हम
बात आज बात कर
रहें हैं भारत की सबसे पुरानी
राजनितिक पार्टी कांग्रेस
की वैसे तो कांग्रेस दो
दिन पहले हीं अपना 134 वां स्थापना दिवस मनाई है. इसमें कोई शक किसी को
भी नहीं है कि कांग्रेस
पार्टी ने देश के
लिए अतुलनीय योगदान दिया चाहे वो आजादी के
पहले हो या आजादी
के बाद कांग्रेस ने लोगों की
भरपूर सेवा की है. कांग्रेस
ने देश को एक से
बढ़कर एक विश्व विख्यात
अंतर्राष्ट्रीय नेता दिए है जिनके नाम
लिखना शुरू करूंगा तो
वक्त कम पड़ जायेगा
परन्तु कुछ नाम लिखने की चेष्टा कर
रहा हूँ. दादा भाई नैरोबी, महात्मा गाँधी, गफ्फार खां (सीमान्त गाँधी), पंडित जवाहर लाल नेहरू, पंडित मोतीलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृपलानी जी, रविंद्र नाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, मनमोहन सिंह, नरसिंहा रॉव, सोनिया गाँधी, केशरी नाथ त्रिपाठी, वी वी गिरि,
प्रणव मुखर्जी जैसे असंख्य नेता आजादी के पहले और
आजादी के बाद कांग्रेस
पार्टी से जुड़ें रहे
है और कांग्रेस के
विचार स्वरूप जनता की अथक सेवा
में लगे रहें।
ये
तो रहा कांग्रेस का सुनहरा इतिहास
परन्तु 2013 में जब से राहुल
गाँधी ने उपाध्यक्ष की
हैसियत से पार्टी की
बागडोर संभाली थी उस वक्त
कांग्रेस पार्टी में घोर निराशा का दौर था
क्योंकि तत्कालीन मनमोहन सरकार पर हर तरफ
से भ्रष्टाचार के आरोप लग
रहे थे और सरकार
इस तरह के आरोपों से
बुरी तरह घिर चूक थी. 2014 लोकसभा का चुनाव मेरे
ख्याल से कांग्रेस का
अब तक का सबसे
बुरा चुनाव होने वाला है उनके नेताओं
को पहले हीं पता चल चूका था
क्योंकि कांग्रेस की सरकार में
वरिष्ठ मंत्री रहे पी चिदंबरम ने
चुनाव लड़ने से मना कर
दिया था उनकी तरह
और भी बहुत से
नेता थे जिन्होंने चुनाव
नहीं लड़ा और जो भी
कद्दावर और वरिष्ठ नेता
चुनाव लड़ें लगभग सभी हार गए थे. पर
राहुल गाँधी ने आधे-अधूरे
मन से चुनाव से
ठीक पहले जिम्मेदारी संभाली भी पर परिणाम
वैसा हीं निकला जैसा अपेक्षित था. कांग्रेस ने अपने पूरे
इतिहास का सबसे बुरा
प्रदर्शन किया और मात्र 44
सीट पर सिमट गयी
आप सोच सकते हैं कि कैसी सुनामी
रही होगी जो पार्टी 2009
में 204 सीट जीती थी वो 44
पर आ चुकी थी.
चुनाव के बाद कांग्रेस
नेतृत्व पर उंगलियां उतनी
शुरू हो गयी परन्तु
पार्टी के अंदर किसी
में ऐसी हिम्मत नहीं थी कि राहुल
के खिलाफ कोई कुछ बोल सके. इस तरिके से
कांग्रेस पार्टी कमजोर होती गयी और दिल्ली, महाराष्ट्र,
हरियाणा, असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड समेत कई महत्वपूर्ण राज्य
कांग्रेस के हाथ से
रेत की तरह फिसलते
गए और राहुल गाँधी
तथा कांग्रेसी नेता बस देखते रहें न उन्होंने कुछ
किया न कुछ करने
की कोशिश की क्योकि इसके
लिए कहीं न कहीं राहुल
गाँधी स्वयं जिम्मेदार थे क्योंकि हर
चुनाव में मिली हार के बाद वो
छुट्टियां मनाने विदेश चले जाया करते थे जिससे पार्टी
के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं का दिल टूट
जाता था और मीडिया
में भी राहुल गाँधी
का बहुत मजाक बनाया जाता था और उस
दौर में राहुल गाँधी पार्टी पर एक तरह
से बोझ लगने लगे थे ऐसा आरोप
लगाकर कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ
और कद्दावर नेता पार्टी छोड़ कर भाजपा में
चले गए जो भाजपा
की सरकार बनवाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जैसे पूर्वी भारत में असम से हेमंत विश्व
शर्मा निकले और कांग्रेस को
पूर्वोत्तर मुक्त कर दिया। इतना
सब हो रहा था
फिर भी राहुल खामोश
थे राजनितिक पंडितों को ये अंदाजा
लगाना मुश्किल था कि राहुल
गाँधी के विचार में
चल क्या रहा है इसी बीच
भाजपा मोदी का एक जुमला
"कांग्रेस मुक्त भारत" अपने पूरे शबाब पर था हो
भी क्यू ना वो एक
के बाद एक राज्य कांग्रेस
से छींनते जा रहे थे
तो उनका उत्साह स्वाभाविक था. इधर राहुल गाँधी भयानक हताशा के दौर से
गुजर रहे थे लेकिन अंदर
हीं अंदर उन्होंने युवाओं और वरिष्ठ नेताओ
का एक बेहतरीन समायोजन
बना लिया था जो कि
बाहर किसी को पता भी
नहीं चल सका उनकी
इस टीम में बहुत हीं अनुभवी नेता और राजस्थान के
मुख्यमंत्री रह चुके अशोक
गहलोत, अहमद पटेल, सिध्दरमैय्या, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैप्टन अमरिंदर सिंह, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी, रणदीप सिंह सुरजेवाला, राज बब्बर, सुष्मिता देव, संजय निरूपम, प्रियंका चतुर्वेदी, पवन खेड़ा, शक्ति सिंह गोहिल, प्रमोद तिवारी, अखिलेश सिंह जैसे ऊर्जावान कार्यकर्ताओं का एक पैनल
बना लिया जिसमें किसी भी परिस्थिति से
निपटने का कुशल माद्दा
था. उसी समय 2017 में अंत में 4 राज्यों में
चुनाव होने वाला था जिसमें से
एक प्रधानमंत्री का गृह राज्य
गुजरात भी था और
तब तक अशोक गहलोत
जिनकी जमीन पर अच्छी पकड़
मानी जाती है उन्हें पार्टी
का नंबर दो यानी संगठन
महासचिव बना दिया गया था और चुनाव
के तीन महीने पहले तक कांग्रेस जिस
गुजरात चुनाव को बुरी तरह
हार रही थी और गहलोत
के कौशल और राहुल गाँधी
के मेहनत की
वजह से एक कड़े
मुकाबले में आ गयी. गहलोत
ने वहां तीन आंदोलनकारी युवा हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर
को लगभग अपने पक्ष में कर लिया और
तो और अल्पेश ठाकोर
को कांग्रेस पार्टी में भी शामिल करा
लिया। यहां पर एक अच्छा
चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस
को हार तो हुई पर
मोदी और उनकी टीम
के पसीने छूट चुके थे इसके
बाद तो राहुल गाँधी
और कांग्रेस के नेताओं में
चमत्कारिक परिवर्तन देखने को मिला. और
गुजरात चुनाव के बाद 11 दिसंबर 2017 को दिल्ली में एक प्लेनरी सेशन बुला कर राहुल गाँधी
को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया. इसके बाद
अप्रैल, मई के महीनों
में कुछ राज्यों में चुनाव हुआ जिसमें राहुल ने खूब पसीना
बहाया और मंदिर-मस्जिद
की दौड़ भी खूब लगाई
इसी चुनाव में कर्नाटक भी था जहां
कांग्रेस को अपने एक
मात्र बड़े जनाधार वाले राज्य को बचाने की
थी सो मेहनत भी
खूब किया वहां पर बीजेपी सबसे
बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी उसे 104,
कांग्रेस 79 और जेडीएस
को 38 सीट मिली
थी तो वहां भाजपा
को सत्ता में आने से रोकने के
लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने तत्काल अपने
नेताओं से बात करके
जेडीएस को समर्थन देने
का एलान कर दिया और ये भी कहा कि जेडीएस के नेतृत्व में सरकार का गठन किया जायेगा जिसकी पहली बार मीडिया और अन्य राजनितिक विश्लेषकों ने दिल खोलकर प्रसंशा की. इस चुनाव के बाद राहुल कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकल गये उस पर भी काफी विवाद हुआ पर अब रहल गाँधी पूरी तरह से बदल चुके थे उन्हें जनता के मुद्दे को समझने और उठाने की अच्छी समझ हो चुकी थी फिर अपनी इसी टीम के साथ उन्होंने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान (भाजपा सरकार), तेलंगाना (टीआरएस), मिजोरम (कांग्रेस) पर अपना पूरा जोर लगाया और मुद्दों के साथ जमीन पर उतरे और जनता तक अपनी बात पहुंचते रहें जिसे जनता ने अब और भी गंभीरता से उनकी बातों को सुनना शुरू कर दिया था और उसका उदहारण उनकी रैलियों में देखने को मिलने लगा जिससे उनमें गजब के उत्साह का संचार हुआ जो सोये हुए कार्यकर्ताओं को एक झटकी में हीं जगा दिया और लोगों को घरो से नकल कर सड़कों पर संघर्ष करने के लिए उतार दिया और उसका परिणाम अंततः सुखद निकला। कांग्रेस ने बीजेपी शासित तीनों राज्यों को जीत लिया और वहां अर्से बाद कांग्रेस का झंडा बुलंद हुआ और राहुल गाँधी को एक हीं देश के पटल पर विपक्ष के एक बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया और अब मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का जुमला भी काफूर बन गया.
राहुल
के अर्श से फर्श तक की ये कहानी बहुत कठिन रही है, आप पाठकों से अनुरोध है कि मेरे
जुबान से राहुल की राजनितिक कठिनाइयों का सही से वर्णन किया गया है तो आप लोग शेयर
और कमेंट के माध्यम से अपना आशीर्वाद देना.
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