राजनीति आज के दौर में शायद अहम का सबसे उदाहरण बन गया है. ये पहले भी होते रहें हैं पर उस समय उनके हृदय में एक नैतिक शर्म हुआ करती थी. जो आज नहीं हैं. 1975 में अगर इंदिरा गांधी जी ने देश के जनता के ऊपर अनैतिक तरिके से 'आपातकाल" थोपा था. पर जब उन्हें एक लम्बे अवधि के बाद अपनी गलती का आभास हुआ. उन्होंने पूरे देश से सार्वजनिक तौर पर देश के प्रबुद्ध नागरिकों से माफी माँगी थी. मगर आज की सत्ता में वो बात नहीं हैं. मोदी की पहली और दूसरी सरकार ने सिलसिलेवार तरिके से कई विवादित फैसले किये.जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों की जान भी चली गई. पर इनको जरा भी अफ़सोस नहीं था. नोटबंदी करते हुए आतंकवाद, नक्सलवाद, कालाधन इन समस्याओं से निजात पाने का वादा किया था पर हकीकत कुछ नहीं रूका अलबत्ता सैकड़ों लोग बैंक की लाइन में लगाकर जान दे दी और उसे सरकार ने नोटबंदी की वजह भी नहीं मानी। जबकि इंसान बैंकों के सामने लगी लाइनों में अपना दम तोड़ते रहे.
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में नागरिकता संशोधन क़ानून आया जिस पर देश के सभी हिस्सों में आंदोलन छिड़ा हुआ है. जनता सड़कों पर उत्तरी हुई है. दिल्ली का शाहीन बाग़ का प्रदर्शन देश के आंदोलनकारियों के लिए मिसाल बन चुका है. पर सरकार अपने हठ के आगे उनसे बात तक करने को तैयार नहीं है. इस क़ानून के पारित होने के बाद देश के तमाम हिस्सों से हिंसा की खबरें आने लगी. जिसमें मीडिया रिपोर्ट के हवाले से बात किया जाय तो अकेले उत्तर प्रदेश में दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मृत्यु हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में हुई. इस आंदोलन में शामिल लोगों को सरकार ने देशद्रोही करके एक झटके में हीं उनके अस्तित्व को खारिज कर दी. उन लोगों के मौत का फर्क उनके परिवारीजन को पड़ेगा लेकिन सरकार को नहीं. अभी चार दिन पहले लखनऊ में रैली करते हुए गृह मंत्री शाह जी ने कहा कि "अब लोगों को भूल जाना चाहिए कि सरकार ये क़ानून वापस लेगी।" उनके इसी भाषण से सरकार के हठ को समझा जा सकता है.
शाहीन बाग़ को देश के हर कोने से हर तबके के लोगों का समर्थन मिल रहा है. शाहीन बाग़ को भी अपने उच्च नैतिकता को बचा कर रखने की जरूरत है. कल न्यूज़ नेशन के पत्रकार दीपक चौरसिया शाहीन बाग़ पर स्टोरी करने के लिए गए थे. वहां उनके साथ बदतमीजी की गई. जो अत्यंत निंदनीय है. ठीक है उनकी बात आपको पसंद नहीं तो आप मत सुनो परन्तु उनको भी अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार है. शाहीन बाग़ को इन विवादों से दूर रहना होगा नहीं तो ऐसी घटनाएं उनके आंदोलन पर विपरीत असर डालेंगी. जिस तरिके से आप आप 40 दिन से शांति पूर्वक बिना हिंसा के अपनी आवाज रख रहें हैं. उसे देश की जनता देख रही है और अपने-अपने तरिके से उसकी ब्याख्या भी कर रही है. सरकार नहीं अब देश को आंदोलन हीं आगे ले जाने का काम करेगी.
आज के दौर में आंदोलन करना एक अभिशाप बन गया है. खैर सत्ता पर जो पार्टी आसीन है वो आंदोलन की हीं उपज है और उसे आज आंदोलन देश विरोधी लगने लगा है. आपातकाल का आंदोलन हो या जे पी आंदोलन हो. आज के सत्ताधारी दल दोनों आंदोलनों में अपना सब कुछ झोंक दिया था और जे पी के अगुवाई में 1977 का जो आंदोलन चला वो कांग्रेस सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंका था. जे पी आंदोलन का मुख्य केंद्र सहीं बाग़ की तरह पटना था. उस वक्त इन दरबारी मंत्रियों को वह आंदोलन देश हित में लग रहा था और आज का आंदोलन पाकिस्तान परस्ती का. इसे समय का फेर नहीं बल्कि पूरा-पूरा दोगलापन कहा जाना चाहिए. सरकार को प्रदर्शनकारियों से बात करनी चाहिए और उनकी समस्याओं को सुनकर उनके मन में पल रहे शंकाओं को दूर करना चाहिए. आखिरकार वो भी अपने देश के हीं नागरिक है. सरकार तो वार्ता करने को तैयार है परन्तु उसे ऐसा करने की संघ अनुमति नहीं दे रहा है.
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