शाहीन बाग़ दिल्ली में जो नजारा पिछले 35 दिनों से देश देख रहा है. वो निरंतर अपने रूप का विस्तार करता जा रहा है. आज पूरे देश में लगभग शाहीन बाग़ जैसा हीं नजारा देखने को मिल रहा है. चाहे लखनऊ हो, पटना हो, भोपाल, अमृतसर, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ या उत्तर-पूर्व का भाग हो. सब जगह प्रदर्शनकारी पुरूष, महिला, बच्चे पूरे आत्मबल के साथ जमे हुए हैं. उनके हौसले को पूस थी ठंडी रात भी नहीं तोड़ पा रही है. उन प्रदर्शनकारियों को राजनितिक दलों और विभिन्न समाज सेवी संगठनों का भी साथ मिल रहा है. लेकिन उनके बारे सत्ताधारी पार्टी और उसके नेता घटिया बात भी कर रहे हैं. बीजेपी के कुछ नेता कहते हैं ट्विटर पर ट्रेंड करवाते हैं कि शाहीन बाग़ की औरतें बिकाऊ हैं. 500 रूपये दिन पर आती है तो वहीं अनुज वाजपेयी नामक नेता कहते हैं कि साहीन बाग़ के प्रदर्शनं स्थल पर निरोध फेके हुए मिल रहे हैं. देश की आधी आबादी के बारे में इनकी घटिया सोच से हीं आप इनके मूल चरित्र का आंकलन कर सकते हैं.
इस आंदोलन को मैं इन सब से बहुत दूर देख पा रहा हूँ. यह सरकार जैसा कि हर कोई जानता है नागपुर से चलाई जा रही है. उसके कुछ उदाहरण मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ. जैसे कि अभी इन्होंने नागरिक संशोधन क़ानून को उच्च सदन से पारित करवाकर कानूनी अमलीजामा पहना दिया. परन्तु इस क़ानून पर पूरे देश में भीषण प्रदर्शन हो रहें हैं. हालांकि शुरू में ये प्रदर्शन हिंसक थे परन्तु अब शान्ति पूर्वक चल रहा है. देश की जनता के दबाव को सरकार समझी और नागपुर में नड्डा समेत दर्जन भर बीजेपी नेताओं ने संघ मुख्यालय में भेंट की और देश में हो रहे आंदोलनों के बारे में अवगत कराया. परन्तु संघ की तरफ से ये कहा गया कि नागरिकता क़ानून पर पीछे नहीं मुड़ना है और इसे वर्तमान हालात में हीं लागू किया जाना चाहिए. जिस पर सरकार ने हामी भरी. साहीन बाग़ प्रधानमंत्री निवास से बहुत दूर नहीं हैं. लेकिन संघ का दखल होने की वजह से वो बहुत दूर हो गया है और नागपुर दिल्ली क्व बहुत नजदीक हो चुकी है.
संघ का चेहरा धीरे-धीरे करके देश की जनता के सामने आने लगा हैं. जो ये कहते थे कि संघ मात्र के सामाजिक संस्था है न कि राजनितिक. अब उस झूठ को लोगों ने पहचानना शुरू भी कर दिया है. जो संघ कभी हिन्दू राष्ट्र का हिमायती था. आज वो उन्हीं सपनों को पूरा करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. पर संघ के उस हिन्दू राष्ट्र के कल्पना में अर्थब्यवस्था भी देशी हो ऐसी सोच थी. लेकिन अब तो ऐसा नहीं है. जो संघ से संबंध रखने वाली भारतीय मजदूर संघ एफडीआई और दुसरे फैसलों पर पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में सड़क जाम कर देती थी. अब वो कहाँ है ? संघ ने अब उन्हें मोदी सरकार की नीतियों में हाँ में हाँ मिलाने को मजबूर कर दिया है और स्वयं सेवकों को अब ये भी दर सताने लगा है कि अगर मोदी के सत्ता से जाने के बाद किसी और की सत्ता आती है. तब इन स्वयं सेवकों का क्या योगदान होगा ? तब तक तो ये स्वयंसेवक पूरी तरह मोदीमय हो चुके होंगे. संघ आज खुद में उलझन में है कि वो सावरकर को माने या भागवत को. १९२३ में जब सावरकर ने हिंदुत्व पर किताब लिखी थी उस पर हेडगेवार की सहमति थी और उसे नागपुर के हीं प्रकाशक ने छापी थी. लोकल चुनाव में नागपुर भी बीजेपी हार जाती है. जहां स्वयंसेवक परिवारों में रहते हैं तो इसका मायना यह निकाल लिया जाना चाहिए कि स्वयंसेवक भी अब अपना वजूद तलाशने लगे हैं. लोकल चुनाव में केंद्रीय मंत्री गडकरी के गाँव से भी बीजेपी नहीं जीत पायी और पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस के क्षेत्र में भी बीजेपी हार गई. तो इसके क्या मायने निकाले जाने चाहे ? क्या स्वयंसेवकों को अपने भविष्य का अंदाजा हो गया है.
संघ 1925 में बना उसके बाद उसकी बच्चा पार्टी जनसंघ से होते हुए बीजेपी का यह तीसरा सरकार है. जिसमें पहली अटल जी के नेतृत्व में और दूसरी लगातार दो बार मोदी जी के नेतृत्व में. संघ को कि अब वो अपने मूल अजेंडे को अगर लागू नहीं कर पाती है तो फिर कभी नहीं. उसके पीछे कारण यह है कि लोकसभा में जनता ने बीजेपी को 272 के जादुई आंकड़ें से कहीं ज्यादा सीट दी है और राजयसभा में भी बहुत अच्छी स्तिथि में है. अगर कुछ दिन और इन्तजार करना पड़ा तो राजयसभा का खेल बिगड़ सकता है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, झारखण्ड हार चुकी है और इस वर्ष होने वाले दिल्ली चुनाव में इनकी हालत अच्छी नहीं है और बिहार में गठबंधन में हैं. इस वजह से संघ अब इसे अभी नहीं तो कभी नहीं की तर्ज पर ले रहा है.
जिस सनक में उसे अपने देश के नागरिकों का आवाज सुनाई नहीं दे रहा है. लेकिन इतिहास गवाह है कि इंसान के आत्मबल के आगे क्रूर से क्रूर सरकार को भी झुकना पड़ता है. जिस प्रकार दक्षिण अफ्रिका की सरकार कुछ इसी तरह के कानून पर महात्मा गांधी ने नेतृत्व वाले आंदोलन के सामने झुकी थी और उसे निरस्त की थी. इस धर्म के आधार भेदभाव वाले क़ानून की भर्तस्ना अति आवश्यक है. मानवता से बढ़ कर कोई धर्म नहीं है. यही हमारे इस महान देश ने सिखाया है.
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