अमेरिका से अनगिनत असहमतियों के बीच आज हमें उसके उदार लोकतंत्र को देखते हुए यह कहने में खुशी हो रही कि एक परिपक्व देश में हीं ऐसी विलक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था हो सकती है। जहां एक भारतीय अमेरिकी नागरिक भी अमेरिका में दूसरे स्थान का नागरिक बन सकता है। कल जब कमला हैरिस ने अमेरिका के उप-राष्ट्रपति के पद और गोपनीयता की शपथ ली। सीना गर्व से गुब्बारा बन गया। और अनायास हीं मुंह से निकल पड़ा अमेरिका का लोकतंत्र इसी तरह जीता-जागता रहे और वहां के लोग आगे भी जागरूक बनें रहें।
हमारे यहां तो लोगों की बातों में अथाह दोगलापन है। कल रात्रि में (भारतीय समयानुसार) जब कमला हैरिस शपथ ग्रहण करने के लिए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज के सामने हाथों में "बाइबिल" लिए खड़ी थी और शपथ ले रहीं थीं। जब सभी लोग उन्हें भारत का सम्मान बता रहे थे। ऐसे लोगों में भक्त और दक्षिण पंथी विचारक भी शामिल थे। जबकि वो नागरिक अमेरिका की थी और शपथ अमेरिकी संविधान की ले रहीं थीं। ऐसे में पता नहीं लोगों को गर्व कहां महशूस हुआ ? हां अगर गर्व महसूस करना हो तो वो अमेरिकी संविधान पर करो। जहां एक भारत से संबंध रखने वाली महिला को नहीं बल्कि एक अमेरिकी नागरिक को उन्होंने तवज्जो दी।
हमारे देश में 2014 में एक ऐसा हीं नजारा देखने को मिला था। जब सत्ता में अटल जी की अगुआई में बीजेपी थी और बिखरे हुए विपक्ष की अगुआई सोनिया गांधी जी कर रही थी। जो कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी जी की पत्नी थी। जिन्होंने ने इटली से आकर भारत में हिन्दू रिति-रिवाज से शादी के पवित्र बंधन में बधी थीं और भारत की नागरिक बनी थी। उस चुनाव में भाजपा और शरद पवार जैसे लोगों ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था। शादी से पहले सोनिया गांधी मूलतः इटली की नागरिक थीं। सुषमा स्वराज ने तो यहां तक कह दिया कि अगर सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी तो मैं सर मुड़ा लूंगी। तब सारे भक्त ये भूल गए थे कि सोनिया अब इटली की नागरिक नहीं बल्कि भारत के नागरिक थे। उस चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई ने जीत हासिल की और मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने। ऐसे दोगलों के लिए मेरा ये लेख था। अन्त में फिर अमेरिकी लोकतंत्र को सलाम।
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