Wednesday, October 30, 2019

यूरोपियन जमूरों का कश्मीर दौरा और विपक्ष नजरबंद

जैसा कि यूरोपियन सांसदों की कश्मीर जाने की कुछ खबरें अपुष्ट रूप से छन-छनकर बाहर आ रहीं थी. तो कल से वह पुष्ट हो गईं हैं. जिन 23 सांसदों का दल यूरोप से कश्मीर भ्रमण को आया है. उनमें से 17 सांसद मुस्लिमों के खिलाफ काफी आपत्तिजनक भाषा में ट्वीट किये हुए हैं और मुस्लिम समाज के खिलाफ नजरिया रखते हैं. ऐसे लोगों को हमारे देश की संघ/बीजेपी की सरकार ने कश्मीर के हालात के मुआयने के लिए बुलाया है. जब देश के विपक्षी पार्टियों के नेता अपने कश्मीरी भाइयो/बहनों से मिलने के लिए श्रीनगर जाना चाह रहे थे. तो उन्हें जबरन वापस लौटा दिया. वैसे अंग्रेज प्रेम का संघ/बीजेपी का रिश्ता बहुत पुराना रहा है. चाहे माफीवीर सावरकर रहें हों या अब भागवत. इन सबका आदर्श अंग्रेज हीं रहें हैं. पता नहीं ये लोग अंग्रेजों पर इतना यकीन क्यों करते हैं ?

बहरहाल बात ये होनी चाहिए था कि जब कश्मीर हमारे देश का आंतरिक मामला था. तो उसे साक्ष्य भारत के नेताओं और कश्मीर के जनता से मिलना चाहिए था न कि विदेशी और दक्षिण पंथी सांसदों का. जो क्रीमिया में रूस के अतिक्रमण का खुला समर्थन करते हैं. हम कैसे मान लें कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है. कल हीं आतंकियों ने बंगाल से 5 मजदूरों को पंक्ति में खड़ा करके गोली मारकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया. तो सरकार और नाजीवाद के समर्थक धुर दक्षिणपंथी सांसदों की बात पर कैसे यकीन किया जाय. संघ का राष्ट्रवाद के राष्ट्रवाद की परिभाषा अब अपने मूल विचार के बिलकुल विपरीत हो चुकी है. जिसे हम देशवासियों को समझने की जरूरत है. कहीं सरकार के लोग एक अंतरराष्ट्रीय दलाल जिसका नाम 'मैडी शर्मा' है. कहीं उसके हाथ खेल तो नहीं रहें हैं, कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता तो नहीं किया जा रहा है. मुझे शक हैं कि कहीं न कहीं यह सरकार दलालों के हाथ की कठपुतली भर बनकर रह गई है. 

संघ/बीजेपी का राष्ट्रवाद 
  • अपने देश के सांसदों को जबरन हवाई अड्डे से मारकर भेज देना 
  • महिला पत्रकारों के साथ अभद्रता करना 
  • कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को नजर बंद करना 
  • पठानकोट में आईएसआई को जांच के लिए बुलाना 
  • मोदी जी का केक खाने के लिए पाकिस्तान जाना
  • असहमति रखने वालों को पाक परस्त बताना 
  • विरोध के स्वर को दबाना 
  • सन्यासी का वस्त्र धारण करे हुए ने महिला यौन शोषण के आरोपियों को संरक्षण देना 



Friday, October 25, 2019

सरकारी एग्जिट पोल को जनता ने नकारा

आज मैं बात करना चाहूंगा ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल पर. क्या ओपिनियन पोल करने वाली एजेंसियां देश की जनता को गुमराह करती है ? क्या एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां मासूम जनता के सामने झूठ परोसती है ? अगर हाँ तो हमारे देश के लोकतंत्र करे लिए ये किसी बहुत गहरे संकट की आहात है. उदाहरण के तौर पर हरियाणा में 'इण्डिया टूडे' को छोड़कर लगभग आधा दर्जन चैनलों के पोल ने बीजेपी को 75 से 83 सीटें जीता रही थी. ऐसा एग्जिट पोल्ल में नहीं बल्कि ओपिनियन पोल पोल में भी दिखा रही थी और ओपिनियन पोल मतदान से मात्र 48 घण्टे पहले टीवी पर प्रसारित किया गया था. क्या इन मीडिया घरानों ने देश की जनता को गुमराह करने का काम नहीं किया है ? क्या इनके झूठ के लिए इन पर कोई जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती ?

 ओपिनियल पोल की कुछ भ्रामक तस्वीरें संलग्न कर रहा हूँ -







हरियाणा जैसा हीं हाल महाराष्ट्र में भी मीडिया वाले दिखा रहे थे. जहां बीजेपी को अकेले 140 सीट से ज्यादा और बीजेपी, सेना युति को 240 से ज्यादा सीटें जीतती हुई दिखा रहे थे तथा कांग्रेस, एनसीपी गठबंधन को 50 के निचे का आँकड़ा दे रहे थे. हकीकत क्या हुआ आप अपनी आँखों से खुद देखें और सोचे कि क्या आज की मीडिया वाकई आजाद मीडिया की तरह काम कर रही है या किसी के दबाव में काम कर रही है. 
हरियाणा की जनता ने किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत न देते हुए वहां त्रिशंकु विधानसभा का खाका खींच दिया है. बीजेपी और सेना ने मिलकर महाराष्ट्र में बहुमत के आंकड़े को तो पार कर लिया है परन्तु हरियाणा में पेंच फंसा हुआ है. जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने सरकार गठन की सभी संभावनाओं को तलाशना शुरू कर दिया है. कुछ हद तक बीजेपी को इसमें सफलता भी मिल रही है. जब कुछ निर्दलीय विधायक जिनमें 'गोपाल काण्डा' एक प्रमुख नाम हैं. उनके समेत पांच निर्दलीयों ने मिलकर खटटर को सरकार बनाने के लिओए समर्थन का दावा किया है. काण्डा के काण्ड के चर्चे मैं निश्चित तौर पर अगले लेख में करना चाहूंगा.

ओपिनियन पोल और मिलता-जुलता परिणाम ये रहा -



Wednesday, October 23, 2019

हरियाणा, महाराष्ट्र के चुनाव सम्पन्न, आतंकी हमला टला

वक्त-बेवक्त पाकिस्तान का खतरा हमारे देश पर आ हीं जाता है और वो तब आता है जब देश के किसी हिस्से में चुनाव अपने शुरुआती समय में होता है. तब से खतरा बढ़ता जाता है और धीरे-धीरे महज मतदान से बमुश्किल एक या दो दिन पहले देश की सुरक्षा पर गंभीर खतरा छा जाता है. पाकिस्तान हैवी हथियारों से हमारे क्षेत्र में बम बारूद बरसाता है और हम फिर पाकिस्तान को मुंहतोड़ जबाब देते हैं और पाक अधिकृत कश्मीर में चार, छः पाक जवानों की पोस्ट गिरा देते हैं. उसमें १०-बीस आतंकी जहन्नुम में पहुंचा दिए जाते है. ये सब मीडिया और सरकारी प्रवक्ताओं की जुबान होती है. यही हाल २१ अक्टूबर को सम्पन्न हुए महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव से पहले भी देखने को मिला। जहां कुछ आतंकी देश में घुस आये थे. पाक सेना की पीओके में कई पोस्टें तबाह कर दी गयी जिसमें पाक के कई जवान और आतंकी मारे गए. 

परन्तु एक बात समझ नहीं आती कि जैसे हीं चुनाव सम्पन्न हो जाता है. वैसे हीं सीमा पर सबकुछ सामान्य क्यों हो जाता है ? क्या कभी आपने ध्यान दिया ? क्या आपको नहीं लगता कि सत्ता मीडिया द्वारा अपने पक्ष में प्रचार करवाती है ? उदाहरण के तौर पर मैं एक मशहूर हिंदी समाचार पत्र की कटिंग मैं इस लेख के साथ संलग्न करूंगा. जवानों के शौर्य पर कोई क्षमता नहीं है. उनके द्वारा किये गए बहादुरी के कार्य पर अटूट श्रद्धा है. उनके द्वारा बोला गया हर वाक्य सत्य और पवित्र है. परन्तु जब सत्ता उनके शौर्य पर राजनितिक रोटियां सेकने लगे जब थोड़ी आपत्ति जरूर होती है और आपत्ति होनी भी चाहिए. क्योंकि हमारे जवान हमारी भारत भूमि की रक्षा हेतु सर वक्त तैयार रहते हैं न कि किसी चुनावी रैली में अपने नाम के सम्बोधन के लिए.

Saturday, October 19, 2019

हिन्दू नेता कमलेश तिवारी की हत्या

मैं कमलेश तिवारी की गतिविधियों से सहमत नहीं हूँ और न हीं मैं किसी भी कट्टरपंथ का समर्थक हूँ. वो चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम. उत्तर प्रदेश में बाबा योगी के राज में जघन्य अपराधों की संख्या अपने चरम पर पहुंच चुका है. कल लखनऊ जैसे शहर में 'हिन्दू समाज पार्टी' के नेता कमलेश तिवारी की निर्ममता से हत्या कर दी जाती है. वो भी तब जब उनको सरकारी सुरक्षा प्राप्त है. मैं मानता हूँ कमलेश तिवारी किसी एक धर्म के बारे में विवादित बयान दिए थे या एक धर्म का रक्षक खुद को बताते थे. ये उनकी आजादी का अधिकार था. परन्तु इसका मतलब ये कत्तई नहीं कि उनकी हत्या कर दी जाए. ऐसे घिनौने कृत्य करने वाले को तत्काल पकड़ कर सख्त से सख्त सजा सजा दिया जाना चाहिए. ऐसे मानसिक रूप से बीमार लोग समाज में नफरत को भड़काते हैं. अगर कमलेश तिवारी ने कुछ गलत भी किया था तो उनको उनके किये की सजा देने का अधिकार केवल न्यायालय को था.
हाल के दिनों में देखा गया है कि उत्तर प्रदेश में इस तरह के अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इस पर लगाम लगना चाहिए. मेरे जैसे हम अमन पसंद नागरिक का यही विचार है और इसका उत्तरदायित्व तो शासन-प्रशासन के हाथ में है. बहरहाल प्रशासन ने आज पत्रकार वार्ता में बताया कि वो तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है. बाकी दो पर नजर रख रही है. यह पुलिस महकमे के लिए अच्छी बात है. उसके लिए मैं प्रशासन की तारीफ़ करता हूँ. अब प्रशासन इन दरिंदों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने का पर्यटन करें। जिससे कि अन्य आरोपियों की हिम्मत इस तरह के जघन्य अपराध के लिए न हो सके.                    
  

Wednesday, October 16, 2019

राम जन्म भूमि विवाद पर सुनवाई का अन्तिम दिन

इसमें कोई शक नहीं कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम देश के आदर्श नहीं है. हमने और  हमारे जैसे करोड़ों लोगों ने हमेशा राम को भगवान माना है. पर क्या ये जरूरी था कि राम जी के नाम को भी विवादित बना दिया जाय. बहरहाल अब प्रतीत होता है कि लगभग डेढ़ सौ साल बाद एक बहुत हीं पुराने और और विश्व भर में चर्चित राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मुद्दे का पटाक्षेप होने का वक्त नजदीक आता दिख रहा है. अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह मामला आजादी के बाद भी चलता रहा. एक लम्बे ट्रायल के बाद २००९-१० में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने २.७७ एकड़ विवादित जमाने को तीन हिस्सों में बाँट दिया. जिसमें दो हिस्सा हिन्दू पक्ष तो एक हिस्सा मुस्लिम पक्ष को दिया. उसके बाद दोनों पक्ष अपनी असन्तुष्टिता को प्रदर्शित करते हुए सर्वोच्च अदालत में उच्च अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर की. जिस पर रोज सुनवाई होने और अंतिम नतीजे तक पहुंचने में लगभग ९ साल का समय बीत गया. 
अंत में वो दिन आ हीं गया जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीस श्री रंजन गोगोई ने अपने नेतृत्व में ५ सीनियर जजों की एक बेंच गठित की. जिसकी अगुवाई वो खुद कर रहें है. जिनमें न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति बोबडे, न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति चंद्रचूण समेत पांच जज शामिल हैं. यह सुनवाई आज ४२ वें दिन लगातार चल रही है. रविवार के अवकाश को छोड़कर ये बहस रोज चलती रही. जो आज अपने अंतिम परिणाम की तरफ बढ़ती दिख रही है. आज अंतिम दिन की सुनवाई शाम ५ बजे खत्म हो जायेगी। इसके बाद माननीय जजों को १ महीने का वक्त अपने फैसले को अंतिम रूप देने और लिखने का समय रह जाएगा. लेकिन एक बात तो सत्य है कि आज 16 अक्टूबर को इस सुनवाई का पटाक्षेप होना संभावित दिख रहा है.
गोदी मीडिया में मैं सुबह से देख रहा हूँ कि राम राज्य, राम मंदिर और अन्य तरह के नाम से प्रोग्राम चला रहें हैं. मानों वो देश के नागरिकों की भावनाओं को भड़का रहें है. उसी का एक छोटा सा उदाहरण मैं आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ. जो इस तरह है. मैं आज तक हिंदी न्यूज़ चैनल को देख रहा था. वहां पर एक सीनियर एंकर रोहित सरदाना है. जिस अयोध्या में बैठकर ये बैठक कर वहां संघ और साधु संत तथा कुछ मुस्लिम लोगों को बैठाकर को सवाल जबाब कर रहे थे. उस दरम्यान कांग्रेस पार्टी का कोई नेता या प्रवक्ता वहाँ नहीं बैठा था. परन्तु किसी पैनलिस्ट ने कहा कि ये देश को हिन्दू तालिबान बनाना चाहते हैं. उसकी बात को लेकर ये चीखने लगे कि ये कांग्रेस का बयान है, परन्तु जो जिस बात को कांग्रेस की बात बता रहे थे वहां पर तो कांग्रेस का कोई आदमी था हीं नहीं। तो आप सोचिये ये कांग्रेस को बदनाम करने के लिए भाजपा/संघ के एजेंट की तरह काम नहीं कर रहें थे ?  ऐसा क्यों प्रतीत हो रहा है आप अपनी जिम्मेदारी से भाग रहें हैं ?

जय सियाराम 

Saturday, October 12, 2019

चीनी सामान का बहिष्कार कब से

जैसे-जैसे दीवाली का त्योंहार नजदीक आ रहा है. वैसे-वैसे मन में एक अजीब कशमकस सी मची हुई है कि कुछ राष्ट्रवादी संगठनों जैसे विहिप, बजरंग दल, हिन्दू रक्षा मंच, आरएसएस, भारतीय मजदूर संघ जैसे परम पराक्रमी बयान वीरों से सुसज्जित संगठनों के द्वारा कब एलान किया जाएगा कि चीनी सामानों का बहिष्कार किया जाना चाहिए. मेरा दिल ये सोचकर बैठा जा रहा है कि ये वीर अब तक किस कोठरी में छुपे पड़ें हैं. जबकि चीनी राष्ट्रपति तमिलनाडू में हमारे संघ की पाठशाला से निकले और स्वदेशी के सबसे बड़े झंडाबरदार के शिष्य श्रीमान मोदी जी के साथ 'महाबलीपुरम' में बैठकर ब्यापार बढ़ाने की बात पर जोर दे रहा है और श्रीमान प्रधानमंत्री महोदय उसकी हामी में हामी भरते जा रहे हैं.

चीनी सामानों का बहिष्कार करने की अलख जगाने वाले वीरों अब तक आप शांत क्यों बैठे हैं ? आपकी क्या मजबूरी है ? जो आप चीनी सामानों के बहिष्कार का ऐलान करने में देरी कर रहें हैं. क्या आप इन्तजार करना चाहते हैं कि 'शिन पिंग' अपने देश चाइना पहुंच जाए. तब हम उसकी बखिया उखेड़ेंगे या संघ समर्थित अत्यंत पराक्रमी संगठनों ने इस बार ये फैसला किया है कि चीन निर्मित सामानों को भारतीय बाजार में आसानी से बेचने दिया जाए. क्योंकि देश में मंदी घनघोर रूप ले चुकी है, बेरोजगारी सुरसा डायन की तरह अत्यंत विकराल रूप धारण कर चुकी है. ऐसे में सरकार के समर्थन में चुप रहना हीं इन संगठनों के लिए फायदेमंद होगा.
स्वदेशी से याद आया ! आज कल बाबा रामदेव कहाँ हैं ? जो नजर हीं नहीं आ रहें है. भारतीय बाजार में चीनी सामानों का बहिष्कार करने के मामले में बाबा जी लम्पटों के "ब्राण्ड एम्बेस्डर" हुआ करते थे. आजकल उनकी आवाज बहुत शांत हीं कहीं कुछ सुनाई नहीं दे रहा. हो भी क्यों नहीं उनका भी तो 'पतंजलि' का धंधा पिट गया है. अब बाबा बोले तो बोले किस मुंह से. मुझे पूरा यकीन है बाबा जी स्वदेशी अपनाने के लिए बोलेंगे जरूर पर वक्त भी बाबा का होगा और जबान भी बाबा की होगी.

Thursday, October 10, 2019

मन का रावण कोई मारता क्यों नहीं

दशहरा बीत चुका है. आज हम आत्मंथन करें कि हममें से कितने लोगों ने हमारे अंतःकरण से रावण को मारा है. रावण का अर्थ भय, बेईमानी, छल-कपट, चोरी, क्रोध, दुराचार से हैं. क्या हम जितने लोग सोशल मीडिया या रामलीला, झांकी या मेले के रावण को देखा ? क्या उसका अंत कर दिया. हाँ. अगर कर दिया तो बहुत बढ़िया किया परन्तु जिन लोगों ने नहीं किया उनका क्या ? हम समाज के लोगों को कुवार के नवरात्रि के महीने में हीं रावण क्यों नजर आता है ? हम इसी दौरान रावण को मारने के लिए इतने उत्सुक क्यों रहते है ? क्यों नहीं हम हर, दिन हर क्षण अपने अंदर बैठी रावण रुपी बुराइयों को मारने की कोशिश नहीं करते या हम दशहरे में रावण के पुतले को जलाकर अपनी कमियों को छुपाना चाहते हैं. जहां दुधमुँहीं बच्चियों के साथ दुराचार किया जा रहा हो, जहां हमारी बेटियों को मात्र कुछ पैसों और जेवरों के लिए मौत की नींद सुला दिया जाता हो, वहां उस रावण को दण्ड देने के बजाय हम पुतले को जलाकर जश्न मना लेने मात्र से हीं खुश हो जाते हैं. अरे भाई सोच को बदलो, समाज में परिवर्तन दिखने लगेगा. यह परिवर्तन हमें खुद से शुरू करना होगा न कि किसी का इन्तजार करने के बाद.

Saturday, October 5, 2019

राजघाट पर दूबे जी से एक संक्षिप्त वार्तालाप

कौन कहता है कि आज गांधी का अस्तित्व मिटने की कगार पर है. मैं ऐसे लोगों की राय से इत्तेफाक नहीं रखता। सौभाग्य से 2 अक्टूबर के दिन परिवार के साथ मुझे राजघाट गाँधी समाधि स्थल जाने का मौक़ा मिला. जो मेरे लिए बड़े हर्ष का विषय रहा. मैं वहां पहुंचा तो लोगों का भारी हूजूम इकट्ठा था और वो समय सुबह के बमुश्किल साढ़े 10 बजे का रहा होगा. जाहिर सी बात है बापू की जयंती थी और वो भी 150 वीं तो विभिन्न राजनितिक पार्टियों का प्रेम भी गांधी जी के प्रति उमड़ा था. उनमें से कुछ दो-चार साल पहले से गांधीवादी बनने की कोशिश करने वाले भी थे. जो उससे पहले गोड़सवादी हुआ करते थे. इन राजनितिक कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर भी दिया जाय तो देश के अन्यान्य हिस्सों से हर उम्र के लोग आये हुए थे. एक दूबे जी प्रयागराज के तेलियरगंज से हाथ में जलती हुई मसाल लेकर आये थे. उनसे गांधी जी के सिद्धांतों पर बात करने से पता चला कि गांधी जी का असर उनके मानने वालों के मन-मष्तिष्क पर किस कदर हावी हो जाता है. मैं और छत्तीसगढ़ से आये एक प्रखर गांधीवादी विचारक श्रीमती नजमा अजीम जी थी. जो कि बीजेपी के विचारों से प्रभावित थी पर हम सब एक थे और एक साथ थे. दूबे जी से मेरे वार्तालाप के कुछ अंश इस प्रकार हैं -


मैं - दूबे जी प्रणाम 
दूबे जी - खुश रहो 
मैं - आप कहाँ से आये हो ?     
दूबे जी - इलाहबाद, तेलियरगंज से आया हूँ. आप तेलियरगंज को जानते हैं.
मैं - हां 
दूबे जी - आप कहाँ से हो ?
मैं - जौनपुर से हूँ.
दूबे जी - फिर तो आप मेरे पड़ोसी हैं.   
मैं - आप राजघाट किस लिए आये हैं और आपके हाथ में ये क्या है ?
दूबे जी - मैं गांधीवादी विचार से जुड़ा हूँ. मैं बापू जी का दर्शन करने आया हूँ. आप जो ये देख रहें हैं ये जलती हुई मसाल है. जिसे मैं इलाहबाद से लेकर आया हूँ.
मैं - जब आप गांधीवादी है तो क्या आप बता सकते हैं कि गांधी जी की विचारों पर गोड़से के विचार कैसे हावी हो गए ?
दूबे जी - कुछ पल ठहरने के बाद ! हाँ मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि आज के दौर में भी गांधी जी के विचार क्षीण नहीं हुए हैं. बस उन्हें झूठलाने की कोशिश की जा रही है. बापू जी के आदर्शों को पूरा विश्व अपनाने की कोशिश कर रहा है. क्या अमेरिका, क्या चाइना सब किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या का हल बैठ कर शांति से सुलझाने की अपील कर रहें हैं. यही तो हमारे गाँधी जी है. जो संघ/बीजेपी वाले कल तक गांधी के अस्तित्व को नकारते थे आज वही लोग गांधी जी के समर्थन में रैली और तमाम तरह के सार्वजनिक कार्यक्रम का आयोजन कर रहें है. यही तो गांधी जी के विचारों की जीत हैं.
मैं - बाबा जी आपने मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दिया.
दूबे जी - गांधीवादी विचार धारा को दबाने का काम सरकारों ने किया. मैं सभी सरकारों को इसका कसूरवार मानता हूँ. इतना कहते हीं उनकी आँखें गीली हो गयी.
मै भी उनसे माफी लेकर उनके साथ एक फोटो लिया और हम गेट खुलने का इन्तजार करने लगे. क्योंकि वीआईपी का इन्तजार वहां भी था. 

Wednesday, October 2, 2019

हे बापू तुम अमर हो

सर्वप्रथम बापू जी के जन्मदिवस पर उनके चरणों में सादर नमन. आज बापू जी का १५० वां जनमोत्स्व दिवस है. हमने बापू के विचारों को आत्सात किया है परन्तु कुछ राजनितिक दल और संगठन बापू के नाम पर आज जो दिल्ली की सड़कों पर ढोंग रचा रहे हैं. कभी उनके हीं राजनितिक पुरखों ने गांधी जी को मौत के घाट उतार दिया था. आज गांधी जी के विचारों के सबसे बड़े पैरोकार बनने की नाकाम कोशिश कर रहें हैं. जिस पार्टी/संगठन के लोग आतंक की आरोपी और बापू को अपशब्द कहने वाली अपनी सांसद को पार्टी से निकाल नहीं सकते। उन्हें बापू के नाम पर ढोंग रचाने का कोई अधिकार नहीं है.
बात आजादी के प्रारम्भिक दौर की है. गांधी जी कांग्रेस पार्टी के आजीवन सदस्य थे. तब आरएसएस नामक एक संगठन जिसके पास आज अपरोक्ष रूप से सत्ता है. वो गांधी जी के हर कदम का विरोध करती थी और उनके नेतृत्व में होने वाले आन्दोलनों से अपने को अलग कर लेती थी. हद तो तब हो गयी जब देश के अनेक वीर क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफत करते हुए जेलों में ठूंस दिए गए थे. तब संघ के सबसे बड़े नेता सावरकर ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगकर जेल से बाहर आये हुए थे और अंग्रेजी शासन का साथ देने तक की कसम खाते थे। बटवारे के वक्त जब गांधी जी देश को सभी धर्मों के रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. तब संघ के तत्कालीन प्रमुख गोलवरकर मुसलमानों को लेकर बहुत हीं आक्रामक और अविवेक पूर्ण बयान देते थे और इतना कहते हुए गांधी जी खत्म करने की चेतावनी भी देते थे. जिसकी परिणीति १९४८ में गांधी जो अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. इस संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा "कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी" लिखते हैं कि - गांधी को अब आरएसएस के बारे में कोई भ्र्म नहीं था. संघ (RSS) ने जो घृणा महात्मा गांधी के लिए पिछले कई महीनों से पाले रखा था उसके प्रति और ताकत के साथ मुखर हो गया" 
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि - "दिसम्बर १९४७ के पहले सप्ताह में, एम एस गोलवरकर ने दिल्ली में आरएसएस की एक बैठक को सम्बोधित किया। यहां गोलवरकर ने 'मुसलमानों का जिक्र' करते हुए एक टिप्पणी की, "पृथ्वी पर कोई भी शक्ति उन्हें हिन्दुस्तान में नहीं रख सकती है. उन्हें ये देश छोड़कर जाना हीं पड़ेगा। महात्मा गांधी मुसलमानों को भारत में रखना चाहते थे कि चुनावो के वक्त कांग्रेस को मुसलमानों के वोट का लाभ हो सके, लेकिन, उस समय तक, भारत में एक भी मुसलमान नहीं बचेगा। महात्मा गांधी उन्हें गुमराह नहीं कर सकते। हमारे पास ऐसे साधन हैं, जिनसे ऐसे लोगों को तुरंत खामोश किया जा सकता है. लेकिन, यह हमारी परम्परा है कि हम हिन्दुओं के लिए अयोग्य न हो. लेकिन हमें मजबूर किया गया, तो हमें उस काम को भी अंजाम देना पड़ेगा।
लेकिन ३० जनवरी १९४८ को उन्हें खामोश कर दिया गया. यह काम आरएसएस के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे द्वारा हमेशा के लिए कर दिया गया. इसके तुरंत बाद हीं आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया गया और गोलवरकर समेत इनके तमाम नेताओं को जेल भेज दिया गया.
महात्मा गांधी अमर रहे 
हत्यारा गोड़से मुर्दाबाद

Tuesday, October 1, 2019

बापू के विचारों की जीत

गांधी और उनसे जुड़ें विचारधारा के लोगों की इससे बड़ी जीत और क्या होगी कि गांधी जी को 30 जनवरी 1948 की शाम खामोश करने वाली सोच खबरों के मुताबिक़ कल रैली और रोड शो का आयोजन करेगी. खबर ये है कि बीजेपी (जो कि आरएसएस की संतान है) अध्यक्ष अमित शाह कल दिल्ली में गांधी जी के 150 वें जन्म वर्ष पर रैली करेंगे. हम गांधीवादी विचार धारा के लोगों के लिए यह जीत का एक अवसर है. माना की दिल में इनके नाथूराम और माफीवीर सावरकर बस्ते हैं परन्तु गांधी जी के उच्च मानदंडों के अनुसार वो अपने गोड़से प्रेम का इजहार छुपाकर करते हैं और ढोंग रचाकर गांधी जी का सम्मान करते हैं.
खैर ! उन भक्तों को इस खबर से बड़ी निराशा हुई होगी कि संघ/बीजेपी वाले कान में कहते हैं कि गोड़से की जय-जयकार करो और सामने आकर गांधी जी के सम्मान में रैली और तमाम तरह के सार्वजनिक आयोजनों का इंतजाम करो. ऐसे में भक्तों की हालत नेवले जैसे हो जाती होगी. मैं तो बस कल्पना कर सकता हूँ महशूस तो भक्त गण और शाखा में जाने वाले हीं कर सकते हैं. वो बेचारे आज से बहुत लज्जित महशूस कर रहे होंगे कि अब किस मुंह से वो गांधी जी के बारे में अपशब्द कहेंगे.
जैसा कि ऊपर की लाइनों में मैंने जिक्र किया है कि ये संघ/बीजेपी के लोग मजबूरी बस दिखावा मात्र का प्रेम गांधी जी के लिए कर रहें हैं. असल में तो गोडसे का हीं गुणगान करते हैं. मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल से पूरी तरह सहमत हूँ कि "जिस दिन मोहन भागवत गोडसे मुर्दाबाद का नारा बुलंद कर देंगे। उस दिन हम मान जाएंगे कि संघ/बीजेपी वाले दिल से गांधी जी का सम्मान करते हैं". यही तो हमारे जैसे तमाम लोग चाहते हैं. पर ऐसा होगा. मुझे नहीं लगता.
असल तो ये है कि आतंक की आरोपी (मालेगांव ब्लास्ट) और मध्य प्रदेश भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी और अब सांसद जब खुलेआम हत्यारे नाथूराम गोड़से को वीर बताती हैं और बापू जी को अपमानित करती है. तब जब देश के लोगों ने भाजपा के प्रति नाराजगी जाहिर की तब देश के चौकीदार ने कार्रवाई करने के लिए उन्हें 10 दिन का नोटिस दिया था. जिसकी मियाद खत्म हुए 90 दिन से ज्यादा बीत गए हैं. जब उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी तो यही बापू के सम्मान का ढोंग जनता के संख खुलकर आ जाता है.

महात्मा गांधी अमर रहे
हत्यारा गोड़से मुरादाबाद