Saturday, January 4, 2020

सावरकर की वीरता पर कुछ चुभते सवाल

'वीर सावरकर कितने वीर' शीर्षक से मध्य प्रदेश कांग्रेस सेवादल ने एक पुस्तक वितरित की है. जिसमें सावरकर की वीरता को लेकर कई प्रश्न खड़े किये गए हैं. ये भी कहा गया है कि गोडसे और सावरकर के बीच समलैंगिक संबंध थे. जो भी हो. इस बात पर विवाद भी हो रहा है. महाराष्ट्र में कांग्रेस, सेना और एनसीपी मिलकर एक तीन दलों की एक साझा सरकार चला रहे हैं. जिसकी अगुवाई सेना के नेता और बाला साहेब ठाकरे के पुत्र श्री उद्धव जी ठाकरे कर रहे हैं. शिव सेना सावरकर को देशभक्त या एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी मानती रही है. इस विवाद के बाद सेना संजय राउत ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि सावरकर जी देश के महान वीर हैं. जो लोग ऐसी घटिया किताब बटवा रहे हैं. उनके दिमाग में गंदगी भरी है और वह किताब महाराष्ट्र नहीं आएगी.
ये तो रहा शिव सेना का जबाब. लेकिन यहां समझने वाली बात ये है कि कांग्रेस क्यों सावरकर को लेकर ऐसी बात करती है ? जिससे संघ और भाजपा तिलमिला जाती है. सावरकर नाम संघ/भाजपा का पीछा नहीं छोड़ पाता. पिछले साल दिसंबर में राहुल गांध ने रामलीला मैदान से बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा था कि " मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं हैं. मैं माफी नहीं मांगूंगा. मेरा नाम राहुल गांधी है." ऐसा उन्होंने 'रेप इन इंडिया' वाले अपने बयान के संदर्भ में कहा था. सावरकर का नाम अपनी जन सभाओं में बार-बार लेकर कांग्रेस क्या रेखांकित करना चाहती है ? कभी आपने सोचा है.
कांग्रेस सावरकर पर सवाल खड़े करके हिन्दू महासभा और संघ के चरित्र को नए सिरे से जनता को याद दिलाने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस आज की आवाम को ये दिखाना चाह रही है कि जिस सावरकर को आज संघ/भाजपा देशभक्त, वीर और नाना प्रकार के विशेषणों से सम्मानित कर रही है, हकीकत में वो कैसे थे ?
बार-बार राहुल गांधी और कांग्रेस सावरकर की माफी का जिक्र करते है. तो वो माफी है क्या ? आइये थोड़ा जानते हैं 
सावरकर के जीवन को दो पहलुओं में देखना बहुत न्यायोचित होगा. इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सावरकर के जीवन का परहम भाग जो कि 1909 के पहले का था. वो एक आला दर्जे के क्रांतिकारी और विद्वान का था. जहां वो अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सड़कों पर भी उतरने से परहेज नहीं किया था. ठीक इसके उलट सावरकर के जीवन का दूसरा भाग है. जिसकी शुरुआत 1909 के बाद होती है. उस दौर में देश को आजाद करना के समस्त सितारे अपनी जवानी पर थे और आजादी की जंग अपने चरम पर पहुंच सकी थी. 1911 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाले नेताओं सावरकर, नेहरू, भगत सिंह तथा सैकड़ों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दया गया. वहाँ पर सबने अपने-अपने हिस्से की सजा काटी परन्तु अण्डमान जेल में काला पानी सावरकार को भेज दिया गया. वहाँ से उनके जीवन के दूसरे भाग का जन्म होता है. काला पानी की सजा के कुछ महीनों के बाद सावरकर ने अंग्रेजी हुकूमत से लिखित माफी मांगने का सिलसिला शुरू किया. जो लगभग आधा दर्जन बार था. सावरकर ने अंग्रेज़ों को सौंपे अपने माफ़ीनामे में लिखा था, ‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा.’
कांग्रेस के नेतृत्व में जब 1942 में "भारत छोडो अभियान" चलाया गया. जब वो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे और उस वक्त भी सावरकर आंदोलन के खिलाफ थे. सावरकर देश के हिन्दुओं से सार्वजिनक अपील भी की थी कि आपको ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर आंदोलनकारियों के खिलाफ लड़ों और अंग्रेजी सेना का साथ दो. जब देश आजाद हुआ तो देश के संविधान को खारिज करने वाला संघ और हिन्दू महासभा ही थी. जिसके परिणामस्वरूप संघ ने अपने नागपुर मुख्यालय पर 2002 तक तिरंगा नहीं फहराया था.
सावरकर का असर कितना असर ?
जैसा कि सर्वविदित है कि भाजपा/संघ हमेशा से गांधी जी और नेहरू को नीचा दिखाना चाहती है और सावरकर को उनसे श्रेष्ठ या समतुल्य बताती है. चूंकि सावरकर को मानने वाले केवल महाराष्ट्र में है, जबकि गांधी को पूजने वाले पूरे देश में और विश्व भर में हैं. इसलिए कांग्रेस सावरकर के बहाने संघ सरकार पर बहुत तीखे हमले करती है. जिससे संघ सरकार हर बार अपने आप को असहज पाती है और जानबूझकर भी गांघी जी के खिलाफ कुछ बोल नहीं पाती है. जब भी ये गांधी जी को नीचा दिखाने की कोशिश करते है. तब-तब इन्हें मुंह की खानी पड़ती है. उदाहरण स्वरूप हम भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा को हीं ले ले. इन्होने ने दो बार गोडसे की तारीफ़ की और दोनों बार इन्हें तो इन्हें इनकी पार्टी को जनता से खुलेआम माफी मांगी पड़ी और तो और संघ के प्रचारक रह चुके और अब हमारे प्रधानमंत्री महोदय को प्रज्ञा के बयान पर खेद जताना पड़ा. कांग्रेस जानती है कि अगर इनके अति राष्ट्रवाद को रोकना है तो सावरकर का असली चेहरा जनता के सामने आज के परिप्रेक्ष्य में रखना जरूरी है. साथ हीं साथ गांधी जी के मूल्यों का प्रसार करना भी अति आवश्यक है. इन्हीं वजहों से कांग्रेस संघ सरकार पर जानबूझकर आक्रामक है.       

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