आज के दौर में राजनीति लोगों के निष्ठा को ऐसे तोड़ रही हो जैसे कोई इंसान किसी काँच के बर्तन को तोड़ता है. जब इंसान काँच तो तोड़ता है तो उसे यह बोध जरूर होता है कि ये जब टूट कर बिखर तब फिर से जुड़ नहीं पायेगा फिर भी वो तोड़ता है. ठीक उसी प्रकार का चरित्र आज के राजनेताओं (दलबदलू कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए) का हो गया है. उदाहरण के तौर पर आज वो सपा का है तो कल वो भाजपा का भी हो सकता है, परसों बसपा का भी हो सकता है आगे चलकर वो कांग्रेस का भी हो सकता है. तो इनकी निष्ठा इतनी तेज बदल रही है जितनी तेज गिरगिट का भी नहीं बदलता होगा. आज की राजनीति विचारों की नहीं दलबदल पर आधारित हो चुकी है. कभी-कभी तो आश्चर्य होता है कि कल जो नेता अपने विरोधी की घोर और कठोर शब्दों में भर्तस्ना कर रहा होता है यही नेता मात्र कुछ हीं घंटों के उपरान्त उसी विरोधी पार्टी को अपना लेता है. तो हमें समझ लेना चाहिए आज राजनीति जनता की उसूलों के लिए नहीं बल्कि निजी स्वार्थ के लिए होने लगी है. इस लिए आप किसी भी पार्टी के भक्त न बनें. विवेकशील और धीर बने रहे.
हाल के दो-तीन सालों में कुछ ऐसे धुर-विरोधी दल राजीतिक मजबूरियों के कारण एक साथ आये जो सत्ता सुख का रस-पान भी किया. ये कभी एक नदी के दो छोर हुआ करते थे -
बिहार : राजद+आरजेडी+कांग्रेस
जम्मू-कश्मीर : बीजेपी+पीडीपी
उत्तर प्रदेश : सपा+बसपा
हाल के दो-तीन सालों में कुछ ऐसे धुर-विरोधी दल राजीतिक मजबूरियों के कारण एक साथ आये जो सत्ता सुख का रस-पान भी किया. ये कभी एक नदी के दो छोर हुआ करते थे -
बिहार : राजद+आरजेडी+कांग्रेस
जम्मू-कश्मीर : बीजेपी+पीडीपी
उत्तर प्रदेश : सपा+बसपा
आज लगभग ढाई दशक 26 साल बाद उत्तर प्रदेश का मैनपुरी जिला एक ऐतिहासिक घटना का गवाह बना जब 2019 लोकसभा चुनाव के लिए सपा और बसपा की एक संयुक्त रैली का आयोजन किया गया और उस रैली में 1996 के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश की राजनीति के दो पुरोधा और हाल के दिनों में एक-दुसरे के धूर विरोधी नेता सपा संरक्षक माननीय श्री मुलायम सिंह यादव और बसपा अध्यक्ष बहन कुमारी मायावती जी एक साथ सार्वजनिक मंच को साझा किया. यह ऐतिहासिक इसलिए है कि 1996 के गेस्ट हॉउस काण्ड के बाद दोनों नेता एक दुसरे का चेहरा देखना पसंद नहीं करते थे. गेस्ट हॉउस काण्ड में मायावती ने मुलायम सिंह और उनकी पार्टी पर लड़ाई और खुद (मायावती) के कपड़े फाड़ने का आरोप लगाती रहीं हैं. लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि जिस पर आरोप लगा था और जिसने आरोप लगाया था वो दोनों जनता की अदालत में एक साथ एक मंच पर थे. रोचक बात तो ये है कि मायावती जी ने मुलायम सिंह के लिए वोट मांगा और जनता से नेता जी को भारी से भारी मतों से जिताने की अपील की. लगे हाथ मायावती जी ने मुलायम जी को उत्तर प्रदेश पिछड़े वर्ग का सबसे बड़ा नेता बता डाला। अब वो लोग जो एक नेता के साथ और एक के खिलाफ 1996 में खड़े हुए होंगे तो क्या वे इतनी जल्दी अपने साथ हुए राजनितिक बदले की भावना को भूल चुके होंगे अगर नहीं भूले होंगे तो क्या सोच रहे होंगे ? जो गेस्ट हॉउस काण्ड का सजीव गवाह रहा होगा उसकी अब मनोस्थिति क्या होगी मैं समझ सकता हूँ. उदाहरण के तौर पर शिवपाल सिंह यादव को हीं ले लो वही इस काण्ड के सबसे बदनाम किरदार बन कर उभरे थे. आज वो कहाँ हैं, किस स्थिति में हैं सब आप के सामने है. इसीलिए मैंने इस लेख का शीर्षक "राजनीति जो न सो करा दे माया-मुलायम " रखा है. इस कलयुग में हमारे सामने यह एक तरह का दुर्लभ उदाहरण है जहां आरोपी और आरोप लगाने वाली दोनों एक साथ एक मंच पर खड़े है. यह हमारे भारतीय राजनीति में हीं हो सकता है अन्यथा दुनियाँ में कहीं भी आपको ऐसा मनोरंजक उदाहरण देखने को नहीं मिलेगा.
चित्र स्थल : मैनपुरी सपा, बसपा की संयुक्त रैली
स्रोत : आज तक हिंदी
दिनांक : 19.04.2019
चित्र स्थल : मैनपुरी सपा, बसपा की संयुक्त रैली
स्रोत : आज तक हिंदी
दिनांक : 19.04.2019

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