Tuesday, December 18, 2018

किसानों का दिन और कांग्रेस की सरकार

कांग्रेस के लिए सत्ता का सुख तो जरूर मिला परन्तु उसके  बाद उसे दो बड़े झटके भी लगे जिससे कांग्रेस को सत्ता मिलने की ख़ुशी थोड़ी काफूर हो गयी परन्तु एक बात तो बड़े दिल से कहना पड़ेगा कल चाहे कांग्रेस का दिन न भी रहा हो पर किसानों का दिन जरूर रहा ऐसा हम कह सकते हैं क्योंकि शपथ ग्रहण के कुछ घंटों के अंदर हीं छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्रियों ने 2 लाख तक के किसानों के कर्जमाफी  के फाइल पर दस्तखत करके उनको एक छोटा सा राहत जरूर दिया है जो निश्चित तौर पर अन्नदाताओं के नाम रहा काश ! देश के सरकारें पहले से हीं धरती पुत्रों का ख्याल रखती तो आज उनको इस तरह की रेवड़ियाँ बाटने की जरूरत नहीं होती और वो अब तक बहुत समृद्ध हो चुके होते।
नेताओं को किसानों की दुर्दशा को समझने के लिए वातानुकूलित कमरे से बाहर निकलकर खेत-खलिहानों में जाना चाहिए और धूप-बरसात में किसानों के पुरुषार्थ को देखकर आंकलन करना चाहिए कि क्यों धरती पुत्र आज बहुत बड़ी विभिषिका में जी रहा है चाहे राहुल गाँधी हो या नरेंद्र मोदी या और कोई जो भी अपने आप को नेता मानता है ये सबके लिए है. चुनावी भाषणों में किसान बनने से किसान का कभी भी कोई भला नहीं हुआ 4 दशक से किसान चुनावों में महज चुनावी किसान की हीं भूमिका में रहा है पर कांग्रेस पार्टी की एक बात को बिना किसी लग-लपेट के मानना चाहिए कि इसने देर से हीं सही चाहे राजनितिक मजबूरी हीं क्यों न कहें किसानों को अपने अजेंडे में सबसे ऊपर रखकर उनकी राजनीति करने की कोशिश कर रही है जिससे अचानक से किसान देश में सबसे चर्चित मुद्दा बन गया है.
केंद्र से कांग्रेस की विदाई के बाद और एक के बाद एक चुनाव हार कर कांग्रेस देश के मानचित्र पर बिलकुल नदारद होने के कगार पर थी तब कांग्रेस ने सबसे पहले पंजाब चुनाव में किसानों के मुद्दे पर राजनिति की शुरुआत की और किसान कर्जमाफी का वायदा किया और भी तमाम मुद्दे थे पंजाब के अंदर पर किसानो और नशे के मुद्दे काफी प्रखर रूप में उठाये गए थे और कांग्रेस को फायदा भी हुआ और कांग्रेस पंजाब में दो-तिहाई बहुमत लेकर सत्ता पर काबिज हुई और किसानो का मध्य प्रदेश की भाँति दो लाख तक कर्जमाफी का अपना चुनावी वायदा पूरा किया। इस चुनाव के बाद तो मानो कांग्रेस ये मान बैठी थी कि उसकी नैय्या को सिर्फ किसान हीं पार लगा सकते हैं और कोई नहीं तो इसी मुद्दे को कांग्रेस ने कर्नाटक में भी दोहराया जहां उसे अपनी सत्ता बचाने की चुनौती थी परन्तु बहुत तो नहीं पर आंशिक रूप से सफलता जरूर मिली। बीजेपी ज्यादा सीट जीतने के बाद भी सरकार बनाने में नाकाम रही और वहीं दूसरी तरफ कम सीट जीतने के बावजूद कांग्रेस जेडीएस के साथ मिलकर एक बार फिर सत्ता में आ गयी और किसानों का कर्जा माफ़ किया।
कर्नाटक चुनाव के बाद शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों को शायद पक्का यकीन हो चला था कि अब हमारी जीत की गारण्टी और सत्ता की चाबी किसानों के ही हाथ में है फिर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसे बड़े मुखर ढंग से उठाया और सरकार को खूब घेरे में लेते रहे जिसका चुनावी फायदा और किसानों का वोट कांग्रेस की झोली में भरपूर गिरा और परिणामस्वरूप कांग्रेस इन तीनो राज्यों में सत्ता पर काबिज हुई जिसमें छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस विगत 15 सालों से सत्ता से दूर थी.
लोकसभा से पहले का ये चुनाव पूरी तरह किसान के नाम रहा ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी !     

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