Tuesday, December 4, 2018

विजयादशमी का रावण मरता हीं नहीं


दशहरा पर्व हम सनातन धर्म को मैंने वाले हिन्दुओं का एक बहुत बड़ा त्यौहार होता है और इस त्यौहार से हमारा गर्व भी जुड़ा हुआ है जो पिछले 30 सालों से राजनीति के केंद्र प्रासंगिक बने हुए है और राज सत्ता के लिए वोट दिलाने का काम करते है वो है हमारे प्रभु श्री राम जी जिन्हे हम पूर्वांचल वासी राजा राम के नाम से पुकारते है कहा यह जाता है कि दशहरा (विजय दशमी) आज के हीं दिन प्रभु श्री राम लंका जीत कर माँ सीता को रावण के कैद से आजाद कराये थे और रावण वध के बाद आतिशबाजी से श्री राम जी का भब्य स्वागत किया गया था.

हम पूर्वांचल वासियों का रघुनन्दन पर अकाट्य विश्वास हजारों साल बाद आज भी बना हुआ है हम इन्हें अपना सबसे बड़ा प्रतीक मानते हैं,तो विजय दशमी मनाने की शुरुआत "त्रेता युग" में रावण वध के पश्चात शुरू हुआ  था जो आज 5 हजार साल बाद भी मनाया जाता है,वभगवान राम नाम के हीं नहीं दिल के भी राजा थे क्योंकि लंका जितने के बाद श्री राम ने उस पर अपना आधिपत्य नहीं जमाया अपितु रावण के छोटे भाई विभीषण को वहां की सत्ता सौप दी थी.

देश के कुछ हिस्सों में विजय दशमी को माँ दुर्गा के भक्ति और शक्ति के रूप में भी मनाया जाता है और आज के दिन शस्त्र-पूजन का कार्य उल्लास के साथ किया जाता है.

मुख्य रूप से विजयदशमी को रावण पर राम के जीत के ऊपर मनाया जाता है कहीं-कही 1 महीने पहले से तो कहीं-कहीं विजयदशी के 9 दिन पहले से रामलीला (राम चरित्र) का आयोजन किया जाता है तथा हर छोटे-बड़े गाँवो और शहरों में राम जी की झाँकियाँ निकली जाती है और रावण के पुतले को एक प्रतीक के तौर पर जलाकर राम जी के जीत का आनन्द लेते हैं,परन्तु रावण हर साल जिन्दा हो जाता है और समाज में तांडव फैलाता है इससे मेरे मन में एक प्रश्न यह उठता है कि राम ने तो सच के रावण को मारा था परन्तु हम जिस तरह से प्रतीक रुपी रावण का वध करते हैं ठीक उसी प्रकार प्रतीक के रूप में रवां भी मरता है फिर कुछ दिनों बाद हीं फिर से हमारे अंतर्मन में जिन्दा हो जाता है.

 रावण-दहन के बारे में मेरे अपने कुछ विचार है    

है आता हर साल दशहरा
हर साल जलाया जाता रावण
फिर क्यों जिन्दा रहता रावण
कैसे लौट है आता रावण 
हर जन के अंतर्मन में बसता
लोभ,कपट,छल रूप है रावण 
फिर क्यों हम बांस जलाते 
कहते रावण को है जलाते
लोभ,कपट,छल,छद्म जलायें 
रावण को हर घर से भगाये 
अपने मन का पाप जलायें 
रावण को फिर पास बुलायें

                       "गिरि बिपिन"


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