Wednesday, November 25, 2020

अहमद भाई पटेल एक दूर्लभ प्रजाति के कांग्रेसी नेता

टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम से पता चला कि आज शुद्ध कांग्रेसी नेता आदरणीय अहमद भाई पटेल जी का तड़के 3.40 पर कोरोना संक्रमण की वजह से निधन हो गया। सबसे पहले मेरी तरफ से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान पर आसीन करें।
आज जब मैं सुबह हो कर उठा तो न्यूज एप के नोटिफिकेशन में एक खबर फ्लैश हुई। जिस पर सहसा यकीन नहीं हुआ तो उसे खोलकर पढ़ा और बेचैन हो गया कि इतना बेहतरीन इंसान इस दुनिया से चला गया। मैं कांग्रेस के लिए ज्यादा ब्यथित हुआ कि अब आगे क्या होगा ? कांग्रेस को कवर करने वाले मीडिया बन्धु और कांग्रेसी नेताओं के बयानों सुनकर और पढ़कर अहमद भाई के किरदार और अहमियत को आसानी से समझा जा सकता है। मैं कोई राजनीतिक ब्यक्ति नहीं हूं जो अहमद भाई के बारे में ज्यादा कुछ जानता हूं। पर हां ! मीडिया में उनके शख्सिसत की चर्चा मैं 2005 से सुन रहा हूं। मैं 2017 के गुजरात राज्य सभा के चुनाव को मीडिया के माध्यम से नजदीकी से समझा। जहां एक तरफ कांग्रेस के विधायक बीजेपी के पाले में चले गए थे और भाजपा ने उन्हीं बागियों में से एक को राज्य सभा के लिए समर्थन की घोषणा भी कर दी। बीजेपी के चाणक्य अमित शाह जी कत्तई नहीं चाहते थे कि अहमद भाई पटेल राज्य सभा का चुनाव जीतें। इसलिए उन्होंने अहमद पटेल की चौतरफा घेराबंदी कर दिए थे। उस दौरान शान्त रहते हुए अहमद भाई ने शाह के ब्यूह को अपने कौशल से सफलतापूर्वक तोड़ते हुए एक वोट से विजय श्री हासिल की। ये था कौशल अहमद भाई का। 
अहमद भाई कांग्रेस के वो नेता थे जो हमेशा दुनिया की नजरों से ओझल होते हुए भी कांग्रेस के सच्चे संकटमोचक रहे। हाल की दो घटनाओं में भी अहमद भाई ने अपने कौशल का परिचय देते हुए विचारों से धुर विरोधी शिव सेना को महा विकास अघाड़ी से जोड़ा और महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार का रूपरेखा तैयार किया। जिसकी तस्कीद आज सुबह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे जी ने भी किया। दूसरी घटना राजस्थान में गहलोत से टकराव के बाद पायलट का विद्रोह। जिसमें देश के सारे प्रतिष्ठित पत्रकारों, कांग्रेसी नेताओं और राजनीतिक जानकारों ने ये मान लिया था कि सिंधिया की तरह पायलट भी बीजेपी के खेमें में शामिल हैं। तब भी चर्चाओं से दूर अहमद भाई ने अपना काम बखूबी अंजाम दिया था और सकुशल पायलट की कांग्रेस में वापसी कराई। कांग्रेस के लिए वो कितने महत्वपूर्ण थे इसका अंदाजा सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जी के बयानों से जाहिर होता है। अहमद भाई गांधी परिवार के कितने करीब रहे हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है। उसका यहां उल्लेख करने का मतलब होगा बातों का दोहराव करना। तीन बार के लोकसभा सांसद और पांच बार का राज्य सभा सांसद बनने के बाद भी सत्ता का कभी हिस्सेदार नहीं बनना निश्चित तौर पर एक संत हीं कर सकता है और वो थे अपने अहमद भाई। अहमद भाई को इंदिरा गांधी जी से लेकर राजीव जी फिर मनमोहन सिंह जी ने मंत्रालय संभालने के लिए की बार अनुरोध किया। लेकिन इस योगी ने हर बार विनम्रता के साथ संगठन के लिए ठुकरा दिया। विरोधी भी अहमद भाई पटेल के मुरीद थे। बाकी मैं देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों और लोगों के शब्दों को अपने लेख में जोड़कर अहमद भाई पटेल को सच्ची श्रद्धांजलि दूंगा।









अहमद पटेल साहब को अहमद भाई कहते थे। हमारी पार्टी के ऐसे एक व्यक्ति, जिनके पास पहुंचकर सारे संकट, चिंताएँ दूर हो जाती थी। जब से पार्टी में पहला कदम लिया है तब से एक वो केंद्रित जगह अहमद भाई की ही थी : श्री @salman7khurshid 25 Nov 7.20 PM Twitter

राजनीति से भी हटकर मेरे घनिष्ठ मित्र अहमद भाई के देहांत से मुझे गहरा आघात लगा। उनका इस तरह जाना मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति है। आज मैंने अपना एक करीबी दोस्त और विश्वसनीय साथी खोया है। अहमद भाई की कमी को कोई भी पूरा नहीं कर पायेगा। श्री अहमद पटेल ने पूरा जीवन कांग्रेस पाटी के लिये समर्पित कर दिया। 
अशोक गहलोत मुख्यमंत्री राजस्थान। Twitter


Tuesday, November 10, 2020

बिहार चुनाव कांग्रेस गठबंधन के लिए सुखद

बिहार का शुरूआती रूझान कांग्रेस गठबंधन के लिए सुखद प्रतीत हो रहा है। इस चुनाव को मोदी जी और नीतीश कुमार जी ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। लेकिन नतीजों का अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि बिहार की महान जनता ने उनके अहम को काफूर कर दिया। और देश को एक नया रास्ता दिखाने के लिए बिहार हमेशा से हीं अपना उत्कृष्ट स्थान रखा हुआ है। महात्मा गांधी जी ने चंपारण से हीं अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने का बिगुल बजाया और पूरी दुनिया को चंपारण ने एक नया दिशा दिखाया था। लगता है बिहार इस भी इस निरंकुश सरकार के विचारों के खिलाफ जाकर एक नया मानदंड स्थापित करने का काम किया है।

इस चुनाव में आम तौर पर शालीनता की मूर्ति कहे जाने वाले नीतीश कुमार जी ने लालू परिवार पर कुछ निजी हमले किए। जिसमें नीतीश जी की खींझ साफ-साफ देखा जा सकता था। चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश जी सभाओं में बेचैन नजर आते थे। इस चुनाव में नीतीश और मोदी जी के कोरोना चुनौती से निपटने के लिए असफल हुए और इस चुनाव में उसका भी असर देखने को मिल रहा है। बीजेपी के नेता बेरोजगारी के मुद्दे पर सवालों का जबाव बड़े थेथरेपन से देते थे। जिससे जनता में इनके प्रति नाराजगी बढ़ती गई और ये दंभ में चूर उसे भांप नहीं पाये। जिसका परिणाम हार के रूप में सामने दिखाई दे रहा है।

गौर करने वाली बात यह है कि 1990 के बाद ये पहला चुनाव आरजेडी लालू प्रसाद यादव के बगैर लड़ रही है। लालू यादव बिहार की राजनीति में खुद एक चमकते ब्रांड की तरह रहे हैं। लालू की भाषण कला और लोगों से जुड़ने का तरीका बिल्कुल अलहदा और सुखद अनुभव वाला होता है। चूंकि लालू यादव चारा घोटाले में झारखंड की दुमका जेल में बतौर सजायाफ्ता बंद हैं। जिसकी कमी बिहार की जनता और राजद को निश्चित तौर पर कल रही है।