Saturday, August 31, 2019

सरकार से सवाल तो देशद्रोही कैसे

समाज में एक अजीब तरह का नशा है, जो सत्ता के अनुकूल है. देश के अंदरूनी मामलों पर जो भी आवाज उठा रहा है उसे फ़ौरन पाकिस्तान परस्त, देशद्रोही और न जानें किस-किस उपनामों से सम्मानित किया जा रहा है. अभी दो दिन पहले का एक मामला इलेक्ट्रॉनिक गोदी मीडिया में बहुत छाया रहा और उसकी वजह से देश के एक पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय नेता को अपने बयानात पर सोशल मीडिया के माध्यम से सफाई तक जारी करनी पड़ी. वो मुद्दा था कश्मीर से संबंधित। जैसा कि सभी जागरूक देशवासी जानते हैं कि पिछले 26 दिनों से जम्मू-कश्मीर में क्या हो रहा है ? वहाँ की सवा करोड़ जनता को बंधक बनाकर उनके घर में हीं कैद कर दिया गया है, उनकी आवाज को कोई सुनने वाला नहीं है और वहां ऐसा कोई मौजूद भी नहीं हैं जिससे वो अपना दुःख-दर्द बता सके. क्योंकि जम्मू-कश्मीर की सरजमीं सेना की संगीनों तले है ? हमारी बहादुर सेना उनका पूरा साथ दे रही है और धैर्य के साथ अपने राष्ट्र के कर्तब्य का पालन भी कर रही है. लेकिन नेता, विधायक कहाँ हैं किसी को कुछ पता नहीं. हाँ बात दूसरी हो रही थी परन्तु संदर्भ कश्मीर हीं था. कश्मीर की इसी आंतरिक समस्या को लेकर कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी जी ने एक ट्विटर पर एक ट्वीट किया था जिसको पकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में कोट किया था. इस बात को लेकर देश में गोदी मीडिया और संघ संगठन द्वारा एक अलग तरह का माहौल बनाने की कोशिश की जाने लगी मानो राहुल गाँधी पाकिस्तानी है. दो-दो केंद्रीय मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर और श्रीमती स्मृति जुबीन ईरानी ने प्रेस से कहा कि राहुल गाँधी पकिस्तान की भाषा बोल रहें है. देश का ये दुर्भाग्य कहा जाए या सौभाग्य जिस राहुल की दादी ने पाकिस्तान के टुकड़ें करते हुए एक नए देश बांग्लादेश का निर्माण किया, जिस राहुल गाँधी के नाना श्री नेहरू जी देश के स्वंत्रता आंदोलन में दशक भर से ज्यादा सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी बिताई पर हार नहीं मानी. आज उसी राहुल गाँधी को पाकिस्तान परस्त के रूप प्रचारित किया जा रहा है. जबकि अंग्रेजो से माफी मांगने वाले सावरकर के संगठन के लोग संघ/बीजेपी वाले आज देशभक्त बन रहे हैं.      
अगर ऐसा हीं चलता रहा तो सरकार तो निरंकुश हो जायेगी. कोई कुछ भी प्रश्न उठाएगा और उसे देश के अस्मिता से जोड़ दिया जाएगा और प्रश्न पूछने वाले को देशद्रोही बोला जाएगा तो ये देश किधर जाएगा ? आज देश में सरकार से कोई सवाल पूछो तो वो तुरंत देश की अस्मिता से जोड़ देते हैं और जबाब देने से दूर भागने की कोशिश करते है अर्थात सरल भाषा में कहें तो बेशर्मी से जिम्मेदारी से दूर भागते हैं. देश की अर्थब्यवस्था गर्त में जा चुकी है पर सवाल करो तो देश के साथ गद्दारी होगा. ऐसा माहौल बना दिया गया है. समाज में जिसको बात करने का ढंग नहीं है वो भी कश्मीर पर खूब ज्ञान पेल रहा है. जैसे कि धारा 370 इनसे पूछ कर लगाई या हटाई गयी है.     

Tuesday, August 27, 2019

अघोषित आपातकाल

मैं और मेरे जैसे लाखों-करोंड़ो लोगों ने "आपातकाल" को नहीं देखा होगा। उस दौरान हुए मानव संघर्षों को नहीं देखा होगा। परन्तु जब हम उन किस्से, दास्तानों को तमाम माननीय बुजुर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनेता, पत्रकार बंधुओं से सुनते हैं और उन्हें समझने की कोशिश करते हैं तो हमें प्रतीत होता है कि जैसा आज का माहौल हैं लगभग वैसा हीं तो उस वक्त रहा होगा. हां एक अंतर जरूर है तब में और अब में 1975 में आपातकाल लगाने की इंदिरा सरकार द्वारा घोषणा की गयी थी और 2019 में अघोषित आपातकाल है. जहां आप कुल कर न तो सांस ले सकते हैं और न हीं कुछ लिख सकते हैं. जम्मू-कश्मीर इसका ताजा और सबसे ज्वलंत उदाहरण है. जहां करीब सवा करोड़ लोगों को धारा 370 के संदर्भ में इस तरह अँधेरे में धकेल दिया गया है मानो उनको अपने हित की बात जानने का कोई हक नहीं है. कश्मीर में किसी समाचार पत्र की छपाई नहीं हो रही है, इंटरनेट और फ़ोन सेवाएं अस्थाई रूप से बंद कर दी गयी हैं, पत्रकारों को घर से उठाकर पुलिस थाने में कैद किया जा रहा है, दो पूर्व मुख्यमंत्रियों को आज 20 दिन से उन्हीं के घर में नजरबंद किया जा चुका है. एक पूर्व मुख्यमंत्री को दो बार श्रीनगर हवाई अड्डे से बैरंग लौटा दिया जाता है, राहुल गाँधी के नेतृत्व में कश्मीर जा रहे विपक्षी प्रतिनिधिमंडल को भी वापस लौटाया गया, पत्रकार बंधुओं को पीटा गया, उठा-उठाकर पटक दिया गया, आज तक की महिला पत्रकार मौसमी सिंह के साथ पुलिसिया दुर्ब्यवहार किया गया. यही तो आपातकाल का लक्षण हैं जो हमें सत्ताधारी दल के नेता और पत्रकार बताते हैं. तो हम क्यों न मान लें कि यह "अघोषित आपातकाल" है.                       

Thursday, August 22, 2019

राजनितिक बदले की भावना में चिदंबरम गिरफ्तार

चिदंबरम की गिरफ्तारी को हल्के में लेने वाले ये शायद भूल रहें हैं कि जो कल चिदंबरम के साथ हुआ कल वही उन लोगों के साथ भी हो सकता है. जो आज की ब्यवस्था के कर्ता-धर्ता हैं. क्योंकि न्याय का पक्ष तो बराबर होता है ? परन्तु जो काम न्याय का चोला ओढ़कर किया जाता है वो बदले की भावना के रूप में परिलक्षित होता है. सरकार के खिलाफ बोलने की सजा चिदंबरम जी को मिल रही है. देश का हर आदमी जानता है कि चिदंबरम जी पर लगाया जाने वाला आरोप राजनीति से प्रेरित है. हंसी आज की गोदी मीडिया पर आती है जो "चिदंबरम फरार" है का हेड लाइन चला रही है. गोदी मीडिया आज के दौर में सत्ता के सामने दण्डवत हो चुकी है. आप इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया का कोई भी चैनल या पृष्ठ बदलकर या उठाकर देख लें तो आपको उसमें बस सरकार का स्तुतिगान और चिदंबरम तथा कांग्रेस की वीभत्स शब्दों में निंदा की गयी है. ऐसा कैसे हो सकता है कि मीडिया या सत्ता वर्ग बिना FIR में नाम आये चिदंबरम या किसी को दोषी अथवा भगोड़ा घोषित कर दे. मैं रात से हीं तथाकथित पत्रकार जो अपने आपको राजनितिक विश्लेषक मानते हैं "उनका कहना है कि चिदंबरम को एक पूर्व मंत्री की हैसियत से नहीं एक आम नागरिक की हैसियत से देखना चाहिए". तो मैं उन तथाकथित मूर्ख मंडली से एक सवाल करता हूँ कि फिर चिदंबरम को लेकर आप टीवी शो किस लिए कर रहें है. क्या आप चिदंबरम को आप नागरिक मानते हैं ? क्या आपने कभी किसी नागरिक के लिए टीवी शो किया है ?. नहीं. यहीं दोगलापन इन सत्ता द्वारा सम्पादित किये जाने वाले पत्रकार चिंटुओं में दिखाई देता है.

चिदंबरम की गिरफ्तारी भूमिका - 2007 के एक केस में चिदंबरम को गिरफ्तार करने के लिए भूमिका किस तरह बनाई गयी है. उसका आंकलन करने पर हमारे सामने सब कुछ साफ़ हो जाएगा. इंद्राणी मुखर्जी जो की पीटर मुखर्जी की पत्नी है और अपनी सगी बेटी की हत्या के आरोप में जेल में एक साल से ज्यादा वक्त से जेल में बंद हैं. उन्हीं की कम्पनी का नाम INX मीडिया था और उसी को विदेशी निवेश के मामले में इंद्राणी मुखर्जी की गवाही के आधार पर कल रात को गिरफ्तार कर किया था. क्या इंद्राणी मुखर्जी की माध्यम से सरकार ने चिदंबरम को फ़साने के लिए कोई डील की है ? किसी कैदी की बातों पर सुबूत के तौर पर माना जा सकता है, यह आप जन के लिए सोचने की बात है.

बीजेपी एक वाशिंग मशीन - बीजेपी आज की ऐसी वाशिंग मशीन बन गई है जिसमें जब तक हेमंत विश्व शर्मा असम कांग्रेस के मंत्री थे तो देश के सबसे बड़े घोटाले बाज थे, मुकुल रॉय जो डेढ़ साल पहले तक TMC में थे तो शारदा घोटाले के सबसे बड़े आरोपी थे, जब उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आयी और पूरे पहाड़ का जीवन अस्त-ब्यस्त था तब सरकार ने पुनर्गठन के लिए "स्पेशल पैकेज" दिया था तब बहुगुणा कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे और मोदी समेत सारे बीजेपी नेता उन्हें भ्र्ष्टाचारी नंबर एक बताते थे इन सभी के खिलाफ CBI (तोता) जांच कर रही थी. नारायण राणे को जब कांग्रेस में थे तो गिरफ्तार करने के लिए सरकार ने पुलिस भेजी थी और वो जैसे हीं भाजपा में शामिल होते वाशिंग मशीन में धूल जाते हैं. अब जब ये सारे नेता बीजेपी में आ गए है तो वो संघ रूपी वाशिंग मशीन से धुल कर साफ़-पाक हो चुके हैं. अब सीबीआई ने इनको पूछना-जांचना बंद कर दिया है. आप जन लोग मिलकर तय करें कि आप किस तरह का देश चाहते हैं ?  

Friday, August 16, 2019

अयोध्या मसले पर कोर्ट के तल्ख सवाल

अयोध्या केस की हर खबर जानने के लिए देश के लोग हमेशा हीं बहुत उत्सुक रहे हैं. परन्तु जब से अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रोजाना सुनवाई शुरू हुई है तब से कुछ न कुछ नई बात निकलकर सामने आ रही है. माननीय अदालत हिन्दू पक्ष के वकीलों से तर्क के आधार पर बाते पूछ रहें हैं और उनका प्रमाण भी मांग रहा है और कोर्ट के सवालों का जबाब संबंधित पक्ष के वकील भी देने की कोशिश कर रहें हैं. परन्तु अदालत उनकी सोच से भी आगे जा कर पश्न पूछ रहा है जिसका जबाब देने में कुछ समस्या तो जरूर पेश आ रही है. जैसे कि माननीय अदालत ने तो हिन्दू पक्ष की दलीलों पर यह कहते हुए पश्न उठाया कि मंदिर का नजरिया आपका अपना नजरिया हो सकता है, परन्तु हर किसी का नहीं। आज भी जब सुबह में अयोध्या कैसे जब हिन्दू पक्ष के वकील श्री वैद्यनाथ ने स्कन्द पुराण का जिक्र किया और उसमें राम जन्म भूमि को सरयू के नजदीक के क्षेत्र को चिन्हित करने की कोशिश की तब सुप्रीम कोर्ट के जज श्री चंद्रचूण जी ने कहा कि आप जिस शब्दों का जिक्र कर रहें हैं उसमेँ भगवान कहाँ है ? उसमें तो भगवान के दर्शन का जिक्र है. भाई जब अयोध्या मामले में हिन्दू पक्ष के वकील साहब ये मान ही लिए हैं कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि ये मस्जिद बाबर ने ही बनवाई थी. तो खामखा बाबर का लाखों बार जिक्र तुम करते क्यों हों ? आज माननीय अदालत ने ये भी पूछ लिया कि मंदिर तोड़ने का आदेश बाबर या उसके सेनापति ने दिया था. इसका आपके पास क्या प्रमाण है ? इसका जबाब संबंधित पक्ष के वकील महोदय नहीं दे सकें. यह सुनवाई अब और ज्यादा देर तक नहीं चलने वाली है. ऐसा माननीय जजों की सक्रियता को देखने से प्रतीत होने लगा है. 

Saturday, August 10, 2019

पांच क्षेत्र के लोगों की राय पर होगा नए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव

लगभग तीन महीने से खाली चल रहे देश की सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष/अंतरिम अध्यक्ष के चुनाव के लिए अब कांग्रेस ने कोशिशें तेज कर दी है. ऐसा लगता है कि अब कांग्रेस को अपने नए अध्यक्ष के चुनाव के लिए समय मिल गया है. हम इसे विडंबना हीं कहेंगे कि जिस कांग्रेस ने अंग्रेजों से लड़ते हुए देश को उनके चंगुल से मुक्त करवाया वो 20 वीं सदी में तीन महीने तक बिना किसी मुखिया के काम करती रही. खैर जो भी हो वो उनका आंतरिक मामला है. आज दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय में कांग्रेस में फैसले लेने वाली सबसे शक्तिशाली संस्था कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की बैठक आहूति की गयी. जिसमें मीडिया रिपोर्ट के आधार को मानें तो मुकुल वासनिक, सुशील शिंदे, मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे कुछ अनुभवी और कुछ युवा नामों की चर्चा की गयी, परन्तु इस पर कार्य समिति में मौजूद समस्त सदस्य सहमत नजर नहीं आये. तो संगठन महासचिव श्री के सी वेणुगोपाल ने एक या दो नाम पर सहमति बनाने के लिए देश के हिस्सों को पांच जोन में बाँट दिया है. जिसका उद्देश्य यह होगा कि जनता और कार्यकर्ता के बीच ये संदेश न जाए कि उन पर किसी ब्यक्ति को अध्यक्ष बनाकर थोपा जा रहा है. इस तरह के फैसले देश के लोकतंत्र के लिए शुभ-संकेत है. 

अध्यक्ष /अंतरिम चुनने के लिए क्षेत्र वार कुछ इस तरह बांटा गया है -

वेस्ट जोन

शुरुआत वेस्ट जोन से करते हैं. इस जोन के अंतर्गत गुजरात, दादर नगर हवेली, दमन दिव, मुंबई , मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा और राजस्थान राज्य शामिल हैं. इस जोन में राहुल गांधी, खड़गे, मोतीलाल वोरा, गुलाम नबी आजाद, एके एंटनी, सिद्दरामैया, श्रीनिवासन बी वी, कुलदीप विश्नाई और जितिन प्रसाद के नाम शामिल हैं.

ईस्ट जोन

ईस्ट जोन के अंतर्गत आने वाले नाम और क्षेत्र इस प्रकार हैं, सोनिया गांधी, तरुण गोगोई, आरपीएन सिंह, केसी वेणुगोपाल, जितेंद्र सिंह, कुमारी शैलजा, पीएल पुनिया, शक्तिसिंह गोहिल, दीपेंद्र हुड्डा, शामिल हैं. इस जोन में देश के बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्य शामिल है.

नार्थ जोन

देश के उत्तरी क्षेत्र (नॉर्थ जोन) में दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश राज्य आते हैं. इस जाने की जिम्मेदारी हाल हीं में औपचारिक तौर पर राजनीति में आने वाली और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, पी चिदंबरम, अविनाश पांडे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, पीसी चाको और आशा कुमारी शामिल है. 

साउथ जोन

देश के दक्षिणी क्षेत्र (साउथ जोन) में पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, राजीव साटव, अधीर रंजन चौधरी और सुरजेवाला जैसे नाम शामिल हैं और इस क्षेत्र के जिम्मे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, लक्षद्वीप, पुदुचेरी और तमिलनाडु जैसे राज्य शामिल है.

नार्थ ईस्ट जोन

नार्थ ईस्ट जोन में जो क्षेत्र आ रहें है उनमें अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, असम, सिक्किम, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा शामिल है. इस क्षेत्र की जिम्मेदारी अहमद पटेल, हरीश रावत, ओमान चांडी, अम्बिका सोनी, दीपक बाबरिया, मीरा कुमार, और सचिन राव के कंधों पर है.

खैर अब खबर आ रही है कि उपरोक्त बनी कमेटियों से श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अपने नाम वापस ले लिए हैं.

यूपीए चेयरपर्सन श्रीमति सोनिया जी और कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी नए पार्टी अध्यक्ष के चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेंगे. ये संघ/भाजपा के मुंह पर तमाचा है और एक सच्चे लोकतंत्र की परिभाषा है.




Tuesday, August 6, 2019

कश्मीर में 370 पर रार और शाह का झूठा बयान

कल कश्मीर में बीजेपी नीत सरकार ने कल 370 को खारिज करते हुए इसे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बाँट दिया. इसके बाद हिंदुत्व की पैरोकारी करने वाले लोग जगह-जगह मिठाइयाँ बाँट रहें हैं और मुखर्जी के सपनों के भारत का निर्माण बता रहें हैं. संविधान की धारा 3 कहती है कि जब भी किसी नए राज्य के सीमा का निर्धारण करने से पहले संबंधित एकीकृत राज्य की विधान सभा से राय-मसवरा करके उसके नए सीमा का निर्माण किया. आजादी के बाद या कहें 1952 के बाद जितने भी नए राज्य बनें सबमें धारा 3 की मूल-भावना को ध्यान रखकर किया गया है. क्या जम्मू-कश्मीर के मामले में सरकार सभी वैधानिक और स्थापित प्रक्रियाओं का पालन किया ? क्या इस सरकार ने संविधान की धारा 3 को मानने से इंकार कर रही है ? 
गृह मंत्री, गोदी मीडिया और उनके समर्थक कह रहें हैं कि कश्मीर से धारा 370 हटने से जम्मू-कश्मीर के लोग बहुत खुश हैं, तो मैं ऐसे लोगों से एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि जब जम्मू में लाखों सैनिकों को बुलाकर धारा 144 लगा दिया है, जब सरकार इंटरनेट, टेलीफोन, मोबाइल को कूड़े की ढेर में तब्दील कर चुकी है तो इन गोदी मीडिया वाले भक्तों को कौन बता रहा है कि वो इस बदलाव से बहुत खुश हैं ? जब जम्मू का कोई निवासी अपने घर से बाहर नहीं निकल रहा है तो क्या मीडिया के बंधु उनकी दीवारों से पूछ कर अपनी रिपोर्टिंग देश के अन्य हिस्सों में प्रसारित कर रहें हैं ? अरे अपने जमीर से मत गिरो। जिस देश की मीडिया सजग और सच्ची प्रहरी रही है उस देश ने आसमान तक की उचाईयों को बुलंदियों के साथ छूती रही हैं. मैं दिल्ली से चले वाले समस्त मीडिया को जब अपने घर में बैठकर टीवी पर देखता हूँ लगता हैं कि इन्होने अपने अस्मत को सरकार के चरणों में समर्पित कर रखा हो.
मैं बीजेपी की इस मनमानी को यहीं तक नहीं देख रहा हूँ. मैं देख पा रहा हूँ कि सरकार का अगला कदम एक बार फिर संविधान पर वज्रपात का होगा. वो समान नागरिक बिल भी हो सकता है, राम मंदिर पर माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के इतर भी कुछ हो सकता है. क्योंकि अब यह सरकार संघ के अजेंडे को लागू करने के लिए उस बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ भर रही है जिसको की कोई रोकने वाला नहीं हैं. आज एक कमजोर विपक्ष होने का अहसास हो रहा है कि संविधान की लिखी हुई बातों को किस तरह से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है.

Monday, August 5, 2019

370 के संदर्भ में संघ निति का पूरा दखल

सरकार की धारा 370 हटाने की सिफारिश सरकार ने बहुत जल्दबाजी में किया है इसे सरकार का घमंड माना जाना चाहिए। अगर सरकार को इसे हटाना हीं था तो एक माहौल बनाती और और बात-चीत के जरिये हल किया जाना था. सरकार हर बात को तानाशाही तरिके से करने में यकीन रख रही है. तानाशाही तरिके से काम करने का आरोप बीजेपी हमेशा लगाती थी पर अब बीजेपी उनसे भी ज्यादा वीभत्स तरिके से काम करने लगी है. हर किसी को उम्मीद थी कि बात धारा 35 A की होगी पर ये तो निकला धारा 370 जो की पहले हीं मृतप्राय हो चुका है. अब जम्मू-कश्मीर का कोई वजूद नहीं रहेगा क्योंकि जम्मू- कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्र शाषित राज्य में बाँट दिया गया है. अब हमें वहां भी दिल्ली वाली धरना पार्टी देखने को मिलेगी। सरकार इतनी जल्दबाजी में जो भी कर रही है उसका परिणाम-दुष्परिणाम की विवेचना आने वाले समय में देखा और पढ़ा जाएगा। जैसे आज हम नेहरू जी के फैसले के बारे में हमें पढ़ने और सुनने को मिला था.

 जो बात आज से छः दशक पहले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री जवाहर लाल नेहरू जी ने 21 अगस्त, 1962 को अनुच्छेद 370 के संबंध में पं. प्रेमनाथ बजाज के पत्र का उत्तर देते हुए लिखा था -

"वास्तविकता यह है कि संविधान में इस धारा के रहते हुए भी, जो कि जम्मू-कश्मीर को एक विशेष दर्जा देती है, बहुत कुछ किया जा चुका है और जो कुछ थोड़ी बहुत बाधा है, वह भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी. सवाल भावुकता का अधिक है, बजाए कुछ और होने के. कभी-कभी भावना महत्वपूर्ण होती है लेकिन हमें दोनों पक्षों को तौलना चाहिए और मैं सोचता हूं कि वर्तमान में हमें इस संबंध में और कोई परिवर्तन नहीं करना चाहिए."

आज सरकार ने संविधान की हत्या की है जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कुछ विशेष रियायत के साथ जोड़ा गया था. लेकिन सत्ता की असीमित भूख ने सरकार को संवैधानिक मूल्यों की हत्या करने से भी नहीं रोक सकी. हम आज के दौर में उस दौर के फैसले की विवेचना कर रहें हैं और उसकी तुलना करने की कोशिश कर रहें हैं जो उतना हीं हास्यास्पद है जितना की होने पिता से पूछना कि आपके पिता का नाम क्या है ? आज नेहरू, पटेल, अम्बेडकर और जितने संविधान निर्माता थे उन्हें अब स्वर्ग में भी तकलीफ हो रही होगी कि जो उन्होंने उस जमात को वादा किया था उसे आज कुछ छद्म राष्ट्रवादियों द्वारा सत्ता ने नशे में चूर होकर बर्बाद कर दिया गया. जिस संघ पर कभी पटेल ने प्रतिबंध लगाया था, जिस कश्मीर नीति को पटेल ने नेहरू के असहमतियों के साथ दृढ़ निश्चय के साथ लागू किया था. आज उस पटेल के आत्मा की हत्या आज उन्हीं के प्रदेश से आने वाले वर्तमान गृहमंत्री श्री शाह ने किया। संघ के कलंकित इतिहास को बदलने का कार्य इस सरकार द्वारा किया जा रहा है. आज कश्मीर के पूर्व राजा हरि सिंह की आत्मा जहाँ कहीं भी विचरण कर रही होगी वो रो रही होगी कि उन्होंने जो अपनी कश्मीरी अवाम को उस दौर में वादा किया था उसे आज तोड़ दिया गया. इस सरकार के नितियों में संघ का कितना दखल है यह तीन तलाक और धारा 370 बिल पर देखा जा सकता है. इतिहास उन लोगों को भी याद करेगा जो आज अपनी मौलिक जिम्मेदारियों से अलग होकर मात्र सत्ता सुख के लिए सरकार के साथ सहभागी बने हुए हैं. मैं ये नहीं कहता कि 370 को नहीं हटाना चाहिए, जरूर हटाना चाहिए पर उससे पहले वहां के लोगों के साथ एक संवाद होना चाहिए। फिर आप सबको साथ लेकर आप इसे हटाइये लेकिन जबरदस्ती आप अपनी जिद हर किसी पर नहीं थोप सकते.

"यह जो नीति है ये सरकार या लोकनिति नहीं हैं. यह संघ निति है. जिसकी अपनी एक अलग राष्ट्र की कल्पना है. जिसमें बस हिन्दू है और उसके अलावा कोई नहीं है."



संघ और बीजेपी की राजनीति कश्मीर और राष्ट्रवाद

मुझे हैरत होती है कि विपक्ष अब तक ये क्यों नहीं समझ पा रहा है कि संघ/बीजेपी की राजनीति का मॉडल क्या रहा है ? अब तक विपक्ष इस पर क्यों नहीं सोच सका कि जिस पार्टी की घोषित निति हीं कश्मीर को लेकर रहीं हो. वो सत्ता में आने के बाद इस पर कोई न कोई बड़ा फैसला तो लेगी हीं. खैर जो भी हो आज हलचल कुछ ज्यादा हीं तेज है. सरकार के इस फैसले की आशंका तो उस समय हीं चल गयी थी जब सरकार ने कश्मीर में ज्यादा अर्धसैनिक बलों की तैनाती का आदेश दिया। जभी से कुछ बड़े परिवर्तन की आहत होने लगी थी. उसी का असर ये था कि जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की पूर्व सहयोगी पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ़्ती के बयानों और फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला के कथनों से समझा जा सकता है. कश्मीर के मुख्यधारा के नेताओं में एक अलग तरह की बेचैनी देखी जा रही है जिसका असर विशेष तौर पर घाटी में देखि और समझी जा रही है. शायद ! आज नेहरू जी के 1954 के फैसले को पलट दिया जाएगा, जिसकी संभावना सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है. सरकार भी जानती है कि कश्मीर एक संवेदनशील मुद्दा है. घाटी की पार्टियों की सबसे बड़ी चिंता जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष अधिकार 35 A और धारा 370 को लेकर है और इसी को लेकर पूरे देश के लोगों का ध्यान आज संसद की अपनी धड़कने बढ़ाकर देख रहें हैं.  

कश्मीर पर कोई भी फैसला सरकार के लिए मुसीबत बन सकता है इस बात का इल्म सरकार को भी है. इसीलिए सरकार सेना,अर्धसैनिक बलों और राज्य के प्रशासनिक अमलों की सहायता से इसे अमलीजामा पहनाने की पूरी तैयारी की जा चुकी है. बीजेपी की सहयोगियों पार्टयों में भी कुछ पार्टियां जैसे शिवसेना, अकाली दाल, आरपीआई और कुछ छोटे दल तो सरकार के साथ हैं तो वहीं जेडीयू जैसी पार्टी जो कि बीजेपी की दूसरी या तीसरी मौजूदा दौर की सबसे बड़ी पार्टी है. जो पहले से हीं सरकार के इस बिल की खिलाफत करती आयी है और हाल के तीन तलाक बिल पर भी सरकार के बिल का विरोध किया था. तो संभावना ये भी बनती है कि जेडीयू निश्चित तौर पर सरकार के कश्मीर बिल का विरोध करेगी. अब क्या होता है थोड़ी देर में या यूं कहें कुछ मिनटों में संसद के माध्यम से देश की जनता को गृहमंत्री श्री अमित शाह जी बताएंगे। जब सारा राज खुल जाएगा और सारी किन्तु-परन्तु का दौर खत्म हो जाएगा.     

  

Friday, August 2, 2019

रवीश के प्राइम टाइम शो ने दिलाया मैगसेसे पुरस्कार

आज हमारे देश के बहुत हीं सादे लिबास में रहने रहने वाले और गोदी मीडिया के दौर और अंधभक्ति के साये से गुजरते हुए सत्ता के खिलाफ और जन सापेक्ष की बात को बिना आडंबर के कहने, बोलने और लिखने वाले NDTV के प्राइम टाइम शो के सम्पादक श्री रवीश कुमार जी को पत्रकारिता में एशिया का नोबेल कहा जाना वाला "'रैमॉन मैगसेसे" पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति श्री रैमॉन मैगसेसे की याद में किसी समाज, संस्था या पत्रकारिता में अपनी जिम्मेदाररियों का सर्वश्रष्ठ और ईमानदारी पूर्वक निवाह करने पर दिया जाता है. जैसे हीं पुरस्कार संस्था ने घोषणा कि वैसे हीं सोशल मीडिया पर और ब्यक्तिगत तौर पर रविश जी को बधाई देने वालों का ताता लगा हुआ है. खासकर सोशल मीडिया पर तो रविश के समर्थन में कई हैज टैग ट्रेंड कर रहें हैं जिसमें लगभग 50 हजार से ज्यादा लोग अपनी बधाई और शुभकामना संदेश उन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.

पुरस्कार देने वाली संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान "बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है." रविश कुमार का शो 'प्राइम टाइम' के नाम से रात 9 बजे प्रसारित किया जाता है. जिनमें बिना किसी शोर-शराबे की समाज के मूलभूत जरूरतों की बात की जाती है. स्कूल, कॉलेजों में छात्रों की आवाज उठाना, किसी रेहणी-पटरी वाले के हक की बात करना या जिस भी समूह के साथ कुछ अन्याय हो रहा है उसकी बात करना, यही रविश जी को महान बनाती है और इस पुरस्कार तक ले कर जाती है. रवीश जी कभी अपने आप को टीवी स्टूडियों तक सिमित रखने की कोशिश नहीं किये वो हमेशा खुले में लोगों से बातचीत करने में यकीन रखते थे और उनकी समस्याओं को सुनने और समझने की कोशिश करते हैं. मुझे अच्छी तरह याद है कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के दौरान जब रवीश जी दिल्ली से सटे जिले नोएडा के खोड़ा कॉलोनी में नोटबंदी से जुड़ीं लोगों की परेशानियों को जान रहे थे तभी कुछ बदमाशों ने उनके साथ किस तरह से दुर्ब्यवहार किया था परन्तु वो बिना डरे अपने काम को अंजाम दे रहे थे.

रवीश होने का अहसास- रवीश होने का अहसास बस यहीं हैं कि जब आप जनता के साथ खड़े होकर उनके हक की बात करने लगो और गोदी मीडिया न बनकर सत्ता से सवाल करते रहो. तभी जाकर आप रवीश कुमार होने का अहसास करा पाएंगे। रवीश कुमार को सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थित नेताओं और उनके भक्तों के द्वारा जान से मारने की धमकियां दी जाने लगी और उनके परिवार को लेकर भी धमकियां दी जाने लगी. इतना होने पर भी जो हिम्मत नहीं हारे वही रवीश कुमार है. रवीश कुमार को यहां तक पहुंचने में उनके चैनल के मालिक श्री प्रणव राय का अतुलिनीय योगदान है जो रवीश कुमार मिश्रा को रवीश कुमार बनने तक हर मोर्चे पर साथ निभाया। रवीश कुमार आपकी सफलता पर हमें एक भारतवासी होने के नाते गर्व है. कोई तो ऐसा शख्स है जिसकी ईमानदारी को इस घुटने के बल रेंगती हुई मीडिया जगत में कभी खरीदा नहीं जा सका.