Thursday, January 16, 2020

हिन्द स्वराज - 'कांग्रेस के कर्ता-धर्ता' पर मेरी समझ

12 जनवरी को मैं दिल्ली के प्रगति मैदान से महात्मा गांधी जी की लिखित पुस्तक 'हिन्द स्वराज, हिन्दी वर्जन में खरीदी। मूलतः यह किताब गुजराती भाषा में लिखी गयी है. जो सिसकी प्रस्तावना पढ़ने के बाद पता चलती है. विभिन्न प्रकाशकों द्वारा यह किताब भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवादित करके छापी गयी है. गांधी जी बताते है कि यह किताब उन्होंने 1908 में लंदन से दक्षिण अफ्रिका से लौटते समय लिखी थी. गांधी जी ने अपने इस किताब में कुल बीस अध्याय का जिक्र किया है. जिसमें से अभी मैनें मात्र चार अध्याय कांग्रेस और उसके कर्ता-धर्ता, बंगाल का विभाजन, अशांति और असंतोष तथा स्वराज क्या है ? इसे हीं पढ़ा है. इतना पढ़ने के आधार पर 'हिन्द स्वराज' के अर्थ को मैं अपने विवेक अनुसार समझने की कोशिश करता हूँ. 

कांग्रेस के कर्ता-धर्ता 
कांग्रेस के कर्ता-धर्ता शीर्षक अध्याय में बापू जी ने कहा कि कांग्रेस ने हीं हिन्द में स्वराज की भावना को जन्म दिया. जैसा कि "नेशनल" शब्द हीं स्वराज का विचार है. बापू जी ने हिन्द के प्रति दादा भाई नैरोजी, प्रोफेसर गोखले, मिस्टर ह्यूम, सर विलियम वेडरबर्न, जस्टिस बदरुद्दीन जैसी महान शख्सियतों का हिन्द के प्रति नजरिये को दर्शाया है. मूलतः यह किताब एक सवाल-सबाब (पाठक और सम्पादक) के भाव में लिखी गयी है और इसी के माध्यम से ज्वलंत प्रश्नों का जबाब भी दिया गया है. पाठक के रूप में किसी के मन में ये विचार आया कि दादा भाई नैरोबी जी तो अंग्रेजों के साथ हमें अच्छी संबंध बनाने की नसीहत देते हैं तो इसका भी उत्तर देते हुए बापू जी ने उसके प्रश्नों को गौड़ किया कि दादा भाई ने हमें अंग्रेजों से लड़ने के लिए हौसला दिया है. हम उन्हें कैसे गलत मान सकते है ? आप ये कैसे कह सकते हैं कि सारे अंग्रेज बुरे होते हैं ? मेरा मानना है जैसे हमारे यहां कुछ लोग हैं जिनको देश के कुछ लोग बुरे लगते हैं. वैसे हीं तो अंग्रेजों में भी हैं. जिनमें  कुछ अंग्रेज लोगों को कुछ अंग्रेज हीं बुरे लगते हैं. ह्यूम ने हमारे लिए जो किया वो कम नहीं है . सर विलियम वेडरबर्न ने जो हमारे स्वराज के लिए लिखा-बोला क्या कम है ? हम किसी की भूमिका को नकार नहीं सकते। देश लोगों के उज्ज्वलित भावनाओं से बनता है न कि किसी एक ब्यक्ति के. गांधी जी हमेशा से एक ऐसे विचार पैदा करने की कोशिश में रहे जिनका अर्थ हमेशा हिन्द से जुड़ा रहे. क्योंकि गांधी जी ने दक्षिण अफ्रिका में इस तरह के अनुभवों को जिया था. वहां से उन्हें हिन्द की कल्पना करने की एक किरण दिखाई दी. जो आगे चलकर हिन्द को आजाद कराने तक चली. इस किताब को पढ़ने के बाद एक बात समझ में आती है कि बापू जी स्वराज के बारे में हमेशा खुले विचारों का समर्थन किया है. ऐसा नहीं लगता कि उन्हें नफरत के विचार ने जकड़ रखा है. उन्होंने अपनी कमियों को स्वीकारने में भी कोई कोताही नहीं बरती है.   

प्रथम अध्याय से मैं एक सवाल और बापू जी का जबाब इसमें सम्मिलित कर रहा हूँ. 
पाठक : आपकी यह बात मुझे पसंद आई. इससे मुझे जो ठीक लगे वह बात करने की हिम्मत आई है. अभी मेरी एक शंका रह गई है. कांग्रेस के आरम्भ से स्वराज की नींव पड़ी, यह कैसे कहा जा सकता है ?
सम्पादक : देखिये, कांग्रेस ने अलग-अलग जगहों पर हिन्दुस्तानियों को इकट्ठा करके उनमें 'हम एक राष्ट्र हैं' ऐसा जोश पैदा किया. कांग्रेस पर सरकार की कड़ी नजर रहती थी. महसूल का हक प्रजा को होना चाहिए, ऐसी मांग कांग्रेस ने हमेशा की है. जैसा स्वराज कैनेडा में है वैसा स्वराज कांग्रेस ने हमेशा चाहा है. वैसा स्वराज मिलेगा या नहीं मिलेगा, वैसा स्वराज हमें चाहिए या नहीं चाहिए, या उससे बढ़कर कोई दूसरा स्वराज है या नहीं, यह सवाल अलग है. मुझे दिखाना तो इतना हीं है कि कांग्रेस ने हिन्द को स्वराज का रस चखाया. इसका जस कोई और लेना चाहे तो वह ठीक न होगा, और हम भी ऐसा मानें तो बेकदर ठहरेंगे. इतना हीं नहीं, बल्कि जो मकसद हम हासिल करना चाहते हैं उसमें मुसीबतें पैदा होंगी. कांग्रेस को अलग समझने और स्वराज के खिलाफ मानने से हम उसका उपयोग नहीं कर सकते.  
                                                                                                    हिन्द स्वराज 
                                                                                               पेज संख्या 16 
                                                                                               प्रकाशक : शिक्षा भारती 



                                                                                        
      

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