Thursday, January 10, 2019

धरती का राजा किसान क्यों है बदहाल


बिपिन नंदलाल गिरि 

किसान धरती का राजा होता है और बिना उसकी मेहनत के कुछ भी संभव नहीं है मेरा मानना है कि किसान हीं जवान पैदा करता है जो जाकर सरहदों पर मुल्क की हिफाजत के खातिर को हर वक्त अपने आप वतन के न्यौछावर होने को तैयार रहता है, किसान हीं नेता देता है उसका इतिहास चाहे हम राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की बात करें, पटेल जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, नेहरू जी, , चौधरी चरण सिंह देवगौड़ा, मनमोहन सिंह जी हो इन सब नेताओं का निर्माण किसान ने हीं किया और भी जितने देश के माननीय प्रधानमंत्री रहें हैं सबका प्रेरणा स्रोत श्री किसान हीं रहें है इसमें को कोई दो राय नहीं है पता लगाने के लिए आप किसी भी प्रधानमंत्री से इस बात को पूछ सकते हैं और तीसरा और अंतिम महत्वपूर्ण कार्य जो किसान करते हैं वो ये है कि वो पूरे देश के लोगों का बिना जात-पात, धर्म, लिंग का विभेद किये सबके क्षुदा को अपनी कर्मठता के डीएम भरने का काम करते हैं. ऋषि परम्परा से काफी मिलती-जुलती हमारे किसान भाइयों की परम्परा और तपस्या होती है. जिस तरह ऋषि-मुनि धुप-ताप, आँधी, वर्षा के परवाह किये बिना अपने कार्य में लीन रहते है ठीक उसी प्रकार हमारे किसान देवता धूप-ताप, आंधी, वर्षा में बिना थके बिना रुके खेतों में खेती के कार्य हेतु समर्पित होते हैं और उनकी यह तपस्या बहुत हीं कठिन होती है पर उनके हौसले इनसे कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं. आज मैं भारत के उस विचार को आपके सामने रखूंगा जो किसानों के प्रति सबसे बड़ा नजरिया है और वह नजरिया हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (बापू) जी का है.

आजादी से पहले संगठित किसान आंदोलनों को चलाने वाले कुछ चुनिंदा लोगों में से एक प्रोफ़ेसर एन जी रंगा स्वयं एक किसान के पुत्र थे और किसानी की बहुत सी बातों की समझ रखते थे. रंगा साहब गाँधी जी के विचारों से बहुत प्रभावित थे. वे गाँधी जी से किसानो के समस्याओं को लेकर अनेक सवाल करते थे कई बार तो पहले से ही सवालों की सूची बनाकर बापू को दे देते थे. 1944 में जब बापू जेल से रिहा हुए तो रंगा जी बापू से मिलने पहुंचे और उनके सामने पहला हीं सवाल बहुत तीखा पूछा था.

‘आप कहते हैं कि न्याय की दृष्टि से धरती किसानों की है या होनी चाहिए. लेकिन इसका अर्थ केवल अपनी जोत की ज़मीन पर नियंत्रण होना है या जिस राज्य में वह रहता है उस पर उसे राजनीतिक सत्ता प्राप्त होना भी है? क्योंकि यदि किसानों के पास केवल ज़मीन होगी और राजनीतिक सत्ता नहीं होगी, तो उनकी स्थिति उतनी ही खराब होगी जितनी सोवियत रूस में है. वहां राजनीतिक सत्ता पर तो सर्वहारा की तानाशाही ने अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया, लेकिन भूमि के सामूहिकीकरण के नाम पर किसान ज़मीन पर अपने अधिकार से हाथ धो बैठे?’ (शब्दशः अनुवादित)

गांधीजी ने जवाब दिया - ‘मुझे पता नहीं कि सोवियत रूस में क्या हुआ है. लेकिन मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि यदि हमारे यहां लोकतांत्रिक स्वराज्य हुआ; और अहिंसक तरीकों से आज़ादी हासिल करने पर ऐसा होगा ही, तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ ही हर किस्म की सत्ता होनी ही चाहिए.’ (शब्दशः अनुवादित)

नवम्बर 1947 का वो साल था जब महात्मा गाँधी जी को किसी अनजान ये चिट्ठी लिखा और उसमें लिखा थी कि हमारी कबिंनेट में कम से कम एक किसान जरूर होना चाहिए। इसके जबाब में 26 नवम्बर 1947 को अपने प्रार्थना सभा में गाँधी जी कहते हैं कि - ‘हमारे दुर्भाग्य से हमारा एक भी मंत्री किसान नहीं है. सरदार (पटेल) जन्म से तो किसान हैं, खेती के बारे में समझ रखते हैं, मगर उनका पेशा बैरिस्टरी का था. जवाहरलालजी विद्वान हैं, बड़े लेखक हैं, मगर वे खेती के बारे में क्या समझें! हमारे देश में 80 फीसदी से ज्यादा जनता किसान है. सच्चे प्रजातंत्र में हमारे यहां राज किसानों का होना चाहिए. उन्हें बैरिस्टर बनने की जरूरत नहीं. अच्छे किसान बनना, उपज बढ़ाना, ज़मीन को कैसे ताज़ी रखना, यह सब जानना उनका काम है. ऐसे योग्य किसान होंगे तो मैं जवाहरलालजी ने कहूंगा कि आप उनके सेक्रेटरी बन जाइये. हमारा किसान-मंत्री महलों में नहीं रहेगा. वह तो मिट्टी के घर में रहेगा, दिनभर खेतों में काम करेगा, तभी योग्य किसानों का राज हो सकता है.’ ऐसा नहीं है कि गाँधी जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में किसान की बात की हो 5 दिसंबर 1929 में "यंग इंडिया" में भी किसानों की बात की थी.

 लेकिन दुःख की बात ये है कि आज 100 साल बाद भी वहीं के वहीं अटके हुए हैं और उन्हीं सवालों से हमारे आज के किसान जूझ रहें हैं जिनसे आज के 100 पहले भी जूझते रहे हैं हम उन्हें जो भी दे देते हैं वो उनके अनुपात के हिसाब से नहीं होता और जो पहुँचता है तो वो सब तहस-नहस होने के बाद पहुँचता है और फसल मुआवले के नाम पर तो मानो उनके सम्मान के साथ के साथ मजाक किया जाता है कुछ जगहों पर तो किसानो को कुछ पैसे चाँद रूपये जैसे 2 रुपया, 70 रुपया, 500 रुपया देकर सरकारी मदद के नाम पर उनका माखौल उदय जाता है. अनेक योजनाएं किसानो के लिए बनाई जाती है पर वो खेतों में नहीं उतरती वो उतरती है तो राजनेताओं की तरह पूजीपतियों की गोद में. उदाहरण के तौर पर हम आज की सरकार की एक किसानी योजना "फसल बीमा" की बात बताता हूँ  समूची फसल जिसकी लागत (गेहूं) 15000-17000 हैं वो किसी प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गयी तो बीमा के लिए पैसा भरने के बावजूद लागत नहीं निकल पा रही है और किसान को इसके आधे का और कहीं-कहीं तो आधे से भी ज्यादे का नुक्सान उठाना पड़ रहा है तो किसान आत्महत्या के सिवाय और क्या करेगा।

किसानो की हालत सुधारने के लिए एक अचूक उपाय यह है कि हर ग्राम सभा के अंदर एक कोल्ड स्टोरेज और खाद्य भंडारण की ब्यवस्था कर दी जाये जिसमें किसान अपने फसल, फल, टमाटर, मिर्च, मटर, केले का उचित भंडारण कर सके और जरूरत के हिसाब से उसे बाजार के हवाले कर सके इससे किसान को उसके मनमाफिक दाम मिलेगा और उसके घर में भी खुशियों का अम्बार लग जायेगा और फिर कोई किसान जान देने की नहीं सोचेगा। 

जय किसान      

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