देश के चौथे स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता की बात करना आज के दौर में शायद लोकतंत्र के साथ बेमानी जैसा होगा, हाल के कुछ सालों में मीडिया में किसी राजनितिक पार्टी या किसी ब्यक्ति विशेष की तरफ झुकाव बहुत हीं तेजी के साथ बढ़ा है. वो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया (अखबार) में चाटुकारिता अपने चरम पर पहुंच गया है. आज साफ़-साफ़ देखकर ऐसा लग रहा है कि मीडिया अपने वास्तविक लोकतान्त्रिक मूल्यों से पूरी तरफ बहक चुकी है, आज के मीडिया में भाषाई मर्यादा, सत्य, आलोचना करना मानो अभिशाप बन गया है. हर काले कोट वाला एंकर मानो सरकार की हीं भाषा बोलता है वो ऐसे प्रतीत होता है जैसे सरकार ने उन्हें अपना प्रवक्ता नियुक्त दिया है, सरकार की निंदा करना आज के दौर में मीडिया के लिए ईश निंदा के समान हो गया है. हर समझदार आदमी यह बखूबी देख और समझ रहा है.
मै कुछ उदाहरणों के साथ मीडिया के इस निंदनीय रवैये पर प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा -
आज के चुनावी महीनों में प्रधानमंत्री उम्मीदवार का मुद्दा -
आज के चुनावी महीनों में प्रधानमंत्री उम्मीदवार का मुद्दा जनता के लिए कम परन्तु मीडिया के लिए बहुत जरूरी हो गया है जितनी बार विपक्ष से सत्ता धारी दल विपक्ष के प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम नहीं पूछती है उससे बहुत ज्यादा टीवी मीडिया और अखबार वाले विपक्षी उम्मीदवार का नाम पूछते हैं और यही शब्दशः सरकार के पार्टी प्रवक्ता पूछते है तो आप थोड़ा सा सोचने के बाद ये पाएंगे कि मीडिया और सरकार के बोल में ज्यादा अंतर नहीं है या कहें तो हूबहू दोनों की जबान एक जैसी है.
जहां तक मेरा मानना है कि मीडिया सत्ता के इशारों पर चल रही है न कि जनता के मुद्दों पर मीडिया और देश के संभ्रांत लोग जानते है कि भारत में एक लोकतान्त्रिक प्रणाली है न की प्रेसिडेंशियल प्रणाली, हमारे देश में हमारे संविधान के अनुसार चुनाव जीतकर आये हुए नवनियुक्त सांसद, विधायक अपने नेता अर्थात प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का चुनाव करते हैं. मीडिया सत्ता के सहयोग से उन नवनिर्वाचित सांसदों, विधायकों का हक छीन कर मात्र दर्शक की मुद्रा में रखना चाहती है. जो लोकतंत्र के लिए किसी से सही नहीं है.
कल का लंदन में दूसरा उदाहरण ईवीएम और सिब्बल -
कल लंदन में एक कथित ईवीएम हैकर ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय ईवीएम को हैक करने को लेकर एक पत्रकार वार्ता का आयोजन लंदन की धरती से किया था. उस मौके पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील श्री कपिल सिब्बल जी मौजूद थे. उनकी इस मौजूदगी पर मै हिंदी न्यूज़ के एक नामी चैनल पर न्यूज़ शो देख रहा था तो साढ़े 9 मिनट के शो में सारे के सारे सवाल कांग्रेस को लेकर पूछे गए, कपिल सिब्बल की मौजूदगी को लेकर पूछे गए और दिवंगत गोपी नाथ मुंडे को लेकर उठे सवाल पर एंकर उन्हें दिवंगत कह कर भाजपा को क्लीन चीट देने की भरसक कोशिश की और कांग्रेस को हर वक्त कटघरे में खड़ा कर रही थी पर सत्ता से एक भी सवाल नहीं. तथाकथित हैकर ने भाजपा के प्रमुख और दिवंगत नेता गोपी नाथ मुंडे से सम्पर्क और ईवीएम हैक करने की बात कबूल की है.
तीसरा और अति महत्वपूर्ण मीडिया को गुलाम बनाने वाला फैसला -
तीसरा और अति महत्वपूर्ण मीडिया को गुलाम बनाने वाला फैसला बीते साल (2018) में हुआ जब प्रधानमंत्री की गलत बयानी को सच के साथ जोड़ने की कोशिश ABP News जो की देश में एक जाना-पहचाना नाम है उसके वरिष्ठ मास्टरस्ट्रोक नामक शो के राजनितिक एंकर और निर्भीक पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ जिले से जमीनी रिपोर्टिंग करके सरकार (मोदी) को झूठा साबित करते हुए सच के नजदीक ले गए और पूरे देश के लोगों को प्रधानमंत्री के मनमाफिक "मन की बात" कार्यक्रम में हुए बातचीत को दिखाया फिर अपनी रिपोर्ट के आधार पर आयी सूचना को दिखाया. तो झूठा कौन ये साबित होने में तनिक देर भी नहीं लगा. इसकी बात तत्कालीन केन्दीय सूचना मंत्री ने एक तरह से चैनल को ट्विटर के माध्यम से खुली धमकी दी थी और छत्तीसगढ़ की सरकार के मुखिया डॉ रमन सिंह जी ने प्रेस नोट निकालकर चैनल के सम्पादक को झूठा और झूठी खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया था. इस घटना के 16 दिन बाद ABP News की टीम फिर से उसी स्थान पर जाकर और ढेर सारे महिलाओं को इकठ्ठा करके उनका साक्षात्कार टीवी पर प्रकाशित किया और इस घटना से सरकार इतनी हिल गयी थी कि चैनल मालिक पर दबाव बनाकर मिलिंद खण्डेलकर, पुण्य प्रसून वाजपेयी और "मास्टरस्ट्रोक" के पूरी टीम को चैनल से निकलवा दिया, उसी के महज चंद दिनों बाद एक और बेलौस और निर्भीक पत्रकार अभिसार शर्मा को भी चैनल द्वारा जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया और फिर वापस नहीं बुलाया गया. इस दौर में कुछ निर्भीक (शेर) पत्रकार बचें है जीनका कुछ का नाम पुण्य प्रसून वाजपेयी, रविश कुमार (NDTV ), मिलिंद खण्डेलकर, अभिसार शर्मा, समीर अब्बास इत्यादि है. जिन्होंने सरकार से सीधे सवाल किया न कि औरों की भांति विपक्ष से. सरकार से सवाल करने का खामियाजा भी इन्हें हीं भुगतना पड़ा.
हमारे चौथे स्तम्भ का तो ये हालात है अब आप युवा और किसान हीं सही खबर और सही बात जन-जन तक पहुचाने में और लोक तंत्र को अभेद्य बनाने में मदद कर सकते हैं.
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