Monday, August 16, 2021

अफगानिस्तान

पिछले दो दिनों से अफगानिस्तान से जो खबर निकलकर आ रही है वह निश्चित तौर पर विश्व समुदाय के लिए एक चिंताजनक सबक है. कल जब भारत 15 अगस्त को देश का 75 वां आजादी दिवस मना रहा था. ठीक उसी समय हमारे पड़ोस के देश से चरमपंथियों के कब्जे की खबर आयी. देखते हीं देखते अफगानी लड़ाके अफगानिस्तान के सबसे बड़े शहर काबुल पर कब्जा जमा लिया था और वहाँ के राष्ट्रपति अशरफ गनी अपनी जान बचाकर भाग चुके थे. अफगानी चरमपंथियों का उन्माद पूरे अफगानिस्तान में फ़ैल चूका था. अफगानिस्तान की जनता हताश हो चुकी थी.
इन सबके बीच विश्व के बड़े झंडाबरदार देशों की फजीहत हो चुकी थी. जो अपने आपको विश्व में सर्वशक्तिमान होने का दम भरते थे वो असहाय हो चुके थे. इन सबमें सबसे ज्यादा बेइज्जती अमेरिका की हुई है. बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने अपने संघमित्रों की सेना 'नाटो' को वापस बुला लिया था. उसके लगभग दो महीनों के अंदर हीं अफगानिस्तान का बंटाधार हो गया. आज वहां चरमपंथी सरकार का शासन हो चुका है. काबुल हवाई अड्डे पर दृश्य भयावह नजर आ रहा है. चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ है. अमेरिका समेत विश्व के सारे देश अफगानिस्तान में अपने दूतावास और नागरिकों को युद्धस्तर पर बाहर निकालने के प्रयास में जुटे हुए हैं. इन सबके बावजूद एक मात्र सवाल हर किसी की दिमाग में घूम रहा है कि विश्व की सबसे मजबूत खुफिया एजेंसी मानी जाने वाली अमेरिका यहां असफल कैसे हो गयी ? अफगानिस्तान के नागरिकों के लिए विश्व समुदाय को आज एक साथ खड़े होने की जरूरत है और उनके जान-माल की रक्षा करने की जरूरत है.

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