एक दिन पहले और लोक सभा के पहले चुनाव जिनमें ९१ सीटों पर चुनाव होने वाला है उसके तीन दिन पहले बड़ी मेहनत, मशक्क़त के बाद भजपा/संघ का भी घोषणा पत्र (संकल्प-पत्र ) जनता के सामने आ चुका है. भाजपा ने इस संकल्प-पत्र में कोई नई बात तो शामिल नहीं की अलबत्ता रोजगार को छोड़ लगभग पुराने मुख्य वादों को फिर से दोहरा दिया है. जिनका कुछ मुख्य अंश ये हैं -
- कश्मीर से धारा ३७० हटाना
- कश्मीर से धारा ३५ अ हटाना
- अब राम मंदिर का निर्माण न्यायायिक प्रक्रिया के माध्यम से हल करना पहले किसी भी हाल में राम मंदिर का निर्माण करना
- २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पहले यह वादा २०१९ तक के लिए था
- देश के राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा मसलन उग्रवाद और आतंकवाद पर कड़ाई से निपटना पहले २०१४ का भी ये मुख्य अंश रह चुका है
- हलाला पर प्रतिबंध लगाना
- ३३% महिलाओं को आरक्षण देना
इनके अलावा और भी बहुत मुद्दे है फिर भी लगभग ७५ वादों का इनका संकल्प पत्र बन कर जनता के सामने आया है. जब इस संकल्प को पढ़ा गया तो कुछ बातों को देखकर ऐसा लगा कि क्या वाकई ये आडवाणी जी की पार्टी है जिसके लिए उन्होंने उत्तर से दक्षिण तक रथ यात्रा निकाली थी. मैं औरों का तो नहीं जानता पर मेरे लिए यह संकल्प-पत्र किसी झटके से कम नहीं था. उसका उदाहरण मैं आपको बीजेपी/संघ के सबसे बड़े और पुराने मुद्दे राम मंदिर निर्माण के संकल्प से शुरू करता हूँ और आप को याद दिलाना चाहता हूँ कि १९८९ के पालम पुर अधिवेशन में बीजेपी और संघ ने सामूहिक रूप से राम मंदिर निर्माण को लेकर एक आर-पार की जंग छेड़ने की योजना बनाई और अगले आम चुनाव में जब उतरी तो मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर का निर्माण इनके संकल्प पत्र में वचन क्रमांक १ पर था और इसी मानस के साथ जन-जागरण फैलाते हुए बीजेपी चुनाव में गयी और उसे इसका फायदा भी मिला उसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण घटना श्री आडवाणी जी की रत यात्रा भी रही है. इन्हीं राम के सहारे चलते-चलते शीघ्र हीं इन्होने दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली. १९९८ में स्वर्गीय अटल जी पहली बार कुछ दिनों के लिए और दूसरी बार १९९९-२००४ तक सहयोगियों के साथ मिलकर ५ साल तक केंद्र की सत्ता पर विराजमान रहे. उसके बाद उनकी विदाई हो गयी. फिर १० साल के उपरान्त और तीन दशक के बाद किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला तो वो थी नरेंद्र मोदी निति बीजेपी की पार्टी को. जब पूर्ण बहुमत के बाद ये राम मंदिर नहीं बनवा सके, धारा ३७० और धारा ३५ अ, तीन तलाक बिल नहीं हटा सके तो आगे की क्या गारंटी है कि ये ऐसा कर सकते हैं जब बिलकुल साफ़-साफ़ दिख रहा है कि सत्ता के लिए सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी। इनकी सहयोगी पार्टी जीडीयू , लोक जनशक्ति पार्टी और पूर्वोत्तर की तमाम पार्टियां जो इस समय सत्ता में भागिदार हैं उनका बीजेपी/संघ के इन वादों के ठीक विपरीत विचार है और समय-समय पर इन्होने अपनी राय को बहुत हीं बेबाकी के साथ जनता के सामने रखा है तो ऐसी परिस्थिति में यह कैसे सम्भव है. इस पर सरकार को अवश्य रोशनी डालना चाहिए. हाँ इस २०१९ के घोसना पत्र में एक बात तो स्पष्ट है कि बीजेपी/संघ का एक मूल मुद्दा लगातार गिरावट की रहा है और वो है मंदिर निर्माण से संबंधित. मंदिर निर्माण पेज नंबर एक से शुरू होकर आज ३२ साल बाद पेज नंबर ४० पर मात्र दो लाइनों में सिमट कर रह गया है (जो ऊपर उल्लेखित है), परन्तु निरंतरता बनी हुई कि ३२ सालों से राम-भक्त राम मंदिर निर्माण शब्द से हीं बैकुंठ को पहुंच रहे है.
एक मुख्य बात ये है कि बीजेपी ने अबकी बार २०१४ की भांति रोजगार देने का एक निश्चित वादा नहीं किया है मतलब जो पिछली बार दो करोड़ रोजगार का वादा किया था कुछ वैसा अबकी बार नहीं. पूर्व की भांति कालाधन लाने का भी कोई जिक्र नहीं हैं शायद सरकार को लगने लग गया है कि सारा कालाधन विदेशों से अब देश में आ गया है.
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