Tuesday, December 4, 2018

मंदिर-मस्जिद का खेल


आज 4 सालों के अंदर राजनीति में इतना परिवर्तन  गया है कि जो सख्श 2014 मेंमुस्लिमों के आग्रह पर टोपी पहनने से इंकार कर दिया था वो अब 2018 में MP केअंदर मस्जिद में जाकर बाकायदा साल भी ओढ़ लिया और यहाँ तक बोल दिया कि"एक तरह से मै बोहरा समुदाय का सदस्य हो गया हूँ"उनके मात्र इतना बोलने से हीकरोड़ो भक्तो का दिल टूट गया जो हिन्दू-मुस्लिम करके अपनी रोटी चला रहा थेवोअब किसी को अपना मुंह दिखाने के भी काबिल नहीं रहे,अब वो किस मुंह से दूसरेलोगों को मुस्लिमो का हितैषी बताएंगे जब खुद उनके सबसे बड़े नेता खुद को मुस्लिमोंका सबसे बड़ा रहबर दिखाने की शुरुआत कर चुके है.

अच्छा मजे की बात ये है कि इसी तरह का बदलाव दूसरी तरफ भी आया है जो हिन्दूशब्द बोलने से भी कतराते थे वो अब हिन्दू-हिन्दू का जाप करने लगे है,ऐसा लग रहा हैकि दोनों मुख्य पार्टियों का चरित्र  अब उल्टा हो चुका है,एक पार्टी जो काफी सालोंतक सत्ता में रही हो उसके अंदर हिन्दू-मुस्लिम दोनों समन्वय के साथ कार्य करते थेपरन्तु हाल के दिनों में उस पार्टी की छवि मुस्लिम हितैषी के रूप में बना दी गयीजिसका उसे ज्यादा से ज्यादा नुकसान बीते चुनाव में हुआ थाअब वह पार्टी एक तरहसे मुखर तो नहीं परन्तु मध्यम मार्ग से हिन्दू की बात करने लगी है,जिसका सबसे बड़ाउदाहरण मध्य प्रदेश चुनाव से पहले हर ग्राम पंचायत में गौशाला खोलने की बात होया "राम पथ गमन"के रास्ते को विकसित करने की बात हो.

हाँ,ये बात सत्य है कि एक पार्टी जो पूरी तरह से मुस्लिम विरोध पर जन्म ली थी अबउसने धीरे-धीरे उस विरोध के विचार से अलग होने की कोशिश कर रही है और दूसरीपार्टी उसकी छोड़ी हुई विचार धारा के साथ थोड़ा नरम तरीके से आगे बढ़ने कीकोशिश में लगी है,इस कृत्य से किसे कितना सफलता मिलता है या कितना नुकसानहोता है आने वाले चंद महीनों में उसका उत्तर मिल जायेगा परन्तु एक बात तो सत्य होगयी है कि समाज के किसी भी तबके की उपेक्षा ज्यादा दिन तक नहीं की जा सकती।

अब छुटभैय्ये नेताओं को भी चाहिए की अपनी गंदी जबान से गंदे शब्द और दिमाग सेबुरे ख्याल निकाल दें क्योंकि उनके शीर्ष नेतृत्व ने इस बात का उदाहरण दे दियाहै,समाज में भाई-चारे के साथ जिये और हर किसी के दुःख-सुख में शरीक होंइसी मेंहमारे महान भारत देश की भलाई है और सम्पूर्ण लोगों का कल्याण भी,धर्म-अनुष्ठान,पूजा-पाठ,इबादत-नमाज ये सब अपने-अपने धर्मों के अंदर की चीजें होती हैंजो सतत चलती रहेंगी।

"इश्क तो अनमोल रिश्ता है
इसके बिना कहाँ कोई जीता है
जो इश्क कर लें वो फरिस्ता है
जो इश्क  करे वो सुप्ता है."

 नमः शिवाय

जय त्रिलोचन महादेव 



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