Friday, November 29, 2019

आतंक की आरोपिनी का संसद में माफी राग

परसों बीजेपी के मध्य प्रदेश भोपाल की सांसद महोदय एवं आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा गांधी जी हत्या करने वाले आतंकी गोडसे का महिमामंडन करते हुए सदन में उसे देशभक्त बताया था और कल तक जो भक्त कह रहे थे कि प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को देशभक्त कहा वो सही था और उसका समर्थन कर रहे थे. वो अपनी दोनों आँख खोलकर देख लें आज वही आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा संसद में माफी मांग रहीं हैं और गांधी जी के विचारों को सम्मान करने को बोल रहीं है. यही गांधी की जीत है. यही तो गांधी है. यही तो देश की आत्मा है. वो गांधी हीं थे जो अनेक बर्बरता के बाद भी किसी पर हथियारों का उपयोग नहीं किया. गांधी वो थे जब उन्हें डरबन (दक्षिण अफ्रीका) के रेलवे स्टेशन पर रंग भेद के कारण उतार दिया गया था. तब भी उन्होंने उसका हिंसक रूप से जबाब नहीं दिया और माफ़ करते हुए आगे की लड़ाई की लकीर खींच दी. 
गांधी जी ने तो हमेशा घटिया और गंदी सोच वालों को अपने अच्छे विचारों से परिवर्तित किया है. ऐसे में राहुल गांधी ने जो सोशल मीडिया पर कहा उससे मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. एक आतंक की आरोपी को कैसे कोई सांसद का चुनाव लड़ सकता है ? आज सदन में महिला और सन्यासी होने का जो रोना रो रही हैं. वो उस वक्त खा गया था ? जब आप एक बार नहीं बार-बार गांधी जी को अपमानित कर रही थी. आज भी जब प्रज्ञा ठाकुर ने शर्तों के साथ माफी मांगी तो उसमें भी "तोड़-मरोड़ करके पेश करने का आरोप लगाया, और उसके संदर्भों के साथ छेड़-छाड़ करने का आरोप भी लगाया".
हद तो तब हो गयी जब आतंक की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर के बयान के संदर्भ में  वरिष्ठ सांसद श्री निशिकांत दूबे जी ने एक और आपत्तिजनक बयान दे दिया. दूबे ने कहा "एक महिला का अपमान करना गांधी जी हत्या करने से भी ज्यादा बड़ा अपराध है". ऐसा उन्होंने राहुल गांधी के "आतंकवादी" वाले ट्वीट के संदर्भ में कहा था. दिक्क्त ये नहीं है कि किसने क्या कहा ? परन्तु दिक्क्त ये है कि उन्हें सत्ता और संघ का वरद हस्त हासिल है. प्रज्ञा और उनके जैसे लोग आतंकी गोडसे को देश की रौशनी के बीच लाना चाह रहे हैं और गांधी जी के समकक्ष खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. संघ/बीजेपी के लोग आज मजबूरीवश दिखावे के लिए गांधी जी को अपनाने की कोशिश करते हैं परन्तु उनके हृदय में बापू का हत्यारा गोडसे हीं निवास करता है. संसद बाधित है, होनी भी चाहिए. क्योंकि जो देश, समाज अपने विरासत को संभालने में नाकाम रहता है तो उसका मस्तक ऊपर नहीं उठ सकता.

      

Tuesday, November 26, 2019

पवार ने महाराष्ट्र में बीजेपी की मिट्टी पलीद की

पवार परिवार बीजेपी को डूबा दिया. अजित पवार ने महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया और भाजपा को शर्म से डूब मरना चाहिए. 80 वर्षीय जवान शरद पवार ने पूरा खेल हीं बदल कर रख दिया. चाणक्य तो पवार साहब हीं हैं कोई शाह-वाह नही. पवार साहब के अलावा एक नाम और चाणक्य के रूप में उभरा है जिसका नाम है संजय राउत. बीजेपी महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए इतनी उतावली थी कि उसे नैतिकता और अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता की छवि को मिट्टी में मिला दिया. अजित पवार ने बीजेपी के सपने को मात्र 78 घंटे में हीं चकनाचूर कर दिया. बीजेपी कैसे चूक गयी ? संघ/बीजेपी के रणनीतिकारों से ये ऐतिहासिक चूक कैसे हो गयी ? संघ/बीजेपी ने महाराष्ट्र को बदनाम करने की कोशिश की थी. जिसे वहां की सम्मानित जनता कभी स्वीकार नहीं करती. जो भी हो संघ/भाजपा छवि को महाराष्ट्रऔर देश में कीचड़ में मिल हीं गयी है. वैसे प्रचारमंत्री जी को कीचड़ काफी पसंद है. वो कीचड़ में कमल खिलाने को बहुत उत्सुक रहते हैं.
आधी रात में प्रचारमंत्री महोदय आपातकाल के समय की स्थिति को लागू करते हुए अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए आधी रात में राष्ट्रपति शासन हटाने की मंजूरी दी, रात में ही राष्ट्रपति महोदय ने प्रधानमंत्री के विचार को अपने हस्ताक्षर से वैध कर दिया और 5.18 भोर में गृह मंत्रालय ने गजट जारी कर दिया. उसके बाद तोता रूपी राज्यपाल महोदय ने आनन-फानन में 22 नवंबर को फडणवीस और एनसीपी के बागी अजित पवार को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दिया और उसका परिणाम आज 26 को दोपहर बाद सारा देश देख रहा है. इस मामले में बीजेपी की प्रतिष्ठा तो धूमिल होगी हीं परन्तु इस मामले में प्रधानमंत्री महोदय खुद को मुख्य भूमिका में लेकर आये थे. क्यों अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए प्रधानमंत्री ने बिना कैबिनेट के संतुस्ती पर राष्ट्रपति शासन हटाने की मंजूरी दी थी और भोर के 5.18 पर गृह मंत्रालय ने सरकारी गजट निकाल दिया. ये सब आनन-फानन में हुआ.
बीजेपी को हाल के दिनों में चार बहुत बड़े झटके लगे हैं. जिसकी शुरुआत उत्तराखंड और अरुणांचल प्रदेश अदालत में मोदी सरकार को मुँह की खानी पड़ी. उसके बाद अपने जिद की वजह से कर्नाटक में येदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का शपथ दिलवा दिया और बहुमत साबित करने से पहले से हीं एक भगोड़े/कायर की भाँति सभा छोड़कर भाग गए. उसके बाद 24 अक्टूबर को भाजपा-सेना के पक्ष में आये परिणाम के बाद कुछ मतभेदों की वजह से साथ छूटने के बाद आनन-फानन में 23 की सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ फडणवीस को दिलवा दी और आज पूरी संभावना है कि फडणवीस भी एक रणछोर की भाँति सभा छोड़कर भाग जाएंगे. ये तो पहले दिन से तय था कि एक हारा हुआ योद्धा कभी नहीं जीत सकता.
यहाँ सबसे बड़ा फायदा अजित पवार को हुआ है. पहला फायदा तो ये हुआ कि उन्हें सिंचाईं घोटाले जैसे संगीन मामले में क्लीन चिट मिली है. क्योंकि सिंचाईं घोटाले को चुनावी मुद्दा खुद फडणवीस ने बनाया था और हर सभा में पवार को आर्थर जेल में बंद करने को कहते थे. फडणवीस और विनोद तावड़े ने सिंचाईं मुद्दे को बहुत बड़ा विषय बना दिया था. फडणवीस तो खुद मशहूर फिल्म शोले का मशहूर डायलॉग "चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग" हर सभा में बोलते थे, पर 22 नवंबर को हुआ उससे ठीक उल्टा, उलटे अजीत पवार के समर्थन से मुख्यमंत्री बने और उन्हें उप- मुख्यमंत्री बना दिया और अजित पवार को सिंचाईं घोटाले से बरी भी हो गए. इसे कहते हैं चालाकी. अब अजीत बीजेपी के लिए 'पवित्र' हो चुके हैं, क्योंकि क्लीन चिट तो भाजपा की देशभक्त सरकार ने हीं दिया है.

Tuesday, November 19, 2019

जेएनयू को बर्बाद करने की नाकाम साजिश

धीरे-धीरे एक बात अब स्पष्ट होती जा रही है कि संघ/भाजपा की सरकार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को बर्बाद और बदनाम करने की नाकाम कोशिश कर रही है। परन्तु जेएनयू के साहसिक छात्र उनकी कोशिशों को बार-बार सफलता पूर्वक असफल करते जा रहे हैं. आज जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय का नाम पूरी दुनिया में शान के साथ लिया जाता है. क्योंकि इस विद्यालय ने देश को ऐसी-ऐसी प्रतिभा दिए है जो दुनिया भर के कोने-कोने में भारतवर्ष का नाम रोशन कर रहें हैं. सबसे कमाल की बात तो तब होती है जब मोदी 2.0 में वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल रही निर्मला सीतारमण जी जवाहरलाल नेहरु के समर्थन में आवाज नहीं उठाती और मौन धारण करके अपनी रजामंदी विश्वविद्यालय का दुष्प्रचार करने वालों को देती हैं. 

Thursday, November 14, 2019

चाचा नेहरू का बाल प्रेम

आज का दिन १४ नवंबर देश के पहले प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल का जन्म हुआ था. आज देश पंडित जवाहरलाल नेहरू जी का १३० वां जन्मदिन मना रहा है जिसे देशवासी बाल दिवस के रूप में मनाते हैं. नेहरू जी एक विशाल ह्रदय के मालिक थे और प्रतिभा के धनी थे. नेहरू जी को बच्चों से बहुत लगाव था. जिसकी वजह से बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू पुकारते थे. जिस पर नेहरू जी काफी आह्लादित होते थे. नेहरू जी एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी रहें थे. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश को समर्पित कर दिया था. नेहरू जी के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी. नेहरू जी लंदन के प्रतिष्ठित स्कूल 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी' से पढ़ाई की थी. उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू जी लंदन के एक प्रतिष्ठित वकील थे. जिनके पास अथाह सोहरत थी. लेकिन अपने युवाकाल में नेहरू जी महात्मा गांधी जी से काफी प्रभावित थे. जिसकी वजह से उन्होंने अपनी वकालत के पढ़ाई के बाद उस पेशे को ज्यादा समय नहीं दिया और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए.
देश की आजादी के ७२ साल बाद आज हम देखें तो नेहरू जी को गाली दिया जाता है, उनके बलिदानों को खारिज करने की कोशिश की जा रही है, उनके विचारों पर पाबंदी लगाई जा रही है. इसे हम विडंबना हीं कह सकते हैं. जो नेता अपना सारा यश, वैभव माँ भारती को आजाद कराने के लिए कुर्बान कर दिया हो, उसके साथ इस तरह का ब्यवहार अपमानजनक किया जा रहा है. उनके बलिदानों को संघ/भाजपा अपने घृणित मानसिकता के साथ नाकरने की कोशिश कर रही है और उनके बारे में सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगह केवल झूठ, भ्रम और अफवाह फैला रहे है. जैसा कि आज हीं देखने को मिल रहा है कि सत्ता से समर्थन प्राप्त कुछ झूठे लोगों का एक समूह ट्विटर पर #ठरकी_नेहरू ट्रेंड करा रहें हैं. जो हमारे लिए बेहद अपमानजनक स्थिति है. 
नेहरू जी के जन्मदिवस पर आज गुरु/शिष्य या प्राइवेट कंपनियों में काम करने अफसरान अपने मातहतों को कुछ न कुछ खिलाकर नेहरू जी के प्रति अपनी कृतग्यता जाहिर कर रहें हैं. जिसे देखकर लगता है कि नेहरू जी के प्रति तमाम नकारात्मकता फैलाने के बाद भी उनको याद करने वाले अब भी बचे हुए हैं. मैं जब ये  लेख लिख रहा था तभी उसी दौरान मेरे मातहत काम करने वाले शुभम श्रीवास्तव की कोई रिश्तेदार गोरखपुर से फ़ोन की और बता रही थी कि उसके विद्यालय में भी चाचा नेहरू जी के जन्मदिवस को बाल दिवस के रूप में धूम-धाम से मनाया जा रहा है. जो मुझ जैसे देशवासी के लिए एक सुकून देने वाली बात है. क्योंकि हमारे विभूतियों का सम्मान हमें हर हाल में करना होगा। नेहरू जी के योगदान को कभी कोई नकार नहीं सकता और देश का हर नागरिक आज भी उनका ऋणी है.

जय हिन्द     
              

Tuesday, November 12, 2019

कांग्रेस को सेना के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए

हमारी पार्टी के तथाकथित क्षत्रपों, आदरणीय महानुभावों आपने क्या किया इतने दिनों में उत्तर प्रदेश और बिहार में ? जो आज आप महाराष्ट्र में सेना से हाथ मिलाने से डर रहें हैं. महानुभावों आप पार्टी को बचाओ अपनी महत्वाकांक्षी भावना का परित्याग करो. कांग्रेस पार्टी यह समझने में नाकाम क्यों हो रही है कि धीरे-धीरे धर्म की राजनीति हाशिये पर जा रही है. हमें उन चीजों से बाहर निकलकर सोचना पड़ेगा। कल अगर कांग्रेस की जगह भाजपा को किसी राज्य में इस तरह का सरकार बनाने का आमंत्रण मिलता तो बीजेपी अब तक शपथ लेकर मंत्रालयों का बटवारा कर रही होती। लेकिन कांग्रेस अब तक अपना मन साफ़ नहीं कर पायी है. मैं कांग्रेस की सेकुलर छवि का समर्थन करता हूँ परन्तु मौके की नजाकत ये है कि कांग्रेस को सरकार में शामिल हो जाना चाहिए। इसी में कांग्रेस का भला है. अन्यथा मुंबई में भी गोवा की पुनरावृत्ति जल्द देखने को मिल सकती है.
कांग्रेस के जो छत्रप कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया जी को बता रहें हैं वो जमीनी सच्चाइयों से कोसों दूर है. जब आपके दो तिहाई से ज्यादा विधायक बोल चुके हैं कि हमें सरकार में शामिल होना चाहिए न कि बाहर से समर्थन दें. इसके बाद भी कांग्रेस में उहापोह की स्थिति बताती है कि कांग्रेस के वेटरन नेता आज की सोच के साथ नहीं जा पा रहें हैं. सही समय पर सही निर्णय ना लेने से कांग्रेस को नुकसान होता है. निर्णय लेने में देरी हम करते हैं और जब भाजपा सरकार बना लें जाती है तब कहते हैं कि वो विधायकों को खरीद लिया है। भाई मौका दोगे तो वो कांग्रेस नहीं है, समर्थन लूट लेगी. जब आपके ४४ में से ३९ विधायक सरकार में जाने को सोच रहें हैं तो आप उन्हें कब तक टोक पाओगे ? आपको खुद समझ लेना चाहिए कि ये विधायक कही भी जा सकते हैं, फिर उनको संभाल कर रखना कांग्रेस नेतृत्व के लिए नामुमकिन सा होगा.
जब बीजेपी ऐन-केन प्रकारेण सरकार बना ले जाती है तो हम संविधान की दुहाई देते हैं. जो अब सरासर गलत लगता है. कांग्रेस ने कल मौक़ा खो दिया है. कांग्रेस के पास कल अपनी छवि को भी सुधारने का एक सुनहरा मौक़ा था, जो कल अन्धेरा होते हीं धुंध में बदल गया. कांग्रेस, एनसीपी और सेना की सरकार बनाने के ढेर सारे कारण हैं. जिसमें भयंकर बारिश के बाद किसानों की बदहाल स्थिति, कुछ सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों का संकट। इस तरह की जायज दलीलों के साथ थोड़ा वैचारिक मतभेद होते हुए भी ये एक साथ आकर जनता की सेवा कर सकते हैं. जिसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन ये तब होगा जब दिल्ली के अकबर रोड पर एसी कमरों में रहने वालों को जमीन की सच्चाई का स्वतंत्र आंकलन हो. फैसले में देर होना कहीं न कहीं कमजोरी की तरफ इशारा करता है.  
आज कांग्रेस को शिव सेना अछूत लगने लगी है पर अगर हम देखें तो सेना ने इमरजेंसी में कांग्रेस का साथ दिया, १९७७ में साथ दिया, १९८० में कांग्रेस को समर्थन करते हुए सेना ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की थी. ये तो तो तीन दशक से ज्यादा पुरानी है और २००७ में सेना ने राष्ट्रपति के चुनाव में प्रतिभा सिंह पाटिल का समर्थन किया. जो कांग्रेस की प्रत्याशी थी. २०१२ में एक बार सेना ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए कांग्रेस प्रत्याशी डॉ प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था. क्या तब सेना अछूत नहीं थी ? माना की बाला साहेब ठाकरे ने कांग्रेस के लिए कभी अपशब्द कहा था लेकिन अगर १० सालों का उद्धव ठाकरे का कार्यकाल का इतिहास देखें तो हमें प्रतीत होगा कि सेना ने कांग्रेस के खिलाफ न तो कटु वचनों का उपयोग किया है और न हीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊं विचार रखरण हैं. अलबत्ता महाराष्ट्र के २०१९ के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज मुस्लिम नेता सेना के टिकट पर जीत कर आएं हैं. तो अब कांग्रेस के लिए कोई ज्यादा सोचने की बात नहीं बचती है.
उत्तर भारतियों के खिलाफ शिव सेना का रूख कभी बाला साहेब के जमाने में था पर वो अब गुजरी बात हो गयी है. गैर मराठों पर कड़ा रूख अब मनसे रखती है. सेना का उत्तर भारतीयों के प्रति नरम रूख इस बात से देखने को मिलता है कि अब बकायदा सेना के कार्पोरेटर और विधायक महाराष्ट्र में छठ पूजा का आयोजन कराते हैं और उद्धव ठाकरे 'सामना' के माध्यम से छठ व्रतियों को धन्यवाद देते हैं. तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि अब बाला साहेब की सेना और उद्धव जी की सेना के विचार में काफी परिवर्तन आ चुका है.
सेना के जिस उग्र हिंदुत्व की बात से कांग्रेस डर रही है और उसकी केरल इकाई सेना के साथ जाने में अल्पसंख्यकों का हवाला दे रही है. उसका पटाक्षेप तो हो चुका है. अगर इतिहास उठाकर देखें तो शिव सेना का मूल रूप से तीन विचार रहा है. जिसके लिए हम उसे उग्र हिंदुत्व वाली पार्टी बोलते थे. उसमें पहला राम मंदिर निर्माण, दूसरा कश्मीर से धारा ३७० का हटाना और तीसरा मराठा मानुष। जिसमें मराठी सम्मान की राजनीति तो चलती रहेगी और बाकी दोनों मुद्दे तो अब हल हो चके है. इसी महीने की ९ तारीख को मंदिर निर्माण का रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है और लगभग ढाई महीने पहले सरकार ने कश्मीर से धारा ३७० को भी हटा दिया है. अब कोई कांग्रेसी विद्वान बताएं कि सेना की कौन सी राजनितिक अजेंडा उग्र वाली है. मुझे तो नहीं लगता है कि अब कुछ और बचा है जिससे अल्पसंख्यकों को डरने की जरूरत है.





Saturday, November 9, 2019

रामलला टाट से ठाट तक

490 साल पुराने अयोध्या मामले पर अन्ततः आज 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में 5 जजों ने निपटारा कर दिया. आज भगवान राम और बाबरी मस्जिद के मुकदमें का एक अच्छे फैसले के साथ पटाक्षेप हो गया. यह फैसला इतना महत्वपूर्ण था कि दशकों तक इससे देश की राजनिति प्रभावित होती रही. हमे तो समाचार पत्रों और मीडिया के अन्य माध्यमों से पढ़ने और सुनने को मिलता है. उसमें 12 वीं शताब्दी तक या उससे पहले तक का भी कागजी जिक्र देखने-सुनने को मिला. आज कोर्ट उन सबको जबाब दे दिया और विवादित जमीन को हिन्दू पक्षों को समर्पित कर दिया। इससे उम्मीद की जानी चाहिए कि समाज में अब हिन्दू-मुस्लिम की खाई जो समुद्र जितनी चौड़ी हो चुकी है. वो जल्दी भर जायेगी.
दिन-ब-दिन यह मुद्दा बढ़ता गया और अंततः भावुकता में बदल गया. मेरी उम्र महज 5 साल रही होगी जब उक्त स्थान पर निर्मित मस्जिद जिसका नाम 'बाबरी' था. उसे  शिव सेना, संघ/बीजेपी के लोगों ने 6 दिसंबर 1992 को ढहा दिया. उस वक्त राज्य में बीजेपी की सरकार थी. जिसके मुखिया कल्याण सिंह थे. जिन्होंने कोर्ट में हलफनामा भी दिया था कि उनकी सरकार हर हाल में बाबरी मस्जिद की हिफाजत करेगी। परन्तु अपनी कुटिल मंशा की वजह से उन्होंने आतताई भीड़ पर कोई अंकुश लगाने की कोशिश नहीं की. उसका परिणाम अब आप सबकी सामने है. जिसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया और कोर्ट की अवमानना के आरोप में कल्याण को जेल भी जाना पड़ा था.
कल्याण सरकार जाने के बाद बाबरी विध्वंश पर अदालती सुनवाइयों का दौर चला और मामला फैजाबाद की जिला अदालत से होते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंचा फिर 2010 में सुप्रीम कोर्ट तक आया और आज अपने अंतिम सफर पर पहुंचा. इसमें भी बड़ी दिलचस्प बात ये है कि जिला अदालत के आदेश पर पुअर प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जी ने राम मंदिर का दरवाजा खुलवाया था. बाद में बाबरी विध्वंश का कुछ कारक मुस्लिम समाज राजीव गांधी की मानता है. बाबरी विध्वंश के बाद कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने विवादित जमीन के अलावा 63 अकड़ के आस-पास जमीन अधिगृहित की थी. जो आज तक काबिज है. अब तक राम मंदिर पर खुलकर न बोलने की वजह से संघ/बीजेपी कांग्रेस की छवि मुस्लिम परस्त बनाने में काफी हद तक सफल हो गयी थी. इसलिए आज के फैसले पर पहले से चौकन्नी बैठी कांग्रेस ने कल की बजाय आज हीं सीडब्लूसी की बैठक आहूत की और संघ/बीजेपी से पहले राम मंदिर के बारे में अपना मन्तब्य दिया.      

कांग्रेस पार्टी का पक्ष भी अयोध्या मामले पर आ गया और वो इस निर्णय का समर्थन करती है और पार्टी मर्यादा पुरषोत्तम भगवान राम के भब्य मंदिर का समर्थन करती है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि "भगवान राम सदाचार हैं, भगवान राम त्याग हैं, भगवान राम करूणा हैं, भगवान राम प्रेम हैं. जो इन्हें बांटने की कोशिश करता है वो भगवान श्री राम की मर्यादा को नहीं समझता."


कोई नहीं जीता, नहीं कोई हारा 
देश जीता, देश का संविधान जीता  

Friday, November 8, 2019

बीजेपी की चाल से शिव सेना हुई दूर

जब ८० के दशक में अछूत माने जाने वाली बीजेपी को कोई नहीं पूछता था उस वक्त शिव सेना उनके साथ जुडी और फिर अकाली दल जुड़ा. आज वही शिव सेना है जिसका हाल आज बीजेपी ने 'न घर के न घाट के' वाली स्थिति वाली कर दी है. बीजेपी का चरित्र मोदी-शाह के आने के बाद बदल गया है. जिसे अब उनके सहयोगी भी समझने लगे हैं. आज के दौर में भी कुछ पार्टियाँ कांग्रेस से सहानुभूति तो रखती है लेकिन जैसी हीं बीजेपी के नंबर थोड़े ज्यादा आते हैं. वो बीजेपी की तरफ किसी तरह मोड़ दिए जाते हैं. जिसे आजकल शाह पालिटिक्स का नाम दिया जा रहा है. परन्तु महाराष्ट्र में अबकी बार बीजेपी तीन अंकों की पार्टी लगातार दूसरी बार बनकर उभरी है परन्तु वहां बीजेपी इस लिए सरकार बनाने में अब तक नाकाम रही है कि वहां देश के अक्खड़ हिंदूवादी पार्टी शिव सेना मौजूद है. जो अपने जिद के लिए जानी-पहचानी जाती है.
वैसे शिव सेना की ढाई साल के मुख्यमंत्री की मांग जायज लगती है. क्योंकि बीजेपी का पूरा शीर्ष नेतृत्व ज्यादा से ज्यादा सीट जीतने की कोशिश कर रहे थे ? वहां बीजेपी को पता था कि अगर हम पहले के नंबर को बरकरार रखते हैं तो सेना की सरकार में भूमिका सिमित हो जायेगी. बीजेपी पूरी तरह आत्मविश्वास में थी कि वो अपने दम पर महाराष्ट्र में सरकार बनाएगी और बीजेपी की उस मंशा को सेना के नेता-कार्यकर्ता भी भाँप गए थे. इसलिए वो बीजेपी के खिलाफ जमीनी स्तर पर काम कर रही थी. जिसका फायदा शरद पवार की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस को काफी हद तक हुआ. आप प्रचार के दौरान के वाकये को अगर समझना चाहें तो पाएंगे कि उद्धव या सेना इस चुनाव में शरद पवार जी पर बहुत नरम रही और जो उन्होंने मूसलाधार बारिश में भाषण दिया वो चुनाव के दो-तीन दिन पहले का दिन था. जब शिव सेना ने 'सामना' के जरिये उनकी तुलना मराठा शेर सी की थी. अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन होने वाला है. जिसमें कांग्रेस, एनसीपी और कट्टर हिंदुत्व का मिलन हो सकता है. यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है. इसका जबाब शायद अयोध्या मामले का फैसला आ जाने की बाद मिल जाएगा.       

Tuesday, November 5, 2019

दिल्ली में वकीलों पुलिस में भिड़न्त

देश में क्या हो रहा है ? दिल्ली कहने को तो देश का दिल है. लेकिन चार दिन से दिल्ली की सड़कों पर जो नंगा नाच हो रहा है. जिसकी शुरुआत तीस हजारी कोर्ट में हुआ जिसमें एक पुलिस ने एक वकील के ऊपर गोली चला दी और यह घटना यहां से निकल कर साकेत कोर्ट तक पहुंच गयी. जिसमें लोकतंत्र के मजबूत स्तम्भ एक पुलिस विभाग और न्याय के लिए लड़ने का दिखावा करने वाले वकीलों के बीच एक मामूली पार्किंग की बात को लेकर झगड़ा हुआ. जो बढ़ते-बढ़ते बहुत बड़ा विकराल रूप ले लिया है. मीडिया या अन्य लोगों के माध्यम से जो बातें सामने आ रहीं हैं उसमें एक पुलिस वाले ने वकील को मारा. जिसके बाद ज्यादा संख्या में वकीलों ने नजदीक के एक थाने पर हल्ला बोल दिया और एक पुलिस के जवान को बुरी तरह मारा और उसे अधमरा करके छोड़ा. लेकिन कल साकेत कोर्ट के बाहर से एक झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आयी. जिसमें एक दिल्ली पुलिस का जवान अपनी वर्दी में मोटरसाइकिल से से आता दिखता है और वकीलों की भीड़ उसे घेरकर कर मारने लगती है.

यह सब गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के आँखों के निचे दिल्ली में हो रहा है और उन लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. सरकार न तो वकीलों को समझा पा रही हो और न हीं प्रशासन को. मुझे लगता है कि सरकार को अपने वोट की चिंता है. जो अगले साल के शुरुआत में दिल्ली विधान सभा का चुनाव होने वाला है. बीजेपी सरकार को लगता है कि इस समय चुप्पी साधकर रखना हीं सबसे बड़ा अनुशासन हो सकता है. चाहे भले हीं दिल्ली की गलियां लाल रंगों में तब्दील क्यों न हो जाय. बीजेपी का चुप रहना दिल्ली के नागरिकों के लिए सबसे बड़ा झटका है. निश्चित तौर पर जब बीजेपी चुनाव में जनता के सामने जायेगी तो उनसे जनता कुछ कड़े सवाल जरूर पूछेगी.

जैसा कि हर जागरूक नागरिक जानता है कि दिल्ली की प्रशासनिक ब्यवस्था लेफ्टिनेंट गवर्नर के माध्यम केंद्र की सरकार के हाथ में होती है और दिल्ली की सत्ता में विराजमान 'आम आदमी पार्टी' हमेशा केंद्र के इस कदम की विरोध करती है. तो जो चार दिनों से पुलिस और वकीलों का हिंसक झगड़ा शुरू हुआ है. उसमें आप विधायक 'सौरभ भारद्वाज' ने उम्मीदों के अनुरूप वकीलों का समर्थन करना शुरू कर दिया है और दिल्ली पुलिस को बीजेपी का एक समर्थक विंग बता दिया है. तो आप यहां पर बाजी मारती हुई दिख रही है. जिसका कुछ न कुछ असर आगामी चुनाव में जरूर पड़ने वाला है. लेकिन बीजेपी की रहस्यमयी चुप्पी कब टूटेगी ? इसका हर कोई बेसब्री से इन्तजार कर रहा है. बीजेपी की चुप्पी यह बता रही है कि इस मुद्दे पर वह फंस गयी है.    

Friday, November 1, 2019

Whatsapp की जासूसी में सरकार की भूमिका

व्हाट्सएप जासूसी का जो मामला नजर में आ रहा है. वो हमारे अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा उत्प्नन करने वाला लगता है. यह उन्मादी सरकार जनता के मौलिक अधिकारों पर भी डांका डाल रही है. इसलिए इसका नाम "भारतीय जासूस पार्टी" होना जायज लगता है. व्हाट्सअप जासूसी मामला इस सरकार के लिए नया नहीं है. इस सरकार ने निजता के अधिकार पर बार-बार हमला किया है. एक वाकया आधार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से पेश अटार्नी जनरल रोहतगी जी ने कहा था कि 'इंसान का उसके शरीर पर भी हक नहीं है'. तो ऐसे लोग जासूसी नहीं तो और क्या करेंगे ? इस जासूसी काण्ड में अगर ठीक ढ़ग से जांच की गयी तो बहुत बड़े-बड़े खुलासे मुमकिन लगते हैं. मैं ऐसा जासूसी करने वाली कम्पनी के बयानों के आधार पर कह रहा हूँ.
जिस इजराइली कम्पनी पर जासूसी का आरोप लग रहा है उसका कहना है कि वो अपना सॉफ्टवेयर केवल सरकारों को बेंचती है. तो भारत में अगर सरकार सरकार ने नहीं खरीदा तो किसने खरीदा ? कथित कम्पनी किसी और को बेचने का नाम क्यों नहीं ले रही है ? जबकि उसका ब्यापार विश्व भर में तकरीबन १ अरब डालर से ज्यादा का है और वो किसी गैरसरकारी कम्पनी या संगठन को अपना सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है. भारत सरकार की तरफ से दूर संचार मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दे चुके हैं और ४ नवंबर तक व्हाट्सएप से आखिरी जबाब माँगा है. पत्रकारों के सवाल पर मंत्री साहब मुखर्जी जी की जासूसी से लेकर विक्रम सिंह तक का जबाब तो दे दिया कि कांग्रेस ने एक परिवार के लिए इनकी जासूसी करवाई थी. पर ये बता पाने में विफल रहे कि देश के १४०० मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों और बुद्धजीवियों के व्हाट्सएप काल की निगरानी क्यों और कैसे की गई? अगर जल्द से जल्द इसकी स्वतंत्र जांच नहीं करवाई गयी तो ये सत्ता के लिए बहुत घातक होगा.
जासूसी असंवैधानिक है. हमारे संविधान ने हमें हमारे लिए कुछ मौलिक अधिकारों का ख्याल रखा है. जिनका क्षरण किसी भी दशा में नहीं हो सकता. संविधान कहता है कि हम कैसे जिए, क्या खाये, क्या पहने, किस्से बात चीत करें ? ये हमारे विचार पर निर्भर करता है. इस पर कोर जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकता है. परन्तु ये सरकार कुछ लोगों के साथ मिलकर हमारी स्वंत्रता पर अंकुश लगाने की भरपूर कोशिश कर रही है।. इस घटना का माननीय सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं संज्ञान में लेना चाहिए और अपने निगरानी में एक स्वतंत्र जांच करवानी चाहिए.