अब लोक सभा की घड़ियां जैसे-जैसे नजदीक आ रहीं हैं वैसे-वैसे पार्टियों के अंदर की खेमेबाजियां भी निकलकर बाहर आने लगी है. चाहे बात सत्ताधारी पार्टी की करें या बात विपक्ष की पार्टियों का. सब धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगे हैं. बमुश्किल साल भर पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी में दो फाड़ हुआ तो शिवपाल सिंह ने अलग रास्ता अख्तियार कर लिया फिर एक ऐतिहासिक घटना सपा-बसपा के रूप में जनता के सामने आया. उसके बाद कांग्रेस ने अपनी तरफ से धमाका करते हुए प्रियंका गाँधी को चुनावी समर में उतार दिया। जिसकी वजह से आगामी लोक सभा चुनाव के दौरान सारे देश के मीडिया का ध्यान उत्तर प्रदेश पर हीं केंद्रित रहेगा. भाजपा के नितिन गडकरी जी के बोल भी कुछ-कुछ तल्ख लग रहे हैं. अब ये क्या करते हैं संघ जानें.
अब बात करते हैं पार्टियों के अंदर वाले नेताओं की जो किसी विपक्ष के नेता तो नहीं हैं पर भाषा विपक्ष की तरह हीं उपयोग में ला रहे हैं -
नितिन गडकरी -
सरकार के सबसे अच्छे मंत्रियों में से एक नितिन गड़करी जी ने कल यानी २७ जनवरी सन २०१९ को महराष्ट्र के नागपुर में एक बयान दिया है जो आज बहुत चर्चित हो रहा है और वो इस प्रकार है, " सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है। इसलिए सपने वही दिखाएं जो पूरे कर सकें.... मैं सपने दिखाने वाले में से नहीं हूं। मैं जो बोलता हूं वो 100 प्रतिशत डंके की चोट पर पूरा होता है." ऐसा नहीं है कि गडकरी जी ऐसा बयान पहली बार दे रहें हैं. गडकरी जी वर्तमान सरकार के सबसे कर्मठ मंत्रियों में से एक हैं, इससे पहले पिछले साल भी उन्होंने एक ऐसा हीं बयान दिया था जो इस पकार था, "हमें पूरा भरोसा था कि हम कभी भी सत्ता में नहीं आएंगे, इसलिए हमें लंबे-चौड़े वादे करने की सलाह मिली थी....अब जब हम सत्ता में हैं तो लोग हमें उन वादों की याद दिलाते हैं, जिन्हें हमने किया था। हालांकि, इन दिनों हम सिर्फ हंस देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं." गडकरी जी की इन बयानों को लोग सरकार की आलोचना के तौर पर देख रहें है. लोगों की उत्सुकता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है कि अब गडकरी जी का अगला निशाना क्या होता है. संघ प्रमुख का हाथ गडकरी जी के सिर पर है तो मोदी-शाह की जोड़ी भी लाचार है. अभी कुछ दिन पहले संघ प्रमुख भागवत ने एक सेना के संबंध में सरकार पर एक बहुत हीं तल्ख टिप्पणी करते हुए खा था कि, "जब युद्ध नहीं हो रहा है तो इतने जवान शहीद कैसे हो रहे हैं." संघ प्रमुख के इस बयान को सरकार के प्रति उनकी नाराजगी को लेकर देखा जाने लगा था फिर गडकरी एपिसोड आ गया तो नाराजगी की खबर और पुख्ता हो गयी.
हमें यह समझना पड़ेगा कि आज के भजपा के दौर में मोदी और अमित शाह की जोड़ी के सामने बड़े से बड़े नेता में बोलने की हिम्मत नहीं होती तो ये हिम्मत (माद्दा) गडकरी जी के हृदय में कहाँ से पैदा हो गया. तो उसका जबाब बहुत सरल है जो लोग संघ की कार्य सस्कृति से परिचित हैं वो जानते हैं कि गडकरी जी में नव ऊर्जा का संचार नागपुर (संघ कार्यालय) से मिल रही है. जैसा की सर्वविदित है कि मोदी जी कभी भी संघ के स्वीकार्य नेता नहीं रहें है २०१४ के चुनाव के दौरान संघ ने मजबूरी बस मोदी को स्वीकार किया है. आज के परिदृश्य में नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह हीं दो ऐसे नेता हैं जो निर्विवाद रूप से संघ की पसंद बने हुए हैं. गडकरी जी को तो पूरे देश ने देखा है कि जब भी संघ का कोई बड़ा कार्यक्रम होता है वो उसमें स्वयं सेवक के गणवेश में जरूर शामिल होते हैं और गडकरी जी अपना संघ प्रेम कभी नहीं छुपाते है. जब गडकरी जी भाजपा के अध्यक्ष बने थे तब वो अपने संघ प्रेम के कारण हीं बने थे. अगर आज वो सार्वजनिक मंच से कुछ भी खुल कर बोल पा रहें हैं तो उसके पीछे संघ की ताकत है जिसकी वजह से छद्म रुपी भाजपा चुप-छाप सह रही है. कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.
संघ प्रमुख चाहते थे कि सरकार राम-मंदिर पर अध्यादेश लाये, धारा ३७० पर आक्रामक तरिके से खत्म करने की दिशा में आगे बढ़े, नयी शिक्षा ब्यवस्था लागू हो एक बात तो लगभग साफ़ हो गयी है कि संघ सरकार से नाराज है क्योंकि सरकार ने संघ के मनमुताबिक फैसले नहीं लिए शिवाय नोटबंदी को छोड़ कर. क्योंकि अब स्वयं सेवकों से क्षेत्र की जनता मीटिंगों में अच्छे दिन, राम-मंदिर, नौकरी को लेकर सवाल करने लगी है. स्वयं सेवक जबाब न होने की स्थिति में शर्मिंदगी महशूस होने लगी है, इस वजह से संघ को यह डर भी सताने लगा है कि कहीं उसके कार्यकर्ता घर में न बैठ जाये.
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