आज झारखण्ड चुनाव का परिणाम जनता के सामने आ रहा है. वह परिणाम अपेक्षित है. क्योंकि यह सरकार झारखण्ड में अलोकप्रिय हो चुकी थी. इस सरकार ने बहुत से गलत निर्णय किये हुए जिसे "पत्थलगढी" और आदवासियों का प्रमुख रोष रहा है. जब नोटबंदी के बाद बीजेपी चुनाव जीत जाते है तो बोलती है कि जनता ने फैसले पर मुहर लगा दिया, जीएसटी के बाद जीती तो बोली की जनता ने फैसले पर हमारा साथ दिया. तो अब हमें मान लेना चाहिए कि "नागरिक संशोधन बिल" के बाद चुनाव लड़े और हार गए. इसका मतलब जनता ने बीजेपी को नकार दिया. शायद मैं ऐसा नहीं कह सकता क्योंकि बीजेपी अच्छा लड़ रही है. दोनों पार्टियों की सीटें घट-बढ़ रहीं हैं. जैसे-जैसे सीटें घट-बढ़ रहीं हैं. संबंधित समर्थकों की बेचैनियां बढ़ जा रहीं हैं. इस ठंड में में भी भाजपा का सिकुड़न जारी है. देशहित में जनता बेहतर निर्णय ले रही है.
भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान ईमानदार छवि के मालिक श्री सरयू राय जी से हुआ. जिन्होंने बीजेपी की सरकार में पूरे पाँच साल मंत्री रहे और सरकार के अंदर रहकर सरकार का विरोध करते रहे. सरयू राय जी ने हीं लालू यादव को जेल (कारवास) भिजवाया था. लालू जी के भ्रष्टाचार को उजागर करने और जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय जाता है. संघ में रहते हुए सरयू राय जी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा मुखर होकर आवाज उठाई थी. वही सरयू राय उपेक्षित होकर बीजेपी से निकल गए और वर्तमान मुख्यमंत्री श्री रघुबर दास के खिलाफ जमशेद पुर पूर्व से चुनाव लड़े और दोपहर तक वो रघुबर दास को पीछे धकेलने में कामयाब रहें हैं. सरयू राय ने सरकार के खिलाफ इतना बढ़-चढ़कर प्रचार किया. उन्होंने तो विपक्ष के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हेमंत सोरेन के लिए प्रचार किया.
बीजेपी जाना चाहिए कि मोदी-शाह की जोड़ी जो कहेगी वो जनता मान लेगी. धारा 370 और राम मंदिर पर फैसला आने के बाद तीन चुनाव महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखण्ड में हुए जिसमें हर जगह बीजेपी को अपनी पुरानी सीटों का नुकसान तो हुआ हीं परन्तु मात्र 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में विधान सभा क्षेत्रों पर हुई बढ़त को भी गवा दिया. झारखण्ड की जनता ने और हरियाणा की जनता ने इनको सबक सिखाया कि हम पाकिस्तान के दर से वोट नहीं देंगे, हम कांग्रेस मुक्त भारत के लिए वोट नहीं देंगे. अब वो सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिए हैं. वो सरकार से रोजगार पर सवाल करते हैं, आलू, प्याज की महंगाई की बात कर रहें हैं. झारखण्ड और हरियाणा के गांवों में रहें वाले लोगों और किसानों ने अपने हक का सवाल पूछा है और परिणाम आप जनता के सामने है. झारखण्ड के 8 में से 4 मंत्री आज का चुनाव हार रहें हैं. जिनमें मुख्यमंत्री समेत आदिवासी नेता लुईस मरांडी, मीरा यादव समेत बड़े नेता हैं.
झारखण्ड चुनाव में बीजेपी की हार का कारण शायद संघ भी रहा. संघ के लोग पूरी तरह से चुनावी मोड में नहीं आये. बीजेपी की जो मूल ताकत है वो संघ की ताकत है. रघुबर दास की छवि एक घमंडी और अड़ियल इंसान की रही है. उनके बारे में ये कहा था कि वो अपने कार्यकर्ताओं से गलत बर्ताव करते थे. जिसकी वजह से कार्यकर्ता उस तरह से चुनाव में नहीं जुटे जैसे लोकसभा चुनाव में जुटे थे. रघुबर को केंद्र का पूरा-पूरा समर्थन हासिल था. जिसकी वजह से रघुबर दास बेलगाम हो गए. बीजेपी के हारने का सबसे बड़ा कारण बीजेपी का गैर आदिवासी चेहरे को तरजीह देना और आदिवासियों को उससे वंचित रखने की कोशिश करना था. आदिवासियों के मन में ये डर गया कि बीजेपी उनके हस्ती को, उनके वजूद को मिटा रही है. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस चुनाव में पूरा जोर लगा दिया था. प्रधानमंत्री जी ने लगभग आधा दर्जन चुनावी रैलियां की. उसमें से भी हेमंत सोरेन को हराने के लिए मात्र 100 किलोमीटर के अंतर पर दो रैली की. इस हार से उनके छवि को धक्का लगने की पूरी-पूरी गुंजाइश है. क्योंकि लोग धीरे-धीर प्रधानमंत्री जी की बातों को मानना बंद कर देंगे.
झारखण्ड चुनाव में बीजेपी की हार का कारण शायद संघ भी रहा. संघ के लोग पूरी तरह से चुनावी मोड में नहीं आये. बीजेपी की जो मूल ताकत है वो संघ की ताकत है. रघुबर दास की छवि एक घमंडी और अड़ियल इंसान की रही है. उनके बारे में ये कहा था कि वो अपने कार्यकर्ताओं से गलत बर्ताव करते थे. जिसकी वजह से कार्यकर्ता उस तरह से चुनाव में नहीं जुटे जैसे लोकसभा चुनाव में जुटे थे. रघुबर को केंद्र का पूरा-पूरा समर्थन हासिल था. जिसकी वजह से रघुबर दास बेलगाम हो गए. बीजेपी के हारने का सबसे बड़ा कारण बीजेपी का गैर आदिवासी चेहरे को तरजीह देना और आदिवासियों को उससे वंचित रखने की कोशिश करना था. आदिवासियों के मन में ये डर गया कि बीजेपी उनके हस्ती को, उनके वजूद को मिटा रही है. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस चुनाव में पूरा जोर लगा दिया था. प्रधानमंत्री जी ने लगभग आधा दर्जन चुनावी रैलियां की. उसमें से भी हेमंत सोरेन को हराने के लिए मात्र 100 किलोमीटर के अंतर पर दो रैली की. इस हार से उनके छवि को धक्का लगने की पूरी-पूरी गुंजाइश है. क्योंकि लोग धीरे-धीर प्रधानमंत्री जी की बातों को मानना बंद कर देंगे.
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