Friday, March 22, 2019

बीजेपी के लौह पुरुष की विदाई, आडवाणी युग का दुखद अंत

कल भारतीय जनता पार्टी ने आगामी आम चुनावों के संदर्भ में देश के 20  प्रांतों के लगभग 184  सीटों का ऐलान शाम 7  बजे किया लेकिन उसमें सबसे चौकाने वाला नाम बीजेपी के लौह पुरुष कहे जाने वाले और स्वर्गीय श्री अटल जी के साथ साये की तरह रहने वाले और भूतपूर्व पार्टी अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी का रहा. जिनका टिकट इस चुनाव में गांधी नगर से काट दिया गया और उनकी जगह वर्तमान पार्टी अध्यक्ष श्री अमित शाह को दिया गया. बीजेपी के इस एक फैसले से राजनितिक पंडितों ने तरह-तरह कयासों को जन्म देना शुरू कर दिया है. बहरहाल इस फैसले के पीछे की वजहें चाहे जो रही हों पर अब आडवाणी युग का अंत हो गया है इसे मान लेने में अब कोई हर्ज नहीं है, आडवाणी युग के एक और चर्चित नेता जो उत्तर प्रदेश के कानपुर से सांसद डॉ मुरली मनोहर जोशी जी का भी पता साफ़ है यानी कि उनका भी टिकट कटना लगभग तय है. आडवाणी जी गांधी नगर की सीट से 6 बार सांसद चुने जा चुके हैं. अटल जी हीं वो एकलौते शख्स रहें हैं जिन्होंने बीजेपी को 2 सीट से 180 तक और 2014 के सत्ता शिखर तक पहुंचाने में अहम एवं सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया है. आडवाणी ने 1992 की अयोध्या रथ यात्रा निकाल कर बीजेपी की राजनीति में धार दी थी और एक हिन्दू संगठन या हिन्दू हितैषी पार्टी होने का खुलेआम दावा किया था और वो अपनी नफरत भरी बात को जनता को समझाने में काफी हद तक कामयाब भी रहे और इस नफरत ने हमारे समाज में अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली कि देश के माथे पर एक काला दाग लगा दिया. इसी रथयात्रा के बाद होने वाले अगले चुनाव में बीजेपी को अप्रत्याशित लाभ मिला और सीटों की सख्या में बहुत बड़ा इजाफा हुआ जो निरंतर आ तक चल रहा है. लेकिन एक बात ये भी सत्य है आडवाणी जी ने देश के भाई-चारे को तोड़ने के लिए जो आग लगाई थी वो आज भी सुलग रही है. उन्हीं की रथयात्रा मुहीम ने देश में आपसी सद्भाव में जहर घोलने का काम किया और उन्ही की आंदोलन की एक विभीषिका बाबरी मस्जिद का विध्वंश होना था. जिस विवाद की वजह से देश किए दो समुदायों में उग्र तेवरों की शुरुआत हुई और कई बार ऐसी टकराहट हुई की दोनों सम्प्रदाय के मानने वालों को भरी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा. शायद अब जब आडवाणी जी राजनितिक से दूर होने के बाद जब कभी अकेले बैठकर सोचेंगे तो उन्हें अपने किया पर शर्म बहुत आएगी और अगर नहीं आयी तो ये समझ लेना चाहिए कि वो इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं. मेरा मानना है कि आडवाणी का इससे ज्यादा अपमान कोई नहीं हो सकता जो उनको इस चुनाव से दूर करके किया गया है ठीक वैसे हीं जैसे इन्होने (आडवाणी और वाजपेयी) कभी बलराज मधोक को औकात दिखाई थी . नफरत के जन्मदाता का अपमान सतयुग, द्वापर, त्रेता या यूं कहें कि हर युग में हुआ है. 

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