Friday, November 19, 2021

तीनों काले कृषि कानून वापस

जीता किसान, हारी घमण्डी सरकार।।
तीनों काले कृषि क़ानून केंद्र सरकार ने लिया वापस 

हमारे किसान भाईयों को प्रणाम. आज सुबह जैसे हीं अवतारी पुरुष श्री मोदी जी ने तीनों काले कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया. उनके इस ऐलान से करोङों किसान परिवारों के चेहरे ख़ुशी से खिल उठे. क्योंकि उन किसानों के सदस्य पिछले लगभग 355 दिनों से अपना घर बार छोड़कर दिल्ली की सीमाओं पर बैठे थे. तीन कृषि कानूनों पर चला किसान आंदोलन दुनिया के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक था. जिसमें लगभग 750 किसानों की मृत्यु हुई. इतने मृत्यु के बाद सरकार की नींद टूटी और काला कृषि क़ानून वापस लिया।
किसानों की जीत, सरकार की हार -
इन तीनों बिल का वापस होना किसानों के धैर्य, साहस, प्रतिज्ञा और अटल रहने की जीत है. लेकिन एक बात का दुःख है कि इसमें 750 किसानों की शहादत देश को देखना पड़ा. इस आंदोलन में करोड़ों लोगों की भागीदारी थी. लेकिन उनमें कुछ लोग प्रमुख थे. जिनके नाम क्रमशः राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, चढूनी, राजेवाला, दर्शन पाल सिंह, जोगिन्दर सिंह, माता सुरजीत कौर, नवदीप, दिशा रवि हैं. जो सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक किसान आंदोलन को मजबूत किया और उसको अंतिम अंजाम तक ले जानें में सफल हुए. मुझ जैसे युवा ने इतना विराट आंदोलन देखा जो सम्भवतः इस जिंदगी में अब दोबारा देखने को भी न मिलें। लेकिन धरती माँ के सपूतों ने दो ब्यक्तियों के घमंड को मिट्टी में मिला दिया.                 
राजनितिक मजबूरी या कुछ और -
यह कृषि क़ानून चार राज्यों में हुई उपचुनाव में बीजेपी की हार के बाद लिया गया. सरकार की एक हठ ने किसानों का बहुत नुकसान किया. सरकार को आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधान सभा के चुनाव में अपनी निश्चित हार दिखने लगी थी. जिससे हताश होकर सरकार को अपने हीं निर्णय पर पीछे मुड़ना पड़ा. जिस प्रधानमंत्री ने किसानों को "आन्दोलनजीवी" नाम की संज्ञा दी. वो इतनी आसानी से बिल वापस कैसे ले सकते थे ? बिल वापस लेने के पीछे किसानों के वोट का डर साफ़ देखा और समझा जा सकता है.
जो राजनितिक विशेषज्ञ किसानों को मवाली, गुंडा, खालिस्तानी, आतंकवादी बोलते थे. अब वापसी के बाद इस क़ानून के संदर्भ में किस मुंह से बात करेंगे ? अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार करे प्रवक्ता और गुल्लू एंकर मोदी के इस फैसले का कैसे बचाव करते हैं ? किसान इतनी जल्दी कुछ नहीं भूलता जो सरकार सोच रही है कि अब उसे बहला लिया जाएगा और ध्रुवीकरण की कोशिश को धार दिया जायेगा. तो सरकार को मैं बता दूँ कि किसान सालों पहले के डाई,यूरिया, पोटाश, जिंक, सल्फर की कीमत याद रखता है. उसे बरगलाया नहीं जा सकता है। इसलिए सरकार का ये फैसला विशुद्ध रूप से राजनैतिक कारणों से लिया गया है.