Thursday, January 28, 2021

क्या टिकैत अन्नदाताओं की बुलन्द आवाज बन चुके हैं

क्या किसान आन्दोलन 26 जनवरी के बाद राकेश टिकैत के चेहरे के आस-पास आकर सिमट गई है ? मिडिया की आंखों से देखें तो यही सच दिखाई दे रहा है। आन्दोलन 26 जनवरी की लाल किले पर घटित घटना के बाद अपना रुप बदल चुका है। लेकिन जैसे हीं मंच पर रोते हुए राकेश टिकैत का विडियो आया। जब उन्होंने आरोप लगाया कि लोनी से भाजपा विधायक हमारे बुजुर्गों को डरा-धमका रहे हैं। अब मैं यहां से नहीं जाउंगा। यही अपील एक तरह से लोगों के अन्दर भावनात्मक रूप से घर कर गया। मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बड़ौत, नोएडा, गाजियाबाद और हरियाणा के कुछ जिले के लोगों में भावनात्मक अपील कर गया। रात में हीं राकेश टिकैत के मुजफ्फरनगर स्थित आवास पर समर्थक किसानों का रात में हीं जुटना शुरू हो गया और गाजीपुर चलो का नारा बुलंद करने लगे।

रात में हीं मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों से लोग ट्रैक्टर और अन्य साधनों से दिल्ली बार्डर की तरफ कूंच कर दिया। फिर भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत जी ने कल सुबह मुजफ्फरनगर के राजकीय इण्टर कालेज में किसान महापंचायत बुलाने का आह्वाहन किया है। निश्चित तौर पर कल कुछ रैली ऐतिहासिक होने वाली है। क्योंकि विपक्ष की सारी पार्टियां अब किसान आन्दोलन को अपना समर्थन दे चुकी है। एक बात तो तय है कि लोनी विधायक के एक तथाकथित बयान ने खत्म होने वाले किसान आन्दोलन को एक नई जिंदगी मुहैय्या करा दी। इन सब घटनाओं को अगर आपस में जोड़कर देखने की कोशिश करें तो पायेंगे कि इस आन्दोलन ने राकेश टिकैत को एक राष्ट्रीय किसान नेता के तौर पर स्थापित कर दिया है।


Tuesday, January 26, 2021

गणतंत्र आन्दोलन पर गर्व और ट्रैक्टर रैली में हिंसा होना शर्मनाक

26 जनवरी हिन्दुस्तान के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं? दिसंबर, 1929 में लाहौर में रावी नदी के किनारे पं. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का सम्मेलन आयोजित किया गया था और यहां पर हीं पहली बार कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया था।

उसी आयोजित सम्मेलन में कांग्रेस ने कहा था कि अगर 26 जनवरी, 1930 तक अंग्रेजी हुकूमत भारत को स्वाधीन घोषित नहीं किया। तो उसी दिन आन्दोलनकारीओं द्वारा स्वत: भारत को पूर्ण स्वाधीन घोषित कर दिया जाएगा। चूंकि अंग्रेज सरकार का  भारत को स्वाधीन करने का कोई इरादा नहीं था। इसीलिए 1930 से 1947 तक हर 26 जनवरी को कांग्रेस स्वाधीनता दिवस मनाती रही। यही वजह रहा कि 26 जनवरी, 1950 के दिन भारत को गणतंत्र घोषित किया गया तथा 26 जनवरी की तारीख हमारे इतिहास का गौरवशाली क्षण बन गया।

आज 26 जनवरी है और आज हम सभी देशवासी बड़े हीं नाज से 72 वें गणतंत्र दिवस के रूप में मना रहें हैं। जहां दल से उपर उठकर राष्ट्र के शूरवीरों को एकमत से याद किया जाता है और उनकी शौर्य गाथा से आज की पीढ़ी को अवगत कराया जाता रहा है। लेकिन आजादी के 72 सालों के इतिहास में कल देश को दो झांकियां देखने को मिलेगी। पहली झांकी सेना और उसके शौर्य की निकलती है जिसकी परम्परा आजादी के बाद से अनवरत चली आ रही है। लेकिन आज देश के सामने एक अनोखा दृश्य है। जब किसान भी सैकड़ों किलोमीटर लंबी ट्रैक्टर रैली सरकार के विरोध में निकाल रहे हैं। सुबह आठ बजे की बात करें तो गाजीपुर NH 24 पर खोड़ा से लेकर लाल कुआं तक ट्रैक्टरों से पटी पड़ी थी।

सरकार द्वारा निर्मित तीन नये कृषि कानून के खिलाफ किसान उद्वेलित है। सरकार के हठपूर्ण रवैय्ये के कारण किसानों का धरना आज 62 दिन बाद भी समाप्त नहीं हो पाया। 12 दौर की बात भी किसान और सरकार के बीच बने गतिरोध को खत्म नहीं कर पाई। ये सब बस सरकार के अकड़ के कारण हुआ। सरकार को लगता है कि हमने प्रचण्ड बहुमत प्राप्त किया है तो उसके बल पर कुछ भी करने का अधिकार हमें मिल गया है। लेकिन ये भूल गए हैं कि सड़क पर बैठे इसी गण ने इनको इतना विशाल बहुमत दिया है। और आज वही गण सत्तासीन तन्त्र को उसकी असली जगह दिखा रहा है। 

मेरे मन-मस्तिष्क में एक सवाल कौंध रहा है कि आज देशवासी किसानों की ट्रैक्टर रैली को देखें या जवानों की प्रदर्शनी को। वैसे जवानों की परेड के बाद हीं किसानों की ट्रैक्टर रैली निकलेगी। जो भी हो जब गाजीपुर सीमा से, टिकरी सीमा से किसान निकलें तो वो देखने लायक रहा। लेकिन सरकारी दबाव में न्यूज चैनल किसानों को नहीं दिखा रहे। जिसे हम सोशल मीडिया पर देख रहे हैं। किसानों से अपील है कि हमेशा की तरह आज भी आप संयम का परिचय देते हुए अपनी रैली शान्ति पूर्ण ढंग से पूरा करेंगे।

किसान देवता हैं ऐसा सत्ताधारी पार्टी हर चुनाव में बोलती रहती थी। परन्तु आज जब अन्नदेवताओं को सरकार की सख्त दरकार थी। तब सरकार उन्हें ठण्ड में सिकुड़ने के लिए छोड़ दिया है। सरकार अपनी हठधर्मिता को छोड़कर किसानों की मांगों को मान सकती थी। वो मौका गवां दिया। अगर इतिहास की बात करें तो एक बार और इसी तरह के टकराव की आहट 1965 में तमिलनाडु में हिन्दी विरोध को लेकर हुआ था। द्रविड़ आंदोलन के जनक सीएन अन्नादुरै ने हिंदी का विरोध शुरू किया था। जब तमिलनाडु के लोग 26 जनवरी के दिन काला झण्डा लेकर प्रदेश भर में आन्दोलन करने के लिए उद्वेलित थे। तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार में शामिल लोगों ने 26 जनवरी के बलिदान और इतिहास से अवगत करिते हुए ऐसा न करने की अपील की। जिसका यह असर हुआ कि सीएन अन्नादुरै ने अपना प्रतिकात्मक विरोध 26 जनवरी की बजाय 25 को किया। यहां सरकार और तमिल दोनों ने देश की गरिमा को धूमिल करने से बचा लिया।

आज ट्रैक्टर रैली के नाम पर जो हुआ वह शर्मनाक है। आन्दोलन के बीच कुछ उपद्रवी लाल किला और आईटीओ पर हिंसा की‌। जिसकी मैं भर्त्सना तो करता हूं उसके साथ इनके साथ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए ऐसी मेरी उम्मीद और आकांक्षा है। इस तरह से आप राष्ट्रीय पर्व पर कर नहीं कर सकते। आज इन आन्दोलनकारीओं को मैं इंसान नहीं मानता। मैं दिल्ली पुलिस के जवानों के धैर्य को नमन करता हूं। इस तस्वीर को विश्व समुदाय की मिडिया ने देखा। जिसका संदेश सही नहीं गया। लाल किला पर जिस जगह 1950 से तिरंगा फहराया जाता है और आज भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने ध्वजारोहण किया था। उसे उतारकर एक धार्मिक झण्डा लगा दिया गया। जो हमारे लिए और किसान आन्दोलन के लिए शर्म की बात है।


जय हिन्द

जय जवान जय किसान


Friday, January 22, 2021

ग्यारहवें दौर की वार्ता के बाद किसान और सरकार के बीच बातचीत का सिलसिला टूटने के कगार पर

आज दोपहर बाद किसानों और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच ग्यारहवें दौर की वार्ता प्रस्तावित थी। तय समय पर किसान तो पहुंच गए मगर किसानों ने सरकार पर आरोप लगाया कि वो तीन घंटे इंतजार कराने के बाद आते और बस पन्द्रह मिनट में हीं मिटींग समाप्त हो गई। सरकार के अपने तर्क और सवाल हैं। मैं इस पर कोई और चर्चा नहीं करूंगा। क्योंकि आप सभी लोग उन खबरों से अवगत हो गये होंगे। आज मैं किसान आन्दोलन से होने वाले राजनैतिक नफा-नुकसान के बारे में बात करने की कोशिश करूंगा।

किसानों के लम्बे आन्दोलन का सरकार पर असर - किसानों का आंदोलन आज अनवरत 58 दिनों से चल रहा है। न किसान झूूूके न सरकार। नतीजा यह रहा कि आज की वाार्ताता के बाद सरकार भी मुखर हो गई और खुलकर कुछ किसान नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ नेता ऐसे हैं जो आन्दोलन की आत्मा को तोड़ रहे हैं। ऐसे लोग कभी भी सकारात्मक सोच के साथ नहीं आते। तो इसका सहज अर्थ यह निकलता है कि सरकार भी अब कड़ा रूख अख्तियार करने का मन बना लिया है। और यह विचार निश्चित तौर पर अमित शाह जी का होगा। इस आन्दोलन से निपटने का तरीका बिल्कुल नागरिकता कानून के जैैसा था। लेकिन यहां दांव उल्टा पड़ गया।

किसानों की ट्रैक्टर रैली - यदि ट्रैक्टर रैली किसान निकालने में सफल रहे तो मोदी सरकार के माथे पर आपातकाल की की तरह कभी न मिटने वाला धब्बा लगेगा। सरकार और संघ मिलकर समाज में किसान हितैषी सरकार ढिंढोरा पिटते है। जिस पर निश्चित तौर पर मोदी जी की साख पर बट्टा लगेगा। मैं टी वी पर देख रहा हूं भाजपा के बड़े विद्वान प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी जी आज तक चैनल पर आज जिस तरह से कृषि निजीकरण की पैरोकारी कर रहे हैं। वो किसानों को उकसाने वाला है। किसान के फसलों की तुलना विद्वान प्रवक्ता जी मोबाइल और कार से कर रहे थे। मैं तो उनके विवेक पर सवाल खड़े करता हूं कि आप इस समय ऐसी बकवास बात कैसे कर सकते हैं ? जब आपका किसान आपके खिलाफ सड़कों पर उतरा हो। निश्चित तौर पर ऐसे लोग भाजपा या सरकार का भला नहीं करने वाले।

किसानों का निश्चय - किसान भाइयों ने पहले दिन से हीं एक निश्चय के साथ आन्दोलन कर रहे हैं। MSP की कानूनी गारण्टी और तीनों ने कानून पूरी तरह से रद्द हो। पर सरकार भी कभी MSP का आश्वासन जुबानी ख़र्च में तो देती है पर लिखकर नहीं। फिर कभी अट्ठारह से चौबीस महीने कानून पर अमल को रोकने का आश्वासन देती है। जुबानी जमा ख़र्च के अनुसार सरकार किसानों को वो सब कुछ देना चाहती है पर जो किसान चाह रहा है सरकार वहीं उसे देना नहीं चाहती। कमाल का विचार है सरकार का। भेड़ से ऊनी कम्बल का वादा तो कर दिया मगर ये नहीं बताया कि बाल भेड़ के हीं काटे जायेंगे।


Wednesday, January 20, 2021

लोकतंत्र के मायने अमेरिका हमसे बहुत बेहतर

अमेरिका से अनगिनत असहमतियों के बीच आज हमें उसके उदार लोकतंत्र को देखते हुए यह कहने में खुशी हो रही कि एक परिपक्व देश में हीं ऐसी विलक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था हो सकती है। जहां एक भारतीय अमेरिकी नागरिक भी अमेरिका में दूसरे स्थान का नागरिक बन सकता है। कल जब कमला हैरिस ने अमेरिका के उप-राष्ट्रपति के पद और गोपनीयता की शपथ ली। सीना गर्व से गुब्बारा बन गया। और अनायास हीं मुंह से निकल पड़ा अमेरिका का लोकतंत्र इसी तरह जीता-जागता रहे और वहां के लोग आगे भी जागरूक बनें रहें।

हमारे यहां तो लोगों की बातों में अथाह दोगलापन है। कल रात्रि में (भारतीय समयानुसार) जब कमला हैरिस शपथ ग्रहण करने के लिए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज के सामने हाथों में "बाइबिल" लिए खड़ी थी और शपथ ले रहीं थीं। जब सभी लोग उन्हें भारत का सम्मान बता रहे थे। ऐसे लोगों में भक्त और दक्षिण पंथी विचारक भी शामिल थे। जबकि वो नागरिक अमेरिका की थी और शपथ अमेरिकी संविधान की ले रहीं थीं। ऐसे में पता नहीं लोगों को गर्व कहां महशूस हुआ ? हां अगर गर्व महसूस करना हो तो वो अमेरिकी संविधान पर करो। जहां एक भारत से संबंध रखने वाली महिला को नहीं बल्कि एक अमेरिकी नागरिक को उन्होंने तवज्जो दी।

हमारे देश में 2014 में एक ऐसा हीं नजारा देखने को मिला था। जब सत्ता में अटल जी की अगुआई में बीजेपी थी और बिखरे हुए विपक्ष की अगुआई सोनिया गांधी जी कर रही थी। जो कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी जी की पत्नी थी। जिन्होंने ने इटली से आकर भारत में हिन्दू रिति-रिवाज से शादी के पवित्र बंधन में बधी थीं और भारत की नागरिक बनी थी। उस चुनाव में भाजपा और शरद पवार जैसे लोगों ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था। शादी से पहले सोनिया गांधी मूलतः इटली की नागरिक थीं। सुषमा स्वराज ने तो यहां तक कह दिया कि अगर सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी तो मैं सर मुड़ा लूंगी। तब सारे भक्त ये भूल गए थे कि सोनिया अब इटली की नागरिक नहीं बल्कि भारत के नागरिक थे। उस चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई ने जीत हासिल की और मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने। ऐसे दोगलों के लिए मेरा ये लेख था। अन्त में फिर अमेरिकी लोकतंत्र को सलाम।

हमारे देश में आज भी लोकतंत्र शैशवास्था में है। हमारे यहां कोई फिल्म बन जाती है। उसमें कोई संवाद किया जाता है। तो लोगों की संवेदनाएं घायल हो जाती है। यदि एक नारा कहीं लगा दिया जाता है तो हमारा लोकतंत्र टूटने लगता है। भाई हमारा लोकतंत्र और संविधान इतना महान है कि वो ऐसी बेवकूफी हरकतों से बिखरने वाला नहीं है। हां ऐसे लोगों के ऊपर तत्काल भारतीय संविधान के अनुसार त्वरित एवं कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। परन्तु अफसोस है कि कथित विवादित नारा देने वालों पर पुलिस अदालत में ठोस साक्ष्य नहीं दे पाई। इसलिए कहता हूं कि अमेरिका का लोकतंत्र महान है और हां कमला हैरिस भारतीय नहीं बल्कि अमेरिकी नागरिक की हैसियत से वहां की नम्बर दो लेडी बनी हैं।


Tuesday, January 19, 2021

किसानों के समर्थन में राहुल गांधी की पत्रकार वार्ता

नये साल में इटली की ब्यक्तिगत यात्रा से वापस आने के बाद कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी किसानों और तीनों विवादित कानूनों को लेकर लगातार मार्च और सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे थे। लेकिन एक कदम और चलकर आज दोपहर डेढ़ बजे ‌राहुल गांधी ने दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकार वार्ता किया। जहां पर उन्होंने किसानों के समर्थन में अपना बयान दोहराया तथा किसानों के लिए लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया। अपने पत्रकार वार्ता के दौरान आज राहुल गांधी की शारीरिक भाषा संतुलित थी।‌ राहुल गांधी एकाध मौकों को छोड़कर बस किसान और नव कृषि कानून पर हीं बात करते दिखे। और हर पत्रकार के सवालों का जबाव दिए। लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला। उन्हें अपने अन्दर निरंतरता लाए रखने की जरूरत है। 

इस नए कानून में कई खामियां है। जैसे कि कमोडिटी एक्ट में जो बदलाव किया गया है। उसके मुताबिक कोई भी ब्यवसायी किसी भी कृषि फसल का कम मूल्य पर कितनी भी जमाखोरी कर सकता है और महंगे मूल्य पर बाजार में बेच सकता है। इसका असर देश के आम लोगों पर पड़ेगा। राहुल गांधी ने चीन और अर्नब गोस्वामी पर भी अपने विचार देश के सामने संक्षिप्त रूप से साझा किया। इसी दौरान कांग्रेस ने 'खेती का खून' "तीन काले कानून" नामक एक बुकलेट भी जारी किया।


राहुल गांधी के प्रेस वार्ता की कुछ महत्वपूर्ण झलकियां -

4, 5 लोगों को देश की खेती का ढाँचा दिया जा रहा है.

‘मैं साफ़ सुथरा आदमी हूँ, मुझे ये लोग छू नहीं सकते, हाँ गोली ज़रूर मार सकते हैं, मैं इनसे डरता नहीं हूँ 

चाहे केई मेरे साथ न हो मैं अकेला खड़ा रहूँगा और लड़ता रहूँगा, ये मेरा धर्म है 

आज मेरी बात मत मानना, जब गुलाम बन जाओगे तब मानोगे’- राहुल गांधी 

एक पत्रकार को बालाकोट की जानकारी दी गई थी। पत्रकार ने कहा , यह हमारे लिए बहुत अच्छा हुए हैं कि हमारे 40 जवान मर गए अब हम चुनाव जीत जाएँगे। जिसने जानकारी दी और जिसे मिली दोनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए.

विपक्ष को मीडिया की ज़रूरत होती है। विपक्ष को कोर्ट की ज़रूरत होती है। विपक्ष को संसद की ज़रूरत होती है।विपक्ष को संस्थानों की ज़रूरत है लेकिन इन सब पर सरकार का क़ब्ज़ा है.

किसान जानता है राहुल गांधी क्या करता है। भट्टा परसोल में जेपी नड्डा कहाँ थे ? भूमि अधिग्रहण के वक्त जेपी कहाँ थे.

राहुल गांधी कौन है? क्या करता है? यह बात हिंदुस्तान का हर किसान जानता है। किसान जानता है कि भट्टा परसोल में कौन किसान के साथ खड़ा था ? भूमि अधिग्रहण के समय नड्डा जी या मोदी जी नहीं बल्कि 'राहुल गांधी' किसानों के साथ खड़ा था.


Tuesday, January 12, 2021

विवादित कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने बनाई चार सदस्यी कमेटी

आन्दोलन कर रहे किसानों और उनकी मांगों पर माननीय उच्चतम अदालत ने चार सदस्यी कमेटी बनाई है। कमेटी का काम किसानों की समस्या और सरकार के पक्ष को सुनकर माननीय अदालत को अवगत कराना है। कमेटी के ऐलान के बाद मामला और उलझता हुआ प्रतीत हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने चार नाम इस प्रकार दिए हैं, हरसिमरत मान, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, डाक्टर प्रमोद जोशी और चौथा नाम महाराष्ट्र शेतकारी संगठन से संबंध रखने वाले अनिल धनवत का है।

इनमें से तीन प्रमुख लोग तो पहले से हीं सरकार समर्थित कानून को सार्वजनिक तौर पर देश के प्रतिष्ठित अखबारों में लेख लिखकर किसान हितैषी बताया था। तो इनसे अब निष्पक्षता की क्या कोई उम्मीद की जा सकती है ? जैसा कि उम्मीद था। किसान संगठनों ने भी इनके नाम पर आपत्ति जताई है और यहां तक कह दिया कि यदि कमेटी के लोग बदल भी दिए जाए। तब भी हम कमेटी के सामने नहीं जाने वाले। 

किसानों को भी चाहिए कि वे लोग अदालत का सम्मान करते हुए कमेटी के सामने जाएं। बेशक वो अपनी मांगों पर अड़े रहे। अगर किसान संगठन बात-चीत से दूरी बनाते हुए दिखते हैं तो आम जनता में उनके प्रति नकारात्मक बातें बहुत ज्यादा फैलाई जायेंगी। जो किसान आन्दोलन के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होगा। सरकार को भी अपनी जिद छोड़कर किसानों से खुले मन से बात करनी चाहिए।


Monday, January 11, 2021

कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट की मोदी सरकार को तमाचा

नये कृषि कानून को लेकर मचे घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई चल रही है। इस सुनवाई में कोर्ट ने मोदी सरकार पर सख्त रूख अख्तियार करते हुए बहुत हीं बड़ी टिप्पणी की‌। SC ने केन्द्र सरकार को किसान कानून पर लगाई कड़ी फटकार - माननीय अदालत ने कहा कि यदि सरकार कृषि कानून पर रोक नहीं लगाती है तो अदालत रोक लगायेगी। किसानों के आंदोलन के संबंध में माननीय अदालत ने कहा कि हम किसानों को प्रदर्शन से नहीं रोकेंगे. किसान आंदोलन जारी रखना चाहें तो जारी रख सकते हैं।

इससे पहले कोर्ट ने सरकार पर कभी भी इतना तल्ख टिप्पणी नहीं की थी। कोर्ट ने बुजुर्ग किसान और उनकी मौतों के उपर भी सरकार से सवाल कर रही है। जिस पर सरकार को कोई ज़बाब नहीं सूझ रहा है। सरकार बैकफुट पर है। कोर्ट ने सरकार के बारे में बोला कि हम आपके ब्यवहार से बहुत निराश है, आप असंवेदनशील कैसे हो सकते हैं ? माननीय अदालत की तल्ख टिप्पणी के बाद भी सरकार अपनी दलील को बेशर्मी से रखें जा रही है।

केन्द्र सरकार को ये मान लेना चाहिए कि किसानों की ये लड़ाई अदालत में सुनवाई और पेशी की नहीं है। यह लड़ाई उनके भविष्य और उनके सम्मान की लड़ाई है। आज सर्वोच्च अदालत में केन्द्र सरकार के वकील जी दलील दे रहे थे कि उत्तर भारत के तीन प्रदेशों के किसान हीं क्यों आन्दोलन कर रहे हैं ? दक्षिण भारत के किसान क्यों आन्दोलन नहीं कर रहे हैं ? तो उनकी नासमझी के लिए मैं बता दूं कि इस आंदोलन में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के भी किसान भाई भी शामिल है। और दक्षिण के किसानों का रेल सेवा बाधित होने के बाद यहां तक पहुंचना आसान नहीं रह गया है। दूर-दराज के किसान भी अपने स्तर पर विरोध कर रहे हैं। लेकिन उसे देखने के लिए अहम का चश्मा उतार फेंकना पड़ेगा। कल हरियाणा के मुख्यमंत्री अपने गृह जिले में 'किसान पंचायत' नहीं कर पाए। इससे बड़ी जलालत और क्या होगी संघ की सरकार के लिए। किसान भाइयों का शोषण नहीं होना चाहिए और तत्काल किसान भाइयों को विश्वास में लेकर केन्द्र सरकार को उनकी बात मान लेनी चाहिए। वर्ना कुर्सी वहीं देते हैं और उतार कर फेंक भी देते हैं। जैसा कि पिछली सरकारों ने देखा भी है।

फिर भी इन बेशर्मों को शर्म कहां ?

#कृषि_निजीकरण_बंद_करो

Friday, January 1, 2021

नये साल की पहली खुशखबरी सीरम संस्थान द्वारा विकसित कोरोना की आपातकालीन दवा को मिली सरकार की मंजूरी

नये साल के आगाज के साथ कोरोना वैक्सीन के इस्तेमाल की आपातकालीन स्थिति में करने के लिए सरकार ने आदेश जारी कर दिया। जो नये साल के लिए कोरोना की लड़ाई में एक रोल अदा करेगी। और जनता अत्यधिक आत्म विश्वास के साथ कोरोना से लड़कर जंग जीत हासिल कर सकती है। लगभग अब पूरी दुनिया में मानव जीवन पर लगा ग्रहण छंटने की संभावना प्रबल हो गई है। दवाई के अभाव में दुनिया भर में ‌हजारों-लाखों इंसानों की जान चली गई। लाखों लोगों का परिवार उजड़ने से अब बच जायेगा।