कल अयोध्या में जो विहिप और संघ की तरफ से एक नाटक रुपी धर्म-संसद का आयोजन किया गया था वो निहायत राजनितिक और संविधान का माखौल उड़ाने वाला था,जब की देश हीं नहीं पूरी दुनिया जानती है कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जिसका अपना एक सविधान है और उस सविधान के तहत देश को चलाया जाता है तो अनावश्यक रूप से भीड़ जमा कर लोगों को डरने का प्रयत्न क्यों किया जा रहा था. इस ओछे प्रयास के माध्यम से वो क्या हासिल करना चाह रहे थे जो कि उन्हें लोकतान्त्रिक तरिके से नहीं मिल पा रहा था.
कल जो हुआ वो मेरे लिए संविधान को कुचलने वाला कदम था शायद यही वजह रहा होगा जब 1947 में 14 अगस्त की आधी रात में यही और आज के तथाकथित राष्ट्रभक्त सगठन संविधान को नकार रहे थे और और तिरंगे को जला रहे थे, शायद उनकी वही दूषित मंशा कल भी थी कि किसी प्रकार से भीड़ को इकठ्ठा करके बाबा साहेब के संविधान को चुनौती दी जा सके, परन्तु अपनी मंशा में पूरी तरह खरे नहीं उतरे इसके लिए मैं अपने देश वासियों का हाथ जोड़कर सम्मान करना चाहता हूँ और उनका अभिनन्दन करता हूँ.
कल अयोध्या में जो कुछ हो रहा था वो बहुत डरने वाला दृश्य था परन्तु राजाराम के कृपा से सब कुछ शांति से बीत गया और 6 दिसंबर 1992 को दुबारा नहीं दोहराया जा सका इसके लिए मै प्रशासन से ज्यादा सरकार के अंगीकार और चोर दरवाजे से भागीदार संघ, विहिप, बजरंग दल जैसे उन्मादी संगठनों को संगठनों को जिम्मेदार मानता हूँ और क्यों मानता हूँ उसका कारण भी बता रहा हूँ क्योंकि यही वो संगठन है जो अपने आपको गैर-राजनैतिक पार्टी मानते हुए भाजपा की छोर दरवाजे से मदद करती है और जनता के बीच बीजेपी का प्रचार-प्रसार करने में मुख्य भूमिका का निर्वाह करती है.
एक बात सोचने वाली है कि कल धर्म-संसद में राम मंदिर बनवाने वालों को हासिल क्या हुआ तो वो बहुत कुछ हासिल कर गए शिवाय मंदिर के ठोस आश्वासन के, देश के पांच राज्यों में चुनाव हो रहा है और उनमें भाजपा की संभावित हार छिपी हुई है इसी चीज को पलटने के लिए सर्वाधिक वोट देने वाले मुद्दे को पर्दे के पीछे से संघ और बीजेपी की तरफ से उछाला गया शायद लाज बच जाये पर जनता- जनार्दन होती है और अपना मानष वो पहले हीं बना ली है किसको लाना है और किसको भगाना है. हर उस शख्स को जो देश के मुद्दों पर अपनी नजर रखता है उसे पता था कि जैसे हीं आम चुनाव नजदीक आएगा वैसे हीं राम मंदिर मुद्दा फिर से एक बार जनता के बीच लेकर छोड़ दिया जायेगा और फिर उसपर जम कर राजनीति की जाएगी और वोटों की फसल को काटा जायेगा।
"राम जी भी अब यह सोच-सोच कर परेशान हो रहे होंगे और माँ सीता से कह रहे होंगे कि हमने तो रावण का संहार किया और उसका मद भी मुझे नहीं छल सका पर कलयुग के कुछ मेरे भक्त कितनी आसानी से मेरे नाम का बार-बार उपयोग कर रहे है और मेरे नाम के सहारे भू-वासियों को बार-बार प्रताड़ित कर रहे है, यह देखकर मै अत्यंत विचलित हो गया हूँ".
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