Tuesday, January 26, 2021

गणतंत्र आन्दोलन पर गर्व और ट्रैक्टर रैली में हिंसा होना शर्मनाक

26 जनवरी हिन्दुस्तान के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं? दिसंबर, 1929 में लाहौर में रावी नदी के किनारे पं. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का सम्मेलन आयोजित किया गया था और यहां पर हीं पहली बार कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया था।

उसी आयोजित सम्मेलन में कांग्रेस ने कहा था कि अगर 26 जनवरी, 1930 तक अंग्रेजी हुकूमत भारत को स्वाधीन घोषित नहीं किया। तो उसी दिन आन्दोलनकारीओं द्वारा स्वत: भारत को पूर्ण स्वाधीन घोषित कर दिया जाएगा। चूंकि अंग्रेज सरकार का  भारत को स्वाधीन करने का कोई इरादा नहीं था। इसीलिए 1930 से 1947 तक हर 26 जनवरी को कांग्रेस स्वाधीनता दिवस मनाती रही। यही वजह रहा कि 26 जनवरी, 1950 के दिन भारत को गणतंत्र घोषित किया गया तथा 26 जनवरी की तारीख हमारे इतिहास का गौरवशाली क्षण बन गया।

आज 26 जनवरी है और आज हम सभी देशवासी बड़े हीं नाज से 72 वें गणतंत्र दिवस के रूप में मना रहें हैं। जहां दल से उपर उठकर राष्ट्र के शूरवीरों को एकमत से याद किया जाता है और उनकी शौर्य गाथा से आज की पीढ़ी को अवगत कराया जाता रहा है। लेकिन आजादी के 72 सालों के इतिहास में कल देश को दो झांकियां देखने को मिलेगी। पहली झांकी सेना और उसके शौर्य की निकलती है जिसकी परम्परा आजादी के बाद से अनवरत चली आ रही है। लेकिन आज देश के सामने एक अनोखा दृश्य है। जब किसान भी सैकड़ों किलोमीटर लंबी ट्रैक्टर रैली सरकार के विरोध में निकाल रहे हैं। सुबह आठ बजे की बात करें तो गाजीपुर NH 24 पर खोड़ा से लेकर लाल कुआं तक ट्रैक्टरों से पटी पड़ी थी।

सरकार द्वारा निर्मित तीन नये कृषि कानून के खिलाफ किसान उद्वेलित है। सरकार के हठपूर्ण रवैय्ये के कारण किसानों का धरना आज 62 दिन बाद भी समाप्त नहीं हो पाया। 12 दौर की बात भी किसान और सरकार के बीच बने गतिरोध को खत्म नहीं कर पाई। ये सब बस सरकार के अकड़ के कारण हुआ। सरकार को लगता है कि हमने प्रचण्ड बहुमत प्राप्त किया है तो उसके बल पर कुछ भी करने का अधिकार हमें मिल गया है। लेकिन ये भूल गए हैं कि सड़क पर बैठे इसी गण ने इनको इतना विशाल बहुमत दिया है। और आज वही गण सत्तासीन तन्त्र को उसकी असली जगह दिखा रहा है। 

मेरे मन-मस्तिष्क में एक सवाल कौंध रहा है कि आज देशवासी किसानों की ट्रैक्टर रैली को देखें या जवानों की प्रदर्शनी को। वैसे जवानों की परेड के बाद हीं किसानों की ट्रैक्टर रैली निकलेगी। जो भी हो जब गाजीपुर सीमा से, टिकरी सीमा से किसान निकलें तो वो देखने लायक रहा। लेकिन सरकारी दबाव में न्यूज चैनल किसानों को नहीं दिखा रहे। जिसे हम सोशल मीडिया पर देख रहे हैं। किसानों से अपील है कि हमेशा की तरह आज भी आप संयम का परिचय देते हुए अपनी रैली शान्ति पूर्ण ढंग से पूरा करेंगे।

किसान देवता हैं ऐसा सत्ताधारी पार्टी हर चुनाव में बोलती रहती थी। परन्तु आज जब अन्नदेवताओं को सरकार की सख्त दरकार थी। तब सरकार उन्हें ठण्ड में सिकुड़ने के लिए छोड़ दिया है। सरकार अपनी हठधर्मिता को छोड़कर किसानों की मांगों को मान सकती थी। वो मौका गवां दिया। अगर इतिहास की बात करें तो एक बार और इसी तरह के टकराव की आहट 1965 में तमिलनाडु में हिन्दी विरोध को लेकर हुआ था। द्रविड़ आंदोलन के जनक सीएन अन्नादुरै ने हिंदी का विरोध शुरू किया था। जब तमिलनाडु के लोग 26 जनवरी के दिन काला झण्डा लेकर प्रदेश भर में आन्दोलन करने के लिए उद्वेलित थे। तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार में शामिल लोगों ने 26 जनवरी के बलिदान और इतिहास से अवगत करिते हुए ऐसा न करने की अपील की। जिसका यह असर हुआ कि सीएन अन्नादुरै ने अपना प्रतिकात्मक विरोध 26 जनवरी की बजाय 25 को किया। यहां सरकार और तमिल दोनों ने देश की गरिमा को धूमिल करने से बचा लिया।

आज ट्रैक्टर रैली के नाम पर जो हुआ वह शर्मनाक है। आन्दोलन के बीच कुछ उपद्रवी लाल किला और आईटीओ पर हिंसा की‌। जिसकी मैं भर्त्सना तो करता हूं उसके साथ इनके साथ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए ऐसी मेरी उम्मीद और आकांक्षा है। इस तरह से आप राष्ट्रीय पर्व पर कर नहीं कर सकते। आज इन आन्दोलनकारीओं को मैं इंसान नहीं मानता। मैं दिल्ली पुलिस के जवानों के धैर्य को नमन करता हूं। इस तस्वीर को विश्व समुदाय की मिडिया ने देखा। जिसका संदेश सही नहीं गया। लाल किला पर जिस जगह 1950 से तिरंगा फहराया जाता है और आज भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने ध्वजारोहण किया था। उसे उतारकर एक धार्मिक झण्डा लगा दिया गया। जो हमारे लिए और किसान आन्दोलन के लिए शर्म की बात है।


जय हिन्द

जय जवान जय किसान


No comments:

Post a Comment