Sunday, February 21, 2021

किसान आन्दोलन के बीच संघ का किसान संघ नदारद

किसानों के आंदोलन का आज 89 वां दिन है। सत्ता और किसान दोनों अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। लेकिन इन सब के बीच में एक सिरा लगभग नदारद है। जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। संघ तो वैसे हमेशा हिन्दू और किसान की बात किया करती थी। चाहे पूर्व में कांग्रेस की सरकार रही हो या अटल जी की सरकार रही हो। अटल जी के निजीकरण के विरोध में उस वक्त संघ सरकारी विरोध खुले मन्चों से करने में नहीं हिचकता था। लेकिन मौजूदा सत्ता के दौर में ऐसा प्रतीत होता है कि संघ का तेवर नरम पड़ चुका है या यूं कहें कि संघ मौजूदा दौर में अपने आपको लाचार महसूस कर रहा है। जभी लगभग तीन महीने गुजर जाने के बाद भी संघ का कोई संगठन किसानों के समर्थन में नहीं आया। संघ के एक पूर्व प्रमुख ने हरियाणा में किसानों को हिन्दूत्व से जोड़ते हुए कहा था कि हकीकत में अन्नदाता हीं हिन्दू है जो धरती मां से जुड़ा हुआ है। तो आज सवाल से खड़ा होता है कि क्या संघ अब सत्ता के सामने नतमस्तक हो चुका है ? क्या अब सत्ता को संघ की आवश्यकता नहीं है ?

बहरहाल हम इन बातों से थोड़ा आगे निकलते हुए संघ द्वारा बनाए गए एक संगठन का जिक्र करते हैं। जो पिछली सरकारों के दौरान किसानों के समर्थन में रहने वाला संगठन था। जिसका नाम "भारतीय किसान संघ" था। जो नये सत्ता के दौर में शायद नेपथ्य में चला गया है। भारतीय किसान संघ को दन्तोपन्त हेंगणी ने 13 मार्च 1978 को  राजस्थान में इस संगठन के बारे में सोचा और सभा में उपस्थित लोगों को अवगत कराया। फिर 4 मार्च 1979 में राजस्थान के कोटा शहर में भारतीय किसान संघ की पहली सभा हुई या यूं कहें कि 4 मार्च को भारतीय किसान संघ अस्तित्व में आया और किसानों के हक के लिए काम करना शुरू किया। हेंगणी ने हीं 1991 में एक और संगठन की नींव धरी थी। जिसका नाम "स्वदेशी जागरण मंच" था। दरअसल हम फिर किसानों पर आते हैं। किसान संघ ने किसानों के हक के लिए आन्दोलन करते हुए पहली बार 26 जनवरी 1981 में हैदराबाद विधानसभा को घेरा था। दोबारा फिर किसानों के मुद्दे पर 1985 में राजस्थान विधानसभा का भी सफल घेराव किया था और 1986-87 का जिक्र करना बहुत हीं महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एक बार फिर भाकिसं ने गुजरात विधानसभा का घेराव किया था। जिसको भारतीय जनता पार्टी ने अपना समर्थन दिया था। 1999 में एक बार फिर हरियाणा के किसानों के समर्थन में किसान संघ ने हस्तिनापुर में विरोध प्रदर्शन किया था और तो और 2003 में जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी थे और बिजली दरों में वृद्धि की गई थी। जब भी किसान संघ ने उसका जोरदार विरोध किया था। लेकिन आज किसान संघ की दशा इतनी दयनीय हो गई है कि वह मौजूदा सत्ता के खिलाफ कुछ भी बोलने में असमर्थ है।

जहां तक मैं देख पा रहा हूं कि संघ के हिन्दूत्व को किसान अब चुनौती दे रहें हैं। भले हीं सरकार और संघ यह मानकर चल रहा है कि यह आन्दोलन बस ढ़ाई प्रदेश का है, लेकिन इसका असर बहुत ब्यापक होने वाला है। क्योंकि जब खेती की बात आती है तो उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के लोग अपने आप को किसान मानते हैं। अभी पंजाब, राजस्थान और हरियाणा के लोकल इलेक्शन बताते हैं कि किसानों ने केन्द्र की सत्ता का बहुत नुकसान किया है। यदि यह आन्दोलन दक्षिण-पश्चिम और मध्य क्षेत्र में पहुंचने में कामयाब हो तो संघ और बीजेपी दोनों के लिए बुरी खबर होगी। इतने बड़े आन्दोलन में संघ का नदारद रहना बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। 


Friday, February 19, 2021

देश में राष्ट्रवादी महंगाई चरम पर

 सादर आभार,

राष्ट्र वादी महंगाई के दौर में आपका स्वागत है। महंगाई के बढ़ने की गति बांस (करैल) से भी तेज है। क्या डीजल, क्या पेट्रोल, क्या गैस सिलेंडर ? सबमें महंगाई का जबरदस्त तड़का लगा हुआ है। कमरतोड़ मंहगाई से रसोईं और सड़क दोनों का बजट बुरी तरह बिगड़ चुका है। लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। जैसे लोगों को महंगाई की आदत सी हो गई है। लाकडाउन और कोरोना की वजह से करोड़ों लोग पहले से हीं बेरोजगार हो चुके थे और ऊपर से ये राष्ट्र वादी महंगाई तो जान निकालने का काम कर रही है। 

अगर मैं कुछ पिछले सात-आठ साल पहले की बात करूं। तब दिल्ली की सत्ता पर एक दूसरी पार्टी काबिज थी। उस दौर में जब पेट्रोल-डीजल के दामों में एक रूपए की वृद्धि होती थी तो विपक्ष के लिए महंगाई डायन हो जाती थी। जबकि उनके शासनकाल में सिलेंडर की सर्वाधिक कीमत 413 रूपए, पेट्रोल 76 रुपए था और वो भी तब जब कच्चे तेल की कीमत 124 डालर प्रति बैरल होती थी। तब की महंगाई डायन आज डार्लिंग बन गई है। विपक्ष में रहते हुए जिस पार्टी ने महंगाई पर तमाम ब्यंग बाण चलाते थे। तब के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी को चूड़ियां भेजते थे। अब वो मानो कोमा में चले गए हैं या उनका अब जनता से सरोकार नहीं रहा।

जभी तो मैं इसे राष्ट्र वादी महंगाई का नाम दे रहा हूं। आज अगर नये उभरे कट्टर राष्ट्रवादियों से महंगाई पर बात करो तो वो वहीं व्हाट्सएप विश्वविद्यालय का ज्ञान बांटने लगते हैं कि जब लाकडाउन में पांच रूपए वाला गुटखा चालीस रूपए में ले सकते थे तो देशहित में पेट्रोल सौ रुपए का क्यों नहीं ले सकते। आज का दिल्ली में पेट्रोल का रेट 90.18 पैसा है और सिलेंडर की कीमत 717 राष्ट्र वादी रूपया हो चुका है। वर्तमान राष्ट्र वादी सरकार पेट्रोल पर 33 और डीजल पर 32 रूपए टैक्स के रूप में लेती है। इसके उलट कांग्रेस की सरकार पेट्रोल पर 10 तथा डीजल पर 5 रूपए टैक्स के रूप में वसूलती थी। महंगाई के ऊपर 2014 के तमाम विडियो मोदी जी और उनकी पार्टी के नेताओं के वायरल हो रहे हैं और लोग अब सवाल पूछ रहे हैं। अब तो कट्टर समर्थक भी स्टेटस पर साहेब के पुराने पोस्ट चिपकाने लगे हैं।

Saturday, February 13, 2021

पेट्रोल डीजल की किमतों में लगी आग

आज देश किसान आंदोलन के साथ-साथ महंगाई से त्रस्त है। एक तरफ घरेलू गैस की सब्सिडी को खत्म करते हुए प्रति सिलेंडर की कीमत 717 रूपए कर दी गई है। पेट्रोल की तो बात करना देशद्रोह समान है। एक वक्त था जब मुझे याद है कि 2013 में डीजल की कीमत 52 रुपये लीटर डीजल तथा 73 रूपए पेट्रोल की कीमत थी और उस दरम्यान अमिताभ बच्चन ,अक्षय कुमार जैसे कईयों अभिनेताओं ने कीमत वृद्धि की आलोचना करते हुए गाड़ियों में ब्यंग स्वरूप आग लगाने की बात करते थे। परन्तु आज देखिए कि @abpnews के अनुसार भाजपा शासित मध्य प्रदेश में आज पेट्रोल की कीमत 70 सालों में पहली बार सैकड़े अर्थात 100 रुपये लीटर तथा डीजल 80 रूपए से ऊपर रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज की गई। फिर भी इन‌ अभिनेताओं की गाड़ी मक्खन की तरह चल रही है। अब इनकी एक ट्वीट करने तक की हिम्मत नहीं है।अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी गाड़ी में तेल भरपूर है मात्रा में है और साथ हीं मुंह में दही भी प्रचुर मात्रा में जमी हुई है।

मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तब की कांग्रेस सरकार के खिलाफ इन अभिनेताओं ने सुनियोजित तरीके से एक षणयन्त्र रचने का काम किया था। वास्तव में अगर ये तथाकथित महान अभिनेता राष्ट्र की जनता के प्रति उत्तरदाई होते तो आज इस सरकार के खिलाफ भी आवाज उठाते। पर इनका उद्देश्य देश की जनता नहीं एक राजनैतिक पार्टी को पुनर्स्थापित करने की थी। जिसमें वो भली-भांति सफल भी हुए। मैं किसी और का नहीं अपना हीं उदाहरण दे रहा हूं। कोरोना काल के बाद नौकरी चली गई, गैस की सब्सिडी चली गई, पेट्रोल-डीजल के भाव आसमान पर चढ़ गये। फिर भी इस घमण्डी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रहा है।

Thursday, February 4, 2021

किसानों को और कितना यातना देगी केन्द्र की घमंडी सरकार

आज 70 दिन हो गए किसान भाइयों को दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हुए हैं। लेकिन उनकी समस्या का हल अब तक नहीं निकल पाया। प्रधानमंत्री आवास बीस किलोमीटर की दूरी पर संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट भी लगभग समान दूरी पर स्थित है। लेकिन किसी को अन्नदाताओं की बेबसी नहीं दिखी। अब तो कोरोना के बाद का बजट भी आ गया। बजट के आंकड़ों पर भी नजर डाला जाय तो पिछले साल की तुलना में बहुत मामूली बढ़त की गयी है। लेकिन वो बढ़त इतनी नहीं है कि आन्दोलनकारी किसानों में सरकार के प्रति विश्वास बहाली का सिलसिला शुरू हो सके। मेरा तो लगभग रोज नोएडा सेक्टर 62 तक आना-जाना लगा रहता है। की बार तो नेहरू प्लेस से वापस घर लौटते हुए आन्दोलन स्थल पर रूकना भी हो जाता है। जहां पर किसानों के जज्बे और बुलंद हौसले को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो राधे प्रिय खुद कुरूक्षेत्र में जमें हों। और वही योगी बाबा आज सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री हैं। जो लोग टिकैत के रोने का मजाक उड़ा रहे हैं। उन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है। 

मिडिया और अन्य तबके के लोग कह रहें हैं कि राकेश टिकैत के आंख से निकले आंसू ने दोबारा से किसान आन्दोलन में जान डाल दिया। वैसे आंसूओं के गिरने की ताकत भारत और विश्व जगत ने कई बार देखा है। आंसू की बात करें तो अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, बराक ओबामा, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति पुतिन,  भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी तक की आंखों से कभी न कभी किन्हीं कारणों से आंसू टपके हैं। कर्नाटक के किसान परिवार से आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा को भी हमने रोते देखा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को भी लोकसभा में पूरे देश ने फूट-फूटकर रोते देखा है।

राकेश टिकैत के रोने का हीं असर हुआ कि गाजीपुर बार्डर पर सात स्तरीय अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था तालीम कर दी गई हैं। सड़कों पर लोहे की कीलें गाड़ दी गयी हैं, कंक्रीट की दिवारें चुनवा दी गई हैं और सिंघु बार्डर पर तो सड़क कै बीचोबीच गड्ढे सरकार द्वारा खुदवा दिए गए हैं। टिकैत के आंसुओं का हीं असर है कि सिंघु बार्डर के आस-पास के इलाकों में कई दिनों तक इन्टरनेट सेवा बाधित रही और यही समस्या गाजीपुर धरना स्थल पर है। मैं एक बात बेझिझक महसूस करता हूं कि टिकैत के निकले कीमती आंसुओं ने आन्दोलन को जीवन दे दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में जगह-जगह किसानों के समर्थन में महापंचायतों का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें बहुत भारी भीड़ इकट्ठी हो रही है और उनमें धरना स्थल से उठकर राकेश टिकैत भी उपस्थित हो रहें हैं।