मीडिया को देखकर आज तरस आ रहा है कि कल शाम से इन्हें मोदी जे के अलावा कोई खबर नहीं मिली। क्या हो गया हैं इन मीडिया वालों को ? क्या इनकी अंतरात्मा इन्हें कभी नहीं झकझोरती होगी कि तुम्हारा काम क्या है और तुम कर क्या रहे हो ? कल शाम से देख रहा हूँ कि कुछेक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल और प्रिंट मीडिया को छोड़कर अब तक लगातार मोदी जी की प्रसंशा में लगे हुए हैं. इन मीडिया वालों की नजर में अब केवल भाजपा और प्रधानमंत्री हीं देश हैं न कि देश की सवा अरब आबादी. मीडिया के गोदी मीडिया बनने की कहानी कल शाम को ६ बजे के आस-पास बी एच यु गेट से शुरू होती है जो लंका, सोनारपुर, मैदागिन, दशाश्वमेध घाट होते हुए आज कचहरी जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचा और मोदी गुणगान में अब तक अनवरत लीं है और अपने धर्म का पालन कर रही है.
अगर चुनाव के संबंध में बात किया जाए तो मोदी जी का वाराणसी से जीतना दीवार पर साफ़-साफ़ अंकित है. जिसकी मुहर कल की भीड़ ने लगा दिया है. वैसे इस सीट पर बीजेपी के हारने का कोई सवाल हीं पैदा नहीं होता था, हां पर लड़ाई कल उस समय एकदम कमजोर पड़ गयी जब प्रधानमंत्री के सामने कांग्रेस ने पिंडरा क्षेत्र के पूर्व विधायक श्री अजय राय जी को मैदान में उतार दिया. इससे पहले देश के प्रतिष्ठित गोदी मीडिया चैनलों ने प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर खूब प्रचार किया और कांग्रेस भी कभी इस बात का खंडन नहीं किया था पर जब प्रियंका गाँधी का नाम वाराणसी संसदीय सीट के लिए चल रहा था तो सबको एक रोचक लड़ाई की उम्मीद थी और सबका अपना-अपना अनुमान था कि अगर प्रियंका गांधी वाराणसी से लड़ने आती हैं तो महागठबंधन अपना प्रत्याशी वापस ले लेगा पर प्रियंका के पीछे हटने का कारण ये भी हो सकता है कि सपा-बसपा गठबंधन पीछे हटने को मना कर दिया हो. बहरहाल अगर प्रियंका जी यहां से चुनाव लड़ती तो यह चुनाव निश्चित तौर पर रोचक होता क्योंकि जब २०१४ के चुनाव में केजरीवाल दिल्ली से यहां चुनाव लड़ने आये थे तो उन्हें १,७९,७३९ कांग्रेस के अजय राय ७५,००० सपा के कैलाश चौरसिया और बसपा के विजय जायसवाल को ५,०००० के करीब वोट मिले थे और मोदी जी को करीब ५,१६,५९३ वोट मिले थे जो अपने निकटम प्रतिद्वंद्वी केजरीवाल को ३,००००० से ज्यादा वोटों से हराया था. इसी का आंकलन करने से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि विपक्ष की तरफ से कोई एक उम्मीदवार आता जो बड़ा चेहरा भी होता तो वो मोदी जी को कड़ी टक्कर दे सकता था. काशी का यह चुनाव अब एक मात्र रस्म अदायगी भर रह गया है. कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय बेशक एक स्थानीय उम्मीदवार है पर उनका चेहरा इतना बड़ा नहीं है कि वो मोदी जी को हरा दे. हाँ अगर मोदी जी की जगह बीजीपी के तरफ से कोई सामान्य चेहरा होता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अजय राय जी अच्छी लड़ाई लड़ते और उनकी जीत की प्रबल भी संभावनाएं रहती. अब यह चुनाव खुल गया है और अब बस यह देखना है कि मोदी जी अपनी जीत के अंतर और कितना इजाफा कर पाते हैं.
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