बिपिन नंदलाल गिरि
नये साल के पहले हीं दिन प्रधानमंत्री ने एएनआई के पत्रकार स्मिता प्रकाश को 90 मिनट से ज्यादा का साक्षात्कार दिया जिसे सभी मीडिया चैनलों ने पूरा-पूरा सजीव (लाइव) दिखाया। इस साक्षात्कार में माननीय प्रधानमंत्री ने कई गैर-जरूरी मुद्दों पर जबाब दिया पर जो आज के ज्वलंत मुद्दे जैसे रोजगार, भीड़ तंत्र का न्याय, सकल घरेलू आमदनी (जीडीपी) किसानों की बढ़ती आत्महत्या, कश्मीर में सैनिको और नागरिकों के जान माल के भयानक नुकसान इन मुद्दों पर माननीय प्रचारमंत्री (प्रधानमंत्री) महोदय नाम मात्र का जिक्र करके मोटे तौर पर चुप्पी हीं साधे रखी थी और महान पत्रकार महोदया इन पर सवाल पूछना भी गैर-जरूरी समझा इसके बाद भी ये साक्षात्कार इतना लम्बा कैसे चला मैं बताता हूँ क्योंकि प्रधानमंत्री ने सर्जिकल स्ट्राइक की आधे समय तक तो बस कहानी सुनाई और राफेल को तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पीछे छुपने की कोशिश की.
परन्तु इस साक्षात्कार से सबसे बड़ा धक्का उन लोगों को लगा जिन लोगों से राम मंदिर बनवाने के नाम वोट लिया जाता था उन्हें प्रचार करवाया जाता था. ऐसे सच्चे और सियाराम के प्रति अपार स्नेह रखने वालों को मोदी जी ने एक झटके में ये कहते हुए नेश्ता-नाबूत कर दिया कि राम मंदिर पर अध्यादेश नहीं लाएगी और इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। प्रधानमंत्री महोदय के इस एक वाक्य ने देश के करोङो रामभक्तों के दिलों को चिर कर रख दिया मै आरएसएस और विहिप की बात नहीं कर रहा हूँ मैं यहां पर साधू-संतों की बात कर रहा हूँ जिन्हें इन लोगों ने आश्वस्त किया था कि हमारी सरकार के आते हीं रामलला का भब्य मंदिर बनेगा, पर अब साधू-महात्मा बीजेपी को अपने वादे से मुकरने का आरोप लगाते हुए अंजाम भुगतने तक की चेतावनी देने लगे है.
आरएसएस हमेशा कहती रही है कि बीजेपी से उसका कोई लेना-देना नहीं है उसी का पोल खोलते हुए राष्ट्रीय टेलीविज़न पर निरंजनी अखाङे के एक महंत के बात-चित का ब्यौरा निचे दे रहा हूँ-
आनंद गिरि महंत निरंजनी अखाडा को कोट करते हुए-
आनंद गिरि महंत निरंजनी अखाडा - "भाजपा ने हमें पागल बनाया,बेवकूफ बनाया, हमारी भावनाओं से खेला" जब मंदिर कोर्ट को हीं बनाना था तो इन्होने हमारा तमाशा क्यों बनाया.
चैनल - @abpnews
दिनांक - 02.01.19
समय - शाम 5.20
एंकर - रूबिका लियाकत
महंत आनंद गिरि - आपने क्यों पागल बनाया क्या लोग भाजपा कार्यालय गए थे मै कहता हूँ की विहिप, आरएसएस को भाजपा से सारे नाते तोड़ लेने चाहिए, अगर आपको सुप्रीम कोर्ट का हवाला देना था तो 2010 से सुप्रीम कोर्ट में है वही तय करता.
इस शो में विशेष आमंत्रित ब्यक्ति -
ज्ञानेंद्र बरतरिया (आरएसएस विचारक), राजीव त्यागी (कांग्रेस), सुधांशु त्रिवेदी (बीजेपी), महंत आनंद गिरि (हिन्दू धर्म गुरु), अंसारी (बाबरी मुस्लिम पक्षकार).
ज्ञानेंद्र बरतरिया आरएसएस विचारक - आनंद गिरि जी को आप अब प्रवचन क्यों दे रहें है.
महंत आनंद गिरि- हमने भाजपा के लिए वोट मांगे हमने भाजपा के लिए प्रचार किया और हमने भाजपा की सरकारें बनवाई (दोहराते हुए).
सुधांशु को टोकते हुए-
महंत आनंद गिरि - पहले भी कांग्रेस थी तो क्या से कांग्रेस पूछ कर इन्होंने राम मंदिर को अपने मैनिफेस्टो में डाला था.
जनवरी 1993 में आ चूका है राम मंदिर पर अध्यादेश -
राम मंदिर बनाए जाने के लिए अध्यादेश लाना कोई नई बात नहीं है. केंद्र की बीजेपी सरकार भले ही अभी इसके लिए विचार कर रही हो. लेकिन करीब-करीब 25 साल पहले ही कांग्रेस सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है.
यह जनवरी, 1993 में हुआ था उस समय केंद्र में कांग्रेस निति नरसिम्हा राव की सरकार थी. मतलब बाबरी मस्जिद गिराए जाने के केवल एक महीने बाद. उस वक्त पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे.
7 जनवरी, 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी. बाद में तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था. पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम कहा गया था. हालांकि उस वक्त बीजेपी ने इसका विरोध किया था.
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिल को पेश करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने कहा था, "देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना बनाए रखना जरूरी है." आज उनके द्वार रखा गया विचार बिल्कुल सत्य सा प्रतीत होता है.
नरसिम्हा राव सरकार ने इस अधिनियम के जरिए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि ही नहीं बल्कि इसके चारों ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत कर रही थी. इस पर कांग्रेस सरकार राम मंदिर, एक मस्जिद, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहती थी.
खैर बीजेपी समेत मुस्लिम संगठन भी इस अधिनियम के खिलाफ थे. काश यह अपने असली रूप में आ गया होता तो आज कुछ राजनितिक पार्टियों की दुकान बंद हो गयी होती या यूं कहें दुकान खुली हीं नहीं होती.
जनवरी 1993 में आ चूका है राम मंदिर पर अध्यादेश -
राम मंदिर बनाए जाने के लिए अध्यादेश लाना कोई नई बात नहीं है. केंद्र की बीजेपी सरकार भले ही अभी इसके लिए विचार कर रही हो. लेकिन करीब-करीब 25 साल पहले ही कांग्रेस सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है.
यह जनवरी, 1993 में हुआ था उस समय केंद्र में कांग्रेस निति नरसिम्हा राव की सरकार थी. मतलब बाबरी मस्जिद गिराए जाने के केवल एक महीने बाद. उस वक्त पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे.
7 जनवरी, 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी. बाद में तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था. पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम कहा गया था. हालांकि उस वक्त बीजेपी ने इसका विरोध किया था.
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिल को पेश करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने कहा था, "देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना बनाए रखना जरूरी है." आज उनके द्वार रखा गया विचार बिल्कुल सत्य सा प्रतीत होता है.
नरसिम्हा राव सरकार ने इस अधिनियम के जरिए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि ही नहीं बल्कि इसके चारों ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत कर रही थी. इस पर कांग्रेस सरकार राम मंदिर, एक मस्जिद, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहती थी.
खैर बीजेपी समेत मुस्लिम संगठन भी इस अधिनियम के खिलाफ थे. काश यह अपने असली रूप में आ गया होता तो आज कुछ राजनितिक पार्टियों की दुकान बंद हो गयी होती या यूं कहें दुकान खुली हीं नहीं होती.
इससे एक बात तो सत्य है कि भगवा पार्टी या कहें तो संघ की पार्टी ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के साथ-साथ लाखों साधू-महात्माओं को छला और करोङो आस्थावान श्रीराम भक्तों की भावनाओं को भड़काया, उनके जज्बातों से खेला सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद उनके यकीन का गला घोट दिया। मेरे विचार से भाजपा के लिए ये आगामी चुनाव में ये खतरे की घंटी है.
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