देश में एक बात कुछ दिनों से मुद्दे के रूप में परिवर्तित करने की कोशिश हो रही है,वो है राफेल डील.इस ब्यावसायिक डील को एक तरह से किसी के ब्यक्तिगत लाभ और घोटाले के साथ जोड़ा जा रहा है,इसमें सत्य और असत्य कुछ भी हो सकता है.इसकी शुरुआत संसद के पिछले सत्र में कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा दिए गए भाषण से हुई थी.
इसमें एक बात तो सत्य है कि कहीं न कहीं कुछ तो समस्या है जो न तो सरकार और न हीं ऑफसेट करार पाने वाली कंपनी सच्चाई को सामने ला रही है दिन-ब-दिन सरकार के द्वारा नई बात देश को बताई गयी उससे लोगों में थोड़ी दिलचस्पी बढ़ी और लोग इसकी सत्यता के लिए दबे हुए स्वर में सवाल पूछने की भी कोशिश की,तो कुछ लोगों को उनकी जॉब से हटाकर तो कुछ को नेहरू और गाँधी को अपशब्द कहकर जबाब दे दिया गया,परन्तु सत्य अब भी गौड़ है,उसका जबाब अब भी रहस्यमयी तरीके से गायब से है.
मजे की बात तो तब हो गई जब सवाल पूछने वाली किसी राजनितिक पार्टी के प्रवक्ताओं को "ऑफसेट करार" वाली कंपनी से संस्थान के वकील द्वारा लीगल नोटिस दे दिया जाता है और चेतावनी भरे लहजे में बोला जाता है कि आप हमारे संसथान का नाम बदनाम कर रहे है आप जो भी बोले सोच-समझकर बोलें अन्यथा आपको कोर्ट में घसीटेंगे,तो इस तरह की धमकी से तो साफ है कि कुछ तो गड़बड़ है.
परन्तु एक बात समझ में नहीं आयी कि जब जबाबदेही का काम सरकार की है न की किसी प्राइवेट एंटिटी की तो ये प्राइवेट संसथान वाले भाई साहेब कैसे बीच में कूद रहे है,कहीं सरकार ने इन्हें अपना अघोषित प्रवक्ता तो नहीं बना दिया है कि जिस बात का जबाब सरकार नहीं दे पा रही है तो उस बात का जबाब सरकार के किसी नजदीकी ब्यावसायिक घराने के माध्यम से डर दिखा कर दे दिया जाये।ये पता नहीं कैसी प्रवृत्ति आ गयी है,जबाबदेही सरकार की है और जबाब कोई उद्योगिक घराना दे रहा है,इस मुद्दे को इसके अंतिम परिणिति तक जनता के बीच में पहुंचाने जिम्मेदारी अब विपक्ष के लोगों की है न की ब्यावसायिक और सत्ता पक्ष के लोगों की.
इस ब्यावसायिक डील में एक बात जो शक के दायरे को बढ़ा रही है वो ये है की हमारे पास हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड जैसी अनुभवी और पब्लिक क्षेत्र की उत्कृष्ट स्थान रखने वाली और प्रसिद्द संस्थान था तो डील से मात्र दस दिनपहले बनने वाली कंपनी को कैसे इतना बड़ा करार दे दिया गया और हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड को क्यों दरकिनार किया गया इसका जबाब मिलना बाकी है और दूसरा ये की इसकी कीमत में एक हजार करोड़ रूपये प्रति जहाज कैसे बढ़ गए जैसे कुछ सवाल मन में उठ रह रहें है उनका समाधान सरकार के जबाब से है मिल सकता है न की किसी ब्यवसाय करने वाली कंपनी से.
सरकार की जिम्मेदारी देश की 125 करोड़ जनता से है न कि कुछ खास अमीर लोगों से सरकार जन भावना के साथ चलती है न की किसी के ब्यक्तिगत हिट के साथ,जन मानस को अपने विवेक से फैसला लेना चाहिए क्योंकि जिनको अपना विवेक सौपा था वो तो किसी के पास गिरवी रख दिए है.
जय हिन्द
bahut bda ghotala hai
ReplyDeleteno doubt
ReplyDelete