Tuesday, December 4, 2018

रेडियो एक संस्मरण


रेडियों का नाम आते हीं मेरे जेहन में मेरे बचपन की याद ताजा हो जाती है कि कैसे रेडियो मेरे जिंदगी में शुरूआती दिनों से जुडी रही है जब मेरी उम्र 6 साल की थी मतलब 93 से रेडियो मेरे और मेरे जैसे करोड़ो लोगो के के दिल के बहुत करीब रहा है. मुख्यतः गावों में रेडियों ही एक मात्र मनोरंजन का साधन हुआ करता था क्योंकि रेडियों सस्ता था और बैट्री से चलता था तथा भरपूर मनोरंजन करता था,मेरे गांव (नाना जी के घर) में एक अरुण (बिल्लू) नाम के मेरे से दो साल बड़े थे और मामा लगते थे मानों उनको तो रेडियो का भूत पकड़ लिया था,मामा बिचारे दिन-रात रेडियों बजाते रहते थे वो रेडियों में इतना खो गए थे की पढ़ाई-लिखाई से भी अपने को मुक्त कर लिए शाम को प्रतिदिन जब हमारे पढ़ने का समय होता था तो महाशय तेज आवाज में रेडियों पर गाने बजाते थे फिर हमारा भी मन पढ़ाई में नहीं लगता था परन्तु मैं मेरे नाना के डर से किताब जरूर खोल कर अपने सामने रख लेता था परन्तु रेडियो पर गाने की आवाज जैसे हमारे कानों में आती थी वैसे हीं नैतिक रूप से हम पुस्तक से दूर हो जाते थे क्योंकि मेरा घर सड़क की तरफ गांव के अंतिम छोर पर था और बगीचे की तरफ से पहला मकान था,तो जब बिल्लू जी अपने छत पर बैठकर रेडियो पर गाने बजाते थे तो उसकी आवाज पुरे गांव (सड़क) तक पहुँचती थी और कोई नहीं पढ़ पता था और बिल्लू का घर मेरे घर के सामने था

उन दिनों के रेडियों पर चलने वाले कुछ प्रमुख और चैनल इस प्रकार थे-
आकाशवाणी का वाराणसी केंद्र 
आकाशवाणी का पटना केंद्र 
आकाशवादी का भोपाल केंद्र 
विविध भारती 

   आकाशवाणी का वाराणसी केंद्र महमूर गंज में केंद्रित था जो कि हमारे यहां से नजदीक था तो उसका सिग्नल बहुत अच्छा आता था और साफ-साफ बजता था 95 के दौर में मेरे मामा के ससुराल से दिल्ली सेट एक रेडियों मिला था तो सुबह 6 बजे हिंदी समाचार आता था तो गांव के बड़े जैसे सियाराम नाना (गुरु),लालचंद्र मामा (गिरी जी),टिब्भु नाना,दूधनाथ गिरि (दुद्धू),बजरंग नाना ये लोग दैनिक क्रियाओं मेरे से निवृत्त होकर मेरे द्वार पर बैठते थे और 6 बजे वाले समाचार का इन्तजार करते थे और जैसे हीं समाचार की सिटी बजती थी वैसे ही सन्नाटा छा जाता था जैसे की किसी डाकू के आने के बाद कोई तिनका नहीं हिलता ठीक वैसे हीं,एक बार जब समाचार खत्म हो जाता था तो मेरे घर पर चर्चा ऐसे होती थी मानो जैसे दिल्ली की पूरी संसद उठकर गयी है कई बार तो चर्चा करते-करते लोग उग्र हो जाते थे और एक-दो दिन तक नाराज भी रहते थे लेकिन उसके बाद रेडियों हमें फिर से एक दूसरे के साथ मिला देता था.

     रविवार के दिन जब हमारे स्कूल की छुट्टी होती थी और मेरे नाना सो जाते थे तो रेडियों को चोरी से ले जाकर धीरे आवाज में अपने बगीचे में कटहल के पेड़ पर चढ़ कर गाने सुनता था रस-रंग,रस- तरंग,हिंदी गीत,भूली-बिसरी यादें जैसे तमाम दिल को छूने वाले कार्यक्रम संचालित किये जाते थे कई बार मेरे घर आने से पहले मेरे नाना जी जग जाते थे तो मै पकड़ा भी जाता था और डाट भी पड़ती थी एकाध बार तो थप्पड़ भी मिला था,मेरे नाना जी बहुत सख्त थे क्योंकि वो खुद एक अध्यापक थे और आप लोग तो जानते हैं कि अध्यापक के क्या गुण होते है.

   रेडियों की कहानी को अपने संस्मरणों में सजोते हुए थोड़ा आगे बढ़ता हूँ क्योकि 2000 के आस-पास क्रिकेट मैच टीवी पर कम और रेडियो पर लगभग पूर्णतया आता था तो मैं अपना रेडियों लेकर दुकान पर चला जाता था वहां मैच देखने के लिए नहीं सुनने के लिए भीड़ लग जाती थी उसका वजह यह था कि मेरे गांव में केवल दो रेडियो था एक मेरे पास और एक बिल्लू के और बिल्लू जी हमेशा विविध भारती ट्यून करके रखते थे उन्हें क्रिकेट से रत्ती भर भी लगाओ नहीं था तो सब मेरे पास जाते थे मेरे अलावा एक बजरंग नाना क्रिकेट के बहुत शौक़ीन थे हम बिना खाये-पिए बस रेडियों से चिपके रहते थे चाहे टेस्ट मैच हो या एक दिवसीय हमारे प्रेम में कोई कमी नहीं थी और तो और राहगीरों को तो हम दोनों बिना पूछे हीं स्कोर बताते थे और सचिन तेंदुलकर मेरे पूरे गांव के लड़कों और बूढ़ों के हीरो थे जैसे हीं सचिन जी खेलने आते थे हम उनकी बल्लेबाजी को सुनने के लिए अपने मुंह को सील लेते थे और अगर आउट हो जाते थे तो हम सारे लोग उदास हो जाते थे फिर रेडियो को थोड़ी देर के लिए बंद कर दिया जाता था.

   रेडियों के प्रति मेरी दीवानगी 2003 में ऐसी बढ़ी की मैं घर वालों से चोरी "कशीबो" का एक पॉकेट रेडियों 150 रूपये में खरीदा उस रेडियों को मै हर वक्त अपने साथ अपनी जेब में रखता था जैसे आज लोग मोबाइल फ़ोन रखना नहीं भूलते है, मेरा वह रेडियों मेरे साथ स्कूल से लेकर खेत में काम करने तक मेरे साथ रहता था. खेतों में चाहे गेहूं की कटाई,धन की कटाई,गन्ने की कटाई या हल चलाना हो जब भी मेरा रेडियों मेरे साथ होता था सर पर पगड़ी बाँध कर उसमें रेडियो को चलकर के गाने सुनता था और काम भी करता था,अब वो रेडियों खराब हो गया है फिर भी मैं उसे अपने पास संभल कर रख रखा हूँ और वो मेरे संस्मरणों में उन्ही सवर्णिम पलों को समेटे हुए है ऐसे लाखों संस्मरण मेरे मेरे दिमाग में घूम रहे है और कौतूहल बस समेटना मुश्किल हो रहा है.

  आज लगभग 20 साल बाद देखता हूँ तो रेडियो लोगों के घरों से ऐसे गुम हो गया है जैसे घर के आँगन से गौरैया,संस्मरण जारी है........... 





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