचल का प्रभार देना हो या छत्तीसग़ढ में "न्यूनतम आय की गारंटी" की घोषणा करना। इन सब कारकों का कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और उनके प्रशंसकों में एक नए जोश का संचार करेगा और अधिक कुशाग्रता के साथ वो जमीन पर कार्य करेंगे। अब जनता को भी लगने  लगा है कि कांग्रेस जीतने के लिए लड़ रही है.     


Monday, January 28, 2019

गडकरी का बयान और बदलाव की आहट

अब लोक सभा की घड़ियां जैसे-जैसे नजदीक आ रहीं हैं वैसे-वैसे पार्टियों के अंदर की खेमेबाजियां भी निकलकर बाहर आने लगी है. चाहे बात सत्ताधारी पार्टी की करें या बात विपक्ष की पार्टियों का. सब धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगे हैं. बमुश्किल साल भर पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी में दो फाड़ हुआ तो शिवपाल सिंह ने अलग रास्ता अख्तियार कर लिया फिर एक ऐतिहासिक घटना सपा-बसपा के रूप में जनता के सामने आया. उसके बाद कांग्रेस ने अपनी तरफ से धमाका करते हुए प्रियंका गाँधी को चुनावी समर में उतार दिया। जिसकी वजह से आगामी लोक सभा चुनाव के दौरान सारे देश के मीडिया का ध्यान उत्तर प्रदेश पर हीं केंद्रित रहेगा. भाजपा के नितिन गडकरी जी के बोल भी कुछ-कुछ तल्ख लग रहे हैं. अब ये क्या करते हैं संघ जानें.

अब बात करते हैं पार्टियों के अंदर वाले नेताओं की जो किसी विपक्ष के नेता तो नहीं हैं पर भाषा विपक्ष की तरह हीं उपयोग में ला रहे हैं -

नितिन गडकरी -

सरकार के सबसे अच्छे मंत्रियों में से एक नितिन गड़करी जी ने कल यानी २७ जनवरी सन २०१९ को महराष्ट्र के नागपुर में एक बयान दिया है जो आज बहुत चर्चित हो रहा है और वो इस प्रकार है, " सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर  दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है। इसलिए सपने वही दिखाएं जो पूरे कर सकें.... मैं सपने दिखाने वाले में से नहीं हूं। मैं जो बोलता हूं वो 100 प्रतिशत डंके की चोट पर पूरा होता है." ऐसा नहीं है कि गडकरी जी ऐसा बयान पहली बार दे रहें हैं. गडकरी जी वर्तमान सरकार के सबसे कर्मठ मंत्रियों में से एक हैं, इससे पहले पिछले साल भी उन्होंने एक ऐसा हीं बयान दिया था जो इस पकार था, "हमें पूरा भरोसा था कि हम कभी भी सत्ता में नहीं आएंगे, इसलिए हमें लंबे-चौड़े वादे करने की सलाह मिली थी....अब जब हम सत्ता में हैं तो लोग हमें उन वादों की याद दिलाते हैं, जिन्हें हमने किया था। हालांकि, इन दिनों हम सिर्फ हंस देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं." गडकरी जी की इन बयानों को लोग सरकार की आलोचना के तौर पर देख रहें है. लोगों की उत्सुकता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है कि अब गडकरी जी का अगला निशाना क्या होता है. संघ प्रमुख का हाथ गडकरी जी के सिर पर है तो मोदी-शाह की जोड़ी भी लाचार है. अभी कुछ दिन पहले संघ प्रमुख भागवत ने एक सेना के संबंध में सरकार पर एक बहुत हीं तल्ख टिप्पणी करते हुए खा था कि, "जब युद्ध नहीं हो रहा है तो इतने जवान शहीद कैसे हो रहे हैं." संघ प्रमुख के इस बयान को सरकार के प्रति उनकी नाराजगी को लेकर देखा जाने लगा था फिर गडकरी एपिसोड आ गया तो नाराजगी की खबर और पुख्ता हो गयी. 

हमें यह समझना पड़ेगा कि आज के भजपा के दौर में मोदी और अमित शाह की जोड़ी के सामने बड़े से बड़े नेता में बोलने की हिम्मत नहीं होती तो ये हिम्मत (माद्दा) गडकरी जी के हृदय में कहाँ से पैदा हो गया. तो उसका जबाब बहुत सरल है जो लोग संघ की कार्य सस्कृति से परिचित हैं वो जानते हैं कि गडकरी जी में नव ऊर्जा का संचार नागपुर (संघ कार्यालय) से मिल रही है. जैसा की सर्वविदित है कि मोदी जी कभी भी संघ के स्वीकार्य नेता नहीं रहें है २०१४ के चुनाव के दौरान संघ ने मजबूरी बस मोदी को स्वीकार किया है. आज के परिदृश्य में नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह हीं दो ऐसे नेता हैं जो निर्विवाद रूप से संघ की पसंद बने हुए हैं. गडकरी जी को तो पूरे देश ने देखा है कि जब भी संघ का कोई बड़ा कार्यक्रम होता है वो उसमें स्वयं सेवक के गणवेश में जरूर शामिल होते हैं और गडकरी जी अपना संघ प्रेम कभी नहीं छुपाते है. जब गडकरी जी भाजपा के अध्यक्ष बने थे तब वो अपने संघ प्रेम के कारण हीं बने थे. अगर आज वो सार्वजनिक मंच से कुछ भी खुल कर बोल पा रहें हैं तो उसके पीछे संघ की ताकत है जिसकी वजह से छद्म रुपी भाजपा चुप-छाप सह रही है. कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.

संघ प्रमुख चाहते थे कि सरकार राम-मंदिर पर अध्यादेश लाये, धारा ३७० पर आक्रामक तरिके से खत्म करने की दिशा में आगे बढ़े, नयी शिक्षा ब्यवस्था लागू हो एक बात तो लगभग साफ़ हो गयी है कि संघ सरकार से नाराज है क्योंकि सरकार ने संघ के मनमुताबिक फैसले नहीं लिए शिवाय नोटबंदी को छोड़ कर. क्योंकि अब स्वयं सेवकों से क्षेत्र की जनता मीटिंगों में अच्छे दिन, राम-मंदिर, नौकरी को लेकर सवाल करने लगी है. स्वयं सेवक जबाब न होने की स्थिति में शर्मिंदगी महशूस होने लगी है, इस वजह से संघ को यह डर भी सताने लगा है कि कहीं उसके कार्यकर्ता घर में न बैठ जाये.

Friday, January 25, 2019

इंडिया टूडे के सर्वे में मोदी के मुकाबले राहुल की लम्बी छलांग

राजनैतिक पार्टियों की तरफ से २०१९ लोक सभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है बस चुनाव आयोग के आधिकारिक तौर पर एलान करने की जरूरत है. सभी पार्टियां चुनावी तैयारियों में अपने-अपने अस्तबल के साथ उत्तर चुकी है. चुनाव में खर्च होने वाले अकूत धन और सामान में उड़ने वाले उड़न खटोले की एडवांस में बुकिंग कराई जा चुकी है. आगामी चुनाव के असर से टीवी चंल भी अछूते नहीं रहे हैं. चना वाले भी अलग-अलग तरह से जनता की नब्ज टटोलने की कोशिश में लगे हुए हैं. इस चुनाव में होने वाले कुछ संभावित घटनाओं का आंकलन करने की कोशिश कर रहा हूँ. मेरा अनुमान गलत भी हो सकता है.

टीवी सर्वे के अनुसार जनता की सोच-

हाल के दो दिनों के अंदर देश के दो बड़े हिंदी चैनल ABP न्यूज़ और आज तक ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आगामी लोकसभा के संदर्भ में दो अलग-अलग सर्वे किये थे और दोनों का परिणाम लगभग आस-पास था.

इंडिया टूडे और कार्वी के अनुसार - देश के प्रसिद्द मीडिया ग्रुप का एक सर्वाधिक देखा जाने वाला हिंदी चैनल "आज तक" पर इण्डिया टूडे और कार्वी का सर्वे परिणाम प्रसारित किया गया. इस सर्वे को अगर आधार माना जाये तो अगली लोकसभा त्रिशंकु होने जा रही है. इस सर्वे से जुड़ें साथियों ने जनता से कई सवाल पूछे थे जिनमें से मैं कुछ सवालों का और उसके परिणाम का जिक्र करना चाहूंगा.

पहला सवाल - प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वाधिक पसंद का चेहरा किसका है ? 
जबाब - नरेंद्र मोदी जो की वर्तमान में प्रधानमंत्री भी है उन्हें 46% जनता ने अपनी पसंद बताया.

दूसरा सवाल - प्रधानमंत्री पद के लिए दूसरी पसंद कौन है ?
जबाब - राहुल गांधी 34%

तीसरा सवाल - सारे विपक्ष अगर एक हो कर चुनाव लड़ें तो विपक्ष की तरफ से कौन प्रधानमंत्री का बेहतर विकल्प होगा ?
जबाब - राहुल गांधी 51%

ऐसे कुछ प्रमुख सवाल थे जिनका जबाब जनता से इस सर्वे करने वाली एजेंसी को मिला। जब इन्होने पूरे देश से एकत्रित किये हुए अपने डाटा का एक साथ मिलान किया तो उसका परिणाम अपेक्षित हीं निकला और वो था कि बीजेपी (NDA) को 35% वोट और कांग्रेस (UPA) को 33% मत प्राप्त होने की उम्मीद है. जब इसे सीटों में इन्होने बदला तो NDA के खाते में 237 और UPA के खाते में 166 सीट आने का अनुमान हैं. इसमें जहां बीजेपी और उसके सहयोगियों को 99 सीट का नुकसान उठाना पड़ रहा है वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगियों को 100 से ज्यादा सीट का फायदा हो रह है.

इस स्तिथि में त्रिशंकु सरकार के आसार है और यदि SP, BSP, TMC और PDP, Congress (UPA) के साथ आ जाती हैं तो Congress गठबंधन की सरकार आसानी से बन सकती है और यही अगर BJP की तरफ चली जाती हैं तो NDA की सरकार आसानी से बन जायेगी.

राहुल गाँधी -
राहुल गांधी का ग्राफ अब तेजी से मोदी के मुकाबले में बढ़ रहा है ये तीन हिन्दी भाषी राज्यों के जितने के बाद और बढ़ा है मुझे याद है जब 6 महीने पहले इसी एजेंसी का सर्वे आया था तब राहुल गाँधी मोदी के मुकाबले 26% के आस-पास थे पर आज 34% के साथ मोदी को टक्कर दे रहें हैं. चुनाव आते-आते और परिवर्तन होगा. मेरा निजी तौर पर मानना है कि विपक्षी दल राहुल गाँधी को अपना नेता स्वीकार कर लेंगे उसकी वजह भी है. वजह ये है कि कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आएगी और उसकी सीटें भी ज्यादा होंगी.

नरेंद्र मोदी -
जाहिर तौर पर मोदी जी एक बेहतरीन वक्ता है उनकी एक अकाट्य छवि भी है, पर अब उस छवि का असर दरकने लगा है 2017 के मध्य तक मोदी सरकार की पॉपुलैरिटी 80% तक थी जो आज 52% के आस-पास घूम रही है. 2017 के मध्य तक मोदी जी पॉपुलैरिटी राहुल के मुकाबले 56% से भी ऊपर जो कल यानी 25 जनवरी 2019 को हुए सर्वे में घटकर 46% तक आ गयी है और राहुल की बढ़ रही है. मोदी जी की पूर्व की चुनावी घोषणाएं ही उन पर अब भारी पड़ने लगी है. आने वाला वक्त भाजपा के लिए बहुत कठिन रहने वाला है. हो सकता है कि भाजपा का लगातार दो बार सरकार बनाने का सपना अधूरा ही रहे और इतिहास हो जाये.

निष्कर्ष- 
सर्वे से जो बातें निकलकर सामने आ रही हैं वो सरकार के पेशानियों पर बल देने के लिए काफी है. मोदी का चेहरा दमदार तो है पर काम का नहीं है वो चूक रहे है उसकी सबकी बड़ी वजह ये है कि 2014 के चुनावों में इन्होने जन भावनाओं को चरम तक उभार दिया था वो चाहे राम मंदिर का मुद्दा हो या किसान, जवान, नौजवान। हर किसी को मोदी जी ने बहुत ऊँचे सपने दिखाए थे जिन्हें जमीन पर पूरा करने में असफल रहें है. जनता अब रोष में है और जो सर्वे में दिख रहा है वही जमीन पर भी दिकने वाला है. विपक्ष और मजबूत होगा सत्ता पक्ष की पकड़ और ढीली होगी.  

Wednesday, January 23, 2019

प्रियंका गाँधी का कांग्रेस में औपचारिक प्रवेश


बिपिन नंदलाल गिरि 

माननीय प्रियंका गांधी जी को AICC महासचिव बनाये जाने पर ढेरों बधाई। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर प्रियंका गाँधी को सक्रिय राजनीति  में बार- बार कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से करते रहें हैं जो आज २३ जनवरी २०१९ को नए साल के पहले महीने में नेतृत्व ने अपने कार्यकर्ताओं को ये ख़ास तोहफा दिया है जिससे सभी कांग्रेसी नेताओं में ख़ुशी है और उनकी प्रतिक्रया सोशल मीडिया पर देखने को मिल रही है.  प्रियंका जी को इसी के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल)  प्रभार का जिम्मा भी दिया गया है. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बार-बार ये कहा है कि प्रियंका जी में हम स्व. इंदिरा जी की झलक देखते हैं जो कांग्रेस के उत्साह का एक प्रमुख कारण भी इस फैसले के पीछे हो सकता है. प्रियंका गांधी एक महिला भी हैं और एक सम्मानित परिवार से भी आती हैं इसका भी फायदा कांग्रेस चार महीने बाद होने वाले चुनाव में मिल सकता है. पूर्वांचल की राजनीति जहां तक मैं समझता हूँ बड़े चेहरे के इर्द-गिर्द घूमती है और वो फैक्टर भी कांग्रेस के पक्ष में जा रहा है.   

अब देखना ये है कि प्रियंका गाँधी अमेठी से चुनाव लड़ती हैं या नहीं, पूरे देश में प्रचार के लिए  निकलती हैं या खुद को पूर्वी उत्तर प्रदेश तक हीं सिमित रखती है. अब तक प्रियंका जी ने अमेठी और राय बरेली की लोक सभा सीटों में पर्दे के पीछे से अपनी माँ और भाई राहुल गाँधी जी की हर चुनाव में मदद करती रही हैं, अपनी माँ के पक्ष में चनाव प्रचार करने के लिए कर्नाटक के  बेल्लारी तक पहुंची थी. कांग्रेस नेतृत्व देर से हीं सही पर अपने कार्यकर्ताओं के लिए एक तोहफा आगामी चुनाव से पहले दे हीं दिया है. मैं पिछले सवा घंटे से देख रहा हूँ कि हर प्रमुख टीवी न्यूज़ चैनल पर बस एक हीं बात चल रही है वो है प्रियंका गांधी। मीडिया में भी इस बात को लेकर एक उत्सुकता है क्योंकि इस तरह के फैसले की उम्मीद किसी को नहीं थी चाहे कार्यकर्ता हो या मीडिया के लोग. "राहुल जी ने आज अमेठी में कहा कि हम प्रियंका और ज्योतिरादित्य जैसे युवाओं के माध्यम से प्रदेश को बदलने वाला होगा, निजी तौर पर मेरे लिए ये ख़ुशी की बात है कि मेरी बहन प्रियंका अब मेरे साथ करेगी, वो बहुत कर्मठ है."  

कांग्रेस पार्टी में जो प्रियंका को जानते हैं उन्हें पता है कि वो कितनी कुशल चुनावी मैनेजर और बेहतरीन आर्टिटेक्ट हैं जो पर्दे के पीछे से अब तक चुनाव को मैनेज करती रही हैं. १९९८ में सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस में काफी सक्रिय हो गयी थी. उससे पहले भी जब कभी उनके पिता राजीव गाँधी जी अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में आते थे तो उनके साथ प्रियंका भी आती थी. प्रियंका के बारे में एक बात कही जाती है कि वो एक कुशल रणनीतिकार हैं जो अब तक अमेठी और राय बरेली संसदीय सीट तक ही सिमित थी. लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस ने उनकी सेवा देश भर में लेने का मन बना लिया है और हो भी क्यों नहीं जब आपके पास अच्छे लोग हैं तो उनकी सेवा लेना जरूरी है. इसमें कोई बुराई मुझे नजर नहीं आती.   

अब प्रियंका गांधी के कांग्रेस में आधिकारिक प्रवेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाये जाने से २०१९ लोक सभा की चुनावी रणभूमि पूर्वांचल हीं होने वाला है. इसके पीछे कारण ये है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य योगी नाथ की सीट गोरखपुर, प्रधान मंत्री की सीट वाराणसी, उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या की सीट फूलपुर ये सब प्रदेश की चर्चित सीटें हैं. ये आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब प्रियंका फूलपुर से चुनाव लड़ लें. फूलपुर भारत के पहले प्रधानमंत्री स्व. श्री जवाहर लाल नेहरू की की कर्मस्थली रही है और इलाहबाद का आनंद भवन नेहरू का निवास रहा है और आजादी के महत्वपूर्ण आंदोलनों का गवाह है. सब मिला जलाकर कांग्रेस के लिए चर्चा में बने रहने का एक सार्थक जबाब मिल गया है. मेरा भी मानना है कि कांग्रेस इस बार उत्तर प्रदेश में अच्छा करेगी.

आज राहुल ने वाकई बहुत बड़ा और चौकाने वाला फैसला किया है जो दो धारी भी हो सकता है उसका कांग्रेस को फायदा भी मिल सकता है और नुकसान भी. विपक्ष खासकर बीजेपी अब कांग्रेस पर और जोर-शोर से परिवाद का आरोप लगाएगी, इस बात से कांग्रेस को निपटना होगा क्योंकि राबर्ट वाड्रा के बहाने विपक्ष कांग्रेस पर हमले और तेज करेगा. इसका जबाब कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा कैसे दिया जाता है ये अब देखने वाली बात है. कांग्रेस के एक फैसले से दो जगह फायदा होने वाला है पहला ये की पार्टी के पुराने सवर्ण वोटर कांग्रेस की तरफ बीजेपी से वापस आ सकता है और दूसरा ये है कि प्रियंका गांधी महिला हैं तो उनका भी समर्थन कांग्रेस को भारी मात्रा में मिल सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार NDTV के पूर्व राजनितिक सम्पादक, वर्तमान में लोकबंधु के राजनितिक सम्पादक श्री शेष नारायण सिंह के अनुसार "मैं तो दिल्ली में रहकर भाजपा की मित्रों के चेहरे को साफ़-साफ़ पढ़ रहा हूँ कि ये बेचैन हैं इसका मतलब प्रियंका गाँधी का आना कांग्रेस के लिए कारगर हो रहा है. 

कांग्रेस ने आज एक और परिवर्तन उत्तर प्रदेश में किया प्रियंका जी को पूर्वी यु पी और एक युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया. ज्योतिरादित्य सिंधिया एक राजपूत हैं जो राज घराने से संबंध रखते है. इनका पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान और इनके गृह राज्य मध्य प्रदेश के सवर्ण वोटरों पर भी असर पड़ सकता है. इसी गुणा गणित के साथ इन दोनों को लोक सभा सीट के संदर्भ में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश लाया गया है.   

चुनाव के बाद प्रियंका गांधी के संगठनात्मक काम और उनके करिश्मे का आंकलन किया जायेगा। चुनाव तक बस अनुमान लगाया जाएगा लेकिन कांग्रेस ने अपना तुरूप का पत्ता चल कर एक बहस तो जरूर छेड़ दी है और ये चर्चा जितनी देर तक चलेगी वो कांग्रेस के लिए उतनी लाभकारी होगी.

Tuesday, January 22, 2019

रीढ़ विहिन पत्रकारिता में चापलूसी का दौर

देश के चौथे स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता की बात करना आज के दौर में शायद लोकतंत्र के साथ बेमानी जैसा होगा, हाल के कुछ सालों में मीडिया में किसी राजनितिक पार्टी या किसी ब्यक्ति विशेष की तरफ झुकाव बहुत हीं तेजी के साथ बढ़ा है. वो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया (अखबार) में चाटुकारिता अपने चरम पर पहुंच गया है. आज साफ़-साफ़ देखकर ऐसा लग रहा है कि मीडिया अपने वास्तविक लोकतान्त्रिक मूल्यों से पूरी तरफ बहक चुकी है, आज के मीडिया में भाषाई मर्यादा, सत्य, आलोचना करना मानो अभिशाप बन गया है. हर काले कोट वाला एंकर मानो सरकार की हीं भाषा बोलता है वो ऐसे प्रतीत होता है जैसे सरकार ने उन्हें अपना प्रवक्ता नियुक्त दिया है, सरकार की निंदा करना आज के दौर में मीडिया के लिए ईश निंदा के समान हो गया है. हर समझदार आदमी यह बखूबी देख और समझ रहा है.

मै कुछ उदाहरणों के साथ मीडिया के इस निंदनीय रवैये पर प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा -

आज के चुनावी महीनों में प्रधानमंत्री उम्मीदवार का मुद्दा -   

आज के चुनावी महीनों में प्रधानमंत्री उम्मीदवार का मुद्दा जनता के लिए कम परन्तु मीडिया के लिए बहुत जरूरी हो गया है जितनी बार विपक्ष से सत्ता धारी दल विपक्ष के प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम नहीं पूछती है उससे बहुत ज्यादा टीवी मीडिया और अखबार वाले विपक्षी उम्मीदवार का नाम पूछते हैं और यही शब्दशः सरकार के पार्टी प्रवक्ता पूछते है तो आप थोड़ा सा सोचने के बाद ये पाएंगे कि मीडिया और सरकार के बोल में ज्यादा अंतर नहीं है या कहें तो हूबहू दोनों की जबान एक जैसी है.

जहां तक मेरा मानना है कि मीडिया सत्ता के इशारों पर चल रही है न कि जनता के मुद्दों पर मीडिया और देश के संभ्रांत लोग जानते है कि भारत में एक लोकतान्त्रिक प्रणाली है न की प्रेसिडेंशियल प्रणाली, हमारे देश में हमारे संविधान के अनुसार चुनाव जीतकर आये हुए नवनियुक्त सांसद, विधायक अपने नेता अर्थात प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का चुनाव करते हैं. मीडिया सत्ता के सहयोग से उन नवनिर्वाचित सांसदों, विधायकों का हक छीन कर मात्र दर्शक की मुद्रा में रखना चाहती है. जो लोकतंत्र के लिए किसी से सही नहीं है.

कल का लंदन में दूसरा उदाहरण ईवीएम और सिब्बल - 

कल लंदन में एक कथित ईवीएम हैकर ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय ईवीएम को हैक करने को लेकर एक पत्रकार वार्ता का आयोजन लंदन की धरती से किया था. उस मौके पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील श्री कपिल सिब्बल जी मौजूद थे. उनकी इस मौजूदगी पर मै हिंदी न्यूज़ के एक नामी चैनल पर न्यूज़ शो देख रहा था तो साढ़े 9 मिनट के शो में सारे के सारे सवाल कांग्रेस को लेकर पूछे गए, कपिल सिब्बल की मौजूदगी को लेकर पूछे गए और दिवंगत गोपी नाथ मुंडे को लेकर उठे सवाल पर एंकर उन्हें दिवंगत कह कर भाजपा को क्लीन चीट देने की भरसक कोशिश की और कांग्रेस को हर वक्त कटघरे में खड़ा कर रही थी पर सत्ता से एक भी सवाल नहीं. तथाकथित हैकर ने भाजपा के प्रमुख और दिवंगत नेता गोपी नाथ मुंडे से सम्पर्क और ईवीएम हैक करने की बात कबूल की है. 


तीसरा और अति महत्वपूर्ण मीडिया को गुलाम बनाने वाला फैसला - 

तीसरा और अति महत्वपूर्ण मीडिया को गुलाम बनाने वाला फैसला बीते  साल (2018) में हुआ जब प्रधानमंत्री की गलत बयानी को सच के साथ जोड़ने की कोशिश ABP News जो की देश में एक जाना-पहचाना नाम है उसके वरिष्ठ  मास्टरस्ट्रोक नामक शो के राजनितिक एंकर और निर्भीक पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ जिले से जमीनी रिपोर्टिंग करके सरकार (मोदी) को झूठा साबित करते हुए सच के नजदीक ले गए और पूरे देश के लोगों को प्रधानमंत्री के मनमाफिक "मन की बात" कार्यक्रम में हुए बातचीत को दिखाया फिर अपनी रिपोर्ट के आधार पर आयी सूचना को दिखाया. तो झूठा कौन ये साबित होने में तनिक देर भी नहीं लगा. इसकी बात तत्कालीन केन्दीय सूचना मंत्री ने एक तरह से चैनल को ट्विटर के माध्यम से खुली धमकी दी थी और छत्तीसगढ़ की सरकार के मुखिया डॉ रमन सिंह जी ने प्रेस नोट निकालकर चैनल के सम्पादक को झूठा और झूठी खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया था. इस घटना के 16 दिन बाद ABP News की टीम फिर से उसी स्थान पर जाकर और ढेर सारे महिलाओं को इकठ्ठा करके उनका साक्षात्कार टीवी पर प्रकाशित किया और इस घटना से सरकार इतनी हिल गयी थी कि चैनल मालिक पर दबाव बनाकर मिलिंद खण्डेलकर, पुण्य प्रसून वाजपेयी और "मास्टरस्ट्रोक" के पूरी टीम को चैनल से निकलवा दिया, उसी के महज चंद दिनों बाद एक और बेलौस और निर्भीक पत्रकार अभिसार शर्मा को भी चैनल द्वारा जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया और फिर वापस नहीं बुलाया गया. इस दौर में कुछ निर्भीक (शेर) पत्रकार बचें है जीनका कुछ का  नाम पुण्य प्रसून वाजपेयी, रविश कुमार (NDTV ), मिलिंद खण्डेलकर, अभिसार शर्मा, समीर अब्बास इत्यादि है. जिन्होंने सरकार से सीधे सवाल किया न कि औरों की भांति विपक्ष से. सरकार से सवाल करने का खामियाजा भी इन्हें हीं भुगतना पड़ा.

हमारे चौथे स्तम्भ का तो ये हालात है अब आप युवा और किसान हीं सही खबर और सही बात जन-जन तक पहुचाने में और लोक तंत्र को अभेद्य बनाने में मदद कर सकते हैं.       
   

Sunday, January 20, 2019

ममता की महारैली में विपक्ष का जमावड़ा

कल की ममता जी की रैली देखकर जाहिर तौर पर लगता है की ममता दी का उनके प्रसंशकों में अटूट विश्वाश है उसका अंदाजा कल की रैली में आये हुए जनता को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है, इस रैली में सभी विपक्षी पार्टियों के प्रथम पंक्ति या तो द्वितीय पंक्ति के २० पार्टियों के सम्मानित नेतागण उपस्थित हुए जिनमें मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व प्रधान मंत्री देवगौड़ा, सतीशचंद्र मिश्रा, अखिलेश यादव, हेमंत सोरेन, बाबूलाल मरांडी, शरद यादव, शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, अपांग, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला, एम के स्टालिन, उमर अब्दुल्ला, चंद्र बाबू नायडू, यशवंत सिन्हा, अरूण शौरी, शत्रुन्घ्न सिन्हा समेत सभी मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता मंच पर मौजूद थे पर उनमें खास बात ये थी कि अपने स्वभाव से बागी कहलाने वाले गुजरात के दो चर्चित युवा हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी भी पहुंचे थे और ममता जी ने संक्षेप में हीं सही लेकिन मंच से बात रखने का मौक़ा दिया, और इन्हीं दोनों नौजवानों ने और इन दोनों नौजवानों ने अपनी बात अपने ढंग से रखी. 

हार्दिक पटेल ने एक नारा दिया-

सुभाष बाबू लड़े थें गोरों से 
हम मिलकर लड़ेंगे चोरों से 

जिग्नेश मेवानी के भाव का मुख्य अंश सरकार को सत्ता से बेदखल करने के साथ-साथ संविधान के मूल्यों की रक्षा करने से संबंधित एक संक्षिप्त पर मारक शब्दों वाली थी.

यशवंत सिन्हा : मैं कहना चाहता हूँ कि कश्मीर की समस्या गोली से नहीं बोली से हल होगी कभी आप प्यार से दो बोल, बोल कर देखे की कश्मीर में इसका क्या असर होता है. मै फकीर हूँ मुझे अब कुछ नहीं चाहिए मेरी आप लोगों से यही अपेक्षा है कि देश बचाओ बीजेपी के सामने विपक्ष का बस एक ब्यक्ति दो और इस गलीच सोच वाली सरकार को हराओ, उनका नारा था सबका साथ सबका विकास पर उन्होंने सबका साथ तो लिया पर सबका नाश किया.

अरुण शौरी : इन्होने तो सैनिकों के साथ धोखा किया राफेल में कितना बड़ा घोटाला हुआ आप सब के सामने है इन्होने सीबीआई, आरबीआई, ईडी समेत अन्य संस्थाओं को बर्बाद कर दिया, मोदी जी भी जानते है कि अब उनकी अपील नहीं रही इसलिए चुनाव जीतने के लिए मोदी किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं जो आज आप कर्नाटक में देख रहें हैं वो कल आप मध्य-प्रदेश में भी देखेंगे, मेरी अपील है आप सब विपक्ष के नेताओं से कि आप अपने अहम का त्याग करें और एक साथ मिलकर चुनाव लड़ें.

अभिषेक मनु सिंघवी : इस मंच पर २२ पार्टियों का इंद्र धनुष बना है जो सरकार को निश्चित हीं हराएगी और इस इन्द्र धनुषीय मंच का ये कर्तब्य है कि आप सब वोट बटने से रोकें क्योंकि वोट बटने का फायदा यू पी, हरियाणा, बंगाल, बिहार या अन्य राज्यों में बस एक पार्टी वो भी भाजपा को मिलता है.

शरद यादव : लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने का उनका मूल्य उद्देश्य है और साथ-साथ यादव जी नई नोटबंदी पर निशाना साधते हुए कहा की नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था कई साल पीछे चली गई.

ये कुछ वक्ताओं के शब्द इस महारैली से निकले हैं.      

ममता जी ने इस ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान में कल की रैली के माध्यम से एक बात तो दर्शा हीं दी है कि उनकी चमक अभी फीकी नहीं पड़ी है आज भी उतनी हीं चमकदार है जितनी आज के ५ साल पहले थी. यह वही ऐतिहासक मैदान हैं जिसमें ४१ साल पहले माकपा के ज्योति बसु जी ने रैली करके कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेकने का दम्भ भरा था और कांग्रेस को मूल समेत उखाड़ कर फेक दिया था और तीन दशक से ज्यादा ठसक के साथ अपनी सकता चलाई थी और उसी बासु की सरकार को हटाने का बिगुल ममता जी भी कभी इसी मैदान से फूंकी थी और उस सरकार को उखाड़ फेकने में सफलता हासिल की थी.

 इस रैली में उपस्थित लाखों की भीड़ के माध्यम से ममता जी का एक प्रयास था कि विपक्ष की एकजुटता दिखाई जाएँ जिसमें वो बहुत हद तक सफल भी रहीं है. विपक्ष के कुछ एक बड़े नेताओं जैसे राहुल गाँधी, मायावती जी को छोड़ दे तो सभी उपस्थित रहे और इस मंच के माध्यम से विपक्षी एकजुटता के नारे लगाए. इस महारैली का असर सत्ताधारी पार्टी पर साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है क्योकि रैली खत्म होने से पहले ही पत्रकार वार्ता करने लगे हैं 

Saturday, January 19, 2019

राजनीति की नई भाषा बीमारी पर गाली


बिपिन नंदलाल गिरि 

राजनीति में विचारों की जगह तो कोई बची नहीं परन्तु बिमारी की नाम पर अब गंदी टिप्पणियों ने जोर पकड़ लिया है अभी तक तो राजनेताओं और उनके परिवार वालों को हीं गाली दिया जाता था पर अब तो बीमार इंसान के बिमारी को भी निशाना बनाने जाने लगा है. कल कांग्रेस के राज्य सभा सांसद और वरिष्ठ नेता श्री बी के हरिप्रसाद ने सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह की (स्वाईन फ्लू) बीमारी को लेकर एक अत्यंत शर्मनाक बयान दिया जिसकी जितनी भी निंदा की जाय उतना कम है और मै उनके उस बयान की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ.

लेकिन ये ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि नेताओं ने अपनी भाषा की मर्यादा तोड़ी है मैं आपको 2000 और उसके आस-पास के सालों में लेकर चलता हूँ, जब कांग्रेस बिखरी थी और शरद पवार, तारिक अनवर, सुषमा स्वराज जैसे बड़े और बुद्धजीवी नेताओं ने सोनिया जी को विदेशी महिला, विदेशी है और छुटभैय्ये नेताओं ने ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जिसे मैं उल्लेखित नहीं कर सकता तो आप समझ हीं गए होंगे कि वो शब्द कितने अमर्यादित रहे होंगे, आज की (2019) विदेश मंत्री श्रीमती ने 2004 में तो यहां तक एलान कर दिया था कि अगर सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती है तो वो अपने सिर का बाल मुड़ा (गंजी) लेंगी, ये सब सोनिया जी के प्रति उन नेताओं का दुराग्रह और नफरत भरी सोच का नजरिया था.

वक्त धीरे-धीरे बिता 2004 में अटल जी की हार हुई और कांग्रेस की जीत हुई इसी सन्दर्भ में साल 2007 के चुनावी सभा में गुजरात के दंगों को लेकर मोदी जी तत्कालीन मुख्यमंत्री गुजरात पर निशाना साधते हुए उन्हें मौत का सौदागर कहा उसके बाद तो मानों बीजेपी हत्थे से उखड़ गयी और आज के प्रधानमंत्री और उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री ने सोनिया जी हीं नहीं वरन समस्त महिला जाति का अपमान किया और जब उन्होंने सोनिया जी (कांग्रेस अध्यक्ष) को जर्सी गाय और राहुल जी को बछड़ा कहा था इससे बड़ी घिनौनी और महिला विरोधी कोई और टिप्पणी नहीं हो सकती, उसी समय समझ में आ गया था कि राजनीति का अब निम्न स्तर आ चुका है और ये कब रूकेगा कुछ नहीं कह सकते.

कितनी बार प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के लोग श्रीमती सोनिया जी की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को लेकर खुले मंच से घिनौनी टिप्पणी की है, उस समय किसी भाजपाई बयान वीरों को मर्याद की याद नहीं आयी. चाहे गिरिराज सिंह हो, चाहे अश्विनी चौबे, संबित पात्रा, शुक्ला, अमित शाह जैसे सैकड़ों घटिया सोच और टिप्पणी करने वाले नेता हैं और इसी श्रेणी में कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर जैसे नेता भी शामिल हैं.

2012 में गुजरात के चुनाव के वक्त तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी को लेकर कहा था कि "वाह क्या गर्लफ्रेंड है, आपने कभी देखी है 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड.

उसी दिन ये समझ में आ गया था कि राजनीति में भाषाई मर्यादा अब अपने रसातल में जा चुकी है. इसका दूसरा फ्लू ये भी है कि नफरत की भाषा का जबाब नफरत की भाषा में देने का चलन अब बहुत तेजी से बढ़ चुका है, जिसे रोकना अब नामुमकिन सा है.   

Thursday, January 17, 2019

डोभाल के बेटे का काला कारनामा और "कैरवां" का सच

"कैरवां" ने इस घटना पर अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित (छापी) की है जिसमें ये बताया गया है कि कैसे विवेक की कम्पनी के कर्मचारी शौर्य डोभाल की कम्पनी के लिए भी कार्य करते हैं. इसमें इतना गड़बड़ झाला है कि चौकीदार के चौकीदारी की पर एक यक्ष प्रश्न खड़ा होने लगा है.

जैसे- जैसे लोकतंत्र का महापर्व लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे ही रोज कुछ चकित करने वाले खुलासे हो रहे हैं जिससे इस तथाकथित मजबूत सरकार के दावों की पोल खुलती जा रही है वो चाहे सीबीआई मामले में जस्टिस पटनायक की टिप्पणी हो या माननीय उच्चतम न्यायालय का सीबीआई के संबंध में सरकारी फैसला बदलना हो. अब इसमें सनसनी फैलाने वाला एक और नाम जुड़ रहा है जिसका नाम सुनकर निश्चित तौर पर आप चौंक जायेंगे ऐसा मेरा दावा है.

देश के सुरक्षा एजेंसी के सलाहकार अजित डोभाल (NSA) महोदय हैं जिन्हें चाटुकार पत्रकार और चाटुकार मंत्री जेम्स बांड का नाम देते है और इस तथाकथित जेम्स बांड के दो बेटे हैं जिनका नाम क्रमशः विवेक डोभाल और शौर्य डोभाल है जिसमें एक की नागरिकता इंग्लॅण्ड मूल की है और जिनका नाम विवेक डोभाल है जो सिंगापुर में रहते हैं और GNY ASIA FUND नामक एक फर्म के निदेशक है. आज से बरख्श दो साल पहले देश में ये शोर होता था कि डोभाल दाऊद को कॉलर पकड़कर घसीटते हुए बहुत हीं जल्द भारत लाने वाले हैं और "डी" कम्पनी को बर्बाद कर देंगे लेकिन किसे पता था कि "डी" डोभाल पुत्रों वाली हिन्दुस्तान में भी चल रही होगी। कैरवां नामक एक वेबसाइट ने दिलेरी दिखते हुए जज लाया पर दर्जनों रिपोर्ट छापी थी फिर उस पत्रिका, वेबसाइट पर क्या-क्या जुल्म हुआ हर किसी के सामने है. इस बार भी इसी पोर्टल ने हिन्दू-मुस्लिम डिबेट से दूर जाकर और चट्टान जैसा साहस दिखाते हुए भारतीय जेम्स बांड के पुत्रों के काले धंधे के कारनामों को उजागर करने का प्रयास किया है.

 कौशल श्रॉफ नामक एक खोजी पत्रकार ने अमेरिका, इंग्लैंड, सिंगापुर और केमैन आइलैंड से अनेक कठिनाइयों से गुजरकर दस्तावेज़ जुटाकर भारतीय  जेम्स बांड डोभाल के बेटों के काले धन को सफेद धन (फेयर एंड लवली) करने और हिन्दुस्तान के पैसे को विदेश भेजने के कारोबार का खुलासा कर दिया है जिससे अब हड़कंप सा मच गया है. इस काले धंधे को हेज फंड और ऑफशोर कंपनियों. के नाम से जाना जाता है. एक कमाल की घटना ठीक उस समय घटती है जब हमारा चौकीदार 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे जनता से 50 दिन मांग रहा था ठीक उसके (नोटबंदी)13 दिन बाद 21 नवंबर, 2016 को टैक्स चौरी करने वाले देशों में शामिल केमैन आइलैंड में विवेक डोभाल कंपनी खोलते हैं. 'कैरवां' के एडिटर विनोद होज़े ने ट्वीट किया है कि नोटबंदी के बाद विदेशी निवेश के तौर पर सबसे अधिक पैसा भारत में केमैन आइलैंड से आया था. 2017 में केमैन आइलैंड से आने वाले निवेश में 2,226 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी.

"कैरवां" कम्पनी को मै सलाम करता हूँ कि इस दरबारी और गोदी मीडिया के दौर में आपने उम्मीद के एक लौ तो जला हीं रखी है वर्ना नाम के मुख्यधारा के जो चैनल हैं उन्होंने तो हिन्दू-मुस्लिम और ठगबंधन-गठबंधन पर शोर मचाने के अलावा कोई और काम नहीं हैं. इन हिंदी चैनलों की पत्रकारों का जमीर मर चुका हो और आप जैसे हीं कुछ महान पोर्टल चलाने वालों से देश को उम्मीदें हैं. नोटबंदी तो एक घोटाला था ये पहले दिन से पता था पर इतना बड़ा था ये अब पता चल रहा है.







Tuesday, January 15, 2019

कुम्भ मेले में माँ गंगा की महत्ता


बिपिन नंदलाल गिरि 

आज से मकर संक्रांति के शुभ अवसर में जैसे हीं तेज के देवता सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया वैसे हीं ब्रम्ह मुहूर्त (भोर) में माँ गंगा में भक्तों के स्नान-ध्यान का सिलसिला शुरू हो गया जो अब तक अनवरत 4 मार्च (महा शिवरात्रि) तक चलता रहेगा और बीच-बीच में कई अत्यंत महत्वपूर्ण स्नान आएंगे जिनका अति-विशिस्ट महत्व होगा, माँ गंगा के बारे में हम हिन्दुओं की ये धारणा है कि माँ गंगा स्वर्ग लोक से उतरी हैं और धरती पर भगवान आशुतोष (शिव) की जटाओं (बाल का जुड़ा) से होते हुए आयी हैं और माँ गंगा पतित पावनी है कोई कितना भी पापी क्यों न हों वो अगर माँ के चरणों में अपने आपको समर्पित करके मैया में डूबकी लगा लेता है तो पतित  गंगा बिना देर लगाएं उसे माफ़ कर देती हैं और अपनी शरण में ले लेती है, हमारे वेद और पुराणों में माँ गंगा का बहुत उच्च स्थान है माँ गंगा के जल को वेदों में अमृत समान पवित्र माना गया है, गंगाजल पीने मात्र से हीं असंख्य रोगों का निवारण स्वतः हो जाता है. मै भी माँ गंगा में अटूट आस्था रखता हूँ और मुझे भी दो बार संगम पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है एक बार तो त्रिलोचन महादेव के मंदिर पर  संत आये थे जिनका नाम परम पूज्य श्री करुणानन्द सरस्वती था उन महाराज ने चौमास (सावन 2010) पूजा के दौरान संगम से पवित्र जल लाने का आदेश दिया था जिसका पालन करते हुए नन्हे अग्रहरि के अगुवाई में मैं उदयी चाचा, श्याम चाचा (बल्ली) और भी दो या तीन लोग जल लाने के लिए संगम गये थे और वहां से अमृत समान पवित्र जल लेकर आये थे.तीर्थों के राजा प्रयागराज में आप समस्त भक्तों का स्वागत है पतित पावनी माँ गंगा में पवित्र कुम्भ स्नान की शुरुआत हो चुकी है. अतः आप सब भक्त माँ गंगा में डूबकी लगाए, हमारा वेद कहता है कि जगत पावनी माँ गंगा में डूबकी लगाने मात्र से ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त हो जाता है.

बात आती है कुम्भ स्नान की तो ये भब्य परम्परा बहुत सदियों से यूं हीं अनवरत चली आ रही है. इतिहास में कुंभ के मेले का सबसे पुराना उल्लेख महाराजा हर्ष के समय का मिलता है, जिसको चीन के प्रसद्धि बौद्ध भिक्षु ह्रेनसान ने ईसा की सातवीं शताब्दी में आंखों देखी वर्णन का उल्लेख किया है। कुम्भ का संस्कृत शब्द कलश होता है और कहीं-कहीं सुनने को मिलता है कि कुम्भ की शुरुआत समुद्र मंथन के दौरान निकले हुए अमृत-कलश से हुयी थी. जब अमृत-कलश समुद्र से बाहर है तो देव और दानवों की लड़ाई में अमृत की कुछ बूँदें छलक कर चार जगहों पर गिरी थी:- गंगा नदी (प्रयाग, हरिद्वार), गोदावरी नदी (नासिक), क्षिप्रा नदी (उज्जैन)। सभी नदियों का संबंध गंगा से है। गोदावरी को गोमती गंगा के नाम से पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को भी उत्तरी गंगा के नाम से जानते हैं, यहां पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है.

ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के 2 श्लोकों के माध्यम इसे समझा जा सकता है.

      विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते
      उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते
      एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता
      गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये

शरीर की शुद्धि के लिए स्नान का कितना महत्व है यह हमारे शास्त्रों में वर्णित है. 4 प्रकार के स्नान होते हैं - भस्म स्नान, जल स्नान, मंत्र स्नान एवं गोरज स्नान.

      आग्नेयं भस्मना स्नानं सलिलेत तु वारुणम्।
      आपोहिष्टैति ब्राह्मम् व्याव्यम् गोरजं स्मृतम्।।

भस्म स्नान को अग्नि स्नान, जल से स्नान करने को वरुण स्नान, आपोहिष्टादि मंत्रों द्वारा किए गए स्नान को ब्रह्म स्नान तथा गोधूलि द्वारा किए गए स्नान को वायव्य स्नान कहा जाता है.

मान्यताओं के अनुसार 7 हजार धनुष हर वक्त माँ गंगा की रक्षा में लगे रहते हैं और देवताओं के राजा इन्द्र समूचे प्रयाग की रक्षा करते है. विष्णु जी आतंरिक प्रयाग मण्डल की रक्षा करते रहते हैं एंव अक्षयवट (जो की इसी कुम्भ मेले में श्रद्धालुओं को कई दशकों बाद खोला गया है) की रक्षा स्वयं उमापति करते है। प्रयागराज में एक माह तक सत्य, अहिंसा और ब्रहमचर्य के पालन का विश्व का सबसे बड़ा उदाहरण होता है जिससे इन कियाओं के दम पर मानव जाति को असीम उर्जा की प्राप्ति होती है. पृथ्वी की एक लाख बार प्रवीक्षण करने का फल कुंभ पर स्नान, दान आदि कर्म करने से प्राप्त होता है. इस कुम्भ में करोङो लोग आते है और स्नान, ध्यान, दान का लाभ उठाते है और हमारे धर्म का या कुदरत का करिश्मा कह सकते हैं कि करोड़ों-करोड़ लोग बिना किसी आमंत्रण की आते है और यहां सब माँ गंगा की भक्ति में भेद-भाव भूलकर लीन रहते हैं और अपने ईष्ट नाम का जाप करते रहते हैं.   

हर हर गंगे !!

Saturday, January 12, 2019

समाज में बढ़ती कट्टरता का दोष किसे दें


बिपिन नंदलाल गिरि 

दिन-ब-दिन देखा जा रहा है कि समाज में कट्टरता बढ़ती जा रही है उसके लिए हम किसे जिम्मेदार मानेंगे, क्या हमने कभी ऐसा सोचा था कि समाज में  फ़ैल जायेगा कि लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो हो जायेंगे ऐसा कभी नहीं सोचा तो क्यों नहीं सोचा एक वाजिब सवाल है जो उठना चाहिए कि हमारे से पहले वाली पीढ़ी के नेताओं ने जनप्रतिनिधियों ने ऐसा क्यों नहीं सोचा की हम अपने समाज को नफरत के इस जहर से कैसे दूर रखेंगे, आज हर बात पर उग्र तरिके से जबाब दिया जाता है चाहे वो अच्छी बात हीं क्यों हो उस पर भी समाज के कुछ तबके के लोग उग्रतापूर्वक जबाब देते हैं. पता नहीं क्या हो गया हमारे समाज को जो देखते हीं देखते अपने असल मूल से दूर चला गया इसके लिए हम सबकी जिम्मेदारी समान रूप से है.

मै हाल की कुछ अत्यंत ह्रदय विदारक घटनाओं की जिक्र यहाँ करना चाहता हूँ जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वो हमारे मूल समाज का हिस्सा कैसे बन गयी जैसे पहलू खान को गौ वंश के वध  मार देना, रोहित बेमुला का एक तरह का शैक्षणिक हत्या कर देना, नजीब को जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय से गायब हो जाना और आज दो साल से ज्यादा का वक्त लग चुका है उसका पता न चलना या केरल में वामपंथ समर्थकों में विद्यार्थी परिषद से जुड़ें लोगों की हत्या करवाना, कन्हैया कुमार को विद्यार्थी परिषद के दबाव के कारण देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करवाना ये सब घटनाएं समाज को बेचैन थी. फिर मेरा वही सवाल क्या हमारे अंदर बेचैनी हुई नहीं हुई उसका परिमार्जन ये हुआ कि इस तरह कृत्य करने वाली शक्तियों को शह मिलता गया और वे लोग इस कृत्य को न्यायोचित ठहराने में कोई कसर छोड़ी।

मैं इस स्तिथि के लिए मूलतः कांग्रेस विचारकों को दोष दूंगा न कि संघी विचारकों को मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूँ कि सर्व समाज, सर्व संभव सम्भाव की पोषक तो कांग्रेस हीं थी संघ और हिन्दू महासभा ने तो १९२५ में हीं अपने आप को एक धर्म हितैषी और एक धर्म विरोधी विचार रखते आयी थी तो आज मुझे उनके विचारों से हैरानी नहीं होती है क्यों कि नफरत फैलाना हीं तो उनका यूएसपी है जो वो वखूबी सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे है लेकिन मैं हतप्रभ तो कांग्रेस के विचारकों से हूँ जिन्होंने आजादी की मूल्यों की पूरी तरह से रक्षा नहीं नहीं की गाँधी जी की आदर्शों और विचारों की रक्षा नहीं की. इसलिए हम कांग्रेसी या देशवासियों को संघ और भाजपा द्वारा समाज में जहर फैलाने के लिए अधिक दोषी नहीं मान सकते अधिक दोषी तो वे लोग हैं जो सत्य, अहिंसा, सामजिक समरसता के पोषक रहे हैं.

हमारे गांव के बड़े-बुजुर्गों के द्वारा एक कहानी सुनाई जाती है कि मेरे पिता जी अंग्रेजों से लड़ाई लड़े थे, मेरे दादा जी (८८ वर्ष) बताते हैं कि एक बार नेहरू जी यहां आये थे, गाँधी जी बाजार रास्ते से गुजर रहे थे तो हम सब उन्हें देखने के लिए गए थे. आजादी बहुत जान और जवानी मिट्टी में मिलाने के बाद मिली थी पर आज को देख के बहुत दुःख होता है हर तरफ हिन्दू-मुस्लिम मार-काट देखकर, हर तरफ बेगारी फ़ैली है भ्रष्टाचार है, किसान इलाज के अभाव में मर रहा है.

क्या यही आजादी का सपना था हमारे आजादी के दीवानों का, शायद नहीं !    

Thursday, January 10, 2019

धरती का राजा किसान क्यों है बदहाल


बिपिन नंदलाल गिरि 

किसान धरती का राजा होता है और बिना उसकी मेहनत के कुछ भी संभव नहीं है मेरा मानना है कि किसान हीं जवान पैदा करता है जो जाकर सरहदों पर मुल्क की हिफाजत के खातिर को हर वक्त अपने आप वतन के न्यौछावर होने को तैयार रहता है, किसान हीं नेता देता है उसका इतिहास चाहे हम राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की बात करें, पटेल जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, नेहरू जी, , चौधरी चरण सिंह देवगौड़ा, मनमोहन सिंह जी हो इन सब नेताओं का निर्माण किसान ने हीं किया और भी जितने देश के माननीय प्रधानमंत्री रहें हैं सबका प्रेरणा स्रोत श्री किसान हीं रहें है इसमें को कोई दो राय नहीं है पता लगाने के लिए आप किसी भी प्रधानमंत्री से इस बात को पूछ सकते हैं और तीसरा और अंतिम महत्वपूर्ण कार्य जो किसान करते हैं वो ये है कि वो पूरे देश के लोगों का बिना जात-पात, धर्म, लिंग का विभेद किये सबके क्षुदा को अपनी कर्मठता के डीएम भरने का काम करते हैं. ऋषि परम्परा से काफी मिलती-जुलती हमारे किसान भाइयों की परम्परा और तपस्या होती है. जिस तरह ऋषि-मुनि धुप-ताप, आँधी, वर्षा के परवाह किये बिना अपने कार्य में लीन रहते है ठीक उसी प्रकार हमारे किसान देवता धूप-ताप, आंधी, वर्षा में बिना थके बिना रुके खेतों में खेती के कार्य हेतु समर्पित होते हैं और उनकी यह तपस्या बहुत हीं कठिन होती है पर उनके हौसले इनसे कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं. आज मैं भारत के उस विचार को आपके सामने रखूंगा जो किसानों के प्रति सबसे बड़ा नजरिया है और वह नजरिया हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (बापू) जी का है.

आजादी से पहले संगठित किसान आंदोलनों को चलाने वाले कुछ चुनिंदा लोगों में से एक प्रोफ़ेसर एन जी रंगा स्वयं एक किसान के पुत्र थे और किसानी की बहुत सी बातों की समझ रखते थे. रंगा साहब गाँधी जी के विचारों से बहुत प्रभावित थे. वे गाँधी जी से किसानो के समस्याओं को लेकर अनेक सवाल करते थे कई बार तो पहले से ही सवालों की सूची बनाकर बापू को दे देते थे. 1944 में जब बापू जेल से रिहा हुए तो रंगा जी बापू से मिलने पहुंचे और उनके सामने पहला हीं सवाल बहुत तीखा पूछा था.

‘आप कहते हैं कि न्याय की दृष्टि से धरती किसानों की है या होनी चाहिए. लेकिन इसका अर्थ केवल अपनी जोत की ज़मीन पर नियंत्रण होना है या जिस राज्य में वह रहता है उस पर उसे राजनीतिक सत्ता प्राप्त होना भी है? क्योंकि यदि किसानों के पास केवल ज़मीन होगी और राजनीतिक सत्ता नहीं होगी, तो उनकी स्थिति उतनी ही खराब होगी जितनी सोवियत रूस में है. वहां राजनीतिक सत्ता पर तो सर्वहारा की तानाशाही ने अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया, लेकिन भूमि के सामूहिकीकरण के नाम पर किसान ज़मीन पर अपने अधिकार से हाथ धो बैठे?’ (शब्दशः अनुवादित)

गांधीजी ने जवाब दिया - ‘मुझे पता नहीं कि सोवियत रूस में क्या हुआ है. लेकिन मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि यदि हमारे यहां लोकतांत्रिक स्वराज्य हुआ; और अहिंसक तरीकों से आज़ादी हासिल करने पर ऐसा होगा ही, तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ ही हर किस्म की सत्ता होनी ही चाहिए.’ (शब्दशः अनुवादित)

नवम्बर 1947 का वो साल था जब महात्मा गाँधी जी को किसी अनजान ये चिट्ठी लिखा और उसमें लिखा थी कि हमारी कबिंनेट में कम से कम एक किसान जरूर होना चाहिए। इसके जबाब में 26 नवम्बर 1947 को अपने प्रार्थना सभा में गाँधी जी कहते हैं कि - ‘हमारे दुर्भाग्य से हमारा एक भी मंत्री किसान नहीं है. सरदार (पटेल) जन्म से तो किसान हैं, खेती के बारे में समझ रखते हैं, मगर उनका पेशा बैरिस्टरी का था. जवाहरलालजी विद्वान हैं, बड़े लेखक हैं, मगर वे खेती के बारे में क्या समझें! हमारे देश में 80 फीसदी से ज्यादा जनता किसान है. सच्चे प्रजातंत्र में हमारे यहां राज किसानों का होना चाहिए. उन्हें बैरिस्टर बनने की जरूरत नहीं. अच्छे किसान बनना, उपज बढ़ाना, ज़मीन को कैसे ताज़ी रखना, यह सब जानना उनका काम है. ऐसे योग्य किसान होंगे तो मैं जवाहरलालजी ने कहूंगा कि आप उनके सेक्रेटरी बन जाइये. हमारा किसान-मंत्री महलों में नहीं रहेगा. वह तो मिट्टी के घर में रहेगा, दिनभर खेतों में काम करेगा, तभी योग्य किसानों का राज हो सकता है.’ ऐसा नहीं है कि गाँधी जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में किसान की बात की हो 5 दिसंबर 1929 में "यंग इंडिया" में भी किसानों की बात की थी.

 लेकिन दुःख की बात ये है कि आज 100 साल बाद भी वहीं के वहीं अटके हुए हैं और उन्हीं सवालों से हमारे आज के किसान जूझ रहें हैं जिनसे आज के 100 पहले भी जूझते रहे हैं हम उन्हें जो भी दे देते हैं वो उनके अनुपात के हिसाब से नहीं होता और जो पहुँचता है तो वो सब तहस-नहस होने के बाद पहुँचता है और फसल मुआवले के नाम पर तो मानो उनके सम्मान के साथ के साथ मजाक किया जाता है कुछ जगहों पर तो किसानो को कुछ पैसे चाँद रूपये जैसे 2 रुपया, 70 रुपया, 500 रुपया देकर सरकारी मदद के नाम पर उनका माखौल उदय जाता है. अनेक योजनाएं किसानो के लिए बनाई जाती है पर वो खेतों में नहीं उतरती वो उतरती है तो राजनेताओं की तरह पूजीपतियों की गोद में. उदाहरण के तौर पर हम आज की सरकार की एक किसानी योजना "फसल बीमा" की बात बताता हूँ  समूची फसल जिसकी लागत (गेहूं) 15000-17000 हैं वो किसी प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गयी तो बीमा के लिए पैसा भरने के बावजूद लागत नहीं निकल पा रही है और किसान को इसके आधे का और कहीं-कहीं तो आधे से भी ज्यादे का नुक्सान उठाना पड़ रहा है तो किसान आत्महत्या के सिवाय और क्या करेगा।

किसानो की हालत सुधारने के लिए एक अचूक उपाय यह है कि हर ग्राम सभा के अंदर एक कोल्ड स्टोरेज और खाद्य भंडारण की ब्यवस्था कर दी जाये जिसमें किसान अपने फसल, फल, टमाटर, मिर्च, मटर, केले का उचित भंडारण कर सके और जरूरत के हिसाब से उसे बाजार के हवाले कर सके इससे किसान को उसके मनमाफिक दाम मिलेगा और उसके घर में भी खुशियों का अम्बार लग जायेगा और फिर कोई किसान जान देने की नहीं सोचेगा। 

जय किसान      

Wednesday, January 9, 2019

सीबीआई और सवर्ण आरक्षण पर फैसला

कल सड़क से लेकर संसद तक सवर्ण आरक्षण बिल को लेकर लोगों की नजरें कौतूहल बस देख रही थी ये तो सबको पता था कि इस बिल का विरोध करने की स्तिथि में कोई भी दल नहीं है अथवा यह बिल लोकसभा से पास होना पक्का है पर इस पर होने वाली बहस पर लोगों की नजरें थी. तो आज मैं अपनी बात कम लिखूंगा और कुछ वक्ताओं की बात को मै रकने की कोशिश करूंगा सन्दर्भ वही होगा शब्द इधर-उधर हो सकते हैं -

लोक सभा के प्रमुख वक्ता -    

सरकार की तरफ से आरक्षण पर बात जेटली जी ने रखा और उन्होंने इस बिल के तमाम खूबियों को गिनाया और विपक्ष पर तंज कसने से भी नहीं चुके लेकिन सब मिला-जुलाकर भाषा और शैली शालीन रही.

K H Muniyappa  शिवसेना से आरक्षण पर बोलते हुए जीएसटी और नोटबंदी का भी जिक्र करते हुए आरक्षण पर अपनी बात रखी और लाभ लेने के लिए गलत प्रमाण-पत्र का प्रयोग करते है उनको कैसे रोकेंगे ये सरकार तय करे.  

कांग्रेस की तरफ से क थामस और दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने बहुत हीं प्रभावी तरिके से अपनी बात रखी और इस बिल को चुराने का भी आरोप लगते हुए कहा कि हमारी हरियाणा की सरकार ने २०१३ में हीं इस बिल को पारित किया था जो कोर्ट से भी अपने मूल रूप में बहाल होकर निकला उसी की कॉपी आपने पिछले साल गुजरात में की और आज फिर संसद में कर रहें है.

असद्दुद्दीन ओवैशी ने अपनी पार्टी की तरफ से वबहुत शानदार पक्ष रखते हुए इस बिल का विरोध किया और कहा कि आप किस आयोग की सिफारिश पर ये बिल लेकर आएं है उस आयोग की रिपोर्ट को संसद पटल पर रखें क्या दलितों जितना दुःख-दर्द सवर्णों ने झेला है उनके घरों को दलितों द्वारा नुक्सान किया गया है अगर नहीं तो आप कैसे आरक्षण की ब्यवस्था क्र सकते हो.                    

 राज्य सभा के प्रमुख वक्ता -

आनंद शर्मा ने कहा कि संविधान संशोधन से गरीब का पेट नहीं भरेगा, उसको न्याय नहीं मिलेगा. उन्होंने कहा कि किसान के लिए, नौजवान के लिए जो वादे किए थे, उनका क्या हाल हो रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार को जल्दी दिखानी थी तो महिला आरक्षण बिल पर दिखाते, क्यों सरकार चार साल बाद भी यह बिल लेकर नहीं आई. राजनीति के लिए आप तीन तलाक बिल लाए लेकिन बाकी महिलाओं को न्याय कब मिलेगा. उन्होंने कहा जनता एक बार वादों में बहक जाती है लेकिन बाद में हिसाब जरूर मांगती है लेकिन अब तो आपका हिसाब देने का वक्त है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस बिल की पक्षधर है क्योंकि हमने सामाजिक न्याय और खासकर अगड़ी जातियों के लिए न्याय की आवाज उठाई थी. हम इस बिल का समर्थन करते हैं. (Copy)

सपा सांसद प्रोफेसर राम गोपाल यादव अच्छा सवाल उठा रहे आंकड़ों के साथ सरकार को घेर रहें है और कह रहे हैं कि सचिव से लेकर उपसचिव और क्लास अ क्लास बी क्लास स के श्रेणी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जाती का कोटा भी पूरा नहीं हुआ है और ऊपर की दो श्रेणियों में पिछड़ा वर्ग जो सर्वाधिक संख्या में हैं वो तो शून्य हैं अनुसूचित जाति का उचित प्रतिनिधित्व श्रेणी ग में जरूर पूरी है उसके बाद सब अधूरा।

पिछड़ा वर्ग के लोगों को ५४ % आरक्षण की ब्यवस्था सरकार करें और अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों की आबादी ३५ % है तो उन्हें उतना आरक्षण मिलना चाहिए ये इस लिए कह रहा हूँ कि जब आप ५० % को पार कर चुके हैं तो इसे भी कर हीं दें. रामगोपाल जी ने उड़ीसा का जिक्र भी किया कि उड़ीसा में ४० % अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग है और मात्र ६ % सवर्ण हैं और सवर्णों को ५० % आरक्षण मिल रहा है और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोगों को मात्र २२.५ % तो आपके माध्यम से मैं कानून मंत्री से आग्रह करूंगा कि वो उड़ीसा के लोगों के साथ न्याय करें और उनकी हिस्सेदारी की अनुरूप उन्हें आरक्षण दें. 
यह ऐतिहासिक बिल संभवतः आज ९ जनवरी २०१९ को राजयसभा से पास होकर एक कानून की शक्ल ले लेगा और जहां तक मेरा अनुमान है इसे न्यायिक समीक्षा से गुजरना पड़ेगा 

सीबीआई पर सुप्रीम कोर्ट से दिन की दूसरी बड़ी खबर-  

आज हीं सीबीआई पर एक फैसला आया जो सरकार के लिए एक बहुत बड़ा झटका था वो ये था कि सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को केंद्र सरकार ने जबरन छुट्टी पर भेज दिया था जिसे आज ७६ दिन बाद कुछ शर्तों के साथ वर्मा को उनके पद पर पुनः बहाल कर दिया है यह खबर ८ जनवरी को दोपहर से पहले हीं आ गयी थी और इसकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई, जस्टिस कौल समेत तीन जजों की बेंच के सामने था जिस पर जस्टिस कौल ने मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति में सर्वसम्मति का फैसला सुनाया।
    

Tuesday, January 8, 2019

खबरों का दिन सोमवार,सवर्णों को लालीपाप


बिपिन नंदलाल गिरि 

8 करोड़ कमाने वाले गरीब सवर्ण- 

इस चुनावी मौसम में दिन की जो पहली खबर आयी वो भी बहुत बड़ी थी क्योंकि मंडल-कमण्डल के बाद पहली बार देश के स्तर पर आरक्षण की बात दस्तक दी हुआ ये कि कल दोपहर में भारत सरकार की तरफ से एक नोटिफिकेशन निकला कि गरीब सवर्णों को भी अब 10 % आरक्षण मिलेगा पर इसके दायरे में 8 लाख सालाना इनकम वाला गरीब आएगा, 5 एकड़ जमीन का मालिक भी आएगा शहर में 100 गज और गाँव में 200 गज तक के मकान का गरीब भी आएगा मै तो साहेब से अनुरोध करता हूँ कि अब आप और ज्यादा गरीबी का मजाक मत उड़ाओ और गरीबी की परिभाषा भी लगे हाथ बदल हीं डालों और रही बात 10 % वाली तो ये एक चुनावी जुमला है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले हीं कह रखा है कि 50 % से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता ये बात अलग है बहरहाल मैं आप को इसकी दूसरी तस्वीर दिखता हूँ 10 % आरक्षण देने के लिए संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में बदलाव करना पड़ेगा इसके लिए संविधान संशोधन लाया जाएगा और संविधान की धारा 15-16 में बदलाव होगा. धारा 15 के तहत शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिलेगा. धारा 16 के अंतर्गत रोजगार में आरक्षण मिलेगा. उसे संसद से पास करवा कर संवैधानिक कानून का दर्जा देना होगा जो आज संसद में 12 बजे पेश होगा पर मुझे नहीं लगता कि सरकार के लिए आसान है, सरकार तो अब पूरी तरह चुनाव मोड में आ चुकी है वो दो करोड़ रोजगार दिए नहीं, राम मंदिर बनवाएं नहीं तो एक राजनितिक लॉलीपॉप तो जनता को देना बनता हीं था जो दे भी दिया लेकिन सरकार की राह संसद में कठिन है क्योंकि हर राजनितिक पार्टियों का अपना एक निश्चित वोट सुरक्षित है तो वो क्यों पास होने देंगी और रही बात बीजेपी की तो उसे हीं इस बिल की जरूरत है क्योंकि दो साल पहले तक बीजेपी को सवर्णों की पार्टी कहा जाता था और जब से इन्होने एस सी / एस टी एक्ट पर अध्यादेश लेकर आये और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा तब से इनकी छवि सवर्णों के बीच में टूटने सी लगी थी उसी से खुद को बचाने के लिए इस तरह का एक स्टंट किया गया है. जो लोग आरक्षण को लेकर बाबा साहब अम्बेडकर की आलोचना करते रहते थे और उन्हें भला-बुरा  कहते थे वैसे लोग अब कुछ कहेंगे या उनकी जुबान में टाँके लग जायेंगे.

एक बात और गौर करने वाली है कि जो संघ, बीजेपी आरक्षण ब्यवस्था के खिलाफ कई बार मुखर तो कई बार दबे स्वर में आलोचना करती है वो इस बिल को संसद में किस नैतिक हक से लाना चाह रही है यही सब सवाल उठेंगे और तब बीजेपी को इनका जबाब देना भारी पड़ जायेगा इस बिल का एक असर ये भी हो सकता है कि पिछड़ी और अन्य जातियाँ इसके खिलाफ गोलबंद हो जाये और सत्ताधारी पार्टी के लिए ज्यादा मुश्किल खड़ी हो जाये और इसी की संभावना मुझे ज्यादा दिखाई दे रही है क्योंकि इस बार चुनाव जातियों का होगा न कि 2014 की भांति जात-पात से ऊपर उठकर, इसलिए पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति इकठ्ठा भी हो सकती है अब परसेप्शन की लड़ाई जो जीतेगा वही आगामी आम चुनाव भी जीतेगा ये करीब-करीब तय हैं. ये देखने की बात है और चुनाव बाद इस बात का विश्लेषण चुनावी पंडितों द्वारा जरूर किया जायेगा.     

दूसरी अति महत्वपूर्ण खबर-

कल के दिन देशवासियों के सामने दो बहुत चौकाने वाली घटनाएं घटित हुई पहली ये थी कि बी चन्द्रकला नामक एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के ऊपर दो दिन पहले सीबीआई का छापा पड़ा वो भी उनके 2012 कार्यकाल को लेकर और सत्ता पक्ष की तरफ से इसमें तब के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव का नाम भी जोड़ा गया क्योंकि उस वक्त अखिलेश यादव के पास खनन मंत्रालय का प्रभार था. वक्त ये था कि अखिलेश को शायद सीबीआई समन करने वाली थी उसके बाद जो हुआ वो दो दशक का सबसे विहंगम दृश्य था. राज्य सभा में सीबीआई और अखिलेश के मुद्दे पर खूब शोर-शराबा हुआ फिर संसद के बाहर हीं समाजवादी पार्टी के महासचिव श्री राम गोपाल यादव द्वारा एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया और ये दो दशक का सबसे विहंगम दृश्य यही अवतरित हुआ जब सपा के प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव और बसपा के मायावती जी के बहुत करीबी श्री सतीश चंद्र मिश्रा जी दोनों मिलकर पत्रकार वार्ता को सम्बोधित किये और अपनी तरफ से मिश्रा जी ने अखिलेश का खूब बचाव किया और उन्हें राजीनीति का शिकार बताया और आश्वासन दिया कि बसपा हमेशा अखिलेश यादव के साथ है थोड़ी देर बाद एक और बड़ी खबर आयी कि मायावती जी ने फ़ोन पर अखिलेश से बात की और उन्हें हिम्मत न हारने की सलाह देते हुए कहीं कि मैं आपके साथ हूँ मतलब बुआ-बबुआ साथ-साथ है और इस बात की पुष्टि करने के लिए मायावती जी ने एक प्रेस नोट जारी किया.


Monday, January 7, 2019

किसान का भाग्य प्रकृति के हाथ


बिपिन नंदलाल गिरि 

आज-कल किसान शब्द का बहुत बोल-बाला है आप लोग दो-चार दिन में किसी न किसी नेता से किसान शब्द सुन हीं लेते होंगे जी हाँ मैं उसी किसान, धरती-पुत्र की बात कर रहा हूँ जो आज-कल सबकी जबान पर चढ़ा हुआ है पर दिल में किसने बसाया है ये न तो किसान को पता है न हीं उन्हें स्वयं को (उन्हें से मतलब किसान-किसान चिल्लाने वाले नेताओं से है). किसान तो इस धरती का वह असहाय जीव बन गया है जिसे हाथ-पैर, दिल में धड़कन और सोचने के लिए दिमाग तो हैं पर अब वो उसके किसी काम के लिए नहीं रहा. किसान की ऐसी दुर्दशा हो चली है कि उम्र के अंतिम पड़ाव में उसकी सगी अपनी औलाद भी साथ छोड़ देती है और छोड़ती क्यों है उसका भी कुछ वाजिब और कुछ गैर-वाजिब कारण है वाजिब कारण ये है कि उस किसान के पास इतना धन (पैसा) नहीं होता कि उसके बच्चे उसकी सेहत का सही ढंग से ख्याल रख सकें और अगर उस किसान का बेटा किसी शहर में रोजी-रोजगार के लिए चला गया हो तो उसे भी वहां मेहनत के बराबर मजदूरी नहीं मिलती है और रही सही कसर सरकारों की गलत नितियाँ जैसे नोटबंदी, जीएसटी, शहरी करण को बढ़ावा ये उसे और तोड़ देती है. किसानों के नाम पर समय-समय पर कुछ न कुछ घोषणाएं करके ठगा गया है वो चाहे MSP हो या मंडी, समिति, फसलों का उचित मूल्य दिलाने का वादा. इनमें से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तो भ्र्ष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण है CSDS के आकड़ों के अनुसार बीमा कंपनियों ने लगभग 32% से ज्यादा शुद्ध लाभ इस योजना से कमाया है.   

2014-2015 के साल में सूखा बहुत पड़ा था पर केंद्र सरकार ने उससे निपटने का सही तरीका नहीं सुझाया था उलटे जब वो चुनाव प्रचार में गए थे तो किसान के हित में बहुत बड़े-बड़े वादे किये थे. अभी दो दिन पहले एक किसान प्रदीप शर्मा गाँव बरौली अहीर आगरा के रहने वाले हैं उनकी एक ऐसी रिपोर्ट आयी है कि ब्यवस्था को शर्म आ जाये अगर शर्म न आये तो ये मान लेना चाहिए कि शासन की आँखों का पानी मर चूका है दरअसल बात ऐसी है कि किसान ने धुप, वर्षा, ठंडी सह करके आलू की खेती पूरे लगन से की और 19 टन का बम्पर पैदावार अपना खून-पसीना एक कर के किया यहां तक उस किसान का फर्ज था उसने उसे पूरा किया पर इसके बाद अब शासन का अहम किरदार आता है उसने आलू की ढुलाई करवाई, कोल्ड स्टोरेज में रखा और जब उसे बाजार में बेचने के बाद वो अपने सारे खर्चों को जोड़ता है तो उसे मात्र 490 रूपये का मुनाफा होता है. अब आप पाठक हीं बताएं कि क्या उसके इतने महीनों के मेहनत की कमाई बचत मात्र 490 रूपये की होनी चाहिए मेरे ख्याल से नहीं, अब ऐसे में किसान अपनी जान नहीं देगा तो और क्या करेगा.

किसानों को घोषणाओं के नाम पर ठगना- 
  • मंडियों में किसानों के जींस को खरीदने का वादा तो किया जाता है पर खरीदने में काफी हिला-हवाली की जाती है. मंडियों में किसानों के अनाज तीन-चार दिन बाद जब नहीं बिकता था तो किसान औने-पौने दाम में घाटे के साथ अपनी फसल को बेच कर आ जाता है. जिसकी वजह से उसे बहुत नुकसान होता था.
  • एक घोषणा मृदा (मिट्टी) की जांच के लिए हुई थी पर कितने किसानों तक पहुंची वो कोई नहीं बता सकता है.
  • किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ सिर्फ बड़े और रसूखदार किसानों को हीं मिलता है. 
  • फसल बीमा के नाम पर झुनझुना पकड़ा देना पर फसल नष्ट होने के बाद मुआवजा न मिलना. 
किसान अपनी खेती के लिए हर वो जतन करता है जो वह अपनी प्यारी संन्तान के लिए करता है क्योंकि किसान जानता है कि खेती और संतान दोनों उसका भविष्य है खेती से कल सबका पेट भरेगा और संतान से कल सुख मिलेगा परन्तु हकीकत में ये दोनों अब किसान से दूर होते जा रहे है रही बात खेती की तो वो भगवान के सहारे ज्यादा रह गयी है नेताओं के सहारे कम. किसान को न तो समय पर खाद-बीज सरकारें उपलब्ध करवा पा रहीं है न तो खेतों को सिंचाई के लिए पानी, जहां नहर की ब्यवस्था है वहां भी सिंचाई के लिए पानी का जबरदस्त किल्लत है कई बार तो फसल सूख जाने के बाद नहर में पानी आता है जब फसल ही सूख कर नष्ट हो गयी तो अब पानी का किसान क्या करेगा।

मैं खुद एक किसान हूँ और इन लिखी हुई बातों में मेरे अपने अहसास भी हैं जो करोङों लोगों के है आज भी देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती पर आश्रित है पर खेती में लाभ के लिए कोई तय कार्यक्रम नहीं है वहीं उल्टे दूसरी   तरफ 1 प्रतिशत पूँजी-पतियों के लिए कुबेर का खजाना चौबीसों घंटा खुला हुआ है और ब्यवस्था इस इन्तजार में बैठी रहती है कि कब कोई अडानी, अम्बानी, मेहुल, माल्या आएं और दान लेकर जाये वही दूसरी तरफ किसानों के कुछ हजार रूपये माफ़ हो जाये तो देश की अर्थ-ब्यवस्था की दुहाई का उपदेश देने वाले हजारों लोग आ जाते है किसान की बैठा आज हिमालय सी हो गयी है और वो अब असहनीय पीड़ा में जीने को मजबूर है .........

धरती-पुत्र की एक पुकार
कर्जमुक्त करो सरकार    


खेत में खलिहान में 
धुप औ बरसात में 
जो अडिग स्थिर रहे 
भयभीत ना हो ताप से 
जो डरता नहीं है काल से 
जीता है नित अभिमान से  
करता रहें नित्य कर्म जो 
वसुधा का है लाल वो 
है हिन्द का अभिमान वो 
रहता जो मकरंद हो
बहता नदी सा रक्त हो  
विचलित तनिक ना शांत हो 
निज आप परअभिमान हो
ऐसा धरा का लाल हो 
वो हिन्द की औलाद हो 
किसान की औलाद हो 

"बिपिन गिरि"



Friday, January 4, 2019

साल के अंत तक फर्श से अर्श तक राहुल गाँधी का सफर


हम बात आज बात कर रहें हैं भारत की सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी  कांग्रेस की वैसे तो कांग्रेस दो दिन पहले हीं अपना 134 वां स्थापना दिवस मनाई है. इसमें कोई शक किसी को भी नहीं है कि कांग्रेस पार्टी ने देश के लिए अतुलनीय योगदान दिया चाहे वो आजादी के पहले हो या आजादी के बाद कांग्रेस ने लोगों की भरपूर सेवा की है. कांग्रेस ने देश को एक से बढ़कर एक विश्व विख्यात अंतर्राष्ट्रीय नेता दिए है जिनके नाम लिखना शुरू करूंगा  तो वक्त कम पड़ जायेगा परन्तु कुछ नाम लिखने की चेष्टा कर रहा हूँ. दादा भाई नैरोबी, महात्मा गाँधी, गफ्फार खां (सीमान्त गाँधी), पंडित जवाहर लाल नेहरू, पंडित मोतीलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृपलानी जी, रविंद्र नाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, मनमोहन सिंह, नरसिंहा रॉव, सोनिया गाँधी, केशरी नाथ त्रिपाठी, वी वी गिरि, प्रणव मुखर्जी जैसे असंख्य नेता आजादी के पहले और आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी से जुड़ें रहे है और कांग्रेस के विचार स्वरूप जनता की अथक सेवा में लगे रहें।

ये तो रहा कांग्रेस का सुनहरा इतिहास परन्तु 2013 में जब से राहुल गाँधी ने उपाध्यक्ष की हैसियत से पार्टी की बागडोर संभाली थी उस वक्त कांग्रेस पार्टी में घोर निराशा का दौर था क्योंकि तत्कालीन मनमोहन सरकार पर हर तरफ से भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे और सरकार इस तरह के आरोपों से बुरी तरह घिर चूक थी. 2014 लोकसभा का चुनाव मेरे ख्याल से कांग्रेस का अब तक का सबसे बुरा चुनाव होने वाला है उनके नेताओं को पहले हीं पता चल चूका था क्योंकि कांग्रेस की सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे पी चिदंबरम ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था उनकी तरह और भी बहुत से नेता थे जिन्होंने चुनाव नहीं लड़ा और जो भी कद्दावर और वरिष्ठ नेता चुनाव लड़ें लगभग सभी हार गए थे. पर राहुल गाँधी ने आधे-अधूरे मन से चुनाव से ठीक पहले जिम्मेदारी संभाली भी पर परिणाम वैसा हीं निकला जैसा अपेक्षित था. कांग्रेस ने अपने पूरे इतिहास का सबसे बुरा प्रदर्शन किया और मात्र 44 सीट पर सिमट गयी आप सोच सकते हैं कि कैसी सुनामी रही होगी जो पार्टी 2009 में 204 सीट जीती थी वो 44 पर चुकी थी. चुनाव के बाद कांग्रेस नेतृत्व पर उंगलियां उतनी शुरू हो गयी परन्तु पार्टी के अंदर किसी में ऐसी हिम्मत नहीं थी कि राहुल के खिलाफ कोई कुछ बोल सके. इस तरिके से कांग्रेस पार्टी कमजोर होती गयी और दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड समेत कई महत्वपूर्ण राज्य कांग्रेस के हाथ से रेत की तरह फिसलते गए और राहुल गाँधी तथा कांग्रेसी नेता बस देखते रहें उन्होंने कुछ किया कुछ करने की कोशिश की क्योकि इसके लिए कहीं कहीं राहुल गाँधी स्वयं जिम्मेदार थे क्योंकि हर चुनाव में मिली हार के बाद वो छुट्टियां मनाने विदेश चले जाया करते थे जिससे पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं का दिल टूट जाता था और मीडिया में भी राहुल गाँधी का बहुत मजाक बनाया जाता था और उस दौर में राहुल गाँधी पार्टी पर एक तरह से बोझ लगने लगे थे ऐसा आरोप लगाकर कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ और कद्दावर नेता पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए जो भाजपा की सरकार बनवाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जैसे पूर्वी भारत में असम से हेमंत विश्व शर्मा निकले और कांग्रेस को पूर्वोत्तर मुक्त कर दिया। इतना सब हो रहा था फिर भी राहुल खामोश थे राजनितिक पंडितों को ये अंदाजा लगाना मुश्किल था कि राहुल गाँधी के विचार में चल क्या रहा है इसी बीच भाजपा मोदी का एक जुमला "कांग्रेस मुक्त भारत" अपने पूरे शबाब पर था हो भी क्यू ना वो एक के बाद एक राज्य कांग्रेस से छींनते जा रहे थे तो उनका उत्साह स्वाभाविक था. इधर राहुल गाँधी भयानक हताशा के दौर से गुजर रहे थे लेकिन अंदर हीं अंदर उन्होंने युवाओं और वरिष्ठ नेताओ का एक बेहतरीन समायोजन बना लिया था जो कि बाहर किसी को पता भी नहीं चल सका उनकी इस टीम में बहुत हीं अनुभवी नेता और राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत, अहमद पटेल, सिध्दरमैय्या, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैप्टन अमरिंदर सिंह, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी, रणदीप सिंह सुरजेवाला, राज बब्बर, सुष्मिता देव, संजय निरूपम, प्रियंका चतुर्वेदी, पवन खेड़ा, शक्ति सिंह गोहिल, प्रमोद तिवारी, अखिलेश सिंह जैसे ऊर्जावान कार्यकर्ताओं का एक पैनल बना लिया जिसमें किसी भी परिस्थिति से निपटने का कुशल माद्दा था. उसी समय 2017 में अंत में 4 राज्यों में चुनाव होने वाला था जिसमें से एक प्रधानमंत्री का गृह राज्य गुजरात भी था और तब तक अशोक गहलोत जिनकी जमीन पर अच्छी पकड़ मानी जाती है उन्हें पार्टी का नंबर दो यानी संगठन महासचिव बना दिया गया था और चुनाव के तीन महीने पहले तक कांग्रेस जिस गुजरात चुनाव को बुरी तरह हार रही थी और गहलोत के कौशल और राहुल गाँधी के मेहनत  की वजह से एक कड़े मुकाबले में गयी. गहलोत ने वहां तीन आंदोलनकारी युवा हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर को लगभग अपने पक्ष में कर लिया और तो और अल्पेश ठाकोर को कांग्रेस पार्टी में भी शामिल करा लिया। यहां पर एक अच्छा चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस को हार तो हुई पर मोदी और उनकी टीम के पसीने छूट चुके थे  इसके बाद तो राहुल गाँधी और कांग्रेस के नेताओं में चमत्कारिक परिवर्तन देखने को मिला. और गुजरात चुनाव के बाद 11 दिसंबर 2017 को दिल्ली में एक प्लेनरी सेशन बुला कर राहुल गाँधी को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया. इसके बाद अप्रैल, मई के महीनों में कुछ राज्यों में चुनाव हुआ जिसमें राहुल ने खूब पसीना बहाया और मंदिर-मस्जिद की दौड़ भी खूब लगाई इसी चुनाव में कर्नाटक भी था जहां कांग्रेस को अपने एक मात्र बड़े जनाधार वाले राज्य को बचाने की थी सो मेहनत भी खूब किया वहां पर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी उसे 104, कांग्रेस 79 और जेडीएस को 38 सीट मिली थी तो वहां भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने तत्काल अपने नेताओं से बात करके जेडीएस को समर्थन देने का एलान कर दिया और ये भी कहा कि जेडीएस के नेतृत्व में सरकार का गठन किया जायेगा जिसकी पहली बार मीडिया और अन्य राजनितिक विश्लेषकों ने दिल खोलकर प्रसंशा की. इस चुनाव के बाद राहुल कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकल गये उस पर भी काफी विवाद हुआ पर अब रहल गाँधी पूरी तरह से बदल चुके थे उन्हें जनता के मुद्दे को समझने और उठाने की अच्छी समझ हो चुकी थी फिर अपनी इसी टीम के साथ उन्होंने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान (भाजपा सरकार), तेलंगाना (टीआरएस), मिजोरम (कांग्रेस) पर अपना पूरा जोर लगाया और मुद्दों के साथ जमीन पर उतरे और जनता तक अपनी बात पहुंचते रहें जिसे जनता ने अब और भी गंभीरता से उनकी बातों को सुनना शुरू कर दिया था और उसका उदहारण उनकी रैलियों में देखने को मिलने लगा जिससे उनमें गजब के उत्साह का संचार हुआ जो सोये हुए कार्यकर्ताओं को एक झटकी में हीं जगा दिया और लोगों को घरो से नकल कर सड़कों पर संघर्ष करने के लिए उतार दिया और उसका परिणाम अंततः सुखद निकला। कांग्रेस ने बीजेपी शासित तीनों राज्यों को जीत लिया और वहां अर्से बाद कांग्रेस का झंडा बुलंद हुआ और राहुल गाँधी को एक हीं देश के पटल पर विपक्ष के एक बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया और अब मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का जुमला भी काफूर बन गया.      


राहुल के अर्श से फर्श तक की ये कहानी बहुत कठिन रही है, आप पाठकों से अनुरोध है कि मेरे जुबान से राहुल की राजनितिक कठिनाइयों का सही से वर्णन किया गया है तो आप लोग शेयर और कमेंट के माध्यम से अपना आशीर्वाद देना.