Tuesday, December 31, 2019

2019 की महत्वपूर्ण झलकियाँ

कल 20 वीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम साल में हम प्रवेश करने वाले है. कल से एक नए साल की शुरुआत हो जायेगी. तो 2010 से 2020 तक का सफर अपने अंतिम पड़ाव पर होगा. जैसा कि सर्व विदित है कि साल 2019 बहुत से महत्वपूर्ण धटनाक्रमों को अपने में समेटे हुए है. जनवरी 2019 की शुरूआत एक साधारण दिन की तरह होती है और फरवरी के आधे महीने तक सामान्य दिनों की तरह चलती है. लेकिन उसके बाद कुछ कुछ बहुत बड़ी घटनाएं घटित होती हैं. जो हमें अंदर से झकझोर कर रख देती है और हमारी आत्मा हमसे खुद हमसे कुछ सवालों का जबाब ढूढ़ने लगती है.

कुछ महत्वपूर्ण झलकियाँ -

प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में आना
फरवरी महीने में गांधी परिवार की एक और सदस्य श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. जैसा कि सबको पता है कि अब तक प्रियंका गांधी अपनी माँ श्रीमती सोनिया गांधी जी और श्री राहुल गांधी जी के क्षेत्रों तक हीं खुद को सिमित कर के रखा था. अमेठी और रायबरेली में हीं चुनावी चुनावी बिसात बिछाती थी और लोगों से संवाद स्थापित करती थी तथा सफलता भी प्राप्त करती थी. कांग्रेस के लिए साल की ये सबसे अच्छी खबर थी. अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने लखनऊ में रोड शो के माध्यम से किया और समर्थकों की बहुत अच्छी खासी संख्या भी देखने को मिली थी. उनकी चुनौतियां कांग्रेस को निराशा से उबारने की थी. जिस पर वो अपना पूरा ध्यान आज भी केंद्रित की हुई हैं.

पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर कायराना हमला, 37 जवान शहीद
फरवरी महीने की 14 तारीख को देश में एक ऐसी घटना घटी जिससे हर हिन्दुस्तानी का कलेजा काँप उठा. कुछ आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में अर्धसैनिक बलों के काफिले पर बिस्फोटक भरी कार से हमला कर दिया. जिसमे हमारे 40 से ज्यादा माँ भारती के सपूत शहीद हुए. यह खबर देखते, पढ़ते, सुनते हीं हर भारत वासी स्तब्ध था. धमाका इतना ताकतवर था कि सेना के वाहनों की परखचे तक उड़ गए थे. हमारे कुछ वीरों के अंग भी क्षत-विक्षत हो गए थे. इस घटना के बाद देश के नागरिकों में बहुत उबाल था. जो स्वाभाविक था. कितनी माओं ने अपने आँचल के प्यार को खो दिया, कितनी बहनों ने राखी की कलाई खो दी और कितनी देवियों ने अपने सिन्दूर को भी खो दिया। मेरे अनुसार ये पूरे साल का सबसे बड़ा घटनाक्रम रहा है.

भारत का पाक में घुसकर एयर स्ट्राइक
पुलवामा हमले पर देश में उपजे हुए असंतोष का बदला लेते हुए सरकार की मंजूरी से भारतीय वायुसेना ने पाक के अंदर घुसकर आतंकी ठिकानों को गोले-बारूद से ध्वस्त कर दिया। यह सेना का बहुत बड़ा पराक्रम था. भारत के इस जबाब के बाद सीमा पर बहुत तनाव था. इसी कर्म में पाक की उन्नत फाइटर प्लेन फ-१६ को सुखोई से विंग कमांडर अभिनंदन ने मार गिराया और इसी कोशिश में वो पाकिस्तान की सीमा में विमान में गड़बड़ी की वजह से चले गए थे. जिनके साथ पाकिस्तान ने बहुत बुरा बर्ताव किया था परन्तु भारत के दबावों के आगे झुकते हुए पाक ने महज कुछ दिनों के अंदर विंग कमांडर को भारत को सौप दिया था.

मनोहर परिकर जी का चला जाना
मार्च के महीने में गोवा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर परिकर का अंततः लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया. आज के दूषित राजनीतिज्ञों में मैं मनोहर जी और माणिक सरकार को सच्चा जनसेवक मानता हूँ. परिकर जी बहुत हीं सभ्य, शालीन और पढ़े-लिखे राजनीतिज्ञ थे. परिकर जी राजनीति में आने से पहले इंजीनियरिंग के छात्र थे. इनका जाना भाजपा के साथ-साथ देश को भी काफी कष्टदायक रहा.

यू पी लोकसभा चुनाव में माया की बसपा और अखिलेश की सपा का तालमेल
लोक सभा चुनावों से पहले राजनीति में एक और घटना घटी. जो पूरे राजनैतिक परिप्रेक्ष में अलौकिक और अप्रत्याशित घटना थी. विधान सभा में करारी हार के बाद सपा और बसपा का गठजोड़ हुआ. जो हर राज्य वासी को अचंभित करने वाली थी. दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा, परन्तु उम्मीद के मुताबिक़ सफलता न मिलने के कारण लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन टूट गया और बाद के विधानसभा उपचुनाव में दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ी.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी को अपार सफलता
पांच वर्षों में एक बार आने वाला देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा चुनाव अप्रैल से शुरू हुआ और मई के तीसरे हफ्ते तक चला. जिसमें जनता ने नरेंद्र मोदी के दिल खोलकर वोट दिया। बीजेपी के हिस्से ५० प्रतिशत से ज्यादा सीटें आई और बीजेपी 2014 के 282 सांसदों की संख्या को पीछे छोड़ते हुए 303 तक बढ़ाकर ले आई. वहीं कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष पिछले आम चुनाव की भांति अपने हीं भार के निचे दबा रहा. कांग्रेस अपनी पिछली संख्या को मामूली तौर पर बढ़ाकर 44 से 52 तक ले आयी. फिर भी विपक्ष का पद हासिल करने लायक संख्या नहीं थी.

सोनभद्र में आदिवासियों का नरसंहार 
19-20 जुलाई के आस-पास सोनभद्र जिले के उम्भा गाँव में एक बहुत हीं दर्दनाक घटना देखने को मिली. जहाँ दो पक्षों के बीच में जमीन का विवाद दशकों से चला रहा था. इस गाँव के मुख्य निवासी आदिवासी थे और जो दूसरी पार्टी थी वो दबंग था और साथ हीं साथ प्रधान भी था. एक दिन प्रधान अपने साथ सैकड़ों लोगों के दर्जनों ट्रैक्टर में भरकर ले जाता है और विवादित जमीन पर हल चलाने लगता है जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया. जिस पर हथियारों से लैस गुंडों की टीम ने आदिवासियों/दलितों पर धुंआ धार गोलियों की बौछार कर दी. जिसमें कई दलितों की जान चली गयी. यह सरकार के कानून-ब्यवस्था के मुंह पर तमाचा था. जिस पर राजनीति भी खूब हुई. कांग्रेस महासचिव प्रियंका यादव भी पीड़ितों से मिलने के लिए गयी, परन्तु पुलिस ने उन्हें जाने से रोक दिया। तो वो अपने समर्थकों समेत वहीं धरने पर पूरी रात बैठी रही. अंततः प्रशासन ने पीड़ित परिवार को मिर्जापुर में लाकर प्रियंका गांधी से मिलवाया। पीड़ित परिवारों का दुःख देखकर कलेजा फट रहा था. 
           
कश्मीर से धारा 370 की विदाई
5 अगस्त को लोकसभा में एक संशोधन के जरिये सरकार ने कश्मीर से धारा 370 और 35 A को समाप्त करने का निर्णय लिया। जिसे सफलतापूर्वक संसद के दोनों सदनों में पास भी करवा लिया। इस कृत्य के बाद कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया है और इंटरनेट तथा फ़ोन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गयी है. सरकार कश्मीर के हालात ठीक होने का दावा तो करती है पर पुरानी चहल-पहल बहाल होती नहीं दिख रही है.

राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
490 साल पुराने अयोध्या मामले पर अन्ततः आज 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अगुवाई में 5 जजों की टीम ने हमेशा-हमेशा के लिए इस विवाद का निपटारा कर दिया. राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का मसला हल होने के बाद देश के सभी लोगों ने शान्ति कायम रखी. जो हमारे देश के गौरवशाली लोकतंत्र को प्रदर्शित करता है. न्यायालय ने सरकार को तीन महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए एक बोर्ड गठित करने का आदेश दिया है. उम्मीद है कि अब देश में अमन-चैन आएगा.

महाराष्ट्र में राजनैतिक उलटफेर 
महारष्ट्र में अक्टूबर में विधान सभा का चुनाव हुआ. जिसमें एक तरफ सेना पोर बीजेपी का गठबंधन था तो दूसरी तरफ कांग्रेस और शरद पवार की अगुवाई वाली नेशनलिष्ट कांग्रेस थी. चुनाव दोनों गठबंधनों ने एक-दूसरे गठबंधन के खिलाफ लड़ा. पर जैसे हीं चुनाव का परिणाम आया तो पता चला कि मामला त्रिशंकु विधान सभा की तरफ जा रही है और किसी पार्टी को बहुत तो नहीं मिल रहा है पर सेना-बीजेपी गठबंधन को बहुमत से ज्यादा मिल रहा है. ऐसी स्थिति को भांपते हुए सेना ने मुख्यमंत्री का पासा बीजेपी के तरफ फेंक दिया कि अगर सरकार बनानी है तो आधे समय के लिए सेना के साथ मुख्यमंत्री का पद बांटना पड़ेगा. जिस पर बीजेपी तैयार नहीं हुई. क्योंकि बीजेपी को लगता था कि सेना की मजबूरी है और वो लौट कर बीजेपी के पास आएगी। पर उधर तो संजय राउत और नवाब मलिक अलग हीं मोड़ पर जाने की सोच रहे थे. सरकार गठन को लेकर सेना, कांग्रेस और एनसीपी में मीटिंग का दौर चल हीं रहा था कि अचानक २३ नवम्बर को खबर आयी की एनसीपी के अजित पवार ने बीजेपी को समर्थन दे दिया और रात में हीं प्रधानमंत्री ने अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन हटा दिया और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री और अजीत पवार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली. ये खबर टीवी पर आते हीं एनसीपी,सेना, कांग्रेस में भूचाल आ गया.
फिर बिना समय गवाए शरद पवार पावर में आये और अजित पवार को छोड़ अपने सभी विधायकों की मीडिया के सामने परेड करवा दी. उधर सेना अविलम्ब फ्लोर टेस्ट की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट चली गयी. अंततः 80 घंटे बाद देवेंद्र फडणवीस बिना बहुमत साबित किये सरकार से इस्तीफा दे दिया। फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महराष्ट्र में सेना, कांग्रेस, एनसीपी की नई सरकार का गत हुआ. इसी के साथ महाराष्ट्र के नाटक का अंत हुआ.

नागरिक संशोधन बिल पर संग्राम
संसद के आख़िरी सत्र में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित हिन्दू, सिख, जैन, बुद्ध, पारसी और ईसाई जो 2014 से पहले भारत में आकर बस गए हैं उनको संविधान में इस संशोधन के द्वारा नागरिकता देने का प्रावधान किया गया. सरकार इसे संविधान के अनुरूप बता रही है तो विपक्ष और अन्य संगठन इसे संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ बता रहे है. देश के चारों दिशाओं में इस बिल का घोर विरोध हो रहा है. जिसमें दर्जनों लोगों की जानें जा चुकी हैं और पूरे देश में लाखों चिन्हित, अचिन्हितों के खिलाफ मुकदमें कायम किये गए है. इस आग से देश के नामी विश्वविद्यालय भी नहीं बच सके. अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्र कड़ाके की ठंड में भी बिल के खिलाफ अपना विरोध बुलंद किये हुए हैं. पुलिस विश्व विद्यालय के अंदर घुसकर छात्रों के साथ बर्बरता की. जिनकी जाँच विश्व विद्यालय की आंतरिक कमेटी द्वारा की जा रही है। नागरिक संशोधन बिल का विरोध आज भी बदस्तूर जारी है.

कोई मेरी भाषा से, वाणी से आहत हुआ है तो गुजरने वाले साल के अंतिम दिन में मैं उन लोगों से क्षमा चाहता हूँ.         

Saturday, December 28, 2019

ओ पी भैया और दीपक का भैया सादर स्नेह

भैया प्रणाम !

छोटे हैं आवेश में आ गए होंगे. मुझे उनके इन शब्दों से कोई ग्लानि नहीं हैं. धीरे-धीरे सीख जाएंगे. आप जैसे अग्रज के सानिध्य से सब ठीक हो जाएगा. ऐसा मेरा विश्वास है भैया. इसे पढ़ने वाले जान लें कि मैं और बड़े भैया (दीपक जी) एक-दूसरे को नहीं जानते कि हम किस गाँव-क्षेत्र के निवासी हैं, हमारी विचारधारा भी अलग है. फिर भी हम अपनी अभिब्यक्ति को, अपनी आलोचनात्मक टिप्पणी को लिखते समय शब्दों और संस्कारों का विशेष ध्यान देते हैं. आदरणीय भैया के सानिध्य में रह कर मैं अपनी वाणी पर और ध्यान देता हूँ. 
दीपक भैया से अब काफी अच्छी जान-पहचान हो चुकी है. हम एक-दूसरे से काफी वाद विवाद भी करते हैं, परन्तु अपने संस्कारों को कभी नहीं खोते. भैया हमेशा हर छोटे को 'अनुज' के नाम से हीं सम्बोधित करते हैं और उनके द्वारा की हुई त्रुटियों को सुधारने के लिए स्नेहपूर्वक आग्रह करते हैं. भैया की टिप्पणी देख कर लगा कि आज आपके के बारे में दो शब्द लिखना चाहिए. जिसकी गुस्ताखी मैं यहां कर रहा हूँ. भैया किसी भी त्रुटि के लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ. 
दीपक भैया आपकी तरह हमारे एक ओम प्रकाश भैया (ओ पी वर्मा) हैं. जो आजकल दिल्ली सरकार में सहायक लेखाधिकारी (AAO) हैं. जो मूलतः छत्तीसगढ़ के निवासी हैं. वो भी अपने शब्दों के माध्यम से मुझे चिढ़ाते रहते हैं. उन्हें जब भी मुझे छेड़ना होता है तो कांग्रेस विरोध की एक खबर मेरे व्हाट्सअप्प पर डाल देते हैं. फिर हम दोनों शुरू हो जाते हैं. कई बार तो जब भाभी जी नहीं होती हैं और वो अकेले रहते हैं तो समय बिताने के लिए एक संदेश साझा करते हैं फिर मैं भी खाली बैठा होता हूँ तो दोनों लग जाते हैं. फिर ओ पी भैया कहते हैं "गिरि" मैं खाली बैठा था सोचा तेरे साथ समय काट लूँ. ओ पी भैया से भी मुझे नौकरी के शुरुआत के दिनों में काफी सहायता मिली है. जब मैं भैया से पहली बार दिल्ली में मिला था उस समय आप एक सरकार कार्यालय में 'केयर टेकर' के पद पर कार्यरत थे. भैया अब आप लोगों की अच्छाइयों के बारे में विस्तृत तौर पर बाद में लिखूंगा.

आप दोनों बड़े भाइयों को पुनः प्रणाम ! 

Monday, December 23, 2019

झारखण्ड बीजेपी मुक्त कांग्रेस गठबंधन युक्त हुआ

आज झारखण्ड चुनाव का परिणाम जनता के सामने आ रहा है. वह परिणाम अपेक्षित है. क्योंकि यह सरकार झारखण्ड में अलोकप्रिय हो चुकी थी. इस सरकार ने बहुत से गलत निर्णय किये हुए जिसे "पत्थलगढी" और आदवासियों का प्रमुख रोष रहा है. जब नोटबंदी के बाद बीजेपी चुनाव जीत जाते है तो बोलती है कि जनता ने फैसले पर मुहर लगा दिया, जीएसटी के बाद जीती तो बोली की जनता ने फैसले पर हमारा साथ दिया. तो अब हमें मान लेना चाहिए कि "नागरिक संशोधन बिल" के बाद चुनाव लड़े और हार गए. इसका मतलब जनता ने बीजेपी को नकार दिया. शायद मैं ऐसा नहीं कह सकता क्योंकि बीजेपी अच्छा लड़ रही है. दोनों पार्टियों की सीटें घट-बढ़ रहीं हैं. जैसे-जैसे सीटें घट-बढ़ रहीं हैं. संबंधित समर्थकों की बेचैनियां बढ़ जा रहीं हैं. इस ठंड में में भी भाजपा का सिकुड़न जारी है. देशहित में जनता बेहतर निर्णय ले रही है. 
भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान ईमानदार छवि के मालिक श्री सरयू राय जी से हुआ. जिन्होंने बीजेपी की सरकार में पूरे पाँच साल मंत्री रहे और सरकार के अंदर रहकर सरकार का विरोध करते रहे. सरयू राय जी ने हीं लालू यादव को जेल (कारवास) भिजवाया था. लालू जी के भ्रष्टाचार को उजागर करने और जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय जाता है. संघ में रहते हुए सरयू राय जी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा मुखर होकर आवाज उठाई थी. वही सरयू राय उपेक्षित होकर बीजेपी से निकल गए और वर्तमान मुख्यमंत्री श्री रघुबर दास के खिलाफ जमशेद पुर पूर्व से चुनाव लड़े और दोपहर तक वो रघुबर दास को पीछे धकेलने में कामयाब रहें हैं. सरयू राय ने सरकार के खिलाफ इतना बढ़-चढ़कर प्रचार किया. उन्होंने तो विपक्ष के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हेमंत सोरेन के लिए प्रचार किया.
बीजेपी  जाना चाहिए कि मोदी-शाह की जोड़ी जो कहेगी वो जनता मान लेगी. धारा 370 और राम मंदिर पर फैसला आने के बाद तीन चुनाव महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखण्ड में हुए जिसमें हर जगह बीजेपी को अपनी पुरानी सीटों का नुकसान तो हुआ हीं परन्तु मात्र 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में विधान सभा क्षेत्रों पर हुई बढ़त को भी गवा दिया. झारखण्ड की जनता ने और हरियाणा की जनता ने इनको सबक सिखाया कि हम पाकिस्तान के दर से वोट नहीं देंगे, हम कांग्रेस मुक्त भारत के लिए वोट नहीं देंगे. अब वो सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिए हैं. वो सरकार से रोजगार पर सवाल करते हैं, आलू, प्याज की महंगाई की बात कर रहें हैं. झारखण्ड और हरियाणा के गांवों में रहें वाले लोगों और किसानों ने अपने हक का सवाल पूछा है और परिणाम आप जनता के सामने है. झारखण्ड के 8 में से 4 मंत्री आज का चुनाव हार रहें हैं. जिनमें मुख्यमंत्री समेत आदिवासी नेता लुईस मरांडी, मीरा यादव समेत बड़े नेता हैं.
झारखण्ड चुनाव में बीजेपी की हार का कारण शायद संघ भी रहा. संघ के लोग पूरी तरह से चुनावी मोड में नहीं आये. बीजेपी की जो मूल ताकत है वो संघ की ताकत है. रघुबर दास की छवि एक घमंडी और अड़ियल इंसान की रही है. उनके बारे में ये कहा था कि वो अपने कार्यकर्ताओं से गलत बर्ताव करते थे. जिसकी वजह से कार्यकर्ता उस तरह से चुनाव में नहीं जुटे जैसे लोकसभा चुनाव में जुटे थे. रघुबर को केंद्र का पूरा-पूरा समर्थन हासिल था. जिसकी वजह से रघुबर दास बेलगाम हो गए. बीजेपी के हारने का सबसे बड़ा कारण बीजेपी का गैर आदिवासी चेहरे को तरजीह देना और आदिवासियों को उससे वंचित रखने की कोशिश करना था. आदिवासियों के मन में ये डर गया कि बीजेपी उनके हस्ती को, उनके वजूद को मिटा रही है. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस चुनाव में पूरा जोर लगा दिया था. प्रधानमंत्री जी ने लगभग आधा दर्जन चुनावी रैलियां की. उसमें से भी हेमंत सोरेन को हराने के लिए मात्र 100 किलोमीटर के अंतर पर दो रैली की. इस हार से उनके छवि को धक्का लगने की पूरी-पूरी गुंजाइश है. क्योंकि लोग धीरे-धीर प्रधानमंत्री जी की बातों को मानना बंद कर देंगे.
  

Thursday, December 19, 2019

नागरिक संशोधन बिल का विरोध और इमरजेंसी की याद ताजा

माननीय प्रधानमंत्री जी देश के करोड़ों नागरिक आपसे कुछ सवालों के जबाब जानना चाहते हैं. प्रमुख गांधीवादी और इतिहासकार रामचंद्र गुहा जी को आज बैंगलोर में किस आधार पर ग्रिफ्तार किया ? जबकि रामचंद्र गुहा जी गांधी जी की फोटो हाथ में लेकर शान्ति के साथ अपना विरोध दर्ज करा रहे थे. उस दौरान पुलिस ने किस हक से उनको गिरफ्तार किया गया ? पुलिस योगेन्द्र यादव, कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, लेफ्ट के बड़े नेताओं सीताराम येचुरी, वृंदा करात और पोलित ब्यूरो के सदस्य समेत सभी साथी जो विरोध प्रदर्शन शांति के साथ कर रहें हैं. उनको आप क्यों गिरफ्तार कर रहें हैं ? इस देश को गांधी का देश रहने दें. उन्हें अपनी आवाज शान्ति के साथ रखने दें. विमर्श तो होने दें. सरकार को अगर जब लगता है कि जिन लोगों को लगता है कि वो देश के लोगों को गुमराह कर रहें हैं तो सरकार अपने ब्यापक तंत्र का उपयोग करके लोगों के भ्रम को दूर क्यों नहीं कर रही है ? आरोप लगाने से क्या होता है ? उसका समाधान निकालें. माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी कल कहा कि सरकार को अफवाहों पर लगाम लगाने के लिए ब्यापक तौर पर प्रचार अभियान चलाये और लोगों के मन में ब्याप्त शंकाओं को दूर करे. 
नागरिक संशोधन बिल अब क़ानून का शक्ल ले चुका है. इस बिल पर संसद के भीतर सरकार का सहयोग करने वाले नवीन पटनायक की बीजू जनता दल, नितीश की जनता दल यूनाइटेड, अकाली दल अब इस बिल को अपने राज्यों में लोगों करने के खिलाफ हैं. क्या ये लोग मिलकर संविधान के साथ धोखा नहीं दिए ? क्या अमित शाह जी आप इन लोगों को नक्सल समर्थक घोषित करेंगे ? अमित शाह ने बंगाल की रैली में ये क्यों कहा कि नागरिक संशोधन बिल और एनआरसी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ? आज जब देश में माहौल खराब हो रहा है उस वक्त कल से सरकार अपील कर रही है कि एनआरसी और नागरिक संशोधन बिल दोनों अलग-अलग चीजें हैं. आप जो कल से बोल रहें हैं वो पहले से बोलते तो आप नागरिकों को अपनी बात अच्छे से समझा चुके होते.
आज जो प्रदर्शन हो रहें है उसे प्रधानमंत्री जी, गृहमंत्री और मंत्री, सरकार के प्रवक्ता सब लोग इसे कांग्रेस और राजनितिक पार्टियों द्वारा प्रायोजित और जनता को गुमराह करने का आरोप लगा रहें है. तो जनता जानना चाहती है कि माननीय गृहमंत्री जी पूरे देश के कोने-कोने में जितने लोग भी सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे है, क्या वो सारे आपकी नजर में नक्सलवादी हैं ? क्या सारे कांग्रेस के बहकावे में सड़क पर उतरे हैं ? माननीय मंत्री जी आपसे विनम्र निवेदन है कि कम से कम प्रदर्शनकारियों की आवाज तो मत छीनो. संविधान की धारा 14 का उपयोग वाली जनता की संवैधानिक अधिकार तो मत छीनो। कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी बड़े से बड़े आंदोलन हुए है. लेकिन उस वक्त ऐसा माहौल नहीं देखा गया था ? इस देश में कांग्रेस सरकार द्वारा थोपी गयी "इमरजेंसी" भी देखा है. जिसमें एक नागरिक के सभी अधिकारों को छीन लिया गया था. वही हालात तो आज भी हैं. आप अपने खिलाफ उठ रही जनता की आवाज को सुनना पसंद नहीं कर रहे हैं. आप संघ के अजेंडे में इतने अंधे हो चुके हैं कि आपको अपने देशवासियों की चीख-पुकार, चीत्कार तक सुनाई नहीं दे रही है. साहब ऐसा हठ मत करो. जितने लोग भी इस देश में है सब लोग इस मिट्टी से प्यार करने वाले हैं.  
देश के हर हिस्से में उग्र प्रदर्शन हो रहा है. क्या उत्तर ? क्या दक्षिण ? सब जगह ठहराव हो गया है. पुलिस शांति बहाल करने के लिए पुरजोर पसीने में बहा रही है. जिसकी मैं सराहना करता हूँ. हमारे फ़ोर्स के भाई-बहन हमें सुरक्षित रखने के लिए हमारे हिस्से की चोट अपने साइन पर खा रहें हैं. सरकार साफ़-साफ़ कह दे कि जो भी एनआरसी में नहीं आ पाएंगे वो सारे बाहर जाएंगे. उनका धर्म कुछ भी हो, वो घुसपैठिया है. जनता को इसी बात से गुमराह किया जा रहा है. मेरा सबसे निवेदन है कि क़ानून अपने हाथ में न लें और प्रसाशन की मदद करें. हिंसा फैलाने से किसी का भला नहीं हो सकता. हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि देश की राजधानी दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट, मोबाईल सेवा को बर्खास्त कर दिया गया है. देश अपना है. उसे सवारने की जिम्मेदारी भी हमारी है.
निश्चित तौर पर अब जब भी इतिहास लिखा जाएगा तो नागरिकता संशोधन बिल की खिलाफत करने वाला आंदोलन उसमें स्वर्णिम अक्षरों में जरूर लिखा जाएगा। जो इस वक्त घर में छुप कर बैठ गया है. इतिहास में इसलिए दर्ज होगा कि इस संशोधन का विरोध बहुसंख्यक कर रहा था. जो अल्पसंख्यकों में भरोसा पैदा करने के लिए लड़ रहें हैं. इतिहास उन्हें कायरों की भाँति परिभाषित किया जाएगा। जैसे कि आजादी के आन्दोलनों में जैसे संघ और उसके नेता माफी मांगकर अंग्रेजी फ़ौज की मदद करते थे. जिनका नाम इतिहास की किताब में एक गद्दार के रूप में दर्ज है. आखिर संघ सत्ता जो चाहती थी वही हुआ. इस बिल को टुकड़े-टुकड़े और माओवादी बोला जा रहा है न कि देशद्रोही। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इसका विरोध बीजेपी शासित असम समेत पूरा पूर्वी भारत कर रहा है. वर्ना अभी तक तो एक समुदाय को देशद्रोही, पाकिस्तानी अथवा नाना प्रकार के संज्ञाओं से नवाज दिया गया होता.


      

Tuesday, December 17, 2019

नागरिक संशोधन बिल पर जामिया के बाद सीलमपुर में बवाल

नागरिक संशोधन बिल पिछले हफ्ते तो देश के दोनों सदनों से पास हो गया, पर अब देश जल रहा है. बिल से पहले तो केवल असम समेत देश के उत्तर-पूर्व के राज्यों में विरोध की आवाज बुलंद थी. परन्तु यह आग अब असम, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैण्ड से होते हुए अब देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक पहुंच गयी है. दो दिन पहले जामिया यूनिवर्सिटी के सामने विरोध प्रदर्शन किया। जो देखते हीं देखते उग्र हो गयी. वहां दिल्ली सरकार की कुछ बसों को आग के हवाले कर दिया गया. जिस पर पुलिस ने भी बल प्रयोग किया और इस क्रम में पुलिस जामिया मिलिया  यूनिवर्सिटी के अंदर पहुँच गयी और लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्र- छात्राओं के उपर  बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया गया. इस तरह का आरोप छात्रों ने लगाया है. जिसकी जांच दिल्ली पुलिस द्वारा जारी है. नागरिकता संशोधन की आग देश में भड़कती जा रही है. जामिया के छात्रों के समर्थन में देश के लगभग 22 विश्विद्यालयों के छात्र विभिन्न प्रदेशों में हड़ताल/ जूलूस निकालना शुरू कर दिया। जिसमें दिल्ली विश्व विद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्व विद्यालय, राजस्थान विश्व विद्यालय के कुछ कॉलेजों ने खुलकर जामिया के छात्रों का समर्थन किया.
यह आग वहां से निकलकर आज देश के गली-चौराहों पर आ गयी है. आज दोपहर बाद की घटना दिल्ली के सीलमपुर इलाके में घटित हुई. जहाँ नागरिक बिल का विरोध करने वाले और पुलिस के बीच तीखी बहस हुई और मामला अराजकता की तरफ बढ़ गया. छिट पूट घटनाएं भी देखी गयी. देखते हीं देखते देश में अराजकता बढ़ती जा रही है. यदि मीडिया रिपोर्टों को आधार मानें तो अब तक अकेले असम में प्रदर्शन से चार नागरिकों की मौत हो चुकी है. परन्तु सरकार अपनी कुम्भकर्णी नींद से नहीं जाग पा रही है. सरकार देश में संघ के विचारों को फैलाना तो चाहती है  पर इतनी जिद्दी हो चुकी है कि उस विचार के फैलाव के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार है. सरकार के विरोध कोई मायने नहीं रखता है. बस उसे तो अपने मूल अजेंडे में इजाफा करना है.
32 प्रतिशत लोगों ने सरकार को चुना जबकि 68 प्रतिशत लोगों ने सरकार का विरोध किया था. पर वो विरोध अब मायने नहीं रखता. क्योंकि सरकार संख्याबल के माध्यम से बहुत मजबूत है. शर्म आनी चाहिए सरकार और उसके सहयोगियों को. सरकार और उसके सहयोगियों के पास संविधान की कसम खाने और गांधी जी का नाम लेने का नैतिक अधिकार नहीं हैं. जब सदन में संविधान को तोड़ा जा रहा था तब जेडीयू (नितीश), एजीपी (प्रफुल्ल कुमार महंत) और बीएसपी (मायावती) जैसों ने बिल का समर्थन किया और आज दो दिन से सदन के बाहर वो घड़ियालू आँसू बहा रहे है. विपक्ष की जो 12 पार्टियां संविधान के लिए लड़ रहीं हैं. उनके लिए हम देशवासियों का दायित्व बनता है कि उनको समर्थन दे और दूसरों को भी समर्थन  प्रेरित करें। संविधान नहीं रहेगा तो हमारा हक भी नहीं रहेगा. सरकार को आम की डाली की तरह लचीचा होना चाहिए न कि गन्ने की तरह.


  

Saturday, December 14, 2019

रामलीला मैदान में कांग्रेस की सफल रैली

कांग्रेस की आज की रामलीला मैदान में "भारत बचाओ रैली" शीर्षक के साथ आयोजित रैली की जिसमें इकट्ठी भीड़ को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह रैली दिल्ली में आयोजित सफलतम रैलियों में से एक है.  इस रैली में लाखों की भीड़ थी, भीड़ मैदान के बाहर तक खड़ी थी. इस रैली में कांग्रेस की तरफ से तमाम नए से पुराने दिग्गज नेताओं ने अपनी बात रखी. परन्तु ओजस्वी और युवा नेता एवं राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बहुत ही ओजपूर्ण तरिके से अपनी बात रखी. सिंधिया ने तो एक नारा दिया जो बहुत हीं दिलचस्प नारा है. जो इस तरह है "बदला नहीं बदलाव चाहिए". यदि कांग्रेस प्रयोग करना चाहे तो सिंधिया का यह नारा कांग्रेस के लिए बहुत हीं उपयोगी हो सकता है.
इस रैली में एक और बात देखने को मिली जिसमें जिसमें कांग्रेस के नए पीढ़ी के नेताओं प्रियंका गांधी, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरजेवाला और स्वयं राहुल गांधी ने काफी देर तक बात रखी और आक्रामकता के साथ रखी. इन सबके शब्दों में एक तीखापन तो था पर संयमित था. इन चारों मुख्य वक्ताओं ने हाल ही में घटित घटनाओं का जिक्र करते हुए अपने भाषणों में वजन पैदा कर दिया. राहुल गांधी ने कल की घटना जिसकी अगुवाई स्मृति ईरानी कर रही थी. उनके बहाने एक बार फिर संघ पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि "मैं माफी नहीं मागूंगा. क्योंकि मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं ? राहुल गांधी है". सावरकर का जिक्र करके राहुल ने संघ के दोगलेपन को फिर से उजागर करने की कोशिश की. आज भाषण देते समय राहुल गांधी ज्यादा सहज और संतुलित दिख रहे थे. उनके भाषणों में शब्दों का चयन भी शानदार था और शारीरिक भाषा भी आक्रामक थी. आने वाले दिनों में राहुल गांधी एक बार फिर पार्टी के शीर्ष पर नजर आएंगे.
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष श्रीमती सोनिया जी भी अपने चिरपरिचित अंदाज में देश के उन सारे मुद्दों पर कार्यकर्ताओं का ध्यान आकर्षित कराया जो आज देश में ज्वलंत है. अर्थब्यवस्था के वर्तमान हालात से लेकर, धारा ३७०, महिला सुरक्षा, बढ़ती बलात्कार की घटनाएं, जीएसटी, नागरिक संशोधन बिल जैसे तमाम हालियों मुद्दों पर कार्यकर्ताओं से लड़ने की अपील की और उनका साहस बढ़ाया। अगर हम सब एक साथ मिलाकर देखें तो ये पता चलता है कि कांग्रेस को अब कुछ संभावनाएं दिखनी लगी है और आने वाले दिनों में वो राज्य दर राज्य रैली/ आंदोलन करती हुई दिखाई देने वाली है.   

Tuesday, December 10, 2019

नागरिक संशोधन विधेयक बिल पर देश में बवाल

नागरिक संशोधन विधेयक बिल 2019 पर दो-चार दिनों में देश के भीतर बहस बहुत तेजी से शुरू हो गयी है. आखिर ये 'सिटीजन अमेंडमेंट बिल 2019' है क्या ? जिस पर इतना संग्राम छिड़ा हुआ है. इस बिल के माध्यम से सरकार संविधान के मूल भावना को बदलने की कोशिश कर रही है, जिसका रास्ता हिन्दू राष्ट्र की तरफ जाता है. इस संविधान में सरकार ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं, सिखों, पारसी, जैन और क्रिश्चियन को भारत का नागरिक होने का प्रमाण देना चाहती है. सरकार का कहना है कि हम वहां के अल्पसंख्यकों को अपना नागरिक इसलिए बनाना चाहते हैं कि उन्हें उनके देश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया जाता रहा है. जिसकी वजह से वे लोग भारत में एक शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं. हम उन्हें उनका अधिकार देना चाहते हैं.    
यहां तक तो ठीक है. लेकिन गड़बड़ वहां से शुरू होता है जब ये चीन, मालदीव, भूटान और श्रीलंका में बसे (तमिल) हिन्दुओं का जिक्र नहीं करते। इस बिल से सरकार मुस्लिमों को बिलकुल अलग रखना चाहती है या यूं कहें कि उनके साथ खुले तौर पर भेदभाव कर रही है. जो स्प्ष्ट तौर पर दिखाई भी दे रहा है. हमारा देश एक धर्म निरपेक्ष देश है. जो जाति, धर्म, लिंग के आधार पर किसी को पहचान नहीं देती। जो हमारे यहां आता है तो उसे हमारा संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देती है. वो ये नहीं देखती है कि नागरिक का धर्म क्या है ? किस राष्ट्र से आया है ? उसका लिंग क्या है ? हमारे संविधान की धारा 14 नागरिक अधिकारों की रक्षक है और धारा 21 उसे और सुरक्षित बनाती है.
अगर सरकार का दिल साफ़ है तो धर्म को हटाकर संविधान के अनुरूप सभी धर्मों, लिंगों के लिए एक बेहतर शरणार्थी क़ानून ले कर आये. जिस पर एक सार्थक चर्चा हो. सरकार ऐसा दिखाने की कोशिश कर रही है कि मानों उपरोक्त देशों से आने वाले लोगों को अब से पहले नागरिकता नहीं दी जाती थी. जो सरासर गलत और भ्रामक है. पहले भी अपने-अपने देशों में सताये हुए लोगों को भारत की नागरिकता लेने का कानूनी प्रावधान है. जिसमें मुख्य प्रावधान ये है कि " जो कोई बाहरी ब्यक्ति देश में एक शरणार्थी की तौर पर शरण लिया हुआ है. तो उसके ब्यवहार को देखा, जांचा जाता है. उसके उपरान्त उसे देश में 11 साल रहने के बाद तय मानकों पर खरे उतरने के उपरान्त, शरणार्थी के आवेदन पर उसे विधिवत भारत की नागरिकता प्रदान कर दी जाती है. पर सरकार इतनी जल्दी में है कि उसमें 6 साल की निवास सीमा रखना चाहती है और मुस्लिमों को उससे दूर रखना चाहती है. 
कल संसद में देखा गया कि नागरिकता संसोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और गृह मंत्री की तरफ से गलत तथ्य रखा जा रहा था. जिसकी सत्यता जांचने के लिए मैं देश के कुछ प्रमुख इतिहासकारों के लेख को संलग्न कर रहा हूँ. जो देश के प्रितिष्ठित अखबारों में लिखे गए हैं -  
धर्म के आधार पर जिस दो राष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन माफी वीर सावरकर ने अहमदाबाद में 1935 को किया था. आज उसी पर उनके शिष्यों की सरकार आगे बढ़ रही है. दूसरे जिन्ना का जन्म संघ ने फिर किया है. देश की धर्म निरपेक्ष छवि को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है. देश की संविधान खतरे में हैं. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के सोच को मिटाकर 'मनु स्मृति' को लागू करने की कोशिश है.
नागरिक संसोधन विधेयक 2019 का देश के पूर्वोत्तर के राज्यों में जबरदस्त विरोध हो रहा है. भाजपा नीत असम और मणिपुर में तो प्रदर्शनकारी मुख्य मार्गों को जामकर सड़क पर बैठे हुए है. सड़क पर विरोध स्वरूप टायर जला रहे हैं. पूर्वोत्तर के राज्यों में  आज के बंद का जन-जीवन पर ब्यापक असर पड़ा है. क्षेत्रों की परीक्षाएं रद्द कर दी गयी हैं. राज्य के अनेक जिलों में धारा 144 लगा दिया गया है. ये सब घटनाक्रम प्रत्यक्ष तौर पर देखी जा सकती हैं. फिर भी कल संसद में सरकार की तरफ से गृह मंत्री ने साफ़ झूठ बोला कि पूर्वोत्तर के राज्यों में इस बिल का कोई विरोध नहीं हैं.           


Friday, December 6, 2019

हैदराबाद बलात्कार के आरोपियों का पुलिस एनकाउंटर

आज तड़के जब सो कर उठा तो टीवी पर एक खबर देखने को मिली। जिसमें पिछले दिनों हैदराबाद में एक महिला डॉ प्रियंका रेड्डी की कुछ दरिंदों ने पहले उसकी अस्मत लूटी फिर उसे ज़िंदा जला दिया। इस आरोप में एक तर्क ड्राइवर समेत कुल चार आरोपी पुलिस द्वारा पकड़े गए थे. परन्तु आज की रात को भोर में हैदराबाद पुलिस उन आरोपियों को उक्त घटना स्थल क्राइम सीन दोहराने के नाम पर पर ले गयी. उसका परिणाम ये हुआ कि उन अभियुक्तों का एनकाउंटर कर दिया गया. यह खबर जैसे हीं देश के सामने आयी उस पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगी. कुछ लोग पुलिस के इस कृत्य को सराह रहे थे तो कुछ लोग इसे गलत ठहरा रहे थे. हर किसी के अपने-अपने तर्क थे.         
इन सबको देखने के बाद मैं यह महसूस करता हूँ कि देश में अब कानून को खत्म कर देना चाहिए और हर जिले की पुलिस को यह आदेश दे देना चाहिए कि जिस किसी को आप मारना चाहते हैं, उसे मार दो. उसके किये की सजा शरिया क़ानून की तरह तुरंत दो या दुसरे शब्दों में कहें तो उसके किये की सजा भीड़ तंत्र के विचार अनुरूप दें. मैं मानता हूँ कि उन्होंने जघन्यतम अपराध किये थे. परन्तु उनके अपराध अब तक साबित नहीं हुए थे. अगर पुलिस जो संविधान बचाने की कसम खाती है. वही सविधान को आघात पहुंचाने लगे तो देश का क्या होगा ? भीड़ तंत्र देश के संविधान पर हावी हो जाएगा और मानवता बिखर जायेगी.
आप या हम कैसे किसी आरोपी को सजा दे सकते हैं. पुलिस की भूमिका खुद इस मामले में संदिग्ध लग रही है. पुलिस एनकाउंटर करने के अलावा अकाट्य तथ्य जुटाकर उसे फांसी की सजा दिलवा देती और उसके बाद जनता के बीच ले जाकर किसी चौक-चौराहे पर उसको फांसी पर लटका देती. इससे पुलिस का इकबाल भी बना रहता, संविधान की मर्यादा भी बची रहती तथा दोषियों को उनके किये की अंतिम सजा भी मिल जाती. परन्तु पुलिस के इस कदम से शायद हीं इनमें से किसी पहलुओं का निवारण हुआ हो. जनता हमेशा आक्रोश में आकर नेताओं पर, प्रशासन पर दबाव बनाती है. लेकिन ऐसी परिस्थिति में शासन-प्रसाशन को अपने विवेक के अनुसार सभी मर्यादाओं की पालन करते हुए कदम उठाने की उम्मीद की जाती है.

नए भारत में आपका स्वागत है !  

Thursday, December 5, 2019

सरकार पियजिया पाकिस्तान हो गईल

आज कुछ महीनों से प्याज एक महत्वपूर्ण मुद्रा बन गयी है. जो प्याज कभी एक गरीब -मजदूर के थाली की शोभा हुआ करती थी., वो आज अमीरों की शान हो चुकी है. प्याज के दाम विगत तीन महीनों में सोने से भी तेजी से बढ़ा है. आज प्याज तीन अंकों में पहुंच कर इतरा रहा है. प्याज को भी अब घमण्ड होने लगा है कि वो अमीरी की पहचान सेब और अनार से भी महंगा हो गया है. अतीत में प्याज एक बार और महंगा हुआ था. जब अटल जी की दिल्ली में सरकार थी. लोग कहते हैं कि तब प्याज की महंगाई के वजह से हीं अटल जी की सरकार चली गयी थी. उस समय मनोज तिवारी एक उभरैत हुए भोजपुरी गायक थे. जिन्होंने एक गाना भी प्याज के ऊपर गया था. उसके बोल कुछ इस प्रकार थे (हे ! अटल चाचा पियजिया अनमोल हो गईल). जो आज भी यूट्यूब पर मौजूद है. वही मनोज तिवारी आज बीजेपी दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हैं. आज सत्ता में है तो वो भी प्याज को अनार मान बैठे हैं. आज फिर वही प्याज  इतरा रही है और सरकार में शामिल लोगों को मुंह चिढ़ा रही है. 
प्याज के इतराने का पता तो तब चला जब देश की महिला वित्त मंत्री ने कहा कि "मैं इतना लहसुन, प्याज नहीं खाती हूँ जी. मैं ऐसे परिवार से आती हूँ, जहां अनियन से मतलब नहीं रखते". उनके इस कथन के बाद तो मानों प्याज के अरमानों को पंख लग गए. वो संसद की चहारदीवारी पर बैठ मंत्री, संतरी, प्रधानमंत्री को मुँह चिढ़ाने लगी. प्याज की ये हरकत सरकार को पसंद नहीं आयी और सरकार के लोग प्याज को देशद्रोही साबित करने लग गए. देशद्रोही से याद आया न, वही पाकिस्तान यार. प्याज आज आम लोगों की रसोइयों से निकलकर अमीरों के घर की शान बढ़ाए रहें है. 
आज कल आप किसी बड़ मनई (रईस/अमीर) के घर जाओ तो उनके हाल में सेब/अनार/अंगूर की जगह प्याज रखा हुआ मिलता है. जिसके घर में आपको न दिखे तो ये मत समझ लेना कि ये घर निर्मला सीतारमण जी का है (मतलब की वो प्याज नहीं खाती हैं ना तो रखेंगी क्यों). वो घर किसी आम इंसान का भी हो सकता है, जिसकी हैसियत में प्याज नहीं आती हो. निर्मला ताई ने तो जो नुख्सा देश को दिया है. अगर आप देशवासी हैं तो अब भी सम्भल जाए और अपने मन में ये बिठा ले कि अब सवाल पूछना मना है. अगर जेब में दमड़ी है तो प्याज खरीदों वरना निर्मला सीतारमण बन जाओ. अब तो प्याज भी देशद्रोही हो गया है जो भक्तों को कश्मीर में प्लाट ख़रीदने से रोक रहा है. सारे देशभक्त नाराज हैं कि प्याज भारत माता कि बेइज्जती करवा रहा है. कुछ देशभक्त तो ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि प्याज को पाकिस्तान भेज देना चाहिए और कुछ ऐसे भी हैं जो कह रहें हैं कि अगर मोदी जी आलू को प्याज बोल दें तो पूरा विश्व आलू को प्याज बोलेगा. इस तरह प्याज की समस्या खत्म हो जायेगी और भारत माता का अभिमान बच जाएगा.