Monday, January 27, 2020

आंदोलन से जन्में नेताओं को आज का आंदोलन अलोकतांतिक क्यों लगने लगा है ?

जैसा कि देश के हर जागृत नागरिक को पता है कि देश के साथ क्या किया जा रहा है ? देश के संविधान के साथ क्या खिलवाड़ किया जा रहा है ? परन्तु इन सब बातों के बीच देश दो धड़ों में बट गया है. एक धड़ा सत्ताधारी और उसके समर्थन में संघ जैसे अनुषांगिक संगठन हैं तो दूसरे धड़े में आंदोलनरत छात्र, महिलायें, स्वयं सेवा समूह हैं. जिनमें हिन्दू-मुस्लिम, दलित, पिछड़ा सब शामिल हैं. नागरिक संशोधन क़ानून के खिलाफ आंदोलन देश भर में तकरीबन डेढ़ महीने से चल रहा है. दिल्ली का शाहीन बाग़ इस आंदोलन की आत्मा का कार्य कर रही है. पूरे देश में लोग शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन को अपना आदर्श मान रहें हैं. सत्ताधारी दल और संगठन शाहीन बाग़ के आंदोलनकारियों को पाकिस्तान परस्त, देशद्रोही जैसे तमाम उपमाएं देकर अपने समर्थकों को खुश करने में कामयाब तो हो रही है. परन्तु देश की आत्मा को गहरा आघात पहुंचा रही है. परन्तु जब बात असम समेत पूर्वोत्तर के भाजपा शासित राज्यों में हो रहे विशाल आंदोलनों की आती है तो इनका हिन्दू-मुस्लिम और पाकिस्तान वाला तर्क अपने आप असफल हो जाता है. देशवासी इनके स्वांग को समझने लगे हैं.   
आज का आंदोलन बिना किसी चेहरे का है. आज के आंदोलन को छात्र और महिलाएं अपने आप को समर्पित करके आगे की तरफ ले जा रहें हैं. कल शाहीन बाग़ में देखा गया कि प्रदर्शन स्थल पर लाखों लोग इकट्ठा हुए थे और भारत के राष्ट्रध्वज को गगन की बुलंदियों में फहराया गया था तथा ध्वजबंदन और राष्ट्र गीत से पूरा आसमान गूंजायमान हो गया था. मैं इन्हें कैसे मान लूँ कि ये देशद्रोही है. ये पाकिस्तान परस्त हैं. ऐसा कह के हम भारत की मिट्टी का अपमान कर रहें हैं. 
1974 में इंदिरा की कांग्रेस सरकार के खिलाफ जब आंदोलन शुरू हुआ तो सबसे बड़ी आवाज बिहार की माटी से निकली थी और उस स्थान का नाम पटना विश्विद्यालय था. जहाँ से छात्रों ने बढ़ी हुई फीस के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था और सरकार के सह पर छात्रों पर पुलिस ने भारी बल प्रयोग किया था. इस प्रदर्शन में बहुत से छात्र बुरी तरह घायल हुए थे. इंदिरा गांधी ने जब 1975 में आपातकाल की घोषणा के तो देशवासियों को पता चल गया था कि उनके सारे अधिकारों को छीन लिया गया है. उनके अधिकारों को पूर्णतया कुचल दिया गया है. जिसकी वजह से लोग सड़कों पर उतर पड़े थे और जेलों में उठाकर भर दिए गए थे. लेकिन आज के दौर में आपातकाल की घोषणा तो हुई नहीं पर जनता के अधिकारों को धारा 144 के माध्यम से छीन लिया गया है. शाहीन बाग़ जैसे अहिंसक आंदोलनों को भी पुलिस की मदद से कुचलने का प्रयास किया जा रहा है. जो आपातकाल की पुनरावृत्ति है. पटना विश्वविद्यालय के इकबाल छात्रावास से छात्र जब निकले तो वो पुलिसिया पिटाई में खून से लथ-पथ हो चुके थे और इसी अवस्था में वो जे पी जी के पास पहुंचे और छात्रों ने जे पी जी से उस आंदोलन की अगुआई करने की प्रार्थना की. तब जे पी जी ने कहा था कि "मैं हिंसा के साथ खड़ा नहीं हो सकता हूँ. आप लोगों को पहले वादा करना होगा कि आप लोग आंदोलन को हिंसात्मक नहीं करेंगे. जभी मैं आप लोगों के साथ खड़ा होऊंगा. छात्रों ने जे पी जी को आश्वत किया और वो छात्रों के साथ खड़े हुए और उस आंदोलन के मुख्य भूमिका रहे. जिनका समर्थन पीछे से जनसंघ (भाजपा), संघ कर रहा था. लेकिन शाहीन बाग़ के आंदोलन का मुख्य चेहरा कोई राजनितिक पार्टी नहीं है. जब 18 मार्च 1974 में जे पी के अगुआई में छात्र विधान सभा का घेराव करने पहुंचे तो वहां पुलिस का बहुत तगड़ा बंदोबस्त था. दिल्ली से पुलिस पटना विधान सभा के आस-पास तैनात कर दी गयी थी. वहां पर जमकर लाठीचार्ज हुआ, गोलियां चली, आँसू गैस के गोले दागे गए. बहुत से प्रदर्शनकारी छात्र बुरी तरह घायल हुए थे पर पर उनका हौसला नहीं हारा था. पटना में उन दिनों "सर्चलाइट और प्रदीप" नाम के दो अखबार छापने वाले केंद्र थे. उनमें आग लगा दी गयी थी. वास्तव में उसी दिन सत्ता की चूले हिल चुकी थी. बस उनका पतन होना बाकी था.
इस आंदोलन के बाद उपजी नई परिस्थिति में जे पी जी ने 5 जून को पटना के गांधी मैदान में जो भाषण दिया था. वो एक मिसाल बन गया और छात्रों के जज्बे को आसमान के बराबर उचांई दे दी. जे पी जी ने कहा - महात्मा गांधी ने तो आपसे कहा था कि हमें अपना जिंदगी दे दिजिये और हम अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल देंगे. लकिन हम आपसे सिर्फ एक बरस मांगते हैं. उस एक बरस में यूनिवर्सिटी और कॉलेज बंद किजिये. हम राजनितिक सत्ता को उखाड़ फेकेंगे." उस एक साल को खत्म होते-होते 25 जून 1975 को आपातकाल लगा दिया जाता है. ये ताकत उस छत्र आंदोलन की थी. खैर वो बात अलग है कि जे पी जी खुद कांग्रेस से निकले हुए थे. इंदिरा हारने के बाद जब जे पी से मिलने पहुंची तो जे पी को देखकर काफी भावुक हो उठी थी और वही हाल जे पी जी का भी था. जे पी जी इंदिरा जी को बेटी मानते थे. उन्होंने कहा था कि मैं सरकार से लड़ रहा था इंदिरा से नहीं.
नागरिकता क़ानून पर सरकार इसे संसद से पास हुए क़ानून की दुहाई दे रही है तो आंदोलनकारी इसे संविधान पर हमला बता रहें हैं. गरीब-मजदूर के खिलाफ बता रहें हैं. लेकिन बिहार की धरती से उपजा वो जे पी आंदोलन अब पुराना हो चुका है. उसके मूल्य पुराने हो चुके है. जो उस आंदोलन में शामिल थे. आज मुख्य मंत्री, केंद्र सरकार में मंत्री, विधायक बन चुके हैं और उन्हें इस तरह के आंदोलन अब देश के खिलाफ लगने लगा है. 1974 के छात्र आंदोलन में शामिल चेहरे आज की सरकार में शामिल हैं. जिनमें कुछ मुख्य नाम इस तरह है - रविशंकर प्रसाद केंद्रीय क़ानून मंत्री, नितीश कुमार मुख्यमंत्री बिहार, सुशील मोदी उप-मुख्यमंत्री बिहार, लालू यादव पूर्व मुख्यमंत्री बिहार (राजद), शिवानंद तिवारी, कृपानाथ यादव, वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे तमाम नेता जे पी के छात्र आंदोलन की पैदाइस हैं. आज इन्हें आंदोलन अलोकतांत्रिक लगने लगा है. आप तय करें कि आप किसके साथ खड़े हैं. देश के भविष्य के साथ या देश को हिन्दू-मुसलमान में विभाजित करने वालों के साथ. 

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