Saturday, December 22, 2018

कंप्यूटर और मोबाइल के माध्यम से सरकार आप के घर में देगी दखल

20 दिसंबर 2018 को गृह मंत्रालय ने एक ऐसा आदेश पारित किया है जिससे लोगो की निजी जिंदगी में दखल की संभावना ज्यादा बढ़ गयी है या यूँ कहे कि जनता के हर पल का हिसाब अब सरकार की नजरों के सामने होगा और हम अब कुछ भी नहीं छुपा सकेंगे। गृह मंत्रालय ने 2009 के एक एक्ट और 150 साल पहले बने टेलीग्राफ एक्ट को आधार बनाकर इस बिल को मंजूरी दी है तो आपके मन में एक प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि जब ये सब पहले से हीं चलता आ रहा है तो अब हमारे निजी अधिकारों पर कैसे हमला हो सकता है तो उसके बारे में इस एक्ट में हुए बदलाव को जान लेना हमारे लिए बहुत अहम है वो ये है कि 2009 में देश के मात्र दो एजेंसियों रॉ और सीबीआई को किसी के कंप्यूटर और फ़ोन का डेटा खंगालने का हक था और ऐसा करने के लिए एक कानूनी रास्ता था, अदालत थी और सम्बंधित अदालत (जो कि गोपनीय थी) से सुरक्षा एजेंसियों को जांच करने के लिए आदेश लेना होता था पर अब क्या बदला है उसे जानते है. 20 तारीख को जो आदेश पारित हुआ है उसमे राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत देश की 10 शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों को किसी का भी फ़ोन और कंप्यूटर खंगालने की सीधे तौर पर इजाजत दे दी गयी है और अब किसी के कंप्यूटर के डाटा को रीड करने और उसे डिकोड करने के लिए इन्हे किसी से कोई भी इजाजत लेने की कोई जरूरत नहीं रह गयी है.

मसलन गृह मंत्रालय के नवीनतम बदलाव से पहले कोर्ट से सम्बंधित एजेंसी इजाजत तो लेती हीं थी साथ हीं साथ कानून में ये बंधन होता था कि जांच के दौरान एकत्र किये हुए डाटा को सुरक्षा एजेंसियां 60 दिनों से ज्यादा संभाल कर नहीं रख सकती थी अर्थात उन्हें एकत्र की हुई जानकारियों को डीलीट करना होता था जो अब नहीं है. कुछ विद्वान अब ये सवाल उठा रहे है कि जब कांग्रेस ने इसी तरह दो एजेंसियों को जांच करने का अधिकार दिया तो कोई कुछ नहीं बोला तो अब क्यों बोल रहे है ये सवाल अनुचित है तो उसका जबाब भी मै तथ्यों के माध्यम से देने की कोशिश करूंगा जिस समय कांग्रेस ने इस  कानून में बदलाव किया था उस समय साइबर सुरक्षा के बारे में बहुत ज्यादा बात नहीं होती थी और दूसरी बात ये कि साल 2014 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार के ब्याख्या किया है और मानव के निजता में उससे जुडी तकनिकी और अन्य बातों को भी जोड़ा है और अपने आदेश में कहा है कि कोई सरकार या एजेंसी कैसे किसी की ब्यक्तिगत बातो को एड्रेस कर सकती है कैसे किसी के अत्यंत निजी बातों की निगरानी कर सकती है ऐसा सरकारें ऐसा करने लगे तो मानव और पशुओं में अंतर नहीं रहेगा.

आसान भाषा में कहें तो हम अपने कमरे में क्या कर रहें है किससे बात कर रहें है, कैसी बात कर रहें है, क्यों कर रहे है ये हमारी निजता के अधिकार के दायरे में आता है अगर सरकार इसी पर पहरा लगा दे तो हमारे इन अधिकारों का क्या फायदा फिर तो ये उसी तरह होगा की हम बाथरूम में जा रहे है और उसका दरवाजा खुला हुआ है जिससे कोई भी मेरे बाथरूम में तांक-झांक कर सके उसे किसी बात का डर हीं नहीं होगा, अब ये सवाल जरूर होगा कि जब आपके पास कुछ हहपने के लिए है हीं नही तो आपको किस बात का डर है तो ये बात मेरे लिए सही हो सकती है पर उन लोगों के लिए नहीं जो देश के निरीह लोगों की लड़ाई लड़ते हैं. क्योंकि ऐसा कानून बन जाने से चाहे कोई भी सरकार हो वो अच्छे लोगों को या सरकार की खिलाफत करने वालो को राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर खतरा बताकर उनकी आवाजों को खामोश कर देंगी और वो निरीह इंसान इन्साफ की तलाश में या तो जिंदगी भी भटकता रहेगा या अपनी जान दे देगा.  

No comments:

Post a Comment