आज मै बात करना चाहूंगा स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के सन्दर्भ में,यह तो मानना ही पड़ेगा की आज के इस दूषित माहौल में भी अटल जी ने अपना एक उम्दा ओहदा रखा मरणोपरांत उनकी अंतेष्टि और श्रद्धांजलि सभा में उसकी झलक देखने को मिली हर कोई अटल जी के आगे नतमस्तक था पर असली खेल तो तब शुरू हुआ जब अटल जी की हड्डियों को लोटे में भर-भरकर किसी पार्टी के लोगों में बाटा जाने लगा जिसे अस्थि-कलश नाम दिया गया,परन्तु मेरे ख्याल से ये अटल जी के कद के साथ अच्छा बर्ताव नहीं कहा जा सकता।
आज अटल जी के नाम पर वोट की राजनीति के लिए क्या-क्या किया जा रहा है अटल जी की अंत्येष्टि हुए हफ्ता भर होने वाला है परन्तु हमारे हिन्दू धर्म के अनुसार उनके कर्म नहीं किये जा रहे है और कर्म ये है कि जो भी अस्थि-कलश जीवन वाहिनी,मोक्ष दायिनी माँ गंगा में प्रवाहित करता है तो उसे अपने सिर के बाल भी मुड़ाने पड़ते है आज तक कितने लोगों ने मुंडवाया जबकि कितनी अस्थि-कलश यात्राएं निकाली गयी कई राज्यों की प्रमुख नदियों में उनको प्रवाहित किया गया लेकिन इन क्रिया-कर्म को कितने लोगों ने निभाया,शायद किसी ने नहीं।
अटल जी का जीवन एकदम बेदाग और सर्वमान्य रहा ऐसा हम नहीं कह सकते क्योंकि वो आरएसएस के स्यवं सेवक के नाते कई बार संघ को ध्यान में रखकर फैसले थे अटल जी के बारे में ये जरूर कह सकते है की वो बहुत ही शालीन और बहुत बड़े बुद्धजीवी थे जिनकी समाज के लगभग हर विषागंतियों पर गहरी पकड़ थी,एक दौर ऐसा भी आया जब अटल जी संघ की छाया से निकलने की कोशिश भी करने लगे थे उसका उदहारण बाबरी विध्वंश के बाद संसद में पार्टी के कार्य पर शर्मिंदा होकर माफी भी मांगी थी पर दो दिन बाद फिर से बदल गए और आरएसएस के विचार के साथ खड़े हुए.
फिर भी अटल जी ने अपनी जितनी पहचान बनाई और उसे संभाल कर रखने में कामयाब हुए शायद आज के दौर का कोई भी नेता उस लकीर के आस-पास भी नहीं पहुंच सकेगा उसका कारण आज के राजनेताओं के बीच कटुता, बात-चीत का अभाव होना है,अटल जी ने विपक्षी को प्रतिद्वंद्वी माना जबकि आज दुश्मन माना जाता है संवादहीनता हर किसी पर हावी है क्या पक्ष क्या विपक्ष।
देश को अगर अटल जी जैसा नेतृत्व देना है तो उसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए और साहस तो इतना होना चाहिए की हिमालय भी झुकने को तैयार हो जाये और अटल जी ने लाहौर बस यात्रा ले जाकर अपने उस साहस का परिचय भी करवाया था बेशक उस यात्रा का परिणाम सुखद नहीं रहा परन्तु उन्होंने साहस तो किया था.
अंत में एक बात और आलोचना हर किसी कि की जा सकती है शिवाय भगवान के.
एक कर्मयोगी जो शिव में विलीन हो गया-
मेरी तरफ से अटल जी को विनम्र श्रद्धांजली।
फिर भी अटल जी ने अपनी जितनी पहचान बनाई और उसे संभाल कर रखने में कामयाब हुए शायद आज के दौर का कोई भी नेता उस लकीर के आस-पास भी नहीं पहुंच सकेगा उसका कारण आज के राजनेताओं के बीच कटुता, बात-चीत का अभाव होना है,अटल जी ने विपक्षी को प्रतिद्वंद्वी माना जबकि आज दुश्मन माना जाता है संवादहीनता हर किसी पर हावी है क्या पक्ष क्या विपक्ष।
देश को अगर अटल जी जैसा नेतृत्व देना है तो उसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए और साहस तो इतना होना चाहिए की हिमालय भी झुकने को तैयार हो जाये और अटल जी ने लाहौर बस यात्रा ले जाकर अपने उस साहस का परिचय भी करवाया था बेशक उस यात्रा का परिणाम सुखद नहीं रहा परन्तु उन्होंने साहस तो किया था.
अंत में एक बात और आलोचना हर किसी कि की जा सकती है शिवाय भगवान के.
एक कर्मयोगी जो शिव में विलीन हो गया-
आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे कर्मयोगी की जो आज के विष भरे राजनितिक जीवन में भी "अजातशत्रु" बने रहे और आज अपने निधन के बाद अंतिम पलों में भी प्रासंगिक बने हुए है.अटल जी संघ से जरूर आते थे पर वो संघ और सरकार की विचार धारा से बहुत ऊपर थे और उनको चाहने वाले हर पार्टी में है क्या पक्ष क्या विपक्ष हर कोई उन्हें अपनी तरफ से अंतिम विदाई देने के लिए लालायित है ऐसा विलक्षण क्षण हमारे राजीनीति में बहुत मुश्किल से आता है और मुझे अपनी छोटी सी उम्र में कभी नहीं याद आता.
कल मुझे देख कर बहुत अच्छा लगा की देश-विदेश और विपक्ष का हर नेता उनके अंतिम-दर्शन के लिए पंहुचा और उनके साथ अपनी यादों को सबने लोगों के साथ अपने अनुभव को बताया की अटल जी क्या थे,कैसे थे.जैसे उनका नाम अटल है वैसे ही उनका चरित्र भी अटल था.
मेरी तरफ से अटल जी को विनम्र श्रद्धांजली।
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