सर्वप्रथम बापू जी के जन्मदिवस पर उनके चरणों में सादर नमन. आज बापू जी का १५० वां जनमोत्स्व दिवस है. हमने बापू के विचारों को आत्सात किया है परन्तु कुछ राजनितिक दल और संगठन बापू के नाम पर आज जो दिल्ली की सड़कों पर ढोंग रचा रहे हैं. कभी उनके हीं राजनितिक पुरखों ने गांधी जी को मौत के घाट उतार दिया था. आज गांधी जी के विचारों के सबसे बड़े पैरोकार बनने की नाकाम कोशिश कर रहें हैं. जिस पार्टी/संगठन के लोग आतंक की आरोपी और बापू को अपशब्द कहने वाली अपनी सांसद को पार्टी से निकाल नहीं सकते। उन्हें बापू के नाम पर ढोंग रचाने का कोई अधिकार नहीं है.
बात आजादी के प्रारम्भिक दौर की है. गांधी जी कांग्रेस पार्टी के आजीवन सदस्य थे. तब आरएसएस नामक एक संगठन जिसके पास आज अपरोक्ष रूप से सत्ता है. वो गांधी जी के हर कदम का विरोध करती थी और उनके नेतृत्व में होने वाले आन्दोलनों से अपने को अलग कर लेती थी. हद तो तब हो गयी जब देश के अनेक वीर क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफत करते हुए जेलों में ठूंस दिए गए थे. तब संघ के सबसे बड़े नेता सावरकर ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगकर जेल से बाहर आये हुए थे और अंग्रेजी शासन का साथ देने तक की कसम खाते थे। बटवारे के वक्त जब गांधी जी देश को सभी धर्मों के रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. तब संघ के तत्कालीन प्रमुख गोलवरकर मुसलमानों को लेकर बहुत हीं आक्रामक और अविवेक पूर्ण बयान देते थे और इतना कहते हुए गांधी जी खत्म करने की चेतावनी भी देते थे. जिसकी परिणीति १९४८ में गांधी जो अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. इस संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा "कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी" लिखते हैं कि - गांधी को अब आरएसएस के बारे में कोई भ्र्म नहीं था. संघ (RSS) ने जो घृणा महात्मा गांधी के लिए पिछले कई महीनों से पाले रखा था उसके प्रति और ताकत के साथ मुखर हो गया"
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि - "दिसम्बर १९४७ के पहले सप्ताह में, एम एस गोलवरकर ने दिल्ली में आरएसएस की एक बैठक को सम्बोधित किया। यहां गोलवरकर ने 'मुसलमानों का जिक्र' करते हुए एक टिप्पणी की, "पृथ्वी पर कोई भी शक्ति उन्हें हिन्दुस्तान में नहीं रख सकती है. उन्हें ये देश छोड़कर जाना हीं पड़ेगा। महात्मा गांधी मुसलमानों को भारत में रखना चाहते थे कि चुनावो के वक्त कांग्रेस को मुसलमानों के वोट का लाभ हो सके, लेकिन, उस समय तक, भारत में एक भी मुसलमान नहीं बचेगा। महात्मा गांधी उन्हें गुमराह नहीं कर सकते। हमारे पास ऐसे साधन हैं, जिनसे ऐसे लोगों को तुरंत खामोश किया जा सकता है. लेकिन, यह हमारी परम्परा है कि हम हिन्दुओं के लिए अयोग्य न हो. लेकिन हमें मजबूर किया गया, तो हमें उस काम को भी अंजाम देना पड़ेगा।
लेकिन ३० जनवरी १९४८ को उन्हें खामोश कर दिया गया. यह काम आरएसएस के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे द्वारा हमेशा के लिए कर दिया गया. इसके तुरंत बाद हीं आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया गया और गोलवरकर समेत इनके तमाम नेताओं को जेल भेज दिया गया.
महात्मा गांधी अमर रहे
हत्यारा गोड़से मुर्दाबाद
No comments:
Post a Comment