Tuesday, July 30, 2019

उन्नाव रेप पीड़िता को न्याय नहीं मौत देने की कोशिश

उत्तर प्रदेश में कानून ब्यवस्था की हालत ऐसी है कि उन्नाव से बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर ने जिस युवती का बलात्कार किया। अब उसके परिवार वालो को भी एक-एक कर मारा जा रहा है. दो दिन पहले पीड़िता अपने वकील और मौसी के साथ सड़क रास्ते से जा रही थी कि रायबरेली के पास एक ट्रक ने उनकों रौद दिया जिसमें पीड़िता की मौसी की मौत हो गयी जबकि पीड़िता और उसका वकील अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूला झूल रहें हैं. ऐसे क़ानून-ब्यवस्था वाले राज्य के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ (अजय सिंह बिष्ट) देश का रोल मॉडल बता रहें हैं. रेप पीड़िता की कहानी के बारे में सुनेंगे तो ऐसा लगेगा कि आपके सामने कोई फिल्म चल रही है. जिस तरह से पीड़िता के परिवार को एक-एक करके खत्म किया गया या खत्म किया जा रहा है. पीड़िता ने जब पिछले साल उन्नाव बीजेपी विधायक के खिलाफ आवाज उठाई तो तो उसके घर-परिवार वालों पर प्रशासन की तरफ से बहुत दबाव डाला गया और उसके पिता को उठाकर जेल में बंद कर दिया गया. जहां जेल में उसके पिता की रहस्यमय तरिके से मौत हो जाती है और उस मौत की कलई अभी खुली भी नहीं थी कि पीड़िता के चाचा के आधा दर्जन से ज्यादा मुकदमे पुलिस द्वारा कायम कर जेल में डाल दिया जाता हैं. इतना सब होने के बाद भी जब वो नारी अपना हिम्मत नहीं हारती तो हादसे के नाम पर उसे उसके परिवारजनों के साथ कुचल कर मार देने की खौफनाक साजिश को अंजाम दे दिया जाता है. निश्चित तौर पर इस घटना के लिए भाजपा सरकार जिम्मेदार है और सरकार को उसकी जिम्मेदारी का अहसास कराने का काम हम जनता का है. दुःख की बात ये है कि बीजेपी की लोकसभा की महिला संसद सदस्य सम्माननीय श्रीमती मनोरमा देवी जी को सपा सांसद आजम खान ने कुछ कह दिया तो भक्त पार्टी की सारी महिला सांसद का अपमान हो गया और वो आजम की संसद सदस्यता खत्म करने के लिये एक सुर में अपनी आवाज बुलंद की जो ठीक भी था पर आज जब दूसरी महिला का बलात्कार उनकी हीं पार्टी के विधायक द्वारा किया गया और उसके बाद उसे जान से मार देने की साजिश रची गयी तब इस मौके बीजेपी की महिला सांसदों की चुप्पी बहुत शर्मिंदा करने वाली प्रतीत होती है. भाजपा की क्या मजबूरी है कि एक बलात्कारी विधायक को प्रचंड बहुमत के बाद भी अपनी पार्टी में रख रखी है. बीजेपी और उसके अध्यक्ष की ऐसी क्या मजबूरी है जो जेल में बंद बलात्कारी के साथ खड़े होने के लिए मजबूर कर रही है ? बीजेपी जैसे फर्जी राष्ट्रवाद की प्रवर्तक है उसी तरह फर्जी महिला सम्मान की भी प्रवर्तक है. 

Friday, July 26, 2019

कारगिल की जवानों को नमन

आज कारगिल विजय दिवस पर हम अपने उन बहादुर रण बांकुरों को याद करते हैं जो हमारी आन-बान और शान की रक्षा हेतु अपने प्राणों को बलिदान कर दिया और दुश्मन देश के अरमानों को अपने पैरों तले रौंद दिया. हे हमारे वीर सपूत आप जहाँ कहीं हो हम आपके श्री चरणों में शीष नवाते हैं.

जब कारगिल युद्ध हुआ वो साल 1999 का था जब मेरी उम्र मात्र 12 साल की थी. देश और पाकिस्तान के बीच हो रहे युद्ध की ज्यादा जानकारी तो नहीं तो पर हाँ अपने बड़ों के साथ युद्ध की बात पर मैं भी रोमांचित हो उठता था. मेरे चाचा दीपू जो की आज उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत हैं और मनोज भैया जो गाजीपुर के निवासी थे. वो दोनों घर पर हीं बात करते थे कि युद्ध हो रहा है दीपू अगर हम बड़े होते तो हम भी युद्ध में लड़ने चलते, उनको मारते, आज हमारे इतने जवान शहीद हुए, उनके इतने हुये। ये सब बातें अब मुझे याद आती हैं कि क्या जूनून था देश का उन दिनों सेना के प्रति लोग सेना के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाने के लिए हर वक्त तैयार रहते थे. मेरे याद्दाश्त के अनुसार कारगिल युद्ध अट्ठारह या उन्नीस दिन चला था. हो सकता है कि मेरे आंकड़ें गलत भी हों. गाँव में मेरे घर टीवी और रेडियों दोनों होते थे. हम सब सुबह 6 बजे की न्यूज़ बुलेटिन फिर सुबह 8 बजे उसके बाद 10 बजे की बुलेटिन सुनते थे और फिर बैठ कर आकड़ों का मिलान करते थे. हमारे जवान गोलियों का सामना ऐसे करते थे मानो माँ अपने आँचल से फूल उनके तरफ उनकी स्वागत में उछाल रही हो. हमारे शेर दुश्मन के गोलियों और तोपों से निडर होकर आगे बढ़ते गए और दुश्मनों के सीने में पीतल उतारते गए. हमारे हीरो आगे बढ़े शहीद हुए पर पीछे मुड़कर नहीं देखा और दुश्मन सेना को उलटे पाँव भागने को मजबूर कर दिए. उस समय जो मेरे बड़े थे वो बात-बात पर जज्बाती हो जाया करते थे. युद्ध के दौरान हीं नचिकेता के पाकिस्तान कब्जे और कैप्टन सौरभ कालिया के वीभत्स शरीर की खबर भी मिली थी. जिसको लेकर लोगों में पाकिस्तान के प्रति बहुत नाराजगी थी. अटल जी की साथ उस समय देश का हर बच्चा-बच्चा था और हर देशवासी बस अपनी जीत होते हए देखना चाहता था जिसे हमारे जवानों ने पूरा करके दिखाया। हमें अपने उन सपूतों पर गर्व है जिन्होंने हिमालय की छोटी पर खड़े होकर पाकिस्तान के सीने पर तिरंगा गाड़ा था. ऐसे वीर जवानों को जन्मों-जनम तक नमन. कारगिल की लड़ाई लड़ने वाले हजारों वीर आज भी सेना में रहकर देश की सेवा कर रहें है.  

Saturday, July 20, 2019

सोनभद्र नरसंहार मामले में प्रियंका का हल्ला-बोल

अत्यंत हृदय विदारक, दिल को झकझोर देने वाला दृश्य देखने को मिला जब कांग्रेस नेत्री श्रीमती प्रियंका गांधी ने नरसंहार में पिड़ित परिवार वालों से मुलाक़ात की. इस तरह की असहाय पीड़ा भगवान किसी को न दें पर इन लोगों को सरकार की कृपा से मिला. यह एक बहुत बड़ा नरसंहार है. प्रियंका जी ने जो किया वही मानवता का धर्म-शास्त्र कहता है. किसी दुखी इंसान को ढाढ़स बढ़ा देने से उसका कष्ट थोड़ी देर के लिए कम हो जाता है और उसी दरम्यान वो सम्भलने की कोशिश भी करता है. यहां तो इतना बड़ा नरसंहार हुआ है और वो आदिवासी भाई-बहनों के साथ. हम तो टीवी पर देखकर इतना भावुक हो गए है पर जिसके साथ यह वीभत्स घटना घटी है उनके दुःख की कल्पना करना सोच से परे है. प्रियंका जी के जिद की मैं सराहना करूंगा जो उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवारों से मिले बिना वो अब यहाँ से नहीं जाने वाली हैं. इसी जन-प्रेम, जनसेवा भावना की वजह से पीड़ित परिवार को न्याय और हक दिलाने के लिए पूरी रात मिर्जापुर, चुनार के गेस्ट हॉउस में हिरासत में रह कर काट दिया और बोली कि अंतिम साँस तक मैं पीड़ित परिवारों से मिले बगैर नहीं जाउंगी। एक उच्च दर्जे की नेता के मुंह से ऐसी बात सुनकर अच्छा लगा कि चलो देश में अभी कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अडानी, अम्बानी की नहीं बल्कि दलित, वंचित, शोषित, आदिवासी की भी फ़िक्र करते हैं. जब कांग्रेस के नेता जितिन प्रसाद, राजीव सातव, दीपेन्द्र सिंह हुड्डा, मुकुल वासनिक, राज बब्बर और आर पी एन सिंह सोनभद्र नरसंहार में मारे गए लोगों के समर्थन में  प्रियंका जी के धरने में शामिल होने के लिए जा रहे थे तभी इन सभी को वाराणसी एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया. इनके अलावा टीएमसी सांसदों की एक प्रतिनिधिमंडल भी सोनभद्र जाने के लिए लालबहादुर शास्त्री हवाई अड्डे पर उतरा जिसकी अगुआई राज्य सभा सांसद डेरेक-ओ-ब्रायन कर रहे थे. उन्हें भी यू पी पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिया गया. इससे शक उठता है कि इस नरसंहार में सरकार कुछ छिपाना चाह रही है. अगर सब कुछ सही है तो जो भी नेता घटनास्थल पर जाना चाहते हैं और सोनभद्र में नरसंहार पीङित परिवारों से मिलना चाहते हैं तो उन्हें क़ानून के हिसाब से प्रशासन को खुद मिलवा देना चाहिए और वो भी तब जब घटना को हुए तीन दिन से ज्यादा हो गया है उसके बाद भी सरकार और प्रशासन तरह-तरह की हिला-हवाली कर रही है.
कांग्रेस महासचिव के जमीन पर उतरकर काम करने करने से निश्चित तौर पर आने वाले भविष्य में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में फायदा होने वाला है. चुनार गेस्ट हॉउस के सामने का रात के समय का दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस का सोया हुआ संगठन फिलहाल जाग गया है. वो भले हीं एक रात के लिए हो. 1977 में हार के बाद बिहार के बेलछरी में हुए नरसंहार में पीड़ितों से मिलने के लिए स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी हाथी पर चढ़ कर गयी थी और कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर प्रशासन के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. कुछ पुराने कांग्रेसियों को कल का प्रियंका अवतार कुछ उसी तरह नजर आ रहा है. कल प्रियंका भी खुरदुरी जमीन पर रात अँधेरे में बैठकर अपने कार्यकर्ताओं के साथ एक लम्बा समय बिताया जिससे कार्यकर्ताओं में भी एक नया जोश देखने को मिला और लोग भारी मात्रा में इकट्ठा होकर रात जमीन और सोते-गाते बिताये और प्रियंका के जिद को देखते हुए अंततः प्रशासन और सरकार आज 11 बजे के बाद पीड़ितों को बुलवाकर गेस्ट हाउस में खुद मिलवाया और पीड़ित महिलाएं देखती हीं प्रियंका जी से लिपट कर रोने लगी और उनको रोता देख प्रियंका गांधी भी भावुक हो उठी. कांग्रेस को ऐसे हीं जुझारू नेता की जरूरत है जो जनता की मांग के अनुरूप अपने आप को ढल सके. प्रियंका के धरना पॉलिटिक्स से बीजेपी के अंदर भी एक नए मंथन को जन्म दे दिया और इस लड़ाई में प्रियंका मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस को आगे बढ़ा दिया है. आदिवासी पीड़ित परिवारों के चोट पर मरहम लगाते हुए कांग्रेस ने 10-10 लाख रूपये देने की घोषणा की.


  


Friday, July 19, 2019

सोनभद्र हिंसा में दबंगई का उग्र रूप

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के संसदीय क्षेत्र और माँ विंध्यवासिनी के आँचल से स्टे जिले सोनभद्र में 17 जुलाई को एक बहुत हीं हृदय विदारक घटना घटित हुई. जिसके बारे में सोचने मात्र से हीं रूह काँप जा रहा है. आपको याद होगा कि बुधवार को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र के मूर्तिया नामक गांव में जमीन विवाद को लेकर 10 लोगों गोलियों से भूनकर छलनी कर दिया गया और इसी घटना में 28 लोग घायल हुए थे. बताया जा रहा है कि मूर्तिया गांव के बाहरी इलाके में 90 बीघा खेती की जमीन है, जिस पर गाँव के गौड़ (एस सी ) जाती के ग्रामीण पुश्तैनी तौर पर विगत सैकड़ों वर्षों से खेती-किसानी का काम करते आ रहे हैं. तो उस दिन हुआ ये कि वहां का ग्राम प्रधान किसी आई एस अधिकारी से ये सारी जमीनें खरीद लिया था और बाद में ग्राम प्रधान जो कि गुर्जर बिरादरी से आते हैं उनके बेंच दिया। इसी साल फरवरी में दाखिल खारिज कराने के बाद 17 तारीख को ग्राम प्रधान जो राक्षस रूप में जमीन पर अपने 100 से 150 दोस्तों को दर्जनों ट्रैक्टर ट्राली में भरकर ले आया और उक्त जमीन पर हल चलाने लगा तो गौड़ जाति के लोगों ने इसका विरोध किया। इस बात पर प्रधान की तरफ से आये हुए लोगों ने उनपर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी जिसे अनेक लोग मारे गए और अनेकों घायल हुए. जिसमें बाद में कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुई. बात गिरफ्तारियों की नहीं है बात इतने बड़े घटना की है जो यह सिद्ध कर रहा है कि उत्तर-प्रदेश में एक बार फिर सवर्णों की दबंगई बहुत तीजी से बढ़ रही है. जो मरे हैं या जो घायल है उनमें कई ऐसे हैं जो नाबालिग है. जैसा कि जो पूर्वांचल को जानता है वो पूर्वांचल के मिजाज को अच्छे से जानता होगा। क्योंकि पूर्वांचल में दबंगई वाले ठाठ को राजशाही ठाठ माना जाता है.
इस दबे हुए मुद्दे को आज कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की घटनास्थल की यात्रा और सरकार की थोड़ी सी बेवकूफाना हरकतों ने और हवा दे दी. बात ये है कि प्रियंका गाँधी सोनभद्र घटना में घयलों से वाराणसी के ट्रामा सेंटर से मिकार उनके गाँव सोनभद्र जाना चाहती थी. जभी मिर्जापुर, सोनभद्र और वाराणसी के सरहद पर नायरायण पुर गाँव के पास पुलिस ने रोक लिया और उन्हें आगे नहीं जाने दिया। मामला बढ़ता देख प्रशासन ने उन्हें चुनार गेस्ट हॉउस में हिरासत में रखा. जिसकी वजह से ये मामला और उछल गया. इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस के समस्त फ्रंटल संगठनों ने जगह-जगह सड़क जाम और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। जो अब तक निरंतर चल रहा है पर उस दबंग प्रवृत्ति की चर्चा कोई नहीं कर रहा है जिसकी वजह से न जाने कितने मासूमों की जान चली गयी.          

Monday, July 15, 2019

विश्व कप उन्नीस का फाइनल और डबल सुपर ओवर

इंग्लैंड को मैच जीत की हार्दिक बधाई और न्यूजीलैंड को करोड़ों लोगों का दिल जीतने के लिए हार्दिक बधाई और बेहतर भविष्य की शुभकामना.
आज का विश्व कप 2019 का फाइनल मैच सदी का सबसे रोमांचक मैच रहा. इस मैच में न तो इंग्लैंड की जीत हुई और न हीं न्यूज़ीलैण्ड की हार. यहां तो बस खेल की जीत हुई है. इस मैच के घटनाक्रमों को देखकर अब मुझे पूरा यकीन हो गया है कि क्रिकेट में जब तक अंतिम गेंद न डाल दी जाय तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना एक बचकानी सोच का परिचायक होगा। पहले बैटिंग करते हुए जब न्यूजीलैण्ड ने इंग्लैंड को 241 रन का लक्ष्य दिया उस वक्त तो इंग्लैंड की बैटिंग को देखकर लग रहा था कि अब इंग्लैंड का विजेता बनना लगभग तय है पर जैसे हीं न्यूजीलैंड के बॉलर हेनरी और बोल्ट ने शुरुआत की तो उनकी बॉलिंग को देखकर लगने लगा था कि मैच में जान जरूर आएगा। जब हेनरी ने जेसन रॉय को चलता किया उस वक्त भी लगा कि किवी टीम इस मैच में कहीं नहीं है. क्योकि उसके बाद भी अंग्रेज टीम में एक से एक आलादर्जे के बल्लेबाज मौजूद थे और सबसे बड़ा बल्लेबाज तो जो रुट थे जो अभी-अभी मैदान पर उतरे थे. रुट के ऊपर उनके टीम का पूरा भरोसा था और हो भी क्यों नहीं रुट जो इंग्लैंड की तरफ से टॉप स्कोरर रहे और विश्वकप में सर्वाधिक रन बनाने वाले 5 बल्लेबाजों में इनका भी नाम था. अपनी शैली के अनुरूप रुट खेल हीं रहे थे कि किवी कप्तान विलियम्सन ने ऑलराउंडर डी- ग्रैंडहोम को बॉलिंग के लिए लेकर आये उन्होंने रुट को चलता कर दिया। जभी से मन में ख्याल आने लगा कि अब न्यूजीलैंड इस मैच को जीत भी सकता है. रुट के बाद पिछ्ले दो मैचों  में शानदार शतक लगाने और मैच में भी 36 के ब्यक्तिगत स्कोर पर खेल रहे बेस्टरो को आउट करके किवी गेंदबाजों ने इंग्लैंड को तीसरा झटका दे दिया। इसके बाद निशाम ने इंग्लैंड के कप्तान मोर्गन को आउट करके 90 के भीतर 4 बड़े झटके दे दिए फिर बारी आती है एक उभरते हुए आलराउंर की जिसका नाम बेन स्टोक्स है. वह और जोश बटलर दोनों ने मिलकर शतकीय से ज्यादा की भागीदारी की और बटलर ने अपना अर्द्ध शतक भी पूरा किया और दूसरे छोर पर स्टोक्स भी अपना खेल खेल रहे थे और एक-एक रन के साथ मंजिल के करीब पहुंचने की कोशिश कर रहे थे. जब ठीक बेन स्टोक्स मैदान पर थे तब तक हर किसी को विश्वास था कि इंग्लैंड जीत जाएगी। क्योंकि इससे पहले भी 4 बार स्टोक्स ने अपनी टीम को चुनौती पूर्ण स्थिति से निकालते हुए जीत के मुहाने पर पहुंचाया था पर दो में जीन नसीब नहीं हुई थी. जिसमें श्रीलंका के खिलाफ 225 का  था जो इंग्लैंड हार चुकी थी. स्टोक्स ने अंत तक नाबाद रहते हुए 95 गेंदों और 84 रनों की नाबाद पारी खेली थी. न्यूजीलैंड की तरफ से अंतिम ओवर ट्रेंट बोल्ट लेकर चले थे जिसमे जीत के लिए 15 रन की दरकार थी और बोल्ट ने दो गेंद खाली फेक दी फिर स्कोर 4 पर 15 हो गया इस बीच ओवर की तीसरी गेंद पर स्टोक्स ने मिड विकेट बाउंड्री के ऊपर  शानदार छक्का मार दिए और अब स्कोर 3 पर 9 हो गया. इसी दरम्यान चौथी गेंद पर स्टोक्स ने तेज शाट खेला और एक रन पूरा करके दुसरे के लिए लौटे रहे थे जभी गुप्टिल ने रन आउट करने के लिए सीधा थ्रो स्टम्प पर मारा पर बीच में स्टोक्स आ गए और गेंद उनके हाथ से टकराकर सीमा रेखा के पार चली गयी जिस पर इंग्लैंड को 6 रन मिले और यहीं से न्यूजीलैंड इस मैच से बाहर हो गया और मजे की बात है कि बेन स्टोक्स न्यूजीलैंड में हीं पैदा हुए थे. उसके बाद 2 गेंद पर जीत के लिए 3 रन की जरूरत थी जिस पर स्टोक्स आदिल रशीद को रन आउट कराते हुए मात्र 2 रन हीं ले पाए और इस तरह यह मैच टाई हो गया.
फिर खेल सुपर ओवर में गया जहाँ जिम्मा एक बार फिर स्टोक्स और  हाट में थी तो बॉलिंग एक बार फिर बोल्ट के हाथ. सुपर ओवर में पहले बल्लेबाजी करते हुए इंग्लैंड ने एक ओवर में 15 रन बनाये और  न्यूजीलैंड को जीत के लिए 16 रन का लक्ष्य दिया। न्यूजीलैण्ड की तरफ से बैटिंग के लिए जिम्मी निशाम और गुप्टिल की जोड़ी आयी तथा बॉलिंग के लिए इंग्लैंड के अपनी टीम के सबसे युवा बॉलर और इस विश्वकप में 20 विकेट लेने वाले ज्योफ्रा आर्चर को बुलाया फिर भी न्यूजीलैंड भी महज और वो 15 रन हीं बना पायी और इस तरह सुपर ओवर भी बेनतीजा साबित हुआ और मैच एक बार फिर टाई पर खत्म हुआ। अंतिम गेंद पर 2 रन लेने की कोशिश में गुप्टिल रन आउट हुए. फिर इस मैच का फैसला पारी में लगे सर्वाधिक चौके, छक्के से हुई जिसमें इंग्लैंड को विजेता घोषित किया गया. ICC का यह नियम मेहनत करने वाली टीम के लिए सही नहीं था या तो रिजर्व डे पर एक बार फिर मैच करवाते या दोनों टीमों को संयुक्त रूप से विजेता घोषित करते। न्यूजीलैंड ने मैच तकनीक आधार पर भले हीं हारा पर असली विजेता इस विश्व कप का वही है.

ऐसे मैच सदी में सिर्फ एक बार देखने को नसीब  हमें हुआ. जैसे शेन वार्न की गेंद सदी के सर्वश्रेष्ठ मानी गयी है उसी तरह आने वाले भविष्य में इस मैच को भी सदी का सर्वश्रेष्ठ एकदिवसीय मैच माना जायेगा.

Saturday, July 13, 2019

संघ का आजादी में योगदान एक मजाक

जैसा कि सुनने में आ रहा है कि अब महाराष्ट्र के नागपुर विश्वविद्यालय में संघ की आजादी के आन्दोलन में भूमिका के बारे में पढ़ाया जायेगा. जो पूर्णतया झूठ पर आधारित होगा. क्योंकि जब इतिहास के पन्नों से संघ के गद्दारी का तथ्य आयेगा तो सारे संघी उसे कैसे जायज ठहरायेंगे ? ये भविष्य में देखना रोचक होगा. आजादी में संघ के इतिहास को पढ़कर जब आज के छात्र उसके आन्दोलन से पिछे हटने का स्पष्टीकरण मांगेंगे तो संघी विचार के लोग शर्म से पानी-पानी हो जायेंगे. देश में ऐसे हजारों तथ्य है जो संघ और इसके संबंधित संगठनों की भूमिका पर स्पष्ट नजरिया रखतें हैं. अपने इस लेख के दौरान मैं कुछ अकाट्य और ऐतिहासिक तथ्यों को सूबूत के तौर पर आप के सामने रखूंगा. उसमें असहयोग आंदोलन,गांधी जी के दांडी मार्च, भारत छोड़ो आन्दोलन जैसे प्रमुख घटनाक्रम शामिल होंगे. जब एक तरफ कश्मीर से कन्याकुमारी तक और दिल्ली से लेकर लाहौर तक करोड़ों आजादी के परवाने अंग्रेजों हूकूमत के हर अत्याचार से लड़ते हुए स्वाधीनता आंदोलन को ऊंचाई पर ले कर जा रहे थे तब संघ के सबसे बड़े नेता सावरकर अंग्रेजों की गुलामी की कसमें खा रहे थे और जेल से माफी मांगती हुई चिट्ठियां लिख रहे थे.

Thursday, July 11, 2019

कर्नाटक के नाटक में कीचड़ से खिलेगा कमल

कर्नाटक में पिछले पाँच दिनों से एक सियासी नाटक जो फैला है उसका पटाक्षेप कम से कम अभी होता तो कत्तई नहीं दिख रहा है. क्योंकि पार्टियों के सियासत दाँ अभी हर एक दांव-पेंच आजमा लेना चाहते हैं। जिससे जनता द्वारा हुए "राजनितिक गधों" को धन या मंत्री पद से खरीदा जा सके. इस नाटक का कितना बुरा असर कर्नाटक  जनता की सेहत पड़ होगा इसका इल्म न तो विधायकों को तोड़ने वालों को है और न हीं विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश करने वाली पार्टी को है. इस घटनाक्रम की प्रत्यक्ष आवाज संसद से सड़क तक और बैंगलोर से मुंबई सुनी और देखी जा सकती है. ऐसा लग रहा है मानो देश में अब कोई कायदा-कानून काम नहीं कर रहा है. एक बात जनता को समझ लेनी चाहिए कि जो भी विधायक किसी भी पार्टी को छोड़ते हैं तो वो बीजेपी में जाते हीं मंत्री या अन्य लाभ के पद कैसे पा जाते हैं उसका ताजा उदाहरण गुजरात है जहां बीजेपी में जाते हीं दो कांग्रेसी विधायकों को मंत्री बना दिया जाता है, जबकि बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ता जो सालों तक धूप-बरसात एक करके मेहनत करते हैं वो पद, वो प्रतिष्ठा बीजेपी अपने कार्यकर्ता को क्यों नहीं है ? क्या कभी आपने सोचा है कि आपके जनप्रतिनिधि अगर आप के वोट से चुनकर आने के बाद ऐसी हरकत करते हैं तो उस वोटर को कितना बड़ा झटका लगता होगा, शायद नहीं सोचा होगा तो अब सोचना शुरू करें। छोटी सी लालच की खातिर जो नेता, मंत्री हमारे वोट की इज्जत नहीं करते तो हम उनकी इज्जत क्यों करें ?
कर्नाटक की घटना देश में बढ़ती हुई राजनैतिक अविश्वश्नीयता का जीवन्त उदाहरण है. जिसका चलन हाल के कुछ वर्षों में अनेक बार देखने को मिला है और हर बार ऐसा घृणित कार्य करने वाली एक हीं पार्टी का नाम आया है जिसका संबंध कर्नाटक में मची संवैधानिक अस्थिरता से भी है. इस राजनितिक उथल-पुथल के बीच बीजेपी को भी कीचड़ में कमल खिलने की उम्मीद जगी है. वैसे प्रधानमंत्री द्वारा निर्मित नई इंडिया में नैतिक आधार पर यह जायज होता नहीं दिख रहा है. माननीय विधायकों को बचने की लिए मानों दोनों तरफ से घुड़दौड़ सी मची है. मीडिया की नजर में कर्नाटक का संकट ज्यादा विकट है अपितु सूखे और बरसात से. कितने लोग बाढ़ के पानी में बह गए, उनमें से बहुतों का पता भी नहीं चल पा रहा है पर मीडिया के लिए वो जरूरी नहीं है. शायद वो लोग मीडिया को पैसे नहीं देते। आज शाम सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कांग्रेस+जेडीएस के बागी विधायक शाम को स्पीकर के सामने फिर से इस्तीफा देने के लिए आएंगे। इस खबर को लेकर मीडिया इतनी उत्साहित है कि मानो हमें विश्व का नंबर एक देश घोषित कर दिया गया हो. आज की हालत को देखकर संविधान निर्माता बाबा साहेब भी शायद खुश नहीं होते। कर्नाटक में दोनों तरफ से सत्ता का लालच जोर मार रहा है. एक तरह जेडीएस के कुमारस्वामी जो कि वर्तमान मुख्यमंत्री हैं वो कुर्सी से चिपक कर रहना चाहते हैं तो दूसरी और भ्र्ष्टाचार के आरोप में दो साल जेल की सजा काटकर लौटे हुए बीजेपी के स्वर्ण पुरूष श्री येदुरप्पा जी हैं, जिनसे बिना कुर्सी के रहा नहीं जा रहा है और किसी भी तरह वो कुर्सी हासिल करने को लालायित है. इस लड़ाई में किसी ब्यक्ति की हार होगी किसी की जीत पर दोनों स्थितियों में संविधान का हार निश्चित हीं होगा.


Wednesday, July 3, 2019

राहुल का कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा

राहुल गांधी ने 2019 लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी आगे बढ़ कर ली है और अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। राहुल गांधी के इस्तीफे के फैसले से कांग्रेस के करोड़ों कार्यकर्ता बहुत दुःखी होंगे और दूसरी तरफ वो अपने नेता पर गर्व भी महसूस कर रहे होंगे कि उनका नेता देश की मूल्यों की रक्षा करने के लिए सदैव आगे बढ़कर लड़ाई लड़ी। अब देखना यह है कि राहुल गांधी का इस्तीफे का फैसला उनके चेहरे को कितना चमका पाता है। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ने लड़ाई नहीं लड़ी, लड़ाई तो लड़ी पर धर्म और सेना की राजनीति के आगे हार गए। वैसे राहुल गांधी को जानने वाले बताते हैं कि राहुल एक बहुत ही बेहतरीन इंसान हैं, लेकिन देश को इंसान की नहीं बड़बोले चौकीदार की आवश्यकता थी। मेरा भी ब्यक्तिगत तौर पर अपना मानना है कि राहुल गांधी एक नेक दिल इंसान हैं। हां गांधी नाम उनके साथ जुड़े रहने की वजह से बीजेपी को टारगेट बनाने में आसान हो जाता था पर राहुल के इस एक बड़े फैसले से जनता के बीच निश्चित तौर पर एक नया संदेश जाएगा‌। जो राहुल की छवि को निखारने का काम करेगा। मैं देख रहा हूं कि किस तरह देश के गोदी मीडिया के कुछ पत्रकार अब भी राहुल के इस्तीफे में खोट निकाल रहें हैं। यह देखकर बहुत ताज्जुब होता है कि पत्रकार किसी भी समस्या के लिए नेहरू और गांधी परिवार से सवाल पूछता है न कि सत्ता से।