कल के दिन कांग्रेस ने तकरीबन ५८ साल बाद कांग्रेस में निर्णय लेने वाली बड़ी संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बैठक आहूत की. यह बैठक इस लिए और खास थी की यह बैठक महात्मा गाँधी की जन्म भूमि, कर्म भूमि साबरमती गुजरात में रखी गयी गयी थी और उसी स्थान पर रखी गयी थी जहां से १२ मार्च सन १९३० में अंग्रेजों के बनाये गए नमक कानून के खिलाफ दांडी की पदयात्रा के शुरुआत की थी और कल कांग्रेस उसी १२ मार्च की तिथि को बैठक के लिए चुना था. ख़ास बात ये है कि जब १२ मार्च सन १९३० में गाँधी जी ने दांडी यात्रा की शुरुआत की थी उस समय आरएसएस (संघ) ने गाँधी जी के इस पदयात्रा को घोर विरोध किया था पर गाँधी जी के हौसलों को तोड़ना उनके बस की बात नहीं थी. गाँधी जी के दांडी मार्च को अपार सफलता मिली थी और अंग्रेजों को नमक पर बनाये अपने कानून को वापस लेना पड़ा था. कांग्रेस के इस एक निर्णय की वजह से प्रतीकों की लड़ाई फिर से जोर पकड़ेगी ऐसी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता. क्योंकि कांग्रेस ने पटेल स्मृति भवन में अपनी मीटिंग रखी थी और जब कांग्रेस के बड़े नेता श्री आनद शर्मा ने मीटिंग की बात जब मीडिया के माध्यम से जब जनता को बता रहे थे तो बार-बार पटेल जी और गांधी जी के नामों को सम्बोधित कर रहे थे. हाल हीं में देखा गया था कि संघ/बीजेपी पटेल और गांधी की विरासत को अपनाने की कोशिश कर रही थी तो बीजेपी/संघ को जबाब देने के लिए कांग्रेस ने इस जगह का चुनाव किया और इन महा पुरुषों पर अपना दावा दोहराया जो उन्ही के है क्योंकि संघ ने आजीवन गाँधी, पटेल की खिलाफत करती रही है.
राजनितिक तौर पर कांग्रेस पार्टी में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि गांधी परिवार का कोई VIP किसी आम कार्यकर्ता के साथ कार्यकर्ताओं के बीच में बैठता हो. इसकी अनूठी बानगी कल गाँधीनगर में बापू के आश्रम में मिली जब प्रियंका गाँधी वाड्रा एक आम कार्यकर्ताओं की तरह दूसरे पंक्ति में जा बैठी जहाँ अल्पेश ठाकोर, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य जैसे युवा नेता बैठे थे. प्रियंका गाँधी के एक छोटे से कदम से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक अलग सा जोश देखने को मिला। वैसे कांग्रेस को अब पुरानी परम्परा से निकल कर आगे बढ़ने की और कार्यकर्ताओं के बीच तक पहुंचने जरूरत है.
कल गुजरात की धरती से प्रियका जी ने सार्वजनिक जीवन में पदार्पण के बाद पहली राजनैतिक रैली को सम्भोधित किया। इस रैली के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग छाप छोड़ी है. प्रियंका गाँधी ने बड़ी हीं कुशलता, चतुराई और शालीनता के साथ देश के असल मुद्दों को चुनाव से जोड़ दिया और तो और उन्होंने बीजेपी/संघ के आक्रामक राष्ट्रवाद के मुद्दे की हवा निकालते हुए उसे राष्टभक्ति और जागरूकता से जोड़ दिया। मैंने तो कभी इंदिरा जी को सुना नहीं पर उनका भाषण युटुब पर जरूर देखता हूँ पर एक बात सच कहूँ जब प्रियंका ने बोलना शुरू किया तो तो सहसा कुछ आवाज की खनक बरबस हीं याद आ गयी और वो याद प्रियंका गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा जी की थी. हम इस बहस से बाहर निकलते हुए प्रियंका के दिए गए भाषण का आंकलन करते हैं तो पाते है कि उनका पहला भाषण बेहद संतुलित और अत्यधिक धार वाला था. अपने भाषण के दौरान भले हीं उन्होंने सत्ता पक्ष या सरकार के किसी नुमाइंदे का नाम न लिया हो परन्तु उन पर धारदार हमला किया। शायद इसी वजह से कांग्रेस पार्टी के समर्थक उनमें इंदिरा जी की छवि देखते हैं.
No comments:
Post a Comment