Thursday, October 10, 2019

मन का रावण कोई मारता क्यों नहीं

दशहरा बीत चुका है. आज हम आत्मंथन करें कि हममें से कितने लोगों ने हमारे अंतःकरण से रावण को मारा है. रावण का अर्थ भय, बेईमानी, छल-कपट, चोरी, क्रोध, दुराचार से हैं. क्या हम जितने लोग सोशल मीडिया या रामलीला, झांकी या मेले के रावण को देखा ? क्या उसका अंत कर दिया. हाँ. अगर कर दिया तो बहुत बढ़िया किया परन्तु जिन लोगों ने नहीं किया उनका क्या ? हम समाज के लोगों को कुवार के नवरात्रि के महीने में हीं रावण क्यों नजर आता है ? हम इसी दौरान रावण को मारने के लिए इतने उत्सुक क्यों रहते है ? क्यों नहीं हम हर, दिन हर क्षण अपने अंदर बैठी रावण रुपी बुराइयों को मारने की कोशिश नहीं करते या हम दशहरे में रावण के पुतले को जलाकर अपनी कमियों को छुपाना चाहते हैं. जहां दुधमुँहीं बच्चियों के साथ दुराचार किया जा रहा हो, जहां हमारी बेटियों को मात्र कुछ पैसों और जेवरों के लिए मौत की नींद सुला दिया जाता हो, वहां उस रावण को दण्ड देने के बजाय हम पुतले को जलाकर जश्न मना लेने मात्र से हीं खुश हो जाते हैं. अरे भाई सोच को बदलो, समाज में परिवर्तन दिखने लगेगा. यह परिवर्तन हमें खुद से शुरू करना होगा न कि किसी का इन्तजार करने के बाद.

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