Monday, April 15, 2019

रामनवमी की रात हरिद्वार की यात्रा

जैसा कि शनिवार के दिन रामनवमी थी और मैं अपने आफिस के कायों में ब्यस्त था. शाम को लगभग साढ़े 7 बजे मैं अपने घर पर पहुँचा चाय पिया और IPL का आनंद उठा रहा था जभी अचानक कुलदीप का फ़ोन आया कि दीपू चाचा गाजियाबाद आये हुए हैं और उनसे मिलने के लिए बाहर सड़क पर आओ. मुझे उनके आने पर कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि चाचा आते रहते हैं क्योंकि वो उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे में कार्यरत है तो मुजफ्फर नगर में चुनावी ड्यूटी में आये थे. खैर मैं उनसे मिला फिर अचानक कुलदीप ने कहा कि चाचा हरिद्वार चलने के लिए कह रहें हैं और आप भी चलोगे तो मुझे यकीन नहीं हुआ फिर चाचा ने कहा कि सच में हरिद्वार चलना है और माँ गंगा में नहाकर पाप धोना है फिर मैं मजाक में बोला फिर तो माँ गंगा मैली हो जायेगी बजाय पाप धोने के हम माँ को साफ़ और पवित्र बनायें। मजाक यहीं खत्म हुआ लेकिन मेरे सामने ये परेशानी थी कि अगले दिन यानी रविवार 15 अप्रैल को आधा ऑफिस खुला हुआ था तो मैंने अपनी परेशानी चाचा जी को बताई फिर भी उन्होंने कहा कि तुम्हे (मुझे) चलना होगा फिर हर तरफ से सोच समझकर मैंने एक कैलकुलेटेड रिस्क लेने की हिम्मत किया और बात कल के लिए छोड़ दिया। रूपक त्यागी घर गाड़ी लेकर आये और रात 12 बजे के आस-पास मैं और कुलदीप (केडी) अपने घर से सेवानगर दीपू चाचा को लेने के लिए वो महाशय अभी आता हूँ, अभी आता हूँ कह-कह कर 1 घंटे लगा दिए जब हम तीनों मैं, केडी, रूपक भैया जहां रुके थे उस गली में उनको लेने जाने लगे तो वो आते हुए दिखे फिर वहां से निकल कर रूपक के घर पहुचें अंततः 2 बजे के बाद हम हरिद्वार के लिए निकले। रास्ते में हंसी-मजाक और मस्ती और जगह-जगह रूकते हुए हम सुबह साढ़े 6 बजे हरिद्वार पहुंचे फिर ये निर्णय लिया गया कि अब चलना कहाँ हैं ? अब तक केडी गाड़ी चला रहे थे. फिर एकमत से ये तय हुआ कि हम सबसे पहले ऋषिकेष चलेंगे और हम वहां से हम अपने गंतब्य स्थान के लिए प्रस्थान कर चुके थे. गाड़ी में धीरे-धीरे सन्नाटा हो गया था चूँकि मैं कार की आगे वाली सीट पर बैठा था और अब रूपक भैया बोले देखो यार लोग शांत कैसे हैं मैं पीछे मुड़ के देखा था तो सिपाही (दीपू चाचा) और केडी चीयर निद्रा में लीं हैं आवाज देने के बाद भी उनके स्तिथि में कोई परिवर्तन नहीं हुआ फिर हम दोनों आपस में बात करते हुए रास्ता काट रहे थे और ऋषिकेष पहुंचते हीं विचार बना कि भगवान नीलकंठ के दर्शन करने को ऊपर पहाड़ पर चलते हैं तो गाड़ी उस और मोड़ दी गयी और रास्ते में जब पहाड़ियाँ और नदियाँ दिखी तो मानो दिल हर्षित हो गया और ऐसा लगा कि दिल कह रहा हो कि अब यहीं हमेशा-हमेशा के लिया रूक जाए. जब चाचा को जगाया तो वो अति प्रसन्न हुए और गाड़ी रुकवा कर निचे उत्तर गए और वहाँ की खूबसूरती को कौतूहल भरी नजरों से निहारने लगे और सहसा बोल उठे यार क्या जगह है ? अब तक मैं यहां आने से महरूम कैसे रहा ? आजकल सेल्फी का जमाना चल रहा है तो वहां हमने सेल्फी लिया और ऊपर की तरफ लगातार चलते जा रहे थे और इसी तरह के मनमोहक दृश्य एक के बाद एक उभर कर सामने आ रहे थे जिनको देखने के बाद मन तनाव मुक्त हो जाता था. धीरे-धीरे हम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते गए और नीलकंठ की पहाड़ी पर जा पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद हम लोग स्नान-ध्यान किया और बाबा के दर्शन के बाद हमने कुछ फोटो खींचे फिर वहां से अगले स्थान के लिए निकले फिर वापस हम हरिद्वार वापस आये वहां खाना-पीना हुआ. अब हमारा अंतिम था हम हरकी पैड़ी पहुंच चुके थे फिर हम सबने गंगा जी में घंटे भर डूबकी लगाई और पानी इतना शीतल था कि हाथ लगाना भी भारी पड़ रहा था. रविवार छुट्टी का दिन होने के नाते हरकी पैड़ी पर लोगों की बहुत भीड़ थी तो उनको नहाता देख हम भी पानी में उतरे नहाने के बाद हम 3 बजे दोपहर में हरिद्वार से वापस घर के लिए निकले और पुराने बस अड्डे पर भोजन करते हुए रात साढ़े 10 बजे अपने घर को सकुशल सभी लोग पहुंच चुके थे. इस यात्रा का अनुभव अनुत्तरित करने वाला रहा है और फिर से जाने की इच्छा जागृति हो रही है.       

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