जब ८० के दशक में अछूत माने जाने वाली बीजेपी को कोई नहीं पूछता था उस वक्त शिव सेना उनके साथ जुडी और फिर अकाली दल जुड़ा. आज वही शिव सेना है जिसका हाल आज बीजेपी ने 'न घर के न घाट के' वाली स्थिति वाली कर दी है. बीजेपी का चरित्र मोदी-शाह के आने के बाद बदल गया है. जिसे अब उनके सहयोगी भी समझने लगे हैं. आज के दौर में भी कुछ पार्टियाँ कांग्रेस से सहानुभूति तो रखती है लेकिन जैसी हीं बीजेपी के नंबर थोड़े ज्यादा आते हैं. वो बीजेपी की तरफ किसी तरह मोड़ दिए जाते हैं. जिसे आजकल शाह पालिटिक्स का नाम दिया जा रहा है. परन्तु महाराष्ट्र में अबकी बार बीजेपी तीन अंकों की पार्टी लगातार दूसरी बार बनकर उभरी है परन्तु वहां बीजेपी इस लिए सरकार बनाने में अब तक नाकाम रही है कि वहां देश के अक्खड़ हिंदूवादी पार्टी शिव सेना मौजूद है. जो अपने जिद के लिए जानी-पहचानी जाती है.
वैसे शिव सेना की ढाई साल के मुख्यमंत्री की मांग जायज लगती है. क्योंकि बीजेपी का पूरा शीर्ष नेतृत्व ज्यादा से ज्यादा सीट जीतने की कोशिश कर रहे थे ? वहां बीजेपी को पता था कि अगर हम पहले के नंबर को बरकरार रखते हैं तो सेना की सरकार में भूमिका सिमित हो जायेगी. बीजेपी पूरी तरह आत्मविश्वास में थी कि वो अपने दम पर महाराष्ट्र में सरकार बनाएगी और बीजेपी की उस मंशा को सेना के नेता-कार्यकर्ता भी भाँप गए थे. इसलिए वो बीजेपी के खिलाफ जमीनी स्तर पर काम कर रही थी. जिसका फायदा शरद पवार की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस को काफी हद तक हुआ. आप प्रचार के दौरान के वाकये को अगर समझना चाहें तो पाएंगे कि उद्धव या सेना इस चुनाव में शरद पवार जी पर बहुत नरम रही और जो उन्होंने मूसलाधार बारिश में भाषण दिया वो चुनाव के दो-तीन दिन पहले का दिन था. जब शिव सेना ने 'सामना' के जरिये उनकी तुलना मराठा शेर सी की थी. अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन होने वाला है. जिसमें कांग्रेस, एनसीपी और कट्टर हिंदुत्व का मिलन हो सकता है. यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है. इसका जबाब शायद अयोध्या मामले का फैसला आ जाने की बाद मिल जाएगा.
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