Friday, February 28, 2020

दंगों में झुलसी दिल्ली अब सामान्य होने की तरफ अग्रसर

इस हफ्ते देश की राजधानी दिल्ली ने अपने आप को बहुत दुःख में पाया. जहां नागरिकता संशोधन के मामले में प्रदर्शन करते हुए दो समुदाय एक दूसरे के सामने आ गए. और एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए.दशकों से चला रहा सामुदायिक भाई-चारा तार-तार हो गया. इस बीच दिल्ली के एक नार्थ-ईस्ट जिले में दंगा बहुत हद तक भड़क गया. उस इलाके के सांसद श्री मनोज तिवारी जी हैं. जो बीजेपी के दिल्ली प्रदेश इकाई के अध्यक्ष भी हैं. इस बीच रूक-रूक कर दु:खद और हृदय विदारक खबरें देश की जनता के सामने आती रहीं. जिसमें एक-एक करके लगभग 39 लोग अब तक अपनी जान गवां चुकें है. अस्पतालों में न जानें और भी कितने लोग हैं. जो अपने जीवन की अंतिम साँसें गईं रहें हैं. खैर अब धीरे-धीरे हालात सामान्य होने लगे हैं. लेकिन जख्मों को भरने में निश्चित तौर पर एक लम्बा समय लगेगा. 
इस दंगे में नुकसान दंगा भड़काने वालों को नहीं हुआ. अगर किसी का कोई नुकसान हुआ है तो वो है दिल्ली की भोली-भाली जनता. दिल्ली की जनता के भाई-चारे का नुकसान हुआ, आपसी सद्भाव का नुकसान हुआ और उससे भी ज्यादा मानवता का नुकसान हुआ. इस दंगे में चाहे आईबी अधिकारी शर्मा की हत्या की गई हो या फुरकान की. ये दोनों उस धार्मिक जंग का हिस्सा नहीं थे. लेकिन उनके साथ दंगाइयों ने क्रूर मजाक किया है. और दंगाइयों को संरक्षण देने वाली राजनैतिक पार्टियां अब आरोप-प्रत्यारोप पर उतरा आयी हैं. लेकिन ये नहीं बता सकने की स्थिति में है कि ऐसी घटना कैसे घटित हुई ? जो की देश के माथे पर एक कलंक के समान है. ठीक उसी तरह जिस तरह हम 1984 के सिख दंगे को, 2002 के गुजरात दंगे को, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे को देखते हैं. अब उसी कड़ी में 2020 दिल्ली का दंगा शामिल हो गया है. ये सारे दंगे मानव समाज को अंदर से झकझोर देने वाले थे. 
जब गोकलपुरी, मौजपुर, करावल नगर, शिव बिहार, भजनपुरा, खजूरी, सीलमपुर, चाँद बाग़ की नालियों से शव निकाले जा रहें हैं. उस दौरान उसी दिल्ली दिल्ली ने इस दंगों के दौरान कुछ ऐसे नजारे भी देखें जिनसे प्रतीत हो रहा है कि अभी भी भाईचारे को बढ़ाने वाले लोग है. चाँद बाग़ क्षेत्र के जाकिर नगर में देखने को मिला. जब एक प्राचीन शिव मंदिर के पुजारी हालात से डर कर मंदिर छोड़ कर जाने का मन बना लिया था. तभी मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग आये और उन्हें रुकने की सलाह तथा जान-माल की पूरी हिफाजत करने का भरोसा दिलाया. बकौल मंदिर पुजारी श्री पंडित राकेश शास्त्री पुजारी प्राचीन शिव मंदिर "जावेद भैया आये उन्होंने बोला कि पंडित जी कहीं जाने की जरूरत नहीं हैं. अगर कोई गोली यदि चलाएगा तो सबसे पहले हम उसे अपने सीने खाने के लिए तैयार हैं. सभी लोग आये और बोले कि किसी तरिके से डरने की आवश्यकता नहीं है." इसके बाद मुस्लिम युवकों ने मानव श्रृंखला बनाकर मंदिर की रक्षा की. उन मुस्लिम युवकों पर दंगाई भीड़ ने पत्थर भी फेकें पर वो युवक टस से मस नहीं हुए. ये खबरें हमारे भाई-चारे को बहुत मजबूत बनाने का काम करती हैं. इसमें कुछ हिस्सा आज तक की रिपोर्ट का भी है. जिसका लिंक भी शेयर कर रहा हूँ.      
शासन-प्रशासन ने तो दंगे रोकने में कोई तत्तपरता तो दिखाई नहीं. क्योंकि इनको ट्रम्प की सेवा करनी थी. गृहमंत्री जी और प्रधानमंत्री जी अहमदाबाद में 'नमस्ते ट्रम्प' में ब्यस्त थे और इधर दिल्ली में दंगाई दंगा करने में ब्यस्त थे. जब गृहमंत्री जी गुजरात में ब्यस्त थे तो दिल्ली वालों की सुध लेता कौन ? पुलिस कमिश्नर साहब गृहमंत्री जी के आदेश की बाट जोह रहे थे. जब तक उनका इशारा आता तब तक दिल्ली का नार्थ-ईस्ट जिला शवों के ढेर में बदल चुकी थी. दुकाने या तो जला दी गयी थी या लूट ली थी गयी थी. इन सबमें गरीब बस पीसा जो शराफत से गुजर-बसर कर रहा था.
दिल्ली उच्च न्यायालय के जब श्री मुरलीधरन ने जब दंगा न रोकने के संदर्भ और भड़काऊं भाषण देने वालों पर कार्यवाही न होने के संबंध में दिल्ली पुलिस को डांटा तो आधीरात को उनका स्थानांतरण कर दिया गया. क्योंकि जज साहब ने दिल्ली पुलिस पर कुछ गंभीर टिपण्णी की थी. जो शायद मोदी सरकार को पसंद नहीं आयी और आनन-फानन में सत्ता की तरफ से स्थानांतरण का रास्ता ढूंढ लिया गया. क्योंकि सवाल दिल्ली पुलिस पर था और दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के अधीन है. जज साहब ने दिल्ली पुलिस पर अपनी टिप्प्णी करते हुए कहा था कि "हम अभी भी 1984 के पीड़ितों के मुआवजे के मामले से निपट रहे हैं. ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए, लोगों से बात जरूर करनी चाहिए." जज साहब की ये चिंता शायद सत्ता को पसंद नहीं आयी. और ये हकीकत है कि 1984 के पीड़ित आज भी अपने न्याय की लड़ाई लड़ रहें हैं.  




Tuesday, February 25, 2020

दंगों में झुलसती दिल्ली को प्यार की दरकार

दिल्ली के आप सभी प्रबुद्ध नागरिगों से विनम्र निवेदन है कि आप लोग अफवाहों पर ध्यान न दें. सरकार के प्रतिनिधि और प्रशासन के लोगों पर आप आँख बंद करके यकीन करें. प्रशासन के लोग निश्चित तौर पर आप पीड़ितों की मदद करेंगे और जरूरत के मुताबिक़ आपको सुरक्षा भी प्रदान करेंगे. इस आफत की घड़ी में आप सभी लोग मिलकर दिल्ली में शांति स्थापित करने का प्रयास करें. कुछ लोग सोशल मीडिया पर धर्म इत्यादि के नाम से नफरत फैला रहें हैं. उनकी बातों पर थोड़ा सा यकीन न करें. हम सबका धर्म बहुत बृहद है. उसे कोई क्षीण नहीं कर सकता है. आप लोग संयम से काम करें और प्रशासन की मदद करें। इस तरह आतंक का खुला नंगा नाच हमें किताबों में पढ़ने को मिलता है. जिसे 1984 के दंगे के नाम से जाना जाता है. हमें बुरे इतिहास से सिखने की जरूरत है और सबके अंदर इंसानियत की भावना जगाने की जरूरत है.
आप चिंता न करें. जिन्होंने धर्म की आड़ में कल इतिहास लिखने की कोशिश की थी उसमें से एक को अंग्रेज का समर्थक और दूसरे को पाकिस्तान का जन्मदाता जिन्ना बोला जाता है. ऐसा इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है. और इस देश में उन्होंने खड़ा होने में कई दशक लगे हैं. ये देश किसी की जागीर नहीं है. देश का संविधान है. जो सबको अपनी बात रखने का हक देता है. जैसे आज के सत्ताधारी 1975 में प्रचंड आंदोलन किये थे. जो लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी था. जब वो देशद्रोही नहीं बोले गए थे. आतंकियों को जब कंधार में ले जाकर छोड़ा गया था. जब वो देशद्रोही नहीं थे. धर्म हमारा अपना ब्यक्तिगत विषय है और देश सबका सार्वजनिक विषय है, अभिमान का विषय है. इस समय हमें दिल्ली वालों के लिए ईश्वर, अल्ला से प्रार्थना करना चाहिए कि ये माहुअल जल्द से जल्द सुधरे और तमाम शहरी पूर्व की भाँति फिर से एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें. हमें दिल्ली वासियों के लिए अपनी शुभेच्छा जाहिर करने की जरूरत है.


Monday, February 24, 2020

वाह गांधी फख्र हैं कि आप हमारे हो

आज अमेरिका के राष्ट्रपति हमारे देश आये और गुजरात के धरती पर हीं उतरे. वहां उतरने के बाद ट्रम्प सीधे हवाई अड्डे से 'साबरमती आश्रम' पहुंचे. वहां वो अपनी बेटी के साथ पहुंचने के बाद बापू को नमन किया और उसी चरखे पर सूत काता जिस पर बापू कभी 100 साल पहले सूत कातते हुए अंग्रेजों के खिलाफ स्वदेशी को बढावा देने का एक जनांदोलन चलाया. आज हमारे उसी बापू को पूंजीवाद का सबसे बड़ा देश और उसका प्रथम नागरिक आज सिर झुका रहा है. यही तो हमारे बापू की ताकत है. जिस पर हम विश्व समुदाय को बता सकते हैं कि बिना मार-काट के अहिंसा के माध्यम से हम मुश्किल से मुश्किल मंजिल को आसानी से हासिल कर सकते हैं. यह साबरमती वह पुण्य भूमि है जहां इसकी नींव रखने के बाद बापू जी 12 सालों तक रुके थे और जब 1920 में बापू जी यहां से दांडी मार्च के लिए निकले तो ये बोल कर निकले थे कि अब वो देश को आजाद कराकर हीं वापस यहां आएंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. आजादी के बाद बापू की हत्या एक सनकी ने कर दी. जिससे वो दुबारा उस जगह नहीं लौट सके. 
आज ट्रम्प तो साबरमती आश्रम जरूर पहुंचे, सूत भी काता लेकिन 'विजिटर बुक' में ट्रम्प ने गांधी जी के बारे में न लिखकर अपने प्यारे मित्र मोदी के बारे में लिखा और उन्हें धन्यवाद दिया. ये बात थोड़ी अखरने वाली है. हो भी सकता है. मेरे मन में एक सवाल पैदा हो रहा है कि क्या ट्रम्प गांधी जी को जानते भी हैं ? अगर नहीं जानते थे तो उन्हें शो बाजी के लिए वहाँ जाने से परहेज करना चाहिए थे. मोदी जी की भब्यता को, उनसे अपनी दोस्ती को ट्रम्प मोटेरा स्टेडियम में भी जाहिर कर सकते थे. क्योंकि ट्रम्प मनमौजी तरिके के आदमी है. वो चीजों को अपने तरिके से परिभाषित करते हैं. जो भी है आज वही अंग्रेज हमारे बापू के सामने झुक रहें हैं. जो आजादी के दिनों में या उससे पहले करमचंद गांधी का घोर मजाक उड़ाते थे.
मेरे मन में इन सबके साथ एक सवाल और उमड़ रहा है कि हमारे समाज का एक कट्टर वर्ग हमेशा से हीं पश्चिमी देशों की सभ्यता को लेकर असभ्य बोल बोलता रहता है. लेकिन उसी संगठन से निकले लोग आज एक पश्चिम देश के किसी नेता के आगमन पर अति उत्साहित नजर आ रहें हैं. इनके कट्टर विचारों को अब क्या संज्ञा दिया जाय ? उस कट्टर वर्ग को आरएसएस लीड करता था. और आज के हमारे प्रधानमंत्री उसी आरएसएस के लम्बे समय तक प्रचारक रह चुके हैं. जिस बापू से संघ आजीवन घृणा करता रहा. आज उसी बापू के सामने संघ के समर्थक घुटनों के बल झुके हुए दिखाई पड़ रहें हैं. यही तो हमारे बापू है. जो उन्हें उनके हत्यारे और हिन्दू राष्ट्र के विचारकों को आज भी अपने समाधि, विचारों के आगे झुका देते हैं और ऐसे बहसी लोग बापू के सामने घुटनों के बल बैठ जाते हैं.      


  

Saturday, February 22, 2020

गुजरात के विकास मॉडल को दीवार से ढक कर क्यों छिपाया जा रहा है

ये फरवरी महीना जिसे की युवा प्यार का महीना भी कहते हैं. धीरे-२ अपनी ढलान की तरफ जा रहा है. वैलेंटाइन डे से लेकर कई दिन युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं. पर इसी प्यार के महीने के अंतिम सप्ताह में एक और चीज होने की तरह अग्रसर है और वो है अमेरिका के चर्चित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा. हम इसे भारत यात्रा कम गुजरात यात्रा ज्यादा कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. क्योंकि उनके गुजरात यात्रा की शुरुआत मोटेरा स्टेडियम में होगी. जिस पर अरबों रूपये का खर्च आएगा. ये खर्च किस संस्था के द्वारा वहन किया जाएगा ये साफ़ नहीं हो रहा है. बस इतना सुनने में आ रहा है कि हिन्दुस्तान में एक 'नमस्ते ट्रम्प' की नाम की संस्था है. जो इस यात्रा का पूरा खर्च उठा रही है. 
सबसे आश्चर्य करने वाली बात ये है कि इस संस्था का नाम अब से पहले किसी ने सुना तक नहीं था. आज एकाएक यह संस्था भारत के जन मानस के सामने 'केतू' की भाँती चमकने लगी है. उससे भी आश्चर्य की बात ये यही कि इस संस्था की पहुंच वहां तक है. जहां तक हमारे प्रचारमंत्री जी की नहीं है. मतलब अमेरिका के 'व्हाइट हाउस' तक. नमस्ते ट्रम्प नामक संस्था ने न सिर्फ ट्रम्प को हिन्दुस्तान के गुजरात में बुला लिया बल्कि हमारे देश के प्रधानमंत्री महोदय को भी बुला लिया. मैं तो इस संस्था की ताकत को प्रणाम करता हूँ. इतनी ताकतवर संस्था अगर हमारे देश में है तो हम चीन और पाकिस्तान के आगे क्यों बेबस नजर आते हैं. हमारे प्रधानमंत्री महोदय को एक बार इस संस्था के प्रमुख से अपनी चिंता बता देते और बिना देर किये ये संस्था ट्रम्प चाचा को आदेश दे देती और चीन-पाक को घुटने टेकने पर मजबूर कर देती. फिर ना होता पाकिस्तान और ना होती हमारे वीरों की शहादत. २४ फरवरी को ट्रम्प के सम्मान में अहमदाबाद में जो कार्यक्रम तय हैं, उसमें ट्रम्प के अनुसार ७० लाख से १ करोड़ लोग उनकी अगुआई करेंगे. वो भी सड़कों  के दोनों तरफ खड़े होंगे. किसी भी मेहमान का सम्मान होना चाहिए परन्तु झूठ के बिनाह पर नहीं.
एक विदेशी नेता की अगुवाई के लिए हमारे भारतवासियों का क्या मजाक बनाया गया है ? स्टेडियम के पीछे कुछ गरीब भाई-बहन झुग्गी-झोपड़ी बनाकर अपना गुजर-बसर करते थे. अब उन्हें तोड़ने का फरमान जारी किया जा चुका है. और तो और उनके घरों के सामने ८ फ़ीट ऊँची दीवार खड़ी कर दी गयी है. वो भी बस इसलिए कि अंग्रेजी मेहमान को कहीं झुग्गी न दिख जाय. ये उस राज्य का विकास मॉडल है जिसके बोल ने लोगों के कान में एक स्थायी घर बना लिया था और गुजरात को 'द्वारकापुरी' से भी समृद्ध नगरी कहकर प्रचारित किया गया. उसी गुजरात मॉडल की ये हकीकत है कि २५ साल की सत्ता के बाद वहां की गरीबी, बेगारी छिपाने के लिए दिवार खड़ी की जा रही है. यह स्थिति उन लोगों के लिए भी शर्मनाक है. जिन्होंने इस मॉडल को सुपर मॉडल कहकर प्रचारित, प्रसारित किया.
मेरा सवाल गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री जी से है कि यदि आपने इतना विकास किया तो ये कैसे छोट गया ? इनकी गरीबी का मजाक उड़ाने के लिए आप अपनी गुजरात सरकार पर क्या कोई कार्रवाई करेंगे ? एक विदेशी के स्वागत के लिए आप एक हिन्दुस्तानी के सम्मान को नीचा दिखाने वाले जिम्मेवार लोगों के खिलाफ क्या करवाई करेंगे ? ये सब देखने की बात है. इसी गुजरात मॉडल को प्रसारित करके भाजपा ने केंद्र की सत्ता हासिल की थी और वही नेता प्रधानमंत्री बने. जो निरंतर १५ साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. अब ऐसा लगता है कि साहेब के गुजरात से निकलते हीं वहाँ की स्थिति पर उनका काबू नहीं रहा. लेकिन गुजरात विकास मॉडल का सपना साहेब ने हीं बना था. जो अब धीरे-धीरे एक-२ करके देश के सामने निकल कर आ रही है. जो तथाकथित विकास मॉडल वाला राज्य था अब उसमें हर तरफ असंतोष देखने को मिल रहा है. वो चाहे दलित आंदोलन हो, सवर्ण आंदोलन हो, पटेल आंदोलन हो, पिछड़ा आंदोलन हो. हर वर्ग अब मुखरता के साथ अपनी आवाज को उठा रहा है. जो देश को सामने हैं. दिवार लगाकर उसी आवाज को छुपाने का एक बार फिर प्रयास किया जा रहा है. 

Tuesday, February 18, 2020

पी के का केजरी को दिल्ली जीताने के बाद बिहार प्लान का खुलासा

दिल्ली चुनाव परिणाम के उपरान्त देश का माहौल जामिया यूनिवर्सिटी पर फिर से आकर टिक गया है. दो-तीन दिन से एक-एक करके व्हाट्सप्प वीडियो रिलीज किये जा रहें हैं. जिनकी सत्यता पर संदेह बरकरार है. परन्तु देशभक्त न्यूज़ चैनल अपनी भक्ति का भरपूर निर्वहन करते हुए बेरोक-टोक उसे चला रहें है और तरह-तरह की भाषा का प्रयोग कर रहें हैं. अब तो हर कोई दिल्ली के परिणाम से वाकिफ हो चुका है. केजरीवाल जी ने अपनी फिर से पुरानी वाली मंत्री परिषद को बहाल किया है. आधा दर्जन से ज्यादा महिला विधायक जीत कर आने के बाद भी उनमें से किसी एक को मंत्री लायक नहीं समझ सकें. वैसे ये आंकलन केजरी और उनकी टीम के लोगों को करना होगा. फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि इतने बड़े बहुमत से दुबारा जीत कर आने के बाद कम से एक महिला मंत्री को जरूर शामिल किया जाना चाहिए था. 
दिल्ली में केजरीवाल को सफलता दिलाने के और नितीश की पार्टी से निकाले जाने के बाद प्रशांत किशोर आज बिहार पहुंचे और वहाँ बिहार को एक नया आयाम देने के हुंकार भरी. क्योंकि इस बरस के अंत में अब अगला चुनाव बिहार में हीं होना है. तो उन्होंने सोचा कि क्यों न अभी से बिहार पर चढ़ाई कर दी जाय. आने वाले 10 सालों में बिहार को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने जो शब्द प्रयोग किये वो सुनने में बहुत रोचक हैं. जिनमें प्रशांत किशोर का कहना है कि हम किसी को हराने या किसी को जिताने नहीं आये हैं. बल्कि प्रदेश के होनहार, ईमानदार एवं कर्मठ युवाओं को बस बिहार के खातिर जगाने आएं हैं. जिसके लिए उन्होंने 20 फरवरी से "बिहार की बात" नाम से एक कार्यक्रम चलाने का औपचारिक ऐलान भी कर दिया है. अब देखना ये है कि पी के का बिहार में आना भाजपा-जदयू गठबंधन को कितना नुकसान पहुंचा पाता है या नितीश कुमार, मोदी और शाह की जोड़ी के साथ मिलकर पी के को शून्य साबित करती है. क्योंकि नितीश अपने भरोसेमंद चेहरे के रूप में चुनाव में उतरेंगे तो मोदी-शाह अपने भारी भरकम कद के साथ. जिसमें ढेर सारा धन होगा, सत्ता की ताकत होगी, मंत्रियों की फ़ौज होगी. उसमें हिन्दू-मुस्लिम करने वाले कुछ बयानवीर होंगे, कुछ गोली मारो...... को बोलने वाले होंगे. इन सबसे बिहार की प्यारी जनता और पी के को लड़ना होगा. अब पी के इनका कैसे मुकाबला करते हैं ? ये आने वाले दिनों में देखने को मिल जाएगा. बिहार में आने वाले चुनावों की शोर अभी से सुनाई देने लगी हैं. शायद पी के को ये पता है कि मुख्य वोटर किसे वोट करना है वो 6 महीने पहले हीं अपने मन में निर्णय कर चुका होता है. इसलिए वो अभी से बिहार की जनता के मन में जगह बनाने की कोशिश कर रहें हैं.  

Friday, February 14, 2020

एक साल बाद पुलवाला के शहीदों को पूरे देश में गमगीन श्रद्धांजलि दी जा रही है

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आज देश नम आँखों से ठीक एक साल पहले हुए पुलवामा हमले की बरसी पर अपने वीर बांकुरों को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है. उनकी याद में आज जगह-2 श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है. जनता उनके चित्रों पर भारी मन से पुष्प आदि अर्पित करते हुए उनके फोटो को देखकर गमगीन हो रही है. 14 फरवरी 2019 को दोपहर बाद आतंकियों के कायराने हमले में हमारे 40 वीर जवानों की जान चली गयी थी. इस दर्द का असर देश में चहुँ और देखा गया और उसी का नतीजा था कि 10 दिन के अंदर हीं हमारी सेना ने पाकिस्तान में घुसकर इन कायरों का मारा था. इस कायराने हमले के बाद देश के लोगों में बहुत गुस्सा था. जिसे हमारी सरकार ने समझ लिया था और बिना समय गवाएं सेना को अपनी कार्रवाई करने की छूट दे दी थी. देश के नागरिकों से गुजारिश है कि प्यार का त्यौहार वैलेंटाइन डे और पुलवामा में शहीद माँ भारती के शेरों को एक साथ मनाये और याद करें.
आज एक साल गुजर जाने के बाद भी कुछ सवालों का जबाब आ तक नहीं मिल पाया है. मसलन इतनी बड़ी मात्रा में बिस्फोटक कहाँ से आया ? उसे लाने वाला कौन था ? किस रास्ते से आया ? जो भी दोषी था वो पकड़ा गया या अभी नहीं ? इन सब सवालों का जबाब अभी जनता के सामने के सामने नहीं आया है. हाँ, हमने पाकिस्तान पर दो-2 कड़ी कार्रवाई की परन्तु इन सवालों का अभी भी गौड़ है. सरकार कहती है कि पुलवामा हमले में शामिल कायरों में से 5 को हमारी शेर सेना ने मार गिराया। इस पर हमें पूर्ण विश्वास है. पर सरकार यह बताने में अक्षम क्यों है कि इसमें कौन-कौन से गद्दार शामिल थे. उनकी पहचान जनता के सामने आनी जरूरी है. कम से कम हमें भी तो उस आस्तीन के सांप का पता लगे कि वो कायर कौन है ?
जब हमारे शहीद तिरंगे में लिपटकर अपने-2 घर पहुंचे थे तो उस वक्त अपनी आदतों के अनुरूप हमारे महान राजनेताओं ने शहीदों के सम्मान में बड़े-2 वादे करने से नहीं चुके परन्तु आज एक साल बीत जाने के बाद शहीद परिवारों को बस आश्वासन हीं मिलता जा रहा है. कुछ परिवारों को उचित सम्मान तो मिला पर कुछ को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. यह हाल किसी एक पार्टी या सरकार की नहीं हैं. लगभग सभी राज्य सरकारें एक हीं ढर्रे पर हैं. आज जो बाप अपने बेटे की फोटो हाथ में लिए निहारता रहता है. तो उसकी ममता का तो कोई मोल हो हीं नहीं सकता. परन्तु जो सरकारों के हाथ में हैं उसके माध्यम से उस शहीद के पिता को थोड़ी सांत्वना तो दिलवा हीं सकता है. पुलवामा शहीद जवानों की याद लोगों को लोक सभा चुनाव बाद आज उनके बरसी पर आ रही थी. आज से पहले तो हम गाली-गलौज में, चुनाव-प्रचार में ब्यस्त थे. हमारे जवानों के प्रति हमारा ये नजरिया कत्तई उचित नहीं कही जा सकती. उन्हें हम हर वक्त अपनी साँसों में बसा कर रखे. जब उन्हें उनकी कुर्बानी का वाजिब मिलेगा. हमारे वीर जवान सीमा पर हैं जभी हम सुरक्षित हैं. अन्यथा हमारा कोई अस्तित्व नहीं.
अंग्रेजी के एक पतिष्ठित अखबार hindustantimes की एक कटिंग मैं इस लेख के साथ संलंग्न कर रहा हूँ -

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हिन्द के शेर आपके चरणों को नमन.       


Tuesday, February 11, 2020

दिल्ली चुनाव में देश जीता बीजेपी पाकिस्तान हारा

आज दिल्ली चुनाव में देश जीता पाकिस्तान हारा. ऐसा मैं इसलिए कहना चाहता हूँ कि भाजपा के शीर्ष नेताओं ने जीत और हार को हिन्दुस्तान की जीत और पाकिस्तान की जीत हार का नाम दिया था. बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने बार-बार कहा कि अगर भाजपा जीतती है तो देश की जीत होगी और हारती है तो पाकिस्तान की हार होगी. लेकिन आज तो दिल्ली की जनता ने भाजपा को सिरे से नकारते हुए उन्हें हीं सत्ता सौपीं हैं. जिसे ये लोग भाजपा वाले आतंकवादी और पाकिस्तानी कहते थे. वो जीत रहा है. और 10 हजार से भी ज्यादा जनसभा करने के बाद बीजेपी/ संघ हार गयी है. राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इसके बहुत बड़े मायने हैं. उसका प्रथम मायना ये है कि आप आप महज चुनाव जितने के लिए देश के निर्वाचित मुख्यमंत्री और नागरिकों को पाकिस्तान समर्थक नहीं बता सकते. उन्हें आतंकवादी नहीं कह सकते. यदि आप के ठोस आधार है तो ऐसे लोगों को जेल में डालना चाहिए.
दिल्ली के परिणाम और पीछे के कुछ चुनावों से कुछ बातें स्पष्ट होती जा रही है. जिन्हें मैं अपनी समझ के अनुसार रेखांकित करने की कोशिश कर रहा हूँ -
  1. अब पाकिस्तान का नाम लेकर आप जनता का विश्वास नहीं जीत सकते. आपको कुछ और करने की जरूरत है.
  2. आप जनता के सामने बगैर सार्थक और सकारात्मक मुद्दों के गए तो आपको इसी तरह के नतीजे देखने को मिलेगा.
  3. दिल्ली में 2015 के बाद कांग्रेस एकदम हासिये पर चली गयी है या यूं कहें कि समाप्त हो गयी है. 
  4. नागरिकता कानून के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में धरना पर बैठी महिलाओं के ऊपर शाह से लेकर प्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर, योगी आदित्यनाथ जैसे शीर्ष नेताओं ने जिस तरह की ओछी टिप्पणी की. उसका भी कुछ असर भाजपा के परिणाम पर देखने को मिल रहा है.
  5. शाहीन बाग़ के मुद्दे को बीजेपी ने शाह की अगुआई में दिल्ली के चुनाव में एक मुद्दा बनाया जो कुछ हद तक कारगर रहा और बीजेपी की कुछ सीटें अवश्य बढ़ीं है. पर उतनी नहीं की सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा दें.
  6. गृह मंत्री और बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कई बार बयान दिया कि 'ईवीएम का बटन इतनी तेज से दबाना कि उसका करंट शाहन बाग़ तक लगे'. उनके इसी लाइन को लगभग प्रधानमंत्री जी ने कड़कड़डूमा की रैली में दोहराया था.
  7. केंद्र की सत्ता ने शाहीन बाग़ को 'तौहीन बाग़' कहकर सम्बोधित करना शुरू किया. इसके बाद गोली मारो सालों का नारा बीजेपी के केंद्र सरकार के मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिया. इसे दिल्ली की महान जनता ने नकार दिया.
  8. पिछले 5-6 चुनावों को आधार मानकर देखा जाय तो बीजेपी वहां चुनाव हार जाती है. जहां उसके प्रतिद्वंधी उसके सामने सकारात्मक राजनीति करते हैं. रोजी-रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली ऐसे मुद्दों के सामने बीजेपी का राष्ट्रवाद हार जाता है. उसका औरों का पाकिस्तानी करण किसी काम नहीं आता.
  9. दिल्ली चुनाव का पना एक राष्ट्रीय महत्व है. यहां से निकला परिणाम पूरे देश में जाता है. क्योंकि पूरे देश की जनता दिल्ली में निवास करती है.   
  10. इस जीत के बाद जाहिर तौर पर आप अति उत्साही हो जायेगी और उन्हें राष्ट्रीय नेता के तौर पर एक बार फिर प्रदर्शित करने की कोशिश करेगी. जो आप के लिए नुकसानदेह रहेगा.
  11. इस चुनाव में जो भी गालीबाज नेता थे वो सब चुना हार रहें हैं. चाहे तेजिंदर पाल सिंह बग्गा हो या सबसे पहले 'गोली मारो सालों' को नारा देने वाले कपिल मिश्रा हो. इनका हारना एक सभ्य समाज की जीत है. 
  12. चुनाव घोषित होने से चंद हफ्ते पहले भाजपा ने कच्ची कालोनियों को पक्की करने की घोषणा की और सम्मान के तौर पर प्रधानमंत्री ने रैली भी की. वो भी कारगर साबित नहीं हुआ. जनता समझ गयी थी कि ये पांच साल तक तो बैठे रहे और अब चुनाव में फायदा लेने के लिए ऐसे चाल चल रहे हैं. उसे जनता ने पहचान लिया.
  13. मोदी और शाह का कद अब निश्चित तौर पर घट चुका है. विगत जितने भी राज्य में बीजेपी चुनाव हारी है. उससे बीजेपी के इन दोनों नेताओं का कद लगातार गिराया है. अब ये आकर्षित करने वाले चेहरे नहीं रहे.
  14. आप ने जो फ्री बिजली, फ्री पानी और उच्च शिक्षा गुणवत्ता जनता के सामने पेश किया. वो जनसरोकार वाला था. आप का यह फैसला लोगों के सिर चढ़ कर बोला. उसकी कोई काट बीजेपी और कांग्रेस के पास नहीं था. जो आज के परिणाम में परिलक्षित हो रहा है.
दिल्ली ने देश को एक बार फिर एक नई राह दिखाई है. 2014 में बीजेपी के प्रचंड जीत के बाद दिल्ली ने हीं उसे रोकने का काम किया था. और ऐसे रोका था कि एक नया इतिहास कायम करते हुए 70 विधानसभा सीटों में से 67 विधान सभा सीट जीती थी. 2020 में आप की जीत तो तय मानी जा रही थी. बस अंदाजा यह लगाया जा रहा था कि आप 67 से कितना कम होगी. दिल्ली से सीखते हुए बिहार ने भी बीजेपी को 2015 में बहुत बुरी हार दिखाई थी. अब दिल्ली के बाद बिहार की बारी है. इस बार बिहार की स्थितियां इस चुनाव में बदली हुई होंगी. क्योंकि 2015 में नितीश जी लालू और कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनाव लड़े थे जो इस चुनाव में वापस बीजेपी के पाले में चले गए हैं. लेकिन जो भी हो दिल्ली की जनता का दिल से स्वागत किया जाना चाहिए. किसी को इतनी ताकत मत दो कि वो मदहोश हो जाए और आपकी फ़िक्र भी न कर सके. 

आप के एक उत्साही कार्यकर्ता ने आप  की जीत पर अपनी खुशी का इजहार कुछ इस तरह से किया -
                        
जली को आग कहते है 
बुझी को राख कहते हैं 
जो बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष से 
घर-घर पर्चा बटवा दे 
उसे केजरीवाल कहते हैं     

Monday, February 10, 2020

केजरीवाल को गाली बीजेपी की हार का कारण

जैसा कि नए साल में पहला चुनाव दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश में सम्पन्न हुआ. जहां नेताओं ने खासकर भाजपा/संघ समर्पित लोगों ने जहरीले भाषणों की बौछार कर दी. यह चुनाव दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे और सांसद प्रवेश वर्मा और हिमांचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर के विवादित बयानों और चुनाव आयोग द्वारा चुनाव प्रचार करने के लिए प्रतिबंधित किये जाने के लिए भी जाना जाएगा. इस चुनाव में केंद्र की सत्ता धारी पार्टी बीजेपी ने शाहीन बाद में नागरिकता संशोधन के खिलाफ चल रहे धरने को लेकर एक ख़ास समुदाय को हर वक्त टारगेट करती रही. वहीं दूसरी तरफ केजरीवाल अपनी स्वास्थ्य, शिक्षा, मुफ्त बिजली के नारों के सहारे जनता से अपने पक्ष में वोट करने की अपील करते रहे. चुनाव के पूर्व या बाद हुए सर्वेक्षणों से एक बात तो साफ़ हो गयी है कि आने वाली सरकार केजरीवाल के नेतृत्व में हीं बनेगी. दिल्ली के प्रबुद्ध नागरिकों ने बीजेपी/संघ के बहकावे में न आकर अपनी मुख्य जरूरतों को ध्यान में रखकर वोट किया है. 
जिस दिन से 'एक्जिट पोल' आये हैं उस दिन से मैं सोशल मीडिया पर देख रहा हूँ कि कुछ मूर्ख हिन्दुओं को गाली दे रहें हैं. और बीजेपी को सपोर्ट न करने वाले हिन्दू को गाली दे रहें हैं और लालची बता रहें हैं. इन बेवकूफों को लगता है कि ये हिन्दूओं के ठेकेदार हैं. अरे भाई तुम भी हिन्दू मैं भी हिन्दू हूँ. हिन्दू होने के लिए संघ/भाजपा को वोट देना कब से अनिवार्य हो गया है ? ऐसे जहर बोने वाले खुद तो अंदर से लौकी की तरह खोखले होते हैं और दूसरों का भी अपनी तरह से आंकलन करते हैं. केजरीवाल का काम दिल्ली की जनता को पसंद आया. लोग उसमें रुचि दिखा रहें हैं. तो इसमें हिन्दू, लालची, आतंकावादी होने का क्या मतलब है ? वैसे इतने जहर घोलने के बाद भी बीजेपी हार रही है ये तो तय है. दिल्ली एक बार फिर केजरी मय होने को तैयार है.
जब दिल्ली के देशभक्त पार्टी के सांसद केजरीवाल को आतंकवादी कह रहे थे. तो ये पागल क्यों नहीं कह रहें थे कि केजरीवाल हिन्दू है और हिन्दू आतंकवादी कभी नहीं हो सकता. क्या इसके मायने ये न निकाला जाय कि जो संघ/बीजेपी के खिलाफ जाएगा उनके ऊपर इसी तरह का अवांछनीय आरोप लगाने की कोशिश करती है. केजरीवाल अगर आतंकवादी था तो केंद्र की सरकार उसे जेल में क्यों नहीं डाली. यह उतना हीं हास्यास्पद बयान हैं जितना कि सावरकार को वीर और स्वतंत्रता सेनानी कहना. केजरीवाल किसी राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री हैं. उनके खिलाफ इस तरह के कपटपूर्ण और गंदी राजनीति देश के लिए कभी सार्थक नहीं हो सकती। इस तरह का कृत्य हमेशा देश के दुश्मन करते हैं, देशभक्त नहीं.
आज की रात राजनितिक गुंडों के लिए कयामत की रात की होगी. क्योंकि जनता अपने सरोकार के साथ खड़ी होगी या गाली देने वालों के साथ खड़ी होगी इसका कल जबाब मिल जाएगा. मतलब कल दिल्ली चुनाव का नतीजा सबकी आंखों के सामने होगा. इस चुनाव का इन्तजार ठीक उसी तरह का है जैसे 'आपातकाल' के बाद इंदिरा जी के चुआवी परिणाम को जानने के लिए जनता आधी रात तक इन्तजार करती रही. और अंततः परिणाम ये आया था की इंदिरा जी चुनाव हार गयी. आज हम उस दौर से इस दौर की तुलना क्यों कर रहें हैं तो उसका कारण ये है कि आज की राजनीति में महज एक चुनाव जितने के लिए एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को खुलेआम 'आतंकवादी' केंद्र सरकार के मंत्री कहते हैं. यह सब हमारे लोकतंत्र के लिए किसी काले धब्बे की तरह होगा. आज की रात बहसियों के लिए न काटने वाली होगी. कल लोकतंत्र के जीत का दिन है.
2019 के दौर को याद किया जाय तो कौन जानता था कि राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार जाएंगे ? किसे पता था कि महाराज माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार जाएंगे ? क्या किसी को अंदाजा था कि अजीत सिंह अपने बेटे समेत चुनाव हार जाएंगे ? लेकिन ये हुआ. यही हमारा लोकतंत्र है. हमारा लोकतंत्र अगर किसी को सिर माथे पर बिठाता है तो उसे जमीं में भी दबाने की क्षमता रखता है. तो कल दिल्ली से भी कुछ ऐसा हो सकता है जो किसी के लिए झटका तो किसी के लिए खुशी लेकर आ सकता है.  
   

Saturday, February 1, 2020

2020 का बजट और पुरानी रट

आज साल 2020 का बजट आ रहा है. देश के अधिकतर लोगों के मन में एक डर यह है कि कहीं पूर्व की भाँति उन्हें  एक और जुमला बजट देखने को तो नहीं मिलेगा। क्योंकि इस सरकार के पास देश के लिए कोई ठोस निति नहीं है. देश के युवा बेरोजगारों के लिए कोई योजना नहीं है. आज सदन में बोलते हुए वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी कह रही हैं कि " प्राइवेट सेक्टर को और ज्यादा स्पेस दिया जाएगा." तो इसका साफ़ मतलब निकला लेना चाहिए कि सरकार सरकारी कंपनियों को धड़ल्ले से बेचेगी और प्राइवेट या यूं कहें कि पूंजीपतियों को विशेष फायदा पहुंचाया जाएगा. 
देश में ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों को सरकार से बहुत उम्मीद है. परन्तु दिल्ली को छोड़कर देश के अन्य राज्यों को इस बजट से कोई ख़ास फायदा नहीं होगा। वित्त मंत्री ने अभी ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक अहम घोषणा की है. किसानों की आय दोगुना करने के संदर्भ में सरकार ने एक 16 सूत्रीय कार्यक्रम बनाकर उसी पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक बजट पेश करने की कोशिश कर रहीं हैं. " गांव के स्तर पर खाद्यान्न भंडारण के लिए स्टोरेज बनाने का काम किया जाएगा." तथा दूसरी किसानों से संबंधित घोषणा ये है कि " 15 लाख किसानों को सरकार सोलर पम्प लगाने में मदद करेगी." सरकार 16 बिंदुओं पर अपना परन्तु अभी तक कुछ बड़ी घोषणा नहीं हो पायी है. किसान क्रेडिट कार्ड का लक्ष्य बढ़ाकर सरकार ने 15 करोड़ करने की घोषणा की है. वैसे हर किसान के लिए किसान क्रेडिट कार्ड होना चाहिए.