बिपिन नंदलाल गिरि
दिन-ब-दिन देखा जा रहा है कि समाज में कट्टरता बढ़ती जा रही है उसके लिए हम किसे जिम्मेदार मानेंगे, क्या हमने कभी ऐसा सोचा था कि समाज में फ़ैल जायेगा कि लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो हो जायेंगे ऐसा कभी नहीं सोचा तो क्यों नहीं सोचा एक वाजिब सवाल है जो उठना चाहिए कि हमारे से पहले वाली पीढ़ी के नेताओं ने जनप्रतिनिधियों ने ऐसा क्यों नहीं सोचा की हम अपने समाज को नफरत के इस जहर से कैसे दूर रखेंगे, आज हर बात पर उग्र तरिके से जबाब दिया जाता है चाहे वो अच्छी बात हीं क्यों हो उस पर भी समाज के कुछ तबके के लोग उग्रतापूर्वक जबाब देते हैं. पता नहीं क्या हो गया हमारे समाज को जो देखते हीं देखते अपने असल मूल से दूर चला गया इसके लिए हम सबकी जिम्मेदारी समान रूप से है.
मै हाल की कुछ अत्यंत ह्रदय विदारक घटनाओं की जिक्र यहाँ करना चाहता हूँ जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वो हमारे मूल समाज का हिस्सा कैसे बन गयी जैसे पहलू खान को गौ वंश के वध मार देना, रोहित बेमुला का एक तरह का शैक्षणिक हत्या कर देना, नजीब को जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय से गायब हो जाना और आज दो साल से ज्यादा का वक्त लग चुका है उसका पता न चलना या केरल में वामपंथ समर्थकों में विद्यार्थी परिषद से जुड़ें लोगों की हत्या करवाना, कन्हैया कुमार को विद्यार्थी परिषद के दबाव के कारण देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करवाना ये सब घटनाएं समाज को बेचैन थी. फिर मेरा वही सवाल क्या हमारे अंदर बेचैनी हुई नहीं हुई उसका परिमार्जन ये हुआ कि इस तरह कृत्य करने वाली शक्तियों को शह मिलता गया और वे लोग इस कृत्य को न्यायोचित ठहराने में कोई कसर छोड़ी।
मैं इस स्तिथि के लिए मूलतः कांग्रेस विचारकों को दोष दूंगा न कि संघी विचारकों को मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूँ कि सर्व समाज, सर्व संभव सम्भाव की पोषक तो कांग्रेस हीं थी संघ और हिन्दू महासभा ने तो १९२५ में हीं अपने आप को एक धर्म हितैषी और एक धर्म विरोधी विचार रखते आयी थी तो आज मुझे उनके विचारों से हैरानी नहीं होती है क्यों कि नफरत फैलाना हीं तो उनका यूएसपी है जो वो वखूबी सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे है लेकिन मैं हतप्रभ तो कांग्रेस के विचारकों से हूँ जिन्होंने आजादी की मूल्यों की पूरी तरह से रक्षा नहीं नहीं की गाँधी जी की आदर्शों और विचारों की रक्षा नहीं की. इसलिए हम कांग्रेसी या देशवासियों को संघ और भाजपा द्वारा समाज में जहर फैलाने के लिए अधिक दोषी नहीं मान सकते अधिक दोषी तो वे लोग हैं जो सत्य, अहिंसा, सामजिक समरसता के पोषक रहे हैं.
हमारे गांव के बड़े-बुजुर्गों के द्वारा एक कहानी सुनाई जाती है कि मेरे पिता जी अंग्रेजों से लड़ाई लड़े थे, मेरे दादा जी (८८ वर्ष) बताते हैं कि एक बार नेहरू जी यहां आये थे, गाँधी जी बाजार रास्ते से गुजर रहे थे तो हम सब उन्हें देखने के लिए गए थे. आजादी बहुत जान और जवानी मिट्टी में मिलाने के बाद मिली थी पर आज को देख के बहुत दुःख होता है हर तरफ हिन्दू-मुस्लिम मार-काट देखकर, हर तरफ बेगारी फ़ैली है भ्रष्टाचार है, किसान इलाज के अभाव में मर रहा है.
क्या यही आजादी का सपना था हमारे आजादी के दीवानों का, शायद नहीं !
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